Archive for category: गीत-ग़ज़ल

हिमालय

3 जनोक्ति डेस्क / 2009/06/26 10:34 am

हिमालय की बुलंदी कहती है अपने जवानों से ।कि देख़ो छुट ना जाये कंही दुश्मन निशानों से।हिमालय की बुलंदी कहती है अपने जवानों से …ये आज़ादी जो हमने पाइ है,

खोया आसमा

1 नरेन्द्र निर्मल / 2009/06/17 9:44 pm

दिल तो खोया है खोई जमीं हैखोया जो आंसमा है-२चांद भी खोया है, तारे भी खोये है-२खोया जो सारा जहां है-ओ-२दिल तो खोया है…आसमां है-२दिल भी धड़का है तेरी ही

चंदा मामा है खास

2 नरेन्द्र निर्मल / 2009/06/16 11:22 am

चंदा है दूर फिर भी, मामा है करीब अपनेमामा की लोरी सुन के, देखे सारे बच्चे सपनेरिश्ता ये अजब निराला ओ देखोबाप का बन गया सालाहो चंदा मामा, बाप का

badal ने badal को barsaya है

2 नरेन्द्र निर्मल / 2009/06/15 9:55 am

गीत गाते हैं तारे-गुन गुनाते हैं सारे-२क्या फिर मौसम जो आया हैबादल ने बादल को फिर बरसाया है-२गीत गाते हैं तारे-गुन गुनाते हैं सारे-२ झूमती है ये नदियां, झूमता है

मंजर

2 जनोक्ति डेस्क / 2009/06/07 4:08 pm

उसको छूकर गुजर गए जो मंजर , आंखों ही आंखों में उतर गए मंजर । आहे मजलूम का असर मत पूछ , खाक जैसे बिखर गए मंजर । । वो

तन्हाई

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/06 1:55 am

हम तो जी रहे हैं आपके सहारे ,अब इस जहाँ से रुसवाई क्या होगी ।तनहा जिया था अब तक ,अब बर्दाशत तन्हाई क्या होगी ।वक्त बेवक्त याद आयेगी आपकी ,मैखाने

रुसवाई

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/05 4:21 pm

शमां जली शाम को और ,अँधेरा मेरी जिन्दगी को कर गई ।जब रौशन हुआ शमां तो ,दहशत उजालों से हो गई ।।अबके बरसा ना अब्रे शौक ,भ्रम उनके परछाई की

भीड़ में चलते बुलाता है कोई ……

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/02/02 9:21 pm

कल अरसेबादउदयेश रवि जी से मुलाकात दौरान ये ग़ज़ल मेरे हाथ लगी जो आप तक पहुँचा रहा हूँ ।

तैयार सिपाही हो जा

9 जनोक्ति डेस्क / 2008/07/31 9:36 pm

सरहद ने दी आवाज़, तैयार सिपाही हो जा। दुश्मन ना आया बाज़। ‘तैयार सिपाही हो जा।”है ऑधी चली उधर से, ये धुंधला हुआ समॉ है।ये फिज़ाओं में डर कैसा? ये

कर्मयोगी

4 जनोक्ति डेस्क / 2008/07/29 11:52 am

चलो जलायें दीप वहॉ,जहॉ अभी-भी अँधेरा है।कदम बढाऎ उस पथ पर,जहॉ परिवर्तन का बसेरा है।चलो जलायें..मिलजुल कर हम काम करें तो एकता शकित पायेंगे।कल का काम करें हम आज, ये