Archive for category: साहित्य-सिनेमा

स्पर्श प्यार का

स्पर्श प्यार का

2 जनोक्ति डेस्क / 2012/03/15 9:56 pm

लेखक – “कविता विकास” दिल में आशियाँ बनाने वाले ,काश ऐसा होता कभी सैर के बहाने ही आते ,दिलासा तो मिलता । बादलों संग आँख मिचौली खेलना ,चाँद की फितरत जी

‘ अनजाने में ‘ (बनफूल की कहानियाँ)

‘ अनजाने में ‘ (बनफूल की कहानियाँ)

0 जयदीप शेखर / 2012/02/16 9:59 pm

उस दिन ऑफिस में तनख्वाह मिली। घर लौटते हुए सोचा, उसके लिए एक नाईटी खरीदकर लेता चलूँ। बेचारी बहुत दिनों से कह रही है। इस दुकान उस दुकान से ढूँढकर

‘रेणु’ की धरती पर साहित्यकारों का समागम

‘रेणु’ की धरती पर साहित्यकारों का समागम

0 अरविन्द श्रीवास्तव / 2012/02/14 4:40 pm

- साहित्य की मुख्यधारा प्रगतिवाद है! – नवसाम्राज्यवाद के खतरे से दुनिया को बचाने का संकल्प! – लेखक ही अगुवा बनकर समाज को रौशनी दिखायेगा! – आन्दोलन की कमान युवा

प्रवासी हिंदी साहित्य:उपलब्धियां और अपेक्षाएं

प्रवासी हिंदी साहित्य:उपलब्धियां और अपेक्षाएं

0 देवी नागरानी / 2012/02/08 4:02 pm

महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी के सहयोग से एसआयईएस कॉलेज के हिन्दी विभाग एवं कथा यू.के.(लन्दन) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित द्वि-दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय परिसंवाद (२७-२८ जनवरी २०१२) प्रवासी हिंदी साहित्य:उपलब्धियां

भाषा पर ग्रहण

2 गंगानंद झा / 2012/02/07 1:29 am

आज के भारत के परिप्रेक्ष्य में भाषा के संस्कृति के साथ अन्योन्याश्रयी रिश्ते पर कुछ और बात की जाए। आज के काल-खण्ड में हमारे लिए यह रिश्ता तीव्र तनाव से

जिन्हें नाज़ है भोजपुरी पे वो कहाँ हैं ?

जिन्हें नाज़ है भोजपुरी पे वो कहाँ हैं ?

0 जनोक्ति डेस्क / 2012/02/05 1:48 pm

भोजपुरी सिनेमा अपने पचासवे पायदान पर आ चुका है और हालात कुछ ऐसे हैं जैसे पुरे भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को मुंह छिपाने की जगह ना मिल रही हो | सब

“बनफूल” की कहानियाँ / 3. अपना-पराया

“बनफूल” की कहानियाँ / 3. अपना-पराया

0 जयदीप शेखर / 2012/01/31 9:17 pm

अपना-पराया सारे सुबह की मेहनत के बाद दोपहर दक्षिण तरफ के बरामदे पर एक बिस्तर बिछाकर जरा लेटा था। नीन्द अभी आयी ही थी कि चेहरे पर थप्-से क्या एक

कलम का सिपाही-श्री जीवतराम सेतपाल

0 देवी नागरानी / 2012/01/30 11:46 am

“श्री सेतपाल जी ज़िंदगी को बारीकी से पकड़ते हैं और उसे जीवंत बनाते है। इन लघुकथाओं में ज़िंदगी धड़कती है, ज़िंदगी रोती है, ज़िंदगी जीने के रास्ते निकालती है।“  यही

अटेंशन – एक व्यंग्य कथा !

0 जनोक्ति डेस्क / 2012/01/29 10:12 pm

Vijay Kumar Sappatti कुछ दिन पहले तक मेरी हालत बहुत खराब थी . मुझे कहीं से कोई भी अटेंशन नहीं मिल रही थी . हर कोई मुझे बस टेंशन देकर

‘बेटियाँ मौसम सुहाना/ बेटियाँ मीठा तराना’

‘बेटियाँ मौसम सुहाना/ बेटियाँ मीठा तराना’

2 जनोक्ति डेस्क / 2012/01/22 3:37 pm

भोपाल उत्सव मेला में कवि-फि़ल्मकार अनिल गोयलकी प्रदर्षनी ‘बिटिया की चिठिया’ कवि-फिल्मकार अनिल गोयल के अनूठे रचनात्मक प्रयोग ‘बिटिया की चिठिया’ शीर्षक बहुचर्चित कविता पोस्टर प्रदर्शनी का शुक्रवार , 20