Archive for category: गीत-ग़ज़ल

जमी है महफिल…

0 शारदा मोंगा / 2011/05/02 8:20 pm

जमी है महफिल शेरों की, शेरों  से डर लगता है, बड़े बड़े घाघों के डर से,  भगने को मन करता है. कभी सामना  किया  न हमने, पर हिम्मत जुटाई  है, इसही लिए लिखने को हमे अपनी कलम उठाई

बेमौसम बरसात और किसान

0 डॉ. वेद व्यथित / 2011/04/18 9:16 pm

राजा ये प्रताप तुम्हारा आंधी बादल आयें हैं फसल पड़ी  है बीच खेत के क्यों ये कहर बरपाए हैं इंतजार था फसल पकेगी कर्ज सभी चुक जायेंगे पर सब आशा धरी रह

क्रिकेट

क्रिकेट

0 डॉ. वेद व्यथित / 2011/03/29 8:46 pm

क्रिकेट २ शोर मच रहा किरकेट क्या भगवान हो गया देश निठल्ला  करने का ही ये सारा सामान हो गया छोड़ काम बाक़ी के सारे बस किरकेट की पूजा कर

महान काम

0 डॉ. वेद व्यथित / 2011/03/19 5:26 pm

हुआ खुलासा रिश्वत से सरकार बचाई जाती है हथियारों के सौदे में भी रिश्वत खाई जाती है बिन रिश्वत के सरकारी दफ्तर में काम करा देखो रिश्वत पहले ली जाती

भाभी ने देवर को भेजा sms का गुलाल

0 डॉ. वेद व्यथित / 2011/03/16 9:22 am

ननुआ ने  तो भंग चढाई धोती फाडी ललुआ ने कर रुमाल धुतिया के भइया ताल लगाई कलुआ ने दिल्ली चौंकी सब जग चौंका खूब सुनाई दिगिया ने बड़ी मम के गिर चरणों

ऐतबार

ऐतबार

4 महेश बारमाटे / 2010/12/18 8:04 pm

अपनी ही परछाइयों से डरने लगा हूँ मैं… के जब से तुझसे प्यार करने लगा हूँ मैं… अन्जान है तू आज भी मेरे हाले – दिल से… इस बात का कोई

आवाम के नाम

आवाम के नाम

1 अविमुक्तेश भारद्वाज / 2010/11/12 1:24 pm

इस कैद में ज़म्हुरियत अब और रह सकती नहीं साँस ले कि ज़िन्दगी अब और सह सकती नहीं. ले देख तेरे सब्र का तो अब यही अंजाम है मशहूर तेरी

सर पटकते हैं आशियानों में

सर पटकते हैं आशियानों में

1 देवी नागरानी / 2010/10/29 12:13 pm

उड़ गए बालो-पर उड़ानों में सर पटकते हैं आशियानों में जल उठेंगे चराग़ पल भर में शि्ददतें चाहिये तरानों में नज़रे बाज़ार हो गए रिश्ते घर बदलने लगे दुकानों में

हाय ! ऐसी मोहब्बत

हाय ! ऐसी मोहब्बत

1 kumawatji / 2010/08/29 6:00 pm

इस भरी दोपहरी में, क्यूँ शमा जलाए बैठी हो | किसका इंतजार है , जो द्वार खोले बैठी हो|| ये कैसी तलब है, जो पलके बिछाए बैठी हो| ये कैसी

जी लेने दो

जी लेने दो

1 anamika / 2010/08/24 2:04 pm

कतरा-कतरा ज़िंदगी का पी लेने दो बूँद बूँद प्यार में जी लेने दो हल्का-हल्का नशा है डूब जाने दो रफ्ता-रफ्ता “मैं” में राम जाने दो जलती हुई आग को बुझ