आज मैं सूखा सुमन हूँ
2आज मैं सूखा सुमन हूँ, इक दिन था कोमल कली, वृक्ष की गोद में सुरक्षित, पवन झुलाये दे झूल्ली, कोमल किरणे चन्द्रिका की , गुदगुदातीं खिली खिली, तुहिन के बिछोने
सम्वेदन शून्य हो गया मनुज अब क्या होगा शासन का डर रह नही गया क्या होगा पुलिस खड़ी है मूक बनी पिटने के डर से गुंडे बदमाश घुमते खुले आम
भक्त प्रवर रामकृष्ण परमहंस अक्सर कहा करते थे कोई स्थल तीर्थस्थल नहीं होता,तीर्थस्थान तो वहीं बन जाता है जहाँ महान आत्माएं निवास करती हैं.बिहार की सांस्कृतिक राजधानी कहलाने का गौरव
स्टेशन की सीढियां चढ़ते हुए हर रोज़ रास्ता रोक लेती हैं कुछ निगाहें अजीब से सवाल करती हैं और मैं नज़रें बचाते हुए हर बार की तरह आगे बढ़ जाता
आज मैं सूखा सुमन हूँ, इक दिन था कोमल कली, वृक्ष की गोद में सुरक्षित, पवन झुलाये दे झूल्ली, कोमल किरणे चन्द्रिका की , गुदगुदातीं खिली खिली, तुहिन के बिछोने
मेरी कामना: कि- मधुर वार्तालापों के अंतराल, अविरल, प्रेमपूर्ण निहारूं कि- स्वहस्त नव निर्मित लिफाफे में, प्रेमी को लिखे पत्र के साथ बंद रहूँ. कि- खेत जोतने के परिश्रम से,
माया वती की अजब है माया, ओढ़े है दलितों की काया, अचरज में है सब को डाला, किया है कैसा घोटाला, दलितों के उद्धार नाम से, उन्हें और अधिक धो
प्रिय निकट आओ मेरे, तनिक- आराम तो करलूं, काम मैं फिर- निपट लूँगा, क्षणिक- विश्राम सा कर लूँ. तुम बिन- जीना है दुश्वर, न तुमसे दूर- रहूँ किंचित, बिन किनारे- समुद्र में, परिश्रम करने सा मुश्किल. आज-
जीवन अस्थिर- सपनों सा, धुन्दले उलझे चित्रों सा, निद्रावस्था के सपने, दिवा स्वप्न लगें अपने, कल्पनाओं के घोड़ों पर, इच्छाओं के कोड़ो पर, मृगतृष्णा के आकाश में, भटके बिन प्रकाश
मैं तटनी तरल तरंगा मीठे जल की निर्मल गंगा पर्वत की मैं बिटिया नदी की निर्मल धारा उद्गम स्थल की शिशुबाला, सखी-धाराओं संग मिल क्रीडा करती, खिलखिलाती, गाती, इठलाती, इतराती,
सखि प्राणप्रिये हे सुंदरी! मम हृदय कुञ्ज निवासिनी. मृदु मंद गंधित कमलनयनी, सौरभ सुखद सुहासिनी. नवनील नीरज नीरजा, अरविन्द पुष्ट उरोजिनी. मुकुलित कुमुद मृणालिनी, मम हृदय कुञ्ज निवासिनी. मुखारविंद,कर,पद्म चरण,
बगीचों में अलग-अलग रंग के फूल और उनका सुवास चारों ओर के वातावरण को स्फूर्ति दायक बना देता है. बच्चे,बूढ़े,जवान सभी का मन करता है कि बगीचे के आनंद का
प्राण मित्रो भले ही गवाना, पर यह झंडा न नीचे झुकाना. तीन रंगा है झंडा हमारा, बीच चक्र चमकता सितारा. शान है यह इज्जत हमारी, सर झुकाती इसे हिंद सारी.
पेशावर में मेरा जन्म हुआ. अखंडित भारत के पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रदेश में तथा अफगानिस्तान के दक्षिण से संलग्न पेशावर एक व्याख्यात एतिहासिक/ व्यापारिक केंद्र रहा है. दुर्भाग्य से १९४७ में