आशा -किरण
1: – कविता विकास धुंध के उस पार जो प्रकाश -पूँज है वह महज किरण नहीं इक आस है। भेदकर अंधकार की शून्यता जो आती है , अरमानों की बगिया
केदारनाथ ”कादर” (१९.०१.२०१२) नेता जी ! ऊब चुके हैं हम आपके मन लुभावन वायदों से चांदनी चौक टू चाईना होने के सपने बहुत सुंदर हैं आपके लेकिन, आपके द्वारा खर्च हुए
नए साल की प्रातः बेला में, आओ मिलकर दिया जलाएँ; ईश्वर से हम करें प्रार्थना, उच्च आदर्शों के पुष्प चढ़ाएँ. सरक जाता है जिस तरह रेत समझ ले मानव मुठ्ठी
कहते है लोग काला हूँ मैं! न काला रंग है मेरा न काला मन मेरा न काले कर्म है मेरे न इरादों मे कालापन है क्यूं कहते है लोग काला
: – कविता विकास धुंध के उस पार जो प्रकाश -पूँज है वह महज किरण नहीं इक आस है। भेदकर अंधकार की शून्यता जो आती है , अरमानों की बगिया
केदारनाथ ”कादर” (१९.०१.२०१२) नेता जी ! ऊब चुके हैं हम आपके मन लुभावन वायदों से चांदनी चौक टू चाईना होने के सपने बहुत सुंदर हैं आपके लेकिन, आपके द्वारा खर्च हुए
नए साल की प्रातः बेला में, आओ मिलकर दिया जलाएँ; ईश्वर से हम करें प्रार्थना, उच्च आदर्शों के पुष्प चढ़ाएँ. सरक जाता है जिस तरह रेत समझ ले मानव मुठ्ठी
कहते है लोग काला हूँ मैं! न काला रंग है मेरा न काला मन मेरा न काले कर्म है मेरे न इरादों मे कालापन है क्यूं कहते है लोग काला
माँ करती हूँ, तुझे मै नमन तेरी परविरश को करती हूँ नमन प्यासे को मिलता जैसे पानी, माँ तू है वो जिंदगानी , नो महीनो तक सींचा तूने लाख परेशानी सही तूने ,
बूढ़ी हड्डी में आई नई जवानी है अडवाणी ने फिर एक जिद ठानी है, निकल पड़ें हैं रथ लेकर जनता को जगाने भ्रष्टाचार, महंगाई को देश से भगाने घूम रहे
जुदाई में तेरी मत पूछ -“क्या हुआ मेरा हाल” जुदा होकर तुमसे कैसे कहूं -”क्या दिन थे वो” वो दिन, दिन नही, मेरे लिए तो रात थे, हर पल तुम्हे याद करती , वो पल
शिक्षक तेरा धन्यवाद, दिया है तुमने हमे वरदान , हूँ जहाँ भी आज मै उसमे, तेरा बड़ा है योगदान, नही है शब्द करूं मै कैसे तेरा धन्यवाद, बस चाहिए तेरा आशीर्वाद, शिक्षक की महिमा होगी ना
बापू सुनिए देष का प्रादेषिक समाचार लिए तिरंगा हाथ में उमड़ा है जन-ज्वार सबको बराबर न्याय मिले छिने न मुँह का कौर अन्ना जी संग लगा रहे हैं भारतवासी दौड़
वो कहते है वो कहते है कि “भूल जाऊ में उन्हें ”, पर कोई बताये तोह हमे कि भला ये कैसे मुमकिन है? जबकि बसा हो कोई हर सांस में