Archive for category: साहित्य-सिनेमा

विनाशकारी लहरें

2 नरेन्द्र निर्मल / 2009/06/06 10:33 pm

जब लहरों से टकराये पत्थरवो पत्थर भी पल में बिखर जाता हैरेत बनके वो कण-कण से पत्थरसमन्दर में जाके वो मिल जाता हैजब लहरों से टकराये पत्थरखेवईयां चलाए बस्तियों कोबस्तियों

तुम्हे कैसे याद करूं भगत सिंह ?

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/06/04 10:15 am

जिन खेतों में तुमने बोई थी बंदूकेंउनमे उगी हैं नीली पड़ चुकी लाशेंजिन कारखानों में उगता था तुम्हारी उम्मीद का लाल सूरजवहां दिन को रोशनी रात के अंधेरों से मिलती

बेचारा पप्पू …….. शायद कभी पास नहीं होगा !

0 नरेन्द्र निर्मल / 2009/06/03 9:19 pm

बचपन से ही शर्मीला किस्म का इंसान। लड़कियां तो दूर लड़कियों के शब्द से भी सिरहन सी होने लगती। दोस्त कई सारे हुए मगर सभी समान लिंग वाले। इसका कदापि

एक व्यंग : बड़े साहब का बाथरूम ….

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/06/02 10:13 pm

एक व्यंग : बड़े साहब का बाथरूमट्रिन ! ट्रिन !-टेलीफोन की घंटी बजी ‘हेलो !हेलो! ,बड़े साहब हैं?”“आप कौन बोल रहे हैं?”: आफिस से बड़ा बाबू बोल रहा हूँ “”

आतंकवादी बनाम मच्छर

0 नरेन्द्र निर्मल / 2009/05/31 8:48 pm

एक मच्छर और एक आतंकवादीदोनो की बढ़ रही है आबादीदोनो का नाता बस खून से हैएक इंसान का खून पीता हैतो दूजा खून बहाता है।इसलिए पीने वाला मच्छरऔर बहाने वाला

हास्य-व्यंग…….: एक व्यंग : सियारिन और हुआं हुआं…..#links#links

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/30 8:51 pm

हास्य-व्यंग…….: एक व्यंग : सियारिन और हुआं हुआं…..#links#links

रास्ता होता है….बस नज़र नहीं आता……….!!

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/26 9:17 am

रास्ता होता है….बस नज़र नहीं आता……….!!कभी-कभी ऐसा भी होता है हमारे सामने रास्ता ही नहीं होता…..!! और किसी उधेड़ बून में पड़ जाते हम…. खीजते हैं,परेशान होते हैं… चारों तरफ़

माँ एक संक्रामक प्रत्तय

6 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/23 12:37 pm

माँ एक संक्रामक प्रत्तयमाँ …मैं क्यों कह दूँ तुम्हेंदेवी -?क्यों ?कि तुम मेरे पहले गुरू थेजबकि मैं तुमसे उन सब के लिए लड़ाजिनके लिए मैं अब भी लड़ पड़ता हूँतुम

हम तो बस करतब दिखा रहे हैं……!!

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/22 9:04 am

हम तो बस करतब दिखा रहे हैं……!! चार बांसों के ऊपर झूलती रस्सी….. रस्सी पर चलता नट…. अभी गिरा,अभी गिरा,अभी गिरा मगर नट तो नट है ना चलता जाता है….

अपनी अमीरी पर इतना ना इतराओ लोगों……!!

2 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/18 8:41 am

अपनी अमीरी पर इतना ना इतराओ लोगों……!! मैं भूत बोल रहा हूँ……….!! तूम अमीर हो,यह बात कुछ विशेष अवश्य हो सकती है मगर,वह गरीब है…. इसमें उसका क्या कसूर है…..??