नन्हा दीपक
0नन्हा दीपक- मगन, संकल्प की- लगन. ठान लिया, भगाना- है तम ! अमावस की रात! देना- कलुषता को मात, आंगन के कोने, प्रकाशपुंज से, जगमगाए- भागी रात
मुख पर मलकर लाल गुलाल, प्रेमरस में भीग बेहाल, माथे पर टेसू की रोली लिए संग फूलों की टोली बसंत चला खेलने होली, फूल-पत्तों के बंधन वार, सजाया प्रकृति ने है द्वार, सरसों का बिछा कालीन, संगीत-गोष्ठी जमी सब लीन, कवि पांखी
सन सैंतालिस में किसने धोखा दिया ? जबकि देश ने इन पर भरोसा किया ॥ बेरोजगारी,महँगाई से जनता है त्रस्त । अन्न सड़ रहा गोदामों में नेता हो गए भ्रष्ट
हम सब भ्रष्टों* से त्रस्त** हैं, भ्रष्ट सारे अपने में मस्त हैं । क्योंकि; त्रस्तों में से कुछ के हौसले पस्त हैं, कुछ पर इनका वरदहस्त है , लेकिन; स्वामी
नन्हा दीपक- मगन, संकल्प की- लगन. ठान लिया, भगाना- है तम ! अमावस की रात! देना- कलुषता को मात, आंगन के कोने, प्रकाशपुंज से, जगमगाए- भागी रात
दीपावली गली गली बनके ख़ुशी छाई रे, रोशनी की चादर ओढे दीपावली आई रे. आज की यह रात करें दूर अँधेरा, दीप जलें ऐसे लगे जैसे सवेरा . प्यार की
दीप से दीप जले, भरकर प्यार का तेल. लाये प्यार की सौगात, हुआ सुरभित मेल, हुआ सुरभित मेल, भूल गिला शिकवा, गले से गले मिलें, मेल करें सब मितवा, मेल करें सब
आलि रे! आई दीवाली. दीपों की बारातों के संग खुशियों की सौगातों के संग किशमिश,मेवा, मिश्री, आलि ! लाई रे, लाई दीवाली. आलि रे! आई दीवाली. पर्वों का यह माह
आजकल हर चीज बहुत महंगी है , यह कविता एक पिता की भावनाओं को वयक्त करती है महँगी हुई दीवाली अब पापा क्या करें पापा की जेब है खाली अब
दीप से दीप जला दो माँ! मेरे बिछुड़े हुए मिला दो, दीप से दीप जला दो. विपदा की- घनघोर घटाएं छाईं, आज बने हैं- दुश्मन भाई भाई. भेद भाव और
कविता क्या है ! लेखन कला एक ऐसा मधुबन है जिसमें हम शब्द बीज बोते हैं, परिश्रम का खाध्य का जुगाड़ करते हैं और सोच से सींचते हैं, तब कहीं
कोकिल जितना घायल होता उतनी मधुर कुहुक देता है जितना धुंधवाता है चंदन उतनी अधिक महक देता है मैने खुद को ना जाना था,ना पहचाना था, कौन हूँ ,क्या हूँ
कौन गति . एक नन्हीं -सी ज्योति ! माटी में आँचल में अँकुआता बीज ! काल -धारा में बहे जा रहे जीवन को निरंतरता की रज्जु में बाँधता , भंगुर
हाँ ! गर्व है मुझे भारतीय होने प़र मुझे गर्व है अपनी हिंदी प़र, अपने माथे की बिंदिया प़र, हाथों की मेहँदी प़र, खनखनाती चूड़ियों प़र, अपने भारतीय आचार-विचार और