Archive for category: स्मृति-लेख

सिस्टम की अफीम

सिस्टम की अफीम

0 amita neerav / 2010/07/22 10:21 am

सुबह ट्रेन से उतरते ही यूँ लगा कि बस नैनीताल फैलता हुआ मेरे स्वागत के लिए काठगोदाम तक आ पहुँचा है। मैं यहाँ पहली बार आया हूँ। बाहर निकलते ही

बिहारियों के प्रति गलत धारणा क्यों?

बिहारियों के प्रति गलत धारणा क्यों?

0 अजय केशरी / 2010/06/02 4:44 pm

मै कुछ साल पहले कोटा (राजस्थान) जा रहा था क्यों कि मेरा बड़ा पुत्र इंजीनियरिंग की तैयारी कोटा से ही कर रहा था। मै पटना से दिल्ली गया, दिल्ली से

उसके दो उजले मासूम से पैर …

उसके दो उजले मासूम से पैर …

0 अभिषेक कुमार सिंह / 2010/01/23 6:24 pm

पुस्तके पढ़ने का शौक कभी इतना भारी पढ़ेगा, सोचा भी नहीं था। प्रेम कथाओं को पढ़ने में बढ़ा ही आनन्द मिलता था। एक पुरसकुन की प्राप्ति होती है। ‘कसप’ पढ़ी

कबीर-साहित्य में समाज सुधार का शंखनाद :रामगोपाल राही

कबीर-साहित्य में समाज सुधार का शंखनाद :रामगोपाल राही

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/10/28 10:55 pm

                                                                                   लेखक: रामगोपाल 'राही' कबीर साहित्य में जहाँ दर्शन, अध्यात्म, ज्ञान, वैराग्य की गूढता मिलती है, वहीं उनके साहित्य में समाज सुधार का शंखनाद भी है। वह दार्शनिक होने के

उदबोधन का दूसरा कवि पैदा नहीं हुआ

उदबोधन का दूसरा कवि पैदा नहीं हुआ

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/10/20 1:53 pm

                            "सुनूँ क्या सिंधु मैं गर्जन तुम्हारा, स्वयं युगधर्म का हुँकार हूँ मैं                                                         

राजनीति के देनदार रहे जयप्रकाश

0 नरेन्द्र निर्मल / 2009/07/02 5:56 pm

एक शख़्स, जिसके बारे में मैं कुछ दिनों पहले तक अनभिज्ञ था। इसका कदापि तात्यर्प नहीं कि मैं उन्हें बिल्कुल नहीं जानता था। बल्कि उनकी संद्घर्ष की दासता और उनके