<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; चौथा खंभा</title>
	<atom:link href="http://www.janokti.com/category/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://www.janokti.com</link>
	<description>राज-समाज और जन की आवाज</description>
	<lastBuildDate>Sat, 31 Jul 2010 12:18:15 +0000</lastBuildDate>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.org/?v=3.0.1</generator>
<xhtml:meta xmlns:xhtml="http://www.w3.org/1999/xhtml" name="robots" content="noindex" />
		<item>
		<title>दस टकिये पत्रकारों का दर्द</title>
		<link>http://www.janokti.com/2010/07/31/%e0%a4%a6%e0%a4%b8-%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/2010/07/31/%e0%a4%a6%e0%a4%b8-%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 31 Jul 2010 08:17:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[RTI]]></category>
		<category><![CDATA[controversy]]></category>
		<category><![CDATA[democracy]]></category>
		<category><![CDATA[film-tv]]></category>
		<category><![CDATA[inflation rate]]></category>
		<category><![CDATA[market]]></category>
		<category><![CDATA[media]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[price increasing]]></category>
		<category><![CDATA[religion]]></category>
		<category><![CDATA[social justice]]></category>
		<category><![CDATA[अंधेर नगरी]]></category>
		<category><![CDATA[भ्रष्टाचार]]></category>
		<category><![CDATA[मंहगाई]]></category>
		<category><![CDATA[संसद मार्ग]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=5503</guid>
		<description><![CDATA[दूसरों के दुखःदर्द व जुल्म सितम के लिए रोजाना लड़ाई लड़ने वाले कलम के सिपाहियों के हक के लिए कोई खड़ा नहीं दिखता है। समाज में व्याप्त बराबरी-गैरबराबरी से पत्रकारों... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/31/%e0%a4%a6%e0%a4%b8-%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5504" title="AA040013" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/freelance-journalist-of-india-i-246x300.jpg" alt="" width="246" height="300" />दूसरों के दुखःदर्द व जुल्म सितम के लिए रोजाना लड़ाई लड़ने वाले कलम के सिपाहियों के हक के लिए कोई खड़ा नहीं दिखता है। समाज में व्याप्त बराबरी-गैरबराबरी से पत्रकारों को भी दो-चार होना पड़ता है। खास तौर से उनकी माली स्थिति पर नजर डाले तो एक ऐसा बराबरी-गैरबराबरी सामने आता है जो चैंकाता तो है ही साथ ही सोचने के लिए मजबूर भी करता है। सवाल है मीडिया में काम करने वाले कस्बा से लेकर महानगर तक के पत्रकारों की माली स्थिति का ? और उनके साथ जो शोषण हो रहा है उसके पक्ष में खड़ा होने का ? जहां एक पत्रकार दस से बारह घण्टे काम करता है और एवज में एक सरकारी आदेशपाल से भी कम तनख्वाह पाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">मीडिया हाउसों में कार्यरत मीडियाकर्मी जहां एक ओर मीडिया के चकाचैंध ग्लैमर से प्रभावित हैं। वहीं एक ऐसा वर्ग भी है जो अखबार में काम करते हुए जीने के लिए संघर्ष कर रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि जहां एक ओर मीडियाकर्मियों को दस हजार से एक लाख तनख्वाह मिलती है तो वहीं ऐसे भी मीडियाकर्मी है जिन्हें 15 सौ रुपये महीने पर सुबह से देर शाम तक खबरों के पीछे भागना पड़ता है। जाहिर सी बात है कि जैसा काम वैसा दाम की परिपाटी मीडिया हाउसों में कुलाचे मार रहा है। अनुभव और नाम के सहारे हजारों की तनख्वाह पाने वाला बड़ा पत्रकार भी उतना ही श्रम करता है जितना एक आम पत्रकार। बल्कि मुफ्सिल का पत्रकार तो और ही ज्यादा काम करता है। मुफ्सिल में घटने वाली सुबह की खबर पर वह लगातर बना रहता है। उसे डाक संस्करण से लेकर देर रात के संस्करण के लिए खबर को डेवलप कर लगातार भेजना पड़ता है।</p>
<p style="text-align: justify;">पत्रकारों के बीच एक सामान वेतन नहीं हो सकता लेकिन जिंदगी जीने के लिए जितना चाहिये वह तो मिलनी ही चाहिये? श्रमजीवी पत्रकारों के वेतन को लेकर सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर प्रयास चले, लेकिन मीडिया हाउस के मालिकों ने नौकरी की परिभाषा ही बदल दी। संपादक हो या पत्रकार अमूमन सभी की बहाली अब अनुबंध के आधार पर हो रही है। जब इच्छा हुई रख लिया और निकाल दिया। वहीं बड़े नाम इसका फायदा भी उठा रहे हैं। जहां दूसरे मीडिया हाउस ने ज्यादा पैसे दिये, तुंरत पहले को छोड़, दूसरे को पकड़ लिया। वहीं सबसे बुरा हाल निचले स्तर के पत्रकारों का है वे हमेषा हासिये पर रहते हैं। मजेदार बात यह है कि अब मीडिया हाउस जब किसी को अपने  यहाँ रखता है तो उससे एक बौंड भरवाता है जिसमें उसका पेशा  पत्रकारिता नहीं बल्कि खेती बाड़ी, व्यवसाय आदि भरवाया जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरों के शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने वाले स्वयं पत्रकार अपनी आवाज उठाने से वंचित रह जाते हैं ? देखा जाये तो पत्रकारों की जिंदगी रोज संघर्षों से भरी है। अमूमन हर मीडिया हाउसों द्वारा पत्रकारों का आर्थिक और शारीरिक शोषण जारी है। लेकिन विरोध की गुंज सुनाई नहीं पड़ती है। सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक  शोषण का है। चैंकने वाला तथ्य यह है कि छोटे और बड़े मीडिया हाउसों में 15 सौ रूपये के मासिक पर पत्रकारों से 10 से 12 घंटे काम कराया जाता है। यहीं नहीं उन पत्रकारों के पास मीडिया हाउस द्वारा कोई अनुबंध पत्र / नियुक्ति पत्र नहीं दिया जाता है। प्रबंधन की मर्जी जब नौकरी पर रखे या जब चाहे नौकरी से निकाल दे। भुगतान दिहाड़ी मजदूरों की तरह मास्टर रौल जैसा है। महीने के आखिर में एक मास्टर रौल पर हस्ताक्षर करवाया जाता है और भुगतान के बाद उसे फाड़कर फेंक दिया जाता है। वेतन के मामले में पीड़ित कलम के सिपाहियों का हाल सरकारी आदेशपालों से भी बुरा है।</p>
<p style="text-align: justify;">देश  के राज्यों में अधिकांश  युवा पत्रकार अपने कैरियर की शुरुआत मामूली सी तनख्वाह 1500 रुपये पर करते हैं। अगर देखा जाए तो दिहाड़ी मजदूरों को जितनी मजदूरी एक महीने में दी जाती है, उससे कम पत्रकारों को दी जाती है। बिहार से प्रकाशित कई अखबारों में कमोवेश स्थिति ऐसी ही है। वहीं कस्बाई पत्रकारों को अखबार मीडिया हाउस की ओर से अधिकतम 3000 रुपये प्रति माह दिये जाते हैं। जबकि बड़े पैमाने पर हजार 12 सौ रूपये मासिक पर रखा जाता है। उन्हें समाचार संकलन के अलावा अखबार के लिए विज्ञापन भी जुटाना होता है। पहले सेंटीमीटर या कालम के हिसाब से भुगतान दिया जाता था लेकिन अब प्रति खबर या मासिक भुगतान किया जाता है। बिहार के कस्बा और छोटे जगहों पर कार्यरत पत्रकारों ने बताया कि अखबार को आंदोलन, बदलाव आदि का नारा देने वाले बड़े समाचार पत्र समूह द्वारा एक स्ट्रींगर को प्रति समाचार 10 या 12 रु. दिये जाते हैं, चाहे खबर एक कालम की हो या चार कालम की। भुगतान तय रहता हैं वही 10 या 12 रूपये प्रति खबर। वहीं सुपर स्ट्रींगर को प्रति माह दो से तीन हजार दिया जाता है। जहां तक छोटे समाचार पत्र का सवाल है तो वे कस्बा और छोटे जगहों पर कार्यरत पत्रकारों को एक पैसा भुगतान नहीं करते हैं हां उनके समाचार जरूर छपते हैं। साथ ही उन्हें विज्ञापन लाने को कहा जाता है जिस पर कमीशन दिया जाता है। जबकि अखबार के मुख्य कार्यालयो में कार्यरत स्ट्रींगर और सुपर स्ट्रींगर को तीन हजार से 14 हजार रूपये प्रतिमाह दिये जाते हैं। संपादक/प्रबंधक तनख्वाह तय करते हैं। वहीं चैंकाने वाला तथ्य यह है कि अमूमन हर अखबार कस्बा या छोटे शहरों में किसी को भी अपना प्रतिनिधि रख लेते हैं उसे खबर के लिए कोई भुगतान नहीं किया जाता है। बल्कि वह जो विज्ञापन लाता है उस पर उसे कमीषन दिया जाता है। अखबार का संपादक/प्रबंधक जानते हैं कि वह बेगार पत्रकार अखबार के नाम पर अपनी दुकान चलायेगा ? जो उसकी मजबूरी बन जाती है आखिर  दिन भर अखबार के लिये बेगार करेगा तो खायेगा क्या ?  बिहार के सासाराम में एक छोटे समाचार पत्र के लिए रिपोर्टिंग करने वाला एक पत्रकार अपना नाम छुपाते हुए कहता हैं कि हालात यह है कि पैसा मिले या न मिले किसी मीडिया हाउस से जुड़ने के लिए पत्रकारों की लम्बी कतार है। बिना पैसे और विज्ञापन के कमीशन पर काम करने वाले पत्रकार मौजूद है तो भला क्यों कोई मासिक वेतन पर किसी को रखे ? यही हाल देश के अन्य क्षेत्रों का है।</p>
<p style="text-align: justify;">मजेदार बात यह है कि इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो पत्रकारों के हित के लिए लम्बी-चैड़ी बातें करते हैं। तर्क दिया जाता है कि पत्रकारिता के पेशे  में ऐसे लोग आ गये है जो तिकड़मी, अनस्कील्ड और कहीं नौकरी नहीं लगी तो पत्रकार बन गये आदि आदि। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर उन्हें रखता कौन है ? अखबार ही न ? और आज अखबार संपादक कम प्रबंधक अधिक चला रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रख्यात पत्रकार स्व.प्रभाष जोशी ने भारतीय मीडिया द्वारा चुनाव के दौरान पैसे लेकर खबर छापने की परिपाटी के खिलाफ जो मुहिम छेड़ी थी, उसकी गुंज संसद और चुनाव आयोग में सुनाई दी है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान देशभर में ये गुंज सुनाई दी थी। अब संसद में भी इसकी गुंज सुनाई पड़ी है। राज्यसभा में सांसदों ने पैसे लेकर मीडिया द्वारा खबर छापने की खतरनाक बढ़ती प्रवृति के खिलाफ गंभीर चर्चा की। पैसे लेकर खबर छापने की मीडिया के सोच के खिलाफ केवल सांसद ही नहीं बल्कि पिछले ही दिनों  पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला ने भी चिंता व्यक्त की और इसे गलत करार भी दिया। पैसे लेकर खबर छापने की प्रथा कोई नई नहीं है और इसपर हो-हल्ला तब मचा जब स्व. प्रभाष जोशी ने पूरे देश भर में मीडिया के इस सोच के प्रति जन आंदोलन चला दिया था। गत लोकसभा चुनाव और कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान यह खुलकर सामने आ गया था। मीडिया ने पैसे लेकर खुलेआम खबर छापने का सिलसिला जारी रखा। यह हो-हल्ला लोकतंत्र के निर्माण में, लोकतंत्र के ही एक खंभे द्वारा किया गया। इस मसले पर पत्रकार भी दो खेमें में नजर आये।</p>
<p style="text-align: justify;">मीडिया ने अपने को बाजारवाद के चंगुल में डालकर संभवतः मीडिया को व्यवसायिक नजरिये से परोस दिया। हो-हल्ला तो चुनाव के दरम्यिन नेताओं द्वारा अपने फेवर में पैसे देकर खबर को प्रकाशन प्रसारण से हुआ। लेकिन गुपचुप तरीके से नये-नये हथकंडों के जरिए खबर छापने/प्रसारित करने का सिलसिला जारी है। इसमें दस टकिया पत्रकारों को मोहरा बनाया जा रहा है। यह चैंकाने वाला तथ्य है या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता लेकिन बिहार के कई जिलों में तैनात पत्रकारों से खबर छापने के बदले अखबारों की प्रतियां बिकवाई जाती है। इसमें बड़े मीडिया गु्रप शामिल हैं। बिहार के कई जिलों के अखबारों से जुड़े पत्रकारों ने बताया कि किसी भी कार्यक्रम या खबर को छापने के लिए संबंधित संस्था या व्यक्ति से पैसे न लेकर उससे खबर छापने के एवज में अखबार की प्रतियां खरीदने पर दवाब बनाया जाता है। अखबार द्वारा अपने संवाददाताओं पर विज्ञापन के लिए दबाव बनाने की बात पुरानी हो चुकी है लेकिन प्रतियां बिकवाने का नया फंडा निकाल लिया गया हैं। यानी खबर छपने के बदले अखबार की प्रतियां खरीदों ? बदले में अखबार मालिक अपनी तिजोरी भर रहे हैं और दस टकिया पत्रकार जहां था वहीं खड़ा हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">मीडिया में इस तरह की परिपाटी का जन्म लेना मीडिया के लिए भयावह है और जिस तरह की सोच मीडिया के अंदर बढ़ती जा रही है वह काफी खतरनाक है। पत्रकार को पत्रकार न रख, उसे सेल्स एजेंट के तौर पर मीडिया हाउस इस्तेमाल कर रहा है।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/2010/07/31/%e0%a4%a6%e0%a4%b8-%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>सिनेमा और अश्लीलता</title>
		<link>http://www.janokti.com/2010/07/27/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/2010/07/27/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 16:07:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पियूष कुमार द्विवेदी</dc:creator>
				<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा हिंदी अश्लीलता हिरोईन]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=5059</guid>
		<description><![CDATA[दोस्तों, एक दृश्य है &#8230;&#8230;टीवी चल रहा है कोइ फिल्म आ रही है, माता, पिता, बेटा, भाई, बहन सब देख रहे हैं ! सब बड़े ध्यान से देख रहे हैं... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/27/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="aligncenter size-full wp-image-5386" title="film" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/film.jpg" alt="" width="310" height="387" />दोस्तों,  एक दृश्य है &#8230;&#8230;टीवी चल रहा है कोइ फिल्म आ रही है, माता, पिता, बेटा,  भाई, बहन सब देख रहे हैं ! सब बड़े ध्यान से देख रहे हैं ! अरे ये क्या  &#8230;..ये क्या हुआ इनको? अभी इतने ध्यान से देख रहे थे &#8230;ये क्या हुआ..बेटा  उठ के चला गया, बेटी भी इधर-उधर देखने का प्रयास करने लगी जैसे अपने आपको  टीवी से बचाना चाहती हो , तभी पिता उठ के चल दिए फिर बेटी ने भी उन्ही का  अनुसरण किया और फिर माँ ने भी &#8230;.. कितना अजीब दृश्य है ! ये दृश्य किसी  धारावाहिक, फिल्म इत्यादि का नहीं है ये दृश्य करीब-करीब हर पारिवारिक घर  का है ! आखिर ये दृश्य क्यों बन रहा है ? इस दृश्य के लिए मूलतः जिम्मेदार  कौन है? इस दृश्य के लिए जिम्मेदार है &#8220;अश्लीलता&#8221; जो कि हमारी आज कि हिंदी  सिनेमा पर बिना किसी वजह के पूरी तरह से काबिज है ! अब सवाल ये उठता है कि  इस अश्लीलता के लिए कौन जिम्मेदार है? इस सवाल का जवाब थोडा मुश्किल है  क्योंकी इस सवाल पर लोगों के कई मत हो सकते हैं ! कुछ लोगों का मत है कि  &#8220;इसके लिए फिल्म जगत जिम्मेदार है&#8221; तो कुछ &#8220;निर्माता-निर्देशकों को  जिम्मेदार मानते हैं&#8221; ! इस विषय पर मेरा मत यह है कि &#8220;इसके लिए कोइ या कुछ  एक जिम्मेदार नहीं हैं गलती सबकी है&#8221; !  क्योंकी, अगर हम फिल्म जगत या  निर्माता-निर्देशक को जिम्मेदार कहे तो इसमे दोष हमारा ही है &#8230;क्योंकी   वो ऐसे नहीं दिखा रहे है हम देख रहे हैं तब दिखा रहे हैं ! अगर कोइ फिल्म  रिलीज होती है और उसमे हिरोईन ने गलती से शालीन कपडे पहन लिए तो लोग कहते  हैं हिरोईन का रोल बेकार है, दम नहीं है ! किसी फिल्म में अगर हीरो- हिरोईन  का अंतरंग दृश्य न हो तो उस फिल्म के लिए &#8220;मसाला नहीं है&#8221; जैसे शब्द का  उपयोग किया जाता है ! ये चीज सिर्फ हम और आप तक सीमित नहीं है ये समस्या  मिडीया में भी है ! मिडीया इन अश्लील चीजों को इस तरह से दिखा रहा है कि  जैसे ये बहुत अच्छी बात है ! मिडिया वाले शायद ये भूल गए हैं कि &#8220;न्यूज़&#8221;  परिवार के सब लोग एक साथ देखते हैं ! हमारे युवावर्ग कि ये समस्या है कि जब  वो अकेले फिल्म देखने जाता है तो उसे फिल्म में मसाला चाहिए और जब वही  फिल्म परिवार के साथ देखता है तो नज़रें झुका कर चल देता है और  निर्माता-निर्देशकों को गाली देता  हैं कि कैसी फिल्म बना दी है ! युवावर्ग  के बाद जो एजेट लोग हैं वो कहने के समय तो खूब कहेंगे कि &#8220;आज-कल कि  फ़िल्में देखने लायक नहीं रही पहले कि फिल्मे भी क्या होती थी&#8221; जबकि सच्चाई  ये है कि उनको युवावर्ग से ज्यादा मसाला चाहिए अकेले फिल्म देखने बैठ जाएँ  तो जब तक ४-५ हॉट सीन नहीं देख लेते, हिरोईन को २-३ एंगल से नहीं देख लेते  तब तक चैन नहीं आता है ! इसलिए मेरा मत है कि &#8230;&#8230;अगर हमारी फिल्मों में  अश्लीलता है तो इसके लिए दोषी हम स्वयं हैं ! ये अश्लीलता कुछ और नहीं  पश्चिमी सभ्यता है जिसे हमने बाकि पश्चिमी चीजों कि तरह अपना लिया है !  लेकीन नहीं अब और नहीं &#8230;..हमें इस अश्लीलता को मिटाना है और इसके लिए  हमें अपना नजरिया बदलना पड़ेगा, अश्लील फिल्मों का विरोध करना पड़ेगा&#8230;  क्योंकी, ये अश्लीलता हमारी संस्कृती के लिए बहुत बड़ा खतरा है ! अगर इसे  नहीं मिटाया गया तो आने वाले दशकों में ये हमारी बची-खुची संस्कृती को मिटा  देगी फिर हमारी अपनी कोइ पहचान नहीं रह जाएगी भारत खुद अपने आप ही मिट  जाएगा ! इसलिए रोको इस अश्लीलता को .बदलो अपना नजरिया और बचालो भारत को&#8221;</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/2010/07/27/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>8</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>बाबाओ का मायाजाल टीवी पर बनाये माला-माल</title>
		<link>http://www.janokti.com/2010/07/25/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%93-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ac/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/2010/07/25/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%93-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ac/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 25 Jul 2010 11:49:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनिकेत प्रियदर्शी</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[baba]]></category>
		<category><![CDATA[jyotisacharya]]></category>
		<category><![CDATA[jyotish]]></category>
		<category><![CDATA[market]]></category>
		<category><![CDATA[media]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=5188</guid>
		<description><![CDATA[आज कल टेलीविजन पर प्रतिदिन ज्‍योतिषों का मेला लगा रहता है और उनकी बातें कुछ अजीब तरह का सनक मन में पैदा कर देती है। आपका शनि चौथे घर मे... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/25/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%93-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ac/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5190" title="jyotish" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/jyotish-300x166.jpg" alt="" width="300" height="166" />आज कल टेलीविजन पर प्रतिदिन ज्‍योतिषों का मेला लगा रहता है और उनकी बातें कुछ अजीब तरह का सनक मन में पैदा कर देती है। आपका शनि चौथे घर मे मंगल के साथ बैठा हुआ है, इसके निवारण हेतु आप प्रतिदिन एक मुठ्ठी चावल बंदरो को खिलाये ! अब इस तरह के नुस्के अगर अपनाने चलेंगे तो फिर मुसीबत तो होगी। हमारे एक मित्र भी इन बातों से प्रभावित होकर चले बंदरों को चावल खिलाने। अब बंदर तो रहा बंदर ..आंख बचाकर चावल खाने की जगह मित्र को ही काट खाया नामुराद ने । मित्र का शनि अब वाकई भारी पड गया।</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे देश मे कुछ बातें इस हद तक लोगों के मन मंदिर मे घर कर जाती है जिससे पीछा छुडाना बहुत मुश्किल हो जाता है । ये बात सही है कि ज्योतिष विधा की भी अपनी एक जगह होती है पर हर वख्त केवल ज्योतिषों की बाते अगर हम अपनाने चले फिर तो जीवन की नैया है राम के भरोसे , जीवन की नैया को राम ही बचाई लें । केवल भाग्य के भरोसे बैठे रहने पर तो भाग्य भी सोया रहता है, जरूरत तो है  हिम्मत बाँध कर खड़े होने की निश्चित रूप मे तब भाग्य भी उठ खड़ा होगा । पर हम तो भाई जैसे है वैसे रहेंगे और बात तब जाती है बिगड ।</p>
<p style="text-align: justify;">कभी एक ज्योतिष बता रहे थे कि आप अपने शरीर के भार के बराबर का अन्न दस दिनों तक गरीबों मे बांटे आपका गुरू आपका लिए सहायक हो जायेगा । अब 87 किलो के किसी इसांन के लिए दस दिनो तक अपने शरीर के भार के बराबर अन्न दान करना वो भी तब जब वो आज की महंगाई से प्रताडित है कहां तक जायज है ? उसका दिल तो उपाय सुनकर और ज्यादा घबरा जाता है । पहले क्या दुनिया मे इतने ग्रह नक्षत्र नही थे? और क्या इनका हर बार दुनिया मे प्रलय मचाने का इरादा नही होता था ? ठीक है कि हम मीडिया के प्रभाव मे आने के बाद से इन सब बातों से ज्यादा रू-ब-रू होते रहते है , पर इसका मतलब ये बिलकुल भी नही होना चाहिए की हमारी आसक्ति अंधी हो जाए ।</p>
<p style="text-align: justify;">आज टेलीविजन चैनलों मे लोगों को भयभीत करने का पूरा पूरा बन्दोबस्त किया जाता है और सच तो यह भी है कि भय से ही दुःख आते हैं, भय से ही मृत्यु होती है और भय से ही बुराइयाँ उत्पन्न होती हैं। ये भय इतना कारगर सिद्ध होता है कि इन कार्यक्रमों से लोग अपने को कभी अलग कर के नही देखना चाहते है । जिन राशियों से उनका सम्बन्ध होता है कम से कम उसका पूरा विवरण तो वो ले ही लेना चाहते है। मीन राशि के जातकों के लिए समय बडा बलवान है, तो मेष राशि के जातकों को सावधानी बरतनी होगी । पता चला मीन राशि वाला जातक इतना प्रसन्न हो गया कि खुशी मे अपना   बाइक किसी के उपर चढा गया और मेष राषि का जातक इतना परेशान हो गया कि राह मे खुले मेनहाल मे जा गिरा ।</p>
<p style="text-align: justify;">ये भविष्यवाणियां मूल रूप से एक अवसाद उत्पन्न करती और कुछ नही । अब उपाय मे कबूतरी के दूध मे खीर बनाकर अहले सुबह सियार को खिला दे , चितकबरे कुत्ते की पूंछ मे मलाई लगा कर उसे स्नान करवाये, प्रतिदिन एक लोटा शहद काले कौवे को चटा दें, बूढे लंगूर से अपना पीठ खुजलवाये, इत्यादि भी आने वाले दिनों मे सुनने को मिलने लगे तो आश्चर्य नही होगा । ये सब क्या है ? एक इसांन अगर परेशानियों का मारा है तो वो तो ऐसे भी किसी भी तरह से उससे छुटकारा पाने का प्रयास करेगा । और उसपर से अगर टेलीविजन चैनलों की चक्कर मे पड गया तो फिर तो उपर वाला भी अपने हाथ खडे कर देगा ।</p>
<p style="text-align: justify;">क्या इन टेलीविजन चैनलों मे इस तरह की भविष्यवाणियां और उसके अनाप-सनाप उपाय ज्योतिष विधा का अपमान नही है ? आँख के अंधे को दुनिया नहीं दिखती, काम के अंधे को विवेक नहीं दिखता, मद के अंधे को अपने से श्रेष्ठ नहीं दिखता और स्वार्थी को कहीं भी दोष नहीं दिखता। आज के दौर मे ये टेलीविजन चैनलों का स्वार्थ ही कहा जायेगा और कुछ नही । बिना मतलब का ये टी आर पी का खेल कई लोग या परिवार को ले डूबे ,क्या सही होगा समाज के लिये ? मैने बहुत से ऐसे लोग या परिवार देखे है जो इस तरह के चक्कर मे फंस गये और फिर आगे जाकर अपनी स्थिति पहले से भी ज्यादा बेहाल कर के रख लिया ।</p>
<p style="text-align: justify;">पृथ्वी का अंत हो जायेगा&#8230;फलां लोग ने ये भविष्यवाणी की तो फलां ने ये गणना की..। एक तेरह साल का बच्चा जो कक्षा नवम का विधार्थी है इसलिए अब पढाई मे ध्यान नही दे रहा था क्यूंकि उसके मन मे ये बात बैठ चुकी थी दिसम्बर 2012 मे पृथ्वी का अंत हो जायेगा तो अब पढ लिख कर हम क्या करें ! अब तो कुछ ही दिनो मे हम सब मर जायेंगे । ये जानकारी उसे कहां से मिली ? एक नही अनेक टेलीविजन चैनलों मे ये बात कई बार दिखाई गयी है और टेलीविजन चैनल झूट तो बोलेगा नही ! अब बताएं कि उस किशोर को क्या समझ मे आया और वो इसका क्या परिणाम निकाल कर आगे बढ रहा है ?</p>
<p style="text-align: justify;">सन्तोषः परमो लाभः सत्सङ्गः परमा गतिः ,विचारः परमं ज्ञानं शमो हि परमं सुखम् अर्थात Contentment is the highest gain, Good Company the highest course, Enquiry the highest wisdom, and Peace the highest enjoyment. क्या टेलीविजन चैनल इन बातों को कभी ध्यान मे रखकर चलेगा ? ये ना तो संतोष दे पाते है, ना ही सत्संगति, ना ही सही जानकारी बांटने पर इनका ध्यान है और ना ही शांति प्रदान करने के उद्देश्य से ये कुछ करने जा रहे है । यहां तो बस जितना भ्रम और भय का संचार इन कार्यक्रमों के माध्यम से किया जा सके वही सबसे श्रेष्ठ है इनके लिए ।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा था -: “सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।“ अत: टेलीविजन चैनल के इस तरह के नित्य नये नये पचडों मे पडने से कोई लाभ नही होने वाला है । हमारा ध्यान अपने कर्म की ओर रहे तो एक न एक दिन भगवान सब का भला करेंगे ही । आज चाहे वो तमाम चैनल हो या फिर हम आमजन सभी को आवश्यकता है निष्कपट होने की और चरित्र निर्माण की ।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/2010/07/25/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%93-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ac/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>एंटी-वायरस युक्त और हिंदी फ्रेंडली वेब ब्राउजर &#8220;EPIC&#8221;</title>
		<link>http://www.janokti.com/2010/07/18/%e0%a4%8f%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b0%e0%a4%b8-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/2010/07/18/%e0%a4%8f%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b0%e0%a4%b8-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 18 Jul 2010 16:51:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[ब्लॉग-जगत]]></category>
		<category><![CDATA[Anti-virus protected]]></category>
		<category><![CDATA[EPIC Browser]]></category>
		<category><![CDATA[Firefox]]></category>
		<category><![CDATA[Hidden Reflex web company]]></category>
		<category><![CDATA[blog tips in hindi]]></category>
		<category><![CDATA[blog तकनीक]]></category>
		<category><![CDATA[blogger]]></category>
		<category><![CDATA[facebook]]></category>
		<category><![CDATA[gmail]]></category>
		<category><![CDATA[hindi blog tips]]></category>
		<category><![CDATA[orkut]]></category>
		<category><![CDATA[social networking]]></category>
		<category><![CDATA[twitter]]></category>
		<category><![CDATA[एंटी -वायरस सुरक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[फायरफोक्स]]></category>
		<category><![CDATA[हिडेन रिफ्लेक्स]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=4885</guid>
		<description><![CDATA[वेब की दुनिया में हिंदी के उपयोगकर्ताओं के लिए एक और शानदार उपहार सामने आया है &#124; भारतीय सोफ्टवेयर कंपनी &#8221; हिडेन रिफ्लेक्स &#8220;(Hidden Reflex) ने इसी सप्ताह &#8221; एपिक... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/18/%e0%a4%8f%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b0%e0%a4%b8-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-4886" title="EPIC Browser" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/EPIC-Browser.jpg" alt="" width="595" height="567" />वेब की दुनिया में हिंदी के उपयोगकर्ताओं के लिए एक और शानदार उपहार सामने आया है | भारतीय सोफ्टवेयर कंपनी  &#8221; हिडेन रिफ्लेक्स &#8220;(Hidden Reflex) ने इसी सप्ताह &#8221; एपिक &#8221; (EPIC) नाम का एक अनोखा और दुनिया का पहला एंटी -वायरस सुरक्षा (Anti-virus protected )युक्त इंटरनेट ब्राउजर ( web browser) सार्वजनिक किया है | &#8221; एपिक &#8221; (EPIC) फायरफोक्स (Firefox) पर आधारित ऐसा ब्राउजर है जिसमें सभी भारतीय भाषाओँ के उपयोगकर्ताओं का खास तौर पर ध्यान रखा गया है | ब्राउजर के साइडबार में दर्जन भर ऐसे टूल्स हैं जिसे देखकर कोई भी भारतीय प्रयोक्ता का दिल खुश हो जायेगा ! एक साथ कई टैब्स के अलावा आप साइडबार का भी उपयोग कर सकते हैं | मसलन , इंडिक टाइपिंग टूल, वर्ड प्रोसेसर में जाकर टाइप कर सकते हैं | जीमेल , ऑरकुट, फेसबुक ,ट्विट्टर जैसी सोशल नेटवर्किंग से सीधे साइडबार में ही कनेक्ट कर एक साथ एक ही टैब में दो काम कर सकते हैं | किसी भी समाचारपत्र या चैनल का लिंक एक क्लिक पर उपलब्ध है | वेब पर हिंदी सहित दर्जनों भारतीय भाषाओँ के चाहने वालों को और हिंदी जैसी अंतर्राष्ट्रीय भाषा को संसार भर में पठनीय बनाने के लिए ऐसे अभिनव प्रयासों की आवश्यकता है | वैश्वीकरण के इस दौर में जब दुनिया वेब पर ही सिमटने जा रही है तब ऐसे समय में हिंदी के बढ़ते क़दमों को सहारा मिलता है ऐसे ही व्यावसायिक अथवा गैर-व्यावसायिक किन्तु व्यक्तिगत प्रयासों से ! ऐसी कोशिशों को सराहा जाना चाहिए और अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहिए | आज भले ही भारतवर्ष में सबसे अधिक और प्रतिभवान सोफ्टवेयर इंजिनियर हैं लेकिन फ़िर भी वेब और कंप्यूटर की दुनिया में विदेशी कंपनियों का ही बोल-बाला है और ये सभी उन्हीं के लिए काम करते हैं | हमारी सरकार का भी इस ओर कोई ध्यान नहीं कि किसी सरकारी उपक्रम के जरिये ही सही भारतीय प्रतिभाओं का सही उपयोग कर भारत का पैसा ना केवल भारत के विकास में लगाया जाए बल्कि अन्य देशों को भी अपनी सेवाएँ बेच कर मुनाफा कमाया जा सकता है | हम जैसे भारतीयों का यह कर्तव्य है कि यदि कोई भी भारतीय उत्पाद या सेवा किसी विदेशी कंपनी की तुलना में उत्तम या टक्कर की है तो उसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए | खैर , वेब पर उपलब्ध सभी हिंदी भाषियों को &#8221; एपिक&#8221; ब्राउजर के शुभकामनायें और ये रहा डाउनलोड लिंक ! <strong><a href="http://www.epicbrowser.com/">EPIC BROWSER DOWNLOAD</a></strong></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/2010/07/18/%e0%a4%8f%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b0%e0%a4%b8-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>कौआ और मीडिया</title>
		<link>http://www.janokti.com/2010/07/14/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%86-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/2010/07/14/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%86-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 14 Jul 2010 12:24:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शंकर दत्त फुलारा</dc:creator>
				<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[film-tv]]></category>
		<category><![CDATA[market]]></category>
		<category><![CDATA[media]]></category>
		<category><![CDATA[कौआ]]></category>
		<category><![CDATA[न्यूज चैनल]]></category>
		<category><![CDATA[बाजारवाद]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय समाज]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=4590</guid>
		<description><![CDATA[भारतीय समाज में कौए को आमतौर पर अच्छा नही माना जाता। कारण, शायद उसकी कर्कश आवाज, कुटिल बुद्धि, तांक-झांक करने की आदत, उसका काला रंग आदि हो। लेकिन, अपनी इन... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/14/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%86-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-4592" title="kauwa" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/kauwa.jpg" alt="" width="240" height="214" />भारतीय समाज में कौए को आमतौर पर अच्छा नही माना जाता। कारण, शायद उसकी कर्कश आवाज, कुटिल बुद्धि, तांक-झांक करने की आदत, उसका काला रंग आदि हो। लेकिन, अपनी इन बुराईयों के कारण दुत्कारे जाने के बावजूद, वह सम्मान भी पाता है। अटरिया पर कागा बोले तो, त्यौहार या संक्रांति हो तो,कौआ ग्रास खिलाने को, हमारे यहाँ तो बच्चे को आशीर्वाद भी काक-चेष्टा का दिया जाता है और काले रंग का टीका भी कौए को याद करके लगाया जाता है और पितृपक्ष में तो कौआ विशेष सम्मान पाता है। इन्हें बुद्धिमान भी माना जाता है |</p>
<p style="text-align: justify;">एकता में कौओं का कोई सानी नहीं; इनके साथी के साथ कोई घटना घट जाए तो, या कोई इनके घोंसले को छेड़ दे तो, मतलब, जब ये अपनी एकता प्रर्दशित करते हैं तो अपनी कांव- कांव के आगे किसी की नहीं सुनते&#8221;एक ही जगह पर मंडराते&#8221; रहते हैं। एक आदत इनकी और अच्छी है कि ये खाना मिलने पर खूब काँव-काँव करके अपने साथियों को जमा कर लेते हैं तब एक साथ खाने पर टूटते हैं | इन्हें कोई मरा जानवर मिल जाये तो इनकी एकता देखने को मिल जाती है |</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे गांवों में दो तरह के कौए होते हैं एक जरा ज्यादा काला व बड़ा होता है, उसे सच्चा कौआ कहते हैं ।वैसे गुण-अवगुण लगभग एक जैसे होते हैं। खाने में सामान्य गंदगी से लेकर कुछ भी अच्छा-बुरा खा लेते हैं। अपनी इसी आदत के कारण पहले जैसे विश्वसनीय नहीं रहे। वरना पहले तो हमारा ग्रामीण समाज इन पर बहुत भरोसा करता था, अब तो गाँवों से इनकी संख्या शहरों को पलायन कर गई है। क्योंकिगावों में खाने व तांक- झांक करने के अवसर कम होते हैं, शहरों में तरह- तरह के खाने या ये कहना चाहिए प्रयाप्त जूठन उपलब्ध होती है। और अपनी जिज्ञासु(खोजी)प्रक्रति के कारण शहर इन्हें अपने लिए ठीक लगता है। हमारे यहाँ एक पौराणिक कथा के अनुसार इनके एक पूर्वज ने अपनी प्रकृतिवश श्रीराम की पत्नी माता सीता के पाँव में चोंच मार दी जिससे रक्त निकल आया, भगवान राम को क्रोध आ गया उन्होंने बाण से कौए की एक आँख फोड़ दी। तब से यह एकचक्षू माना जाता है। इसीलिए बहुत चंचल होता है। वैसे काकभुषण्डी के रूप में इनके पूर्वज ने अच्छा सम्मान भी पाया है। आप भी सोच रहे होंगे की कौआ-कौआ -कौआ ये कौआ पुराण क्यों लिखने लगा, लेकिन क्या करूँ जब से टी.वी. न्यूज चैनल चले हैं, बुरा मत मानना मुझे इन चैनलों के रूप में कौए ही कांव-कांव करते सुनाई देते हैं।  अब समानताएं ढूंढना आप भी शुरू कर दो। हाँ चुनावों को इनके लिए पितृपक्ष माना जा सकता है।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/2010/07/14/%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%86-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन की प्रांतीय बैठक संपन्न</title>
		<link>http://www.janokti.com/2010/07/13/%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a8%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a8/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/2010/07/13/%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a8%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a8/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 13 Jul 2010 15:18:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=4551</guid>
		<description><![CDATA[धार 13 जुलाई 2010। वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक उज्जैन की हरसिद्धि धर्मशाला में सम्पन्न हुई। बैठक के प्रारंभ में यूनियन के प्रांताध्यक्ष राधावल्लभ शारदा, कार्यक्रम आयोजक... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/13/%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a8%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a8/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><img class="alignleft size-medium wp-image-4561" title="OLYMPUS DIGITAL CAMERA" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/UNION-ODF-300x224.jpg" alt="" width="300" height="224" />धार 13 जुलाई 2010</strong>। वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक उज्जैन की हरसिद्धि धर्मशाला में सम्पन्न हुई। बैठक के प्रारंभ में यूनियन के प्रांताध्यक्ष राधावल्लभ शारदा, कार्यक्रम आयोजक और वरिष्ठ उपाध्यक्ष डाॅ. अरूण जैन व महासचिव ज्ञानेन्द्र त्रिपाटी ने माँ सरस्वती के चित्र पर दीप प्रज्जवलित कर बैठक का शुभारंभ किया। बैठक की अध्यक्षता प्रदेशअध्यक्ष राधावल्लभ शारदा ने की। प्रारंभ में प्रदेश भर से आए कार्यसमिति सदस्य व जिलाध्यक्षों का परिचय हुआ। तत्पश्चात् प्रांताध्यक्ष श्री शारदा ने अपने उद्बोधन में कहा कि प्रदेश में वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन, पत्रकारों के  हितों के संरक्षण हेतु कार्य कर रही है। जिले की सभी इकाईयां अपने-अपने जिलों में हो रहे पत्रकार उत्पीडन के प्रति सजग रहकर कार्य करे। आपने बताया कि प्रदेश में पत्रकारों के विरूद्ध जो भी प्रकरण दर्ज हो रहे है उसमें शासन द्वारा दिये गये निर्देषों का पालन अभी भी नहीं हो रहा है। सूचना के अधिकार के तहत पत्रकारों पर दर्ज प्रकरणों की जानकारी ली गई तो आज भी कई पत्रकारों के नाम उस सूची में छिपाए गए प्रतीत होते है। इसी प्रकार यूनियन द्वारा श्रम आयुक्त इंदौर कार्यालय से प्रदेश के पत्रकारों की जानकारी चाही गई तो वह भी वहां उपलब्ध नहीं है। साथ ही श्रमायुक्त विभाग से प्रदेश से प्रकाषित समाचार पत्रों की सूची मांगी गई वह भी बाबा आदम के जमाने की निकली। इस संबंध में श्रमआयुक्त मुख्यमंत्री तथा जनसंपर्क मंत्री को भी पत्र लिखने का निर्णय लिया गया है। प्रदेष महासचिव ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी ने बताया कि इस अवसर पर बैठक में सर्वानुमति से आगामी 11 अगस्त तक प्रदेश भर में सदस्यता अभियान चलाकर नए पत्रकारों को जोड़ने तथा आगामी प्रांतीय कार्यसमिति बैठक और सम्मेलन सोनकच्छ (जिला देवास) में 28 व 29 अगस्त को आयोजित करना निष्चित किया गया। साथ ही निष्क्रिय जिला इकाईयों को भंग कर उनका पूर्नगठन करने का भी निर्णय लिया गया। वहीं प्रदेश  अध्यक्ष श्री शारदा ने प्रांतीय कार्यसमिति में होशंगाबाद, की कु. भावना विष्ट को प्रांतीय संगठन सचिव, ओमप्रकाष सोनी शाजापुर को प्रांतीय कोषाध्यक्ष, प्रकाश अग्रवाल शहडोल को शहडोल व रिवा संभाग अध्यक्ष, तुषार कोठारी को कार्यसमिति सदस्य, राजेन्द्रसिंह पंवार सोनकच्छ को उज्जैन संभाग का अध्यक्ष मनोनीत किया गया। इसी प्रकार निष्क्रिय इकाई में फैर बदल हेतु इंदौर के दिलीप मिश्रा को इंदौर संभाग के जिलों के लिए नियुक्त किया गया।</p>
<p style="text-align: justify;">बैठक में प्रमुख रूप से प्रांतीय उपाध्यक्ष सुनील पलेरिया (बैतूल), दिग्विजयसिंह (उपाध्यक्ष) जबलपुर, मनोज मेहता (झाबुआ) उपाध्यक्ष, प्रांतीय सचिव दौलत भावसार, दिलीप मिश्रा, संजय जोशी सचिव, जगदीश जोशी संगठन सचिव, गेंदालाल तिवारी व एस.के. भारद्वाज भोपाल प्रांतीय कार्यसमिति सदस्य सहित प्रदेश कार्यसमिति सदस्य, संभागीय कार्यसमिति सदस्य एवं शहडोल, भोपाल, होशंगाबाद, हरदा, धार, इंदौर, देवास, झाबुआ, रायसेन, विदिशा, अशोक नगर, गुना, जबलपुर सहित अन्य जिलों के सैकड़ों पदाधिकारियों ने हिस्सा लेकर यूनियन को मजबूत बनाने का संकल्प लिया।</p>
<p style="text-align: justify;">
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/2010/07/13/%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a8%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%a8/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>आम आदमी की आवाज बने मीडिया</title>
		<link>http://www.janokti.com/2010/07/13/%e0%a4%86%e0%a4%ae-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/2010/07/13/%e0%a4%86%e0%a4%ae-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 13 Jul 2010 06:16:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डा ० पुरुषोत्तम मीणा</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[film-tv]]></category>
		<category><![CDATA[media]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[भ्रष्टाचार]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=4529</guid>
		<description><![CDATA[मीडिया आम लोगों के लिये लडना तो दूर, कहीं नजदीक भी नजर नहीं आ रहा है। मीडिया एक्टर, क्रिकेटर, कलेक्टर, लीडर और इंस्पेक्टर के इर्द-गिर्द घूमता हुआ उद्योगपतियों का व्यापार... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/13/%e0%a4%86%e0%a4%ae-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-4530" title="breaking-news.jpg" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/breaking-news.jpg-300x206.png" alt="" width="300" height="206" />मीडिया आम लोगों के लिये लडना तो दूर, कहीं नजदीक भी नजर नहीं आ रहा है। मीडिया एक्टर, क्रिकेटर, कलेक्टर, लीडर और इंस्पेक्टर के इर्द-गिर्द घूमता हुआ उद्योगपतियों का व्यापार बन गया है। मीडियाजन धन, दौलत और एश-ओ-आराम के पीछे दौड रहे हैं। ऐसे में सच्चे मीडिया सेवकों को सामने आना होगा। उन्हें अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह करना होगा। मीडिया को मानवता की कराह को सुनना होगा और संसार को सुनाना भी होगा। हालात जो भी रहे हों या जो भी है, लेकिन यह सच है कि आम लोगों में बोलने की हिम्मत नहीं है, अब मीडिया को अपनी जुबानी लोगों की पीडा एवं समस्याओं को सुनना और उठाना होगा, तब ही किसी बदलाव या चमत्कार की आशा की जा सकती है।</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी से 1947 में आजाद हुआ था। आजादी के साथ-साथ हमने विभाजन के अभी रिस रहे घाव देखे थे। करोडों भोले भाले लोगों को लग रहा था कि आजादी के बाद इस देश में चमत्कार हो जायेगा। उनको कष्टों से मुक्ति मिल जायेगी। उनके स्वाभिमान एवं सम्पत्ति की रक्षा सुनिश्चित होगी। आम जनता के सामने जो सवाल 1947 में थे, वही के वहीं सवाल आज भी हमारे सामने सीना ताने खडे थे। बल्कि अधिक तीखे सवालों में तब्दील हो गये हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा नहीं है कि देश आगे नहीं बढा है, लेकिन विकास किस कीमत पर और किन-किन लोगों के लिये हुआ है, यह अपने आप में विचारणीय सवाल है? दुनिया के सामने हम ललकारते हुए कहते सुने जा सकते हैं कि हमने अनेक क्षेत्रों में क्रान्तिकारी प्रगति की है। मात्र आधी सदी में शहरों से चलकर, हमारों गांवों और ढाणियों में भी टीवी और इंटरनेट की पहुँच गये हैं। लेकिन समाज की समस्याएं आज भी वही की वहीं हैं। अपराध एवं अपराधियों में कोई कमी नहीं आयी है। विभेदकारी मानसिकता में कमी नहीं हुई है।</p>
<p style="text-align: justify;">राजनीतिज्ञों का रंग तो इतना बदरंग हो चुका है कि राजनेताओं की पूरी की पूरी कौम ही गिरगिट नजर आने लगी है। शोषित अधिक शोषित हुआ है और शोषक ताकतवर होता जा रहा है। दोनों को एक दूसरे का पता है कि कौन शोषक है और कौन शोक्षित, लेकिन विशेषकर शोषित वर्ग 1947 से पहले भांति बल्कि आज तो पहले से भी अधिक भयभीत और सहमा हुआ है। समाज में व्याप्त आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि विसमता एवं विरोधाभासों में कोई मौलिक बदला या परिवर्तन नहीं आया है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस देश में लोकतन्त्र या जनता के शासन का क्या अभिप्राय है?</p>
<p style="text-align: justify;">लोगों को कार्यपालिका एवं व्यवस्थापालिका ने निराश किया है, न्यायपालिका ने अपनी भूमिका काफी हद तक, काफी समय तकअच्छी तरह से निभाई है, लेकिन सरकार के वास्तविक संचालक अफसरों ने जानबूझकर न्यायपालिका पर इतना गैर-जरूरी भार लाद दिया है कि चाहकर भी न्यायपालिका कुछ नहीं कर सकती। इसके अलावा न्यायपालिका भी भ्रष्टाचार में गौता खाने लगी है। अपराधों एवं जनसंख्य में हो रही बेतहासा वृद्धि के अनुपात में जजों की संख्या बढाना तो दूर, जजों के रिक्त पदों को भी वर्षों तक नहीं भरा जाता है। सब जानते हैं कि जानबूझकर जनता को न्याय से वंचित करने का षडयन्त्र चल रहा है। ऐसे में अब जनता न्यायपालिका से भी निराश होने लगी है।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे में उद्योगपतियों के हाथ की कठपुतली बन चुक मीडिया से अभी भी लोगों को आशा है। लोग मानते हैं कि मीडिया ही आम जन के दर्द को समझने और प्रस्तुत करने का प्रयास करेगा। प्रिण्ट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी के साथ-साथ, यह उसका संवैधानिक कर्त्तव्य भी है कि वह आम लोगों के हक, स्वाभिमान, दर्द, स्वास्थ्य, सम्मान, इज्जत आदि के लिए अपनी प्राथमिकताएँ तय करे, लेकिन इसके विपरीत मीडिया आम लोगों के लिये लडना तो दूर, कहीं नजदीक भी नजर नहीं आ रहा है। मीडिया एक्टर, क्रिकेटर, कलेक्टर, लीडर और इंस्पेक्टर के इर्द-गिर्द घूमता हुआ उद्योगपतियों का व्यापार बन गया है। मीडियाजन धन, दौलत और एश-ओ-आराम के पीछे दौड रहे हैं। ऐसे में सच्चे मीडिया सेवकों को सामने आना होगा। उन्हें अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह करना होगा। मीडिया को मानवता की कराह को सुनना होगा और संसार को सुनाना भी होगा। हालात जो भी रहे हों या जो भी है, लेकिन यह सच है कि आम लोगों में बोलने की हिम्मत नहीं है, अब मीडिया को अपनी जुबानी लोगों की पीडा एवं समस्याओं को सुनना और उठाना होगा, तब ही किसी बदलाव या चमत्कार की आशा की जा सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;">
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/2010/07/13/%e0%a4%86%e0%a4%ae-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>मीडियामोरचा अब वेब पर</title>
		<link>http://www.janokti.com/2010/07/08/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%ac-%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%ac-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/2010/07/08/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%ac-%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%ac-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 08 Jul 2010 13:27:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[ब्लॉग-जगत]]></category>
		<category><![CDATA[film]]></category>
		<category><![CDATA[film-tv]]></category>
		<category><![CDATA[film/tv]]></category>
		<category><![CDATA[market]]></category>
		<category><![CDATA[media]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[मीडियामोरचा]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=4346</guid>
		<description><![CDATA[पटना से संचालित हो रहे मीडिया के सरोकार पर आधारित ई-पत्रिका मीडियामोरचा अब अपने नए कलेवर के साथ पाठकों और प्रशंषकों के बीच वेब पर अवतरित हो गया है। सरोकारों... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/08/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%ac-%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%ac-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-4347" title="Picture 001" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/Picture-001-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" />पटना से संचालित हो रहे मीडिया के सरोकार पर आधारित ई-पत्रिका मीडियामोरचा अब अपने नए कलेवर के साथ पाठकों और प्रशंषकों के बीच वेब पर अवतरित हो गया है। सरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता में उभरते हुए पत्रकार लीना द्वारा संचालित और संपादित इस साइट पर मीडिया से जुड़े आलेख, सूचनाएं और विचार मौजूद हैं। पंचलाइन पत्रकारिता के जनसरोकार के संकल्प से साथ वेब की दुनिया में उपलब्ध मीडियामोरचा की सबसे खास बात है कि लोकतंत्र के वाचडाग यानी मीडिया की खबर लेने वाली इस वेबसाइट से की सभी सहयोगी महिलाएं हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">संपादक लीना कहती हैं कि मीडिया की दुनिया में तेजी से बदलाव आ रहा है। पत्रकार से लेकर मीडिया के बाजार तक सब बदले हैं, वैसी स्थिति में मीडिया के सरोकार भी बदल रहे हैं। हमारी कोशिश है कि मीडिया के सरोकार जनता से जुड़ रहे और मीडिया जनता की आवाज बनी रहे।</p>
<p style="text-align: justify;">मीडियामोरचा के नए रूप की विशेषता है कि अब जब चाहे सामग्री को अपडेट कर सकते हैं। इसमें नए लेखकों और विचार को अधिकाधिक जगह देने की कोशिश की जा रही है। संपादक लीना मीडिया से जुड़े लोग और मीडिया कोर्स में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं से अपील करती हैं कि वे अपने आलेख भेजें, जिसे यथाषीघ्र पब्लिष किया जाएगा। सामग्री को निम्न आईडी पर भेजी जा सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;">mediamorcha@gmail.com  ,  http://mediamorcha.co.in/</p>
<p style="text-align: justify;">
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/2010/07/08/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%ac-%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%ac-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>5</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>हाथ को मीडिया का साथ</title>
		<link>http://www.janokti.com/2010/07/07/%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/2010/07/07/%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 07 Jul 2010 05:04:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>नरेन्द्र निर्मल</dc:creator>
				<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[bhajpa]]></category>
		<category><![CDATA[bjp]]></category>
		<category><![CDATA[congress]]></category>
		<category><![CDATA[controversy]]></category>
		<category><![CDATA[democracy]]></category>
		<category><![CDATA[inflation rate]]></category>
		<category><![CDATA[market]]></category>
		<category><![CDATA[media]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[price increasing]]></category>
		<category><![CDATA[religion]]></category>
		<category><![CDATA[अंधेर नगरी]]></category>
		<category><![CDATA[कांग्रेस]]></category>
		<category><![CDATA[भ्रष्टाचार]]></category>
		<category><![CDATA[मंहगाई]]></category>
		<category><![CDATA[संसद मार्ग]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=4301</guid>
		<description><![CDATA[देश में मंहगाई आज सातवें आसमान पर पहुच गया है. लोगो के थाल से दाल तो सरकार ने पहले ही हटा दिए. अब सरकार का इरादा चावल और आटे को... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/07/%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-4302" title="news_RYsYq_26" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/news_RYsYq_26-300x215.jpg" alt="" width="300" height="215" />देश में मंहगाई आज सातवें आसमान पर पहुच गया है. लोगो के थाल से दाल तो सरकार ने पहले ही हटा दिए. अब सरकार का इरादा चावल और आटे को भी गरीब के थालिओं से हटाने का है. वजह एक मात्र दिखाई देता है, सरकार देश से गरीबी मिटाना चाहती है और शायद ही ऐसा संभव हो पाए. इसलिए सरकार ने नई तरकीब निकाली है, गरीबी मिटाने के लिए नहीं, बल्कि गरीबों को मिटाने के लिए. क्योंकि भारत के नागरिक लाख समझाने पर भी अपनी आबादी घटाने पर विचार नहीं कर रहे है. खासतौर से गरीब और अशिक्षित लोग जनसँख्या को लेकर आज भी पूरी तरह उदासीन है, आज देश भर में महंगाई के खिलाफ विपक्ष ने धरना-प्रदर्शन कर देश में बंद तो सफल अवश्य कर दिया लेकिन क्या इससे महंगाई जैसी समस्या का हल हो जायेगा ऐसा शायद ही  संभव हो पाए.</p>
<p style="text-align: justify;">महंगाई  से त्रस्त आम जनता भले ही विपक्ष की बात मानकर एक दिन के लिए सड़क पर गाड़ी चलाना बंद कर दे, अपनी दुकानों की किवाड़ लगा दे या नौकरियों और अपने कामकाज पर जाना छोड़ दे, फिर भी सरकार कुछ नहीं करेगी ये तय है. क्योकि सरकार जानती है कि आम आदमी आज पूरी तरह विचलित स्थिति में है, वो अपने जीवकोपार्जन और घरेलु परेशानियों से  इस कदर जुझ रहे है कि उन्हें सही गलत समझने की फुरसत ही नहीं होती। वह हर बड़ी बात आसानी से कुछ ही दिनों में भूल जाते है। उन्हें तो बस वर्तमान की चीजे याद रहती है। और भूतकाल के कारनामों पर पर्दा डालना कांग्रेस आसानी से जानती है। इसलिए तो हर चुनाव से पूर्व जनहित में देश की तीजोरी को खोल दिया जाता है। अंतिम बजट सत्र के दौरान इतने उपहार लोगों को बांट दिए जाते है कि लोग सारे द्वेष, सरकार के कामकाजो के प्रति खटाश सब भूल जाएंगे। और ऐसा एक बार नहीं सरकार ने हर बार यहीं किया है। यहां लोगों को वर्तमान में झाकने की आदत पड़ गई है और लोग इंसानियत पूरी तरह भूलते जा रहे हैं। अगर सरकार ने पहले जितने कुछ अच्छे कार्य किए हो वो उसे आसानी से भूल जाते है लेकिन वर्तमान में थोड़ी सी गलती हो जाए तो सारे पुण्य पाप में बदल जाते है। एक आम आदमी की इस सोच का ही नतीजा है कि पिछली राजग सरकार बहुदल होने के बावजूद अच्छा कार्य किया सरकारी कर्ज तोड़े। लोगों के सिर पर जो विश्वस्तरिय कर्जा का काला बादल छाया हुआ था उसे साफ तो नहीं किया लेकिन कम अवश्य कर दिया। परमाणु परिक्षण कर देश को विश्व के बड़े देशों में ला खड़ा किया। वह भी स्वालंबी बनाते हुए। लेकिन आम आदमी ने उन्हें क्या दिया प्याज के आसू। करगील का करारा जवाब देकर पाकिस्तान को झुकने के साथ-साथ विश्व के बीच आतंकवाद फैलाने वाला दोषी देश साबित किया हालांकि उन्होंने दोस्ती की बस चलाकर खाई को पांटने का काम अवश्य किया था। लेकिन कुत्ते की पुंछ टेढ़ी की टेढी। देश के हर कोने में बड़े बड़े राज्य मार्गों का निर्माण कराया जिससे की आज व्यवसाय, औद्योगिक ईकाईयों से लेकर आम आदमी के लिए यातायात को लेकर काफी सुविधा बढ़ी है। वाजपई सरकार ने इतने बड़े गठबंधन को सिर्फ चलाया बल्कि अलग-अलग पार्टियों के हितों के साथ देश हितों का भी बखुबी ध्यान रखा।</p>
<p style="text-align: justify;">आम आदमी के लिए वाजपई सरकार ने सब कुछ किया खासतौर से मंहगाई पर भी अंकुश लगाए रखा। और उस रफतार से भी मंहगाई को बढ़ने नहीं दिया जिस रफतार से आज बढ़ाई जा रही है यूपीए कम कांग्रेस सरकार द्वारा। हां एक बड़ी गलती हुई वाजपई सरकार से कि उन्होंने जिस मुद्दे की वजह से चुनाव जीती और सत्ता तक पहुंचे उसे उन्होंने पूरा नहीं किया। यहीं कारण है कि पहले से नाराज मुसलमान के बाद हिन्दू वर्ग भी उनसे नाराज हो गया। लेकिन उन्होंने यह कभी नहीं सोचा कि किसी भी चीज का निर्माण करने से कही ज्यादा तोड़ना आसान है। मंदिर हो या मस्जिद मुश्किल से किसी भी समुदाय को तोड़ने में 2 से 3 दिन लग सकते है या कहे तो दो से तीन घंटे लेकिन इसे बनाने में कम से कम 2-3 महिने अवश्य लग जाएगे। ऐसे में भला उनके एक पक्षिय मंदिर निर्माण के निर्णय से सरकार गीर जाती तो क्या मंदिर का निर्माण हो सकता था, नहीं। तो उन्हें आज तक इस बात का दोषी क्यों माना जा रहा है। दूसरी चीज जब आज की कांग्रेस सरकार 4 साल मंहगे शाषण देने के बाद अंतिम वर्षों में सस्ता अनाज उपलब्ध करा दे। ऐसे में आप क्या समझ सकते है कि व्यापारी वर्ग पर पूरी तरह से कांग्रेसीयों का दवाब कायम है ऐसे में वाजपेई सरकार के अंतिम वर्षों में व्यापारियों पर दवाब डालकर आम आदमी की वस्तुओं के दामों को बढ़ाकर यह स्थिति पैदा की गई होगी। जिससे लोग पिछले कामों को भूल जाए और आज की महंगाई याद रखे जैसा की 2003 के चुनाव में हुआ था। आम आदमी को सोचना पड़ेगा की राजनीति में ऐसे हथकंडे अपनाए जाते है। कहां भी गया राजनीति कोई आसाना खेल नहीं है और जिसे खेलना आम आदमी के बस का नही है।  खासतौर से शरीफ आदमी की तो इसमें ऐंट्री ही नहीं है। सच बोलने वाला व्यक्ति यहां उपहास का साधन बन जाता है और झूठे व्यक्ति के सर पर हमेशा ताज लग जाता है, क्योंकि शरीफ आदमी के पास धन खर्चने, लोगों को दारू के लिए रूपय बांटने और वोट दवाब में डालने के लिए गुंडे नहीं होते।</p>
<p style="text-align: justify;">यहां तक की शरीफ आदमी जात-पात और धर्म के नाम पर वोट नहीं मांग सकता। वह काम के लिए मांगता है लेकिन आज सच्चाई है कि वोट सबसे ज्यादा काम को लेकर नहीं कौम को लेकर दी जाती है। और इस गुनाह को एक समुदाय सालों से करता आ रहा है। इसलिए आज देश में कोई पिछड़ा हुआ है तो बस वहीं लोग है। ऐसा नहीं है कि ये लोग पैसे के लिए बिक जाते है। ये आज भी इस भ्रम जाल में फंसे हुए है कि देश में इनका कोई हितैशी है तो वो कांग्रेस है। मैं नहीं कहता की बीजेपी ही अच्छी पार्टी है। हमारा मकसद है कि आप अपने क्षेत्र, मोहल्ले, समाज से खुद ऐसा प्रतिनिधि चुने जो गांव, समाज, परिवार, क्षेत्र में सबसे ईमानदार और कार्य के प्रति कर्मठ और विश्वासी हो। ऐसे लोगों को सामने लाकर उसे चुनाव में खड़ा कर हर प्रकार से मदद पहुंचाए फिर वो चाहे किसी भी जात या धर्म का हो। उसमें इंसानियत होनी चाहिए। पत्रकारिता जगत इस पहल में कुछ कर सकती है। लेकिन उसे फुरसत कहां वातानुकुलित जिंदगीयां जीने से उन्हें सरकार विज्ञापन के रूप में इतनी मदद पहुंचा देती है कि वह सरकार के खिलाफ बोलने से बचने के लिए अपने खबरियां चैनलों में नए-नए फिल्मी गोसिप और मनोरंजनात्मक कार्यक्रम प्रस्तुत करती रहती है। वहीं अखबार वाले विपक्ष को कमजोर बनाने में लगे हुए है कभी मोदी प्रकरण उठा लेते है। कभी बीजेपी के आंतरिक कलह को इस कदर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने और लोगों को सुनाने लगते है कि विपक्ष बेहद कमजोर हो चुका है।</p>
<p style="text-align: justify;">कभी अखबार या खबरियां चैनलों ने यह दिखाने की कभी कोशिश नहीं कि देश के 543 सांसदों और हजारों विधायक अपने अपने क्षेत्र में किस तरह का काम कर रहे है। किन किन सांसदों पे काले धन स्वीस खाते में पड़े है, किन-किन राजनेताओं के बच्चे विदेश में शिक्षा प्राप्त कर रहे है। इन शासक वर्ग के लोग जो देश चलाने का, गरीबी मिटाने का, और भारत को विश्व शक्ति बनाने का झूठा ख्वाब दिखाते है, कितनी आसानी से यहा की जनता की गाढ़ी कमाई चुसकर अमेरिका में बसने की तैयारी कर लेते है। जो लोग आज देश की आर्थिक नीतियों का संचालन करते है। और जिनके उपर महंगाई बढ़ाने या घटाने का जिम्मा है उनका भविष्य उनके बच्चों के रूप में अमेरिका बस चुका है। और इनकी उर्जा भी अमेरिकन नागरिकता पाने में लगी रहती है। फिर यह देश कैसे चल सकता है। जब देश को चलाने वालों में देश प्रेम ही नहीं बचा है। इस तरह के अंदरूनी विश्वासघात के प्रति मीडिया आंख फेरे खड़ी है। देश में नक्सली बढ़ रहे है, सैनिक मारे जा रहे है। लेकिन कभी ये सोचने या दिखाने की जरूरत नहीं पड़ती की नक्सलियों जिन्हें सरकारी कर्मचारी समझकर मार रहा है उनके भी परिवार में कोई हैं। उनके पीछे भी कोई रोने वाला है। कभी ये सोचने की जरूरत नहीं पड़ी की नक्सली कभी नेताओं को निशाना क्यो नहीं बनाता। अगर विकास को लेकर नक्सली हिंसा करते है तो उस क्षेत्र का सांसद जिम्मेवार है तो उस सांसद पर क्यों नहीं हमला होता। आखिर उनका फंनडींग का जरिया क्या है? इतने आधुनिक हथियार उन्हें कहा से प्राप्त हो रहे है और इसके लिए उन्हें धन कहा से मिल रहा है? लेकिन पत्रकार जोखिम उठाने तैयार नहीं है वो तो वातानुकुलित कक्ष में बैठकर होम प्रोडक्ट खबरे तैयार कर बेचना ज्यादा पसंद करता हैं। कुछ लोग करना भी चाहते है तो ऐसे लोग जानते है कि हर एक्सक्लूसिव खबर का जुड़ाव सरकार या राजनीति से होता है। जिसका प्रसारण करना बेहद जोखिम भरा होता है क्योंकि हर चैनल का मालिक या तो कोई राजनेता होता है या ऐसे चैनलों में अब राजनीतिक लोगों के पैसे खुले या छुपे तौर पर लगे होते है। लेकिन फिर भी सांसदों के क्षेत्रों में किस प्रकार का काम हो रहा है वहां के लोग कितने खुशहाल है और किस दिक्कतों से गुजर रहे है। कभी दिखाना नहीं चाहते। हां आज जब महंगाई की मार झेल रही जनता की आवाज विपक्षी सड़को पर उठा रहे तो तब इन मीडिया वालों को जनता की थोड़ी बहुत दिक्कतों का बड़ा ख्याल हो आया है। और इसी मीडिया का दोगला चरित्र तो देखिए जब पिछले दिनों बढ़ती महंगाई के दौरान विपक्ष चुप था तब भी ये विपक्ष को ही कोसते हुए उसे कमजोर और निकम्मा साबित करने में लगे हुए थे। ऐसा लगता है कि भारतीय मीडिया का चरित्र सत्ता समर्पित हो चुका है।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/2010/07/07/%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>रावण अधर्मी तो राम धर्मात्मा क्यो ?</title>
		<link>http://www.janokti.com/2010/07/04/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a3-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4/</link>
		<comments>http://www.janokti.com/2010/07/04/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a3-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 04 Jul 2010 08:11:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सुमंत कुo सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.janokti.com/?p=4159</guid>
		<description><![CDATA[&#8216;रावण&#8217; मणि रत्नम की नई फिल्म का नाम है। फिल्म अच्छी है या बुरी, नहीं कह सकता। लेकिन फिल्म कई नये सवाल खड़े करती है। क्या राम उतने अच्छे थे... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/04/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a3-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&#8216;<img class="alignleft size-full wp-image-4165" title="raavan" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/raavan.jpg" alt="" width="260" height="200" />रावण&#8217; मणि रत्नम की नई फिल्म का नाम है। फिल्म अच्छी है या बुरी, नहीं कह सकता। लेकिन फिल्म कई नये सवाल खड़े करती है। क्या राम उतने अच्छे थे जितने रामचरित मानस में दिखाए गए हैं? क्या रावण उतना बुरा था जितना तुलसीदास बता गए? क्या अच्छाई और बुराई एक सीधी सपाट लकीर हुआ करती हैं? फिल्म रावण सीधे-सीधे रामचरित मानस नहीं है लेकिन फिल्म देखते हुए कोई भी कह सकता है कि मणि की कहानी की प्रेरणा रामचरित मानस है।</p>
<p style="text-align: justify;">इस फिल्म में एक रावण है जो अच्छा है या बुरा फिल्म इस बारे में चुप रहती है। एक राम है जिसकी पत्नी का अपहरण रावण कर लेता है। राम की मदद के लिये एक हनुमान है जो अशोक वाटिका तक पहुंच भी जाता है। फिल्म में रावण की एक बहन भी है यानी सूर्पनखा जिसके साथ राम की वजह से गलत होता है। सीता के चरित्र पर राम शक भी करते हैं और अंत में राम रावण में युद्ध होता है। रावण मर जाता है। राम की जीत होती है लेकिन सीता राम के पास लौटती है ये नहीं दिखाया जाता। और फिल्म जिस बिंदु पर खत्म होती है वहां रावण दर्शकों और सीता की सहानुभूति जीत लेता है।</p>
<p style="text-align: justify;">फिल्म में रावण विक्टिम है, वो जो कुछ भी करता है वो अपनी बहन के साथ हुए अत्याचार के प्रतिशोध में करता है। उसकी बहन पुलिस की ज्यादती का शिकार होकर आत्महत्या कर लेती है। बदले की भावना से वशीभूत हो वह पुलिस अफसर की पत्नी का अपहरण कर लेता है। उसे अपने साथ रखता है। उसे तकलीफ भी देता है और उसकी तरफ आकर्षित भी होता है लेकिन उसकी इज्जत पर हाथ नहीं डालता। रामचरित मानस की तरह।</p>
<p style="text-align: justify;">तुलसी की रामचरितमानस में रावण सीता का अपहरण क्यों करता है? क्या वो सीता पर आसक्त हुआ था? नहीं। क्या वो पापी था इसलिए? नहीं। वो गुस्से और बदले की आग में सीता को उठाता है क्योंकि उसकी बहन सूर्पनखा जंगल में भटकते राम पर मोहित हो जाती है। वो राम के सामने प्रणय निवेदन करती है। राम कहते हैं कि वो शादीशुदा हैं लिहाजा वो निवेदन ठुकरा देते हैं। उसे लक्ष्मण के पास भेजते हैं, लक्ष्मण उसे दुबारा राम के पास भेजते हैं, राम फिर लक्ष्मण के पास। इससे नाराज हो कर सूर्पनखा हमला कर देती है। लक्ष्मण सूर्पनखा की नाक काट लेते हैं। क्या सूर्पनखा की नाक काटना जायज है? क्या किसी भी नजर से इसको सही ठहराया जा सकता है? राम और लक्ष्मण ने क्या यहां गलती नहीं की? सूर्पनखा को राम का लक्ष्मण और लक्ष्मण का राम के पास बार-बार भेजने का क्या औचित्य था? क्या सूर्पनखा को जानबूझकर परेशान नहीं किया गया?</p>
<p style="text-align: justify;">सूर्पनखा की नाक कटने की खबर रावण तक पहुंचती है। वो गुस्से से पागल हो जाता है। सूर्पनखा से वो बहुत प्यार करता था। पूरी दुनिया उसके नाम से कांपती थी, देवलोक तक में उसका डंका बजता था, पाताल लोक में भी उसका कोई सानी नहीं था। ऐसे पराक्रमी राजा की बहन की नाक सिर्फ इसलिये काट ली जाये कि उसका दिल किसी पर आ गया और उसने प्रणय निवेदन की गुस्ताखी की तो उस राजा की प्रतिक्रिया क्या होगी? सहज कल्पना तो यही कहती है कि वो फौरन आक्रमण कर ऐसे लोगों को मजा चखा दे। लेकिन वो शायद खून खराबे से बचना चाहता था। इसके बदले वो सीता हरण करता है। और आप पूरी रामचरित मानस पढ़ जाइये कहीं भी आपको अंश भर ये नहीं दिखेगा कि उसने कभी भी सीता के साथ अनाचार करने की कोशिश की। हां, वो उन्हें बंधक बनाकर अशोक वाटिका में रखता है और इस बात का इंतजार करता है कि सीता उन्हें अपना बना ले।</p>
<p style="text-align: justify;">बदले की आग में जलते हुए व्यक्ति के लिये इतने सब्र का कोई कारण नहीं था। दुष्ट बुद्धि तो यही कहती है कि उसे जबरन अपना बना लेना चाहिये लेकिन वो ऐसा नहीं करता। वो इंतजार करता है, सब्र से काम लेता है। अगर लक्ष्मण ने भी जल्दबाजी नहीं की होती, सब्र से काम लिया होता तो शायद राम-रावण युद्ध नहीं होता। तो किसे कहा जाये युद्ध के लिये दोषी? वो जिसने नाक काटी या वो जिसने सीता के हरण के बाद भी इंतजार किया?</p>
<p style="text-align: justify;">मुझे लगता है कि अब इस सवाल को हमें अपने अंदर पूछना चाहिए। राम को धर्म के साथ बताया गया और रावण को अधर्म का प्रतीक। लंका की लड़ाई को पाप पर पुण्य की विजय के रूप में हम उत्तर भारतीय मनाते हैं। विजय दशमी पर रावण को फूंका जाता है। अगर रावण सीता हरण की वजह से पापी हो गया तो सूर्पनखा की नाक काटने वाले को पुण्यात्मा कैसे कह सकते हैं? रावण पापी होता तो राम युद्धभूमि में धराशायी होने के बाद लक्ष्मण को ज्ञान प्राप्ति के लिये उसके पास क्यों भेजते? राम भी मानते थे कि रावण महाज्ञानी था। और लक्ष्मण को उससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत थी। शायद राम ने मन में कभी भी सूर्पनखा की नाक काटने के लिये लक्ष्मण को सही नहीं माना था। और ये राम का अपना तरीका था लक्ष्मण को सबक देने का।</p>
<p style="text-align: justify;">सवाल फिर वहीं आकर टिक जाता है कि जनमानस में रावण पापी है, अधर्मी है और राम धर्म के साथ। क्या इसलिए कि राम की जीत हुई थी और रावण हार गया था? हकीकत ये है कि सत्य अपनी संपूर्णता में भी सापेक्ष है। वो काला या सफेद नहीं, इन दोनों के बीच कहीं अटका रहता है। और हम उसे देख नहीं पाते या देखना नहीं चाहते। मणि रत्नम की पूरी कोशिश इस सत्य को दिखाने की है कि राम उतने पाक नहीं हैं जितने दिखते हैं और रावण उतना पापी नहीं है जितना बताया गया है। और हमें अपनी दृष्टि बदलने की जरूरत है। अपने मिथकों को भी नये संदर्भों में नये सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align: justify;">For more blogs : www.alienshot.blogspot.com</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.janokti.com/2010/07/04/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a3-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>
