Archive for category: कविता

नन्हा दीपक

नन्हा दीपक

0 शारदा मोंगा / 2010/11/09 8:10 am

नन्हा दीपक- मगन, संकल्प की- लगन. ठान लिया, भगाना- है तम ! अमावस की रात! देना- कलुषता को मात, आंगन के कोने, प्रकाशपुंज से, जगमगाए- भागी रात

दीपावली गली गली बनके ख़ुशी छाई

0 शारदा मोंगा / 2010/11/07 1:18 am

दीपावली गली गली बनके ख़ुशी छाई रे, रोशनी की चादर ओढे दीपावली आई  रे.  आज की यह रात करें दूर अँधेरा, दीप जलें ऐसे लगे जैसे सवेरा . प्यार की

दीप से दीप जले,भरा प्यार का तेल

2 शारदा मोंगा / 2010/11/03 8:06 am

दीप से दीप जले,  भरकर प्यार का तेल. लाये प्यार की सौगात, हुआ सुरभित मेल, हुआ सुरभित मेल, भूल गिला शिकवा,  गले से गले मिलें,  मेल करें सब मितवा,   मेल करें सब

आलि रे! आई दीवाली.

आलि रे! आई दीवाली.

0 शारदा मोंगा / 2010/11/02 8:09 am

आलि रे! आई दीवाली. दीपों की बारातों के संग खुशियों की सौगातों के संग किशमिश,मेवा, मिश्री, आलि ! लाई रे, लाई दीवाली. आलि रे! आई दीवाली. पर्वों का यह माह

महँगी हुई दीवाली

महँगी हुई दीवाली

0 जनोक्ति डेस्क / 2010/11/01 9:41 pm

आजकल हर चीज बहुत महंगी है , यह कविता एक पिता की भावनाओं को वयक्त करती है महँगी हुई दीवाली अब पापा क्या करें पापा की जेब है खाली अब

दीप से दीप जला दो,

1 शारदा मोंगा / 2010/11/01 9:28 am

दीप से दीप जला दो  माँ! मेरे बिछुड़े हुए मिला दो, दीप से दीप जला दो. विपदा की- घनघोर घटाएं छाईं, आज बने हैं- दुश्मन भाई भाई. भेद भाव और

कविता क्या है ?

कविता क्या है ?

8 देवी नागरानी / 2010/10/27 1:21 pm

कविता क्या है ! लेखन कला एक ऐसा मधुबन है जिसमें हम शब्द बीज बोते हैं, परिश्रम का खाध्य का जुगाड़ करते हैं और सोच से सींचते हैं, तब कहीं

कौन हूँ मैं!

कौन हूँ मैं!

6 डॉ. शालिनीअगम अग्रवाल / 2010/10/25 10:14 am

कोकिल जितना घायल होता उतनी मधुर कुहुक देता है जितना धुंधवाता है चंदन उतनी अधिक महक देता है मैने खुद को ना जाना था,ना पहचाना था, कौन हूँ ,क्या हूँ

माटी में आँचल में अँकुआता बीज

माटी में आँचल में अँकुआता बीज

1 प्रतिभा सक्सेना / 2010/10/21 7:17 am

कौन गति . एक नन्हीं -सी ज्योति ! माटी में आँचल में अँकुआता बीज ! काल -धारा में बहे जा रहे जीवन को निरंतरता की रज्जु में बाँधता , भंगुर

हाँ ! गर्व है मुझे भारतीय होने प़र

हाँ ! गर्व है मुझे भारतीय होने प़र

4 डॉ. शालिनीअगम अग्रवाल / 2010/10/21 5:20 am

हाँ ! गर्व है मुझे भारतीय होने प़र मुझे गर्व है अपनी हिंदी प़र, अपने माथे की बिंदिया प़र, हाथों की मेहँदी प़र, खनखनाती चूड़ियों प़र, अपने भारतीय आचार-विचार और