Archive for category: कविता

आतंकवादी बनाम मच्छर

0 नरेन्द्र निर्मल / 2009/05/31 8:48 pm

एक मच्छर और एक आतंकवादीदोनो की बढ़ रही है आबादीदोनो का नाता बस खून से हैएक इंसान का खून पीता हैतो दूजा खून बहाता है।इसलिए पीने वाला मच्छरऔर बहाने वाला

रास्ता होता है….बस नज़र नहीं आता……….!!

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/26 9:17 am

रास्ता होता है….बस नज़र नहीं आता……….!!कभी-कभी ऐसा भी होता है हमारे सामने रास्ता ही नहीं होता…..!! और किसी उधेड़ बून में पड़ जाते हम…. खीजते हैं,परेशान होते हैं… चारों तरफ़

माँ एक संक्रामक प्रत्तय

6 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/23 12:37 pm

माँ एक संक्रामक प्रत्तयमाँ …मैं क्यों कह दूँ तुम्हेंदेवी -?क्यों ?कि तुम मेरे पहले गुरू थेजबकि मैं तुमसे उन सब के लिए लड़ाजिनके लिए मैं अब भी लड़ पड़ता हूँतुम

हम तो बस करतब दिखा रहे हैं……!!

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/22 9:04 am

हम तो बस करतब दिखा रहे हैं……!! चार बांसों के ऊपर झूलती रस्सी….. रस्सी पर चलता नट…. अभी गिरा,अभी गिरा,अभी गिरा मगर नट तो नट है ना चलता जाता है….

अपनी अमीरी पर इतना ना इतराओ लोगों……!!

2 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/18 8:41 am

अपनी अमीरी पर इतना ना इतराओ लोगों……!! मैं भूत बोल रहा हूँ……….!! तूम अमीर हो,यह बात कुछ विशेष अवश्य हो सकती है मगर,वह गरीब है…. इसमें उसका क्या कसूर है…..??

ओ माँ…..तेरे बारे में मैं क्या कहूँ….मैं तो तेरा बच्चा हूँ….!!

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/10 10:56 am

ओ माँ…..तेरे बारे में मैं क्या कहूँ….मैं तो तेरा बच्चा हूँ….!! माँ के बारे में मैं क्या कहूँ अब………आँखे नम हो जाती हैं माँ की किसी भी बात पर……..दरअसल माँ

दर्द

2 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/07 2:52 pm

दर्द संभाले कब तक आख़िर ,हर दर्द एक दास्ताँ होता है । दिन ढलते ही रत जवांहोती है ,हर रात अनोखी शमांहोती है॥हुश्न मनो दुकांहोता है ,दिल जिसका मकांहोता है

आँखे

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/07 2:16 pm

देखकर वो झुका गई आँखे , ख़ुद ब ख़ुद ही भर गई आँखे । मौसम का असर मत पूछ , सिंदूरी लाल हो गई आँखे ॥ जब जब वो चली

संवेदना को टटोलती महान हिन्दी सेवी सुभाष सहगल की दो कविताएँ

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/01/17 6:18 pm

संवेदना संवेदना के क्षेत्र मैं दीपक जलाएं , कृष्ण की गीता को हम आगे बढायें। कर्म को काण्ड से हम तोडें सभी कर्म के संग मर्म को जोडें सभी धर्म

विविधता में एकता

विविधता में एकता

24 जनोक्ति डेस्क / 2008/10/10 5:03 pm

रज़िया एक ही इश्वर एक ही अल्लाह, एक रंग का है हर ख़ून। फ़िर निर्दोषों की लाशों पर चढ, मंदिरों की घंटनाद या मस्जिदों की अज़ान से, कैसे मिलेगा चैन