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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; सिनेमा-संसार</title>
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		<title>सिनेमा और अश्लीलता</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 16:07:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पियूष कुमार द्विवेदी</dc:creator>
				<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा हिंदी अश्लीलता हिरोईन]]></category>

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		<description><![CDATA[दोस्तों, एक दृश्य है &#8230;&#8230;टीवी चल रहा है कोइ फिल्म आ रही है, माता, पिता, बेटा, भाई, बहन सब देख रहे हैं ! सब बड़े ध्यान से देख रहे हैं... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/27/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="aligncenter size-full wp-image-5386" title="film" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/film.jpg" alt="" width="310" height="387" />दोस्तों,  एक दृश्य है &#8230;&#8230;टीवी चल रहा है कोइ फिल्म आ रही है, माता, पिता, बेटा,  भाई, बहन सब देख रहे हैं ! सब बड़े ध्यान से देख रहे हैं ! अरे ये क्या  &#8230;..ये क्या हुआ इनको? अभी इतने ध्यान से देख रहे थे &#8230;ये क्या हुआ..बेटा  उठ के चला गया, बेटी भी इधर-उधर देखने का प्रयास करने लगी जैसे अपने आपको  टीवी से बचाना चाहती हो , तभी पिता उठ के चल दिए फिर बेटी ने भी उन्ही का  अनुसरण किया और फिर माँ ने भी &#8230;.. कितना अजीब दृश्य है ! ये दृश्य किसी  धारावाहिक, फिल्म इत्यादि का नहीं है ये दृश्य करीब-करीब हर पारिवारिक घर  का है ! आखिर ये दृश्य क्यों बन रहा है ? इस दृश्य के लिए मूलतः जिम्मेदार  कौन है? इस दृश्य के लिए जिम्मेदार है &#8220;अश्लीलता&#8221; जो कि हमारी आज कि हिंदी  सिनेमा पर बिना किसी वजह के पूरी तरह से काबिज है ! अब सवाल ये उठता है कि  इस अश्लीलता के लिए कौन जिम्मेदार है? इस सवाल का जवाब थोडा मुश्किल है  क्योंकी इस सवाल पर लोगों के कई मत हो सकते हैं ! कुछ लोगों का मत है कि  &#8220;इसके लिए फिल्म जगत जिम्मेदार है&#8221; तो कुछ &#8220;निर्माता-निर्देशकों को  जिम्मेदार मानते हैं&#8221; ! इस विषय पर मेरा मत यह है कि &#8220;इसके लिए कोइ या कुछ  एक जिम्मेदार नहीं हैं गलती सबकी है&#8221; !  क्योंकी, अगर हम फिल्म जगत या  निर्माता-निर्देशक को जिम्मेदार कहे तो इसमे दोष हमारा ही है &#8230;क्योंकी   वो ऐसे नहीं दिखा रहे है हम देख रहे हैं तब दिखा रहे हैं ! अगर कोइ फिल्म  रिलीज होती है और उसमे हिरोईन ने गलती से शालीन कपडे पहन लिए तो लोग कहते  हैं हिरोईन का रोल बेकार है, दम नहीं है ! किसी फिल्म में अगर हीरो- हिरोईन  का अंतरंग दृश्य न हो तो उस फिल्म के लिए &#8220;मसाला नहीं है&#8221; जैसे शब्द का  उपयोग किया जाता है ! ये चीज सिर्फ हम और आप तक सीमित नहीं है ये समस्या  मिडीया में भी है ! मिडीया इन अश्लील चीजों को इस तरह से दिखा रहा है कि  जैसे ये बहुत अच्छी बात है ! मिडिया वाले शायद ये भूल गए हैं कि &#8220;न्यूज़&#8221;  परिवार के सब लोग एक साथ देखते हैं ! हमारे युवावर्ग कि ये समस्या है कि जब  वो अकेले फिल्म देखने जाता है तो उसे फिल्म में मसाला चाहिए और जब वही  फिल्म परिवार के साथ देखता है तो नज़रें झुका कर चल देता है और  निर्माता-निर्देशकों को गाली देता  हैं कि कैसी फिल्म बना दी है ! युवावर्ग  के बाद जो एजेट लोग हैं वो कहने के समय तो खूब कहेंगे कि &#8220;आज-कल कि  फ़िल्में देखने लायक नहीं रही पहले कि फिल्मे भी क्या होती थी&#8221; जबकि सच्चाई  ये है कि उनको युवावर्ग से ज्यादा मसाला चाहिए अकेले फिल्म देखने बैठ जाएँ  तो जब तक ४-५ हॉट सीन नहीं देख लेते, हिरोईन को २-३ एंगल से नहीं देख लेते  तब तक चैन नहीं आता है ! इसलिए मेरा मत है कि &#8230;&#8230;अगर हमारी फिल्मों में  अश्लीलता है तो इसके लिए दोषी हम स्वयं हैं ! ये अश्लीलता कुछ और नहीं  पश्चिमी सभ्यता है जिसे हमने बाकि पश्चिमी चीजों कि तरह अपना लिया है !  लेकीन नहीं अब और नहीं &#8230;..हमें इस अश्लीलता को मिटाना है और इसके लिए  हमें अपना नजरिया बदलना पड़ेगा, अश्लील फिल्मों का विरोध करना पड़ेगा&#8230;  क्योंकी, ये अश्लीलता हमारी संस्कृती के लिए बहुत बड़ा खतरा है ! अगर इसे  नहीं मिटाया गया तो आने वाले दशकों में ये हमारी बची-खुची संस्कृती को मिटा  देगी फिर हमारी अपनी कोइ पहचान नहीं रह जाएगी भारत खुद अपने आप ही मिट  जाएगा ! इसलिए रोको इस अश्लीलता को .बदलो अपना नजरिया और बचालो भारत को&#8221;</p>
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		<title>रावण अधर्मी तो राम धर्मात्मा क्यो ?</title>
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		<pubDate>Sun, 04 Jul 2010 08:11:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सुमंत कुo सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>

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		<description><![CDATA[&#8216;रावण&#8217; मणि रत्नम की नई फिल्म का नाम है। फिल्म अच्छी है या बुरी, नहीं कह सकता। लेकिन फिल्म कई नये सवाल खड़े करती है। क्या राम उतने अच्छे थे... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/04/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a3-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&#8216;<img class="alignleft size-full wp-image-4165" title="raavan" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/raavan.jpg" alt="" width="260" height="200" />रावण&#8217; मणि रत्नम की नई फिल्म का नाम है। फिल्म अच्छी है या बुरी, नहीं कह सकता। लेकिन फिल्म कई नये सवाल खड़े करती है। क्या राम उतने अच्छे थे जितने रामचरित मानस में दिखाए गए हैं? क्या रावण उतना बुरा था जितना तुलसीदास बता गए? क्या अच्छाई और बुराई एक सीधी सपाट लकीर हुआ करती हैं? फिल्म रावण सीधे-सीधे रामचरित मानस नहीं है लेकिन फिल्म देखते हुए कोई भी कह सकता है कि मणि की कहानी की प्रेरणा रामचरित मानस है।</p>
<p style="text-align: justify;">इस फिल्म में एक रावण है जो अच्छा है या बुरा फिल्म इस बारे में चुप रहती है। एक राम है जिसकी पत्नी का अपहरण रावण कर लेता है। राम की मदद के लिये एक हनुमान है जो अशोक वाटिका तक पहुंच भी जाता है। फिल्म में रावण की एक बहन भी है यानी सूर्पनखा जिसके साथ राम की वजह से गलत होता है। सीता के चरित्र पर राम शक भी करते हैं और अंत में राम रावण में युद्ध होता है। रावण मर जाता है। राम की जीत होती है लेकिन सीता राम के पास लौटती है ये नहीं दिखाया जाता। और फिल्म जिस बिंदु पर खत्म होती है वहां रावण दर्शकों और सीता की सहानुभूति जीत लेता है।</p>
<p style="text-align: justify;">फिल्म में रावण विक्टिम है, वो जो कुछ भी करता है वो अपनी बहन के साथ हुए अत्याचार के प्रतिशोध में करता है। उसकी बहन पुलिस की ज्यादती का शिकार होकर आत्महत्या कर लेती है। बदले की भावना से वशीभूत हो वह पुलिस अफसर की पत्नी का अपहरण कर लेता है। उसे अपने साथ रखता है। उसे तकलीफ भी देता है और उसकी तरफ आकर्षित भी होता है लेकिन उसकी इज्जत पर हाथ नहीं डालता। रामचरित मानस की तरह।</p>
<p style="text-align: justify;">तुलसी की रामचरितमानस में रावण सीता का अपहरण क्यों करता है? क्या वो सीता पर आसक्त हुआ था? नहीं। क्या वो पापी था इसलिए? नहीं। वो गुस्से और बदले की आग में सीता को उठाता है क्योंकि उसकी बहन सूर्पनखा जंगल में भटकते राम पर मोहित हो जाती है। वो राम के सामने प्रणय निवेदन करती है। राम कहते हैं कि वो शादीशुदा हैं लिहाजा वो निवेदन ठुकरा देते हैं। उसे लक्ष्मण के पास भेजते हैं, लक्ष्मण उसे दुबारा राम के पास भेजते हैं, राम फिर लक्ष्मण के पास। इससे नाराज हो कर सूर्पनखा हमला कर देती है। लक्ष्मण सूर्पनखा की नाक काट लेते हैं। क्या सूर्पनखा की नाक काटना जायज है? क्या किसी भी नजर से इसको सही ठहराया जा सकता है? राम और लक्ष्मण ने क्या यहां गलती नहीं की? सूर्पनखा को राम का लक्ष्मण और लक्ष्मण का राम के पास बार-बार भेजने का क्या औचित्य था? क्या सूर्पनखा को जानबूझकर परेशान नहीं किया गया?</p>
<p style="text-align: justify;">सूर्पनखा की नाक कटने की खबर रावण तक पहुंचती है। वो गुस्से से पागल हो जाता है। सूर्पनखा से वो बहुत प्यार करता था। पूरी दुनिया उसके नाम से कांपती थी, देवलोक तक में उसका डंका बजता था, पाताल लोक में भी उसका कोई सानी नहीं था। ऐसे पराक्रमी राजा की बहन की नाक सिर्फ इसलिये काट ली जाये कि उसका दिल किसी पर आ गया और उसने प्रणय निवेदन की गुस्ताखी की तो उस राजा की प्रतिक्रिया क्या होगी? सहज कल्पना तो यही कहती है कि वो फौरन आक्रमण कर ऐसे लोगों को मजा चखा दे। लेकिन वो शायद खून खराबे से बचना चाहता था। इसके बदले वो सीता हरण करता है। और आप पूरी रामचरित मानस पढ़ जाइये कहीं भी आपको अंश भर ये नहीं दिखेगा कि उसने कभी भी सीता के साथ अनाचार करने की कोशिश की। हां, वो उन्हें बंधक बनाकर अशोक वाटिका में रखता है और इस बात का इंतजार करता है कि सीता उन्हें अपना बना ले।</p>
<p style="text-align: justify;">बदले की आग में जलते हुए व्यक्ति के लिये इतने सब्र का कोई कारण नहीं था। दुष्ट बुद्धि तो यही कहती है कि उसे जबरन अपना बना लेना चाहिये लेकिन वो ऐसा नहीं करता। वो इंतजार करता है, सब्र से काम लेता है। अगर लक्ष्मण ने भी जल्दबाजी नहीं की होती, सब्र से काम लिया होता तो शायद राम-रावण युद्ध नहीं होता। तो किसे कहा जाये युद्ध के लिये दोषी? वो जिसने नाक काटी या वो जिसने सीता के हरण के बाद भी इंतजार किया?</p>
<p style="text-align: justify;">मुझे लगता है कि अब इस सवाल को हमें अपने अंदर पूछना चाहिए। राम को धर्म के साथ बताया गया और रावण को अधर्म का प्रतीक। लंका की लड़ाई को पाप पर पुण्य की विजय के रूप में हम उत्तर भारतीय मनाते हैं। विजय दशमी पर रावण को फूंका जाता है। अगर रावण सीता हरण की वजह से पापी हो गया तो सूर्पनखा की नाक काटने वाले को पुण्यात्मा कैसे कह सकते हैं? रावण पापी होता तो राम युद्धभूमि में धराशायी होने के बाद लक्ष्मण को ज्ञान प्राप्ति के लिये उसके पास क्यों भेजते? राम भी मानते थे कि रावण महाज्ञानी था। और लक्ष्मण को उससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत थी। शायद राम ने मन में कभी भी सूर्पनखा की नाक काटने के लिये लक्ष्मण को सही नहीं माना था। और ये राम का अपना तरीका था लक्ष्मण को सबक देने का।</p>
<p style="text-align: justify;">सवाल फिर वहीं आकर टिक जाता है कि जनमानस में रावण पापी है, अधर्मी है और राम धर्म के साथ। क्या इसलिए कि राम की जीत हुई थी और रावण हार गया था? हकीकत ये है कि सत्य अपनी संपूर्णता में भी सापेक्ष है। वो काला या सफेद नहीं, इन दोनों के बीच कहीं अटका रहता है। और हम उसे देख नहीं पाते या देखना नहीं चाहते। मणि रत्नम की पूरी कोशिश इस सत्य को दिखाने की है कि राम उतने पाक नहीं हैं जितने दिखते हैं और रावण उतना पापी नहीं है जितना बताया गया है। और हमें अपनी दृष्टि बदलने की जरूरत है। अपने मिथकों को भी नये संदर्भों में नये सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है।</p>
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		<title>हेट नहीं, आई लव, लव स्टोरीज !</title>
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		<pubDate>Thu, 01 Jul 2010 13:45:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
				<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-4087" title="sonam-kapoor01" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/sonam-kapoor01-300x228.jpg" alt="" width="300" height="228" />रोमांटिक फिल्मों के मामलें में बॉलीवुड का रिकॉर्ड रोजर फेडरर के खेल के माफिक ही उजला रहा है. चाहे वह साठ के दशक  की राजकूपर-नरगिस अभिनीत &#8220;आवारा&#8221; हो या फिर नब्बे के  दशक  की हम आपके हैं कौन, दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे या फिर इक्कीसवीं सदी के पहले  दशक की लव आजकल, जब वी मेट हों. रोमांस, नाच-गाना बॉलीवुड की सबसे बड़ी पहचान है और प्रयोगवादी सिनेमा के वर्तमान दौर में भी ऐसी फिल्मों का बनना लगातार जारी है. सो, इसी माहौल में नए निर्देशक पुनीत मल्होत्रा इस शुक्रवार रोमांटिक फिल्मों के शौकीन दर्शकों  के लिए &#8220;आई हेट लव स्टोरीज&#8221; लेकर हाजिर हैं. करण जौहर के कैंम्प की इस फिल्म को उनतीस साल के पुनीत ने वैसी ही फिल्म में ढाला है, जैसे कि उनके गुरू करण ने दिलवालिया दुलहनियां ले जाएंगे में ढाला था. छोटी सी कहानी,, प्यार के पीछे भागते किरदार और एक-दूसरे को लेकर बदलते नायक-नायिका के अहसास, आई हेट लव स्टोरीज में सबकुछ हैं. फिल्म की कहानी इमरान खान के किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है, जो बॉलीवुड में एक फिल्म निर्देशक के साथ असिस्टेंट के तौर पर जुड़ा है. पेंच यहां पर यह है कि उसका बॉस रोमांटिक फिल्मों का सबसे बड़ा निर्देशक है, लेकिन इमरान तो ‘यूज एंड थ्रो’ की पालिसी वाला बंदा है. लेकिन उसकी जिंदगी तब बदल जाती है, जब सोनम कपूर उसके बॉस  की फिल्म में प्रोडक्शन डिजाइनर के तौर पर जुड़ती है. सोनम कपूर की जिंदगी में प्यार ही सबकुछ है, जबकि बंदे इमरान का इससे कोई वास्ता नहीं.. ऊपर से तुक्का यह कि सोनम कपूर पहले ही किसी के साथ प्यार में डूबी हुई है. सो, आगे इमरान भी प्यार के मायने समझता है और प्यार करने लग जाता है अपनी उसी से, जिसने उसे प्यार के मायने समझाए, मतलब सोनम कपूर से&#8230;.बस, आगे की कहानी में वहीं सबकुछ है, जो आप देखना चाहते हैं&#8230;..प्यार, मनाना.</p>
<p style="text-align: justify;">अब बात, फिल्म के कलाकारों की. इमरान खान ने ऐसा ही रोल अपनी पहली फिल्म जाने तू या जाने में भी किया था, लेकिन इस बार कुछ ज्यादा निखार आ गया है, उनकी एक्टिंग में. लेकिन फिल्म की यूएसपी है सोनम कपूर. पहली फिल्म सांवरियां और दिल्ली 6 में तो अनिल कपूर की यह लाडली बिटिया मुरझाई सी लगी थी.. लगा था एक-दो फिल्मों के बाद घर न बैठ जाएं. लेकिन अपनी तीसरी फिल्म में सोनम ने वो अदाकारी दिखाई है कि इंडस्ट्री की टॉप हिरोईनों की तो रातों की नींद उड़ी समझो. ऐसा ही कुछ कर दिखाया है पुनीत मल्होत्रा ने बतौर निर्देशक अपनी पहली ही फिल्म में. निर्देषन शानदार किया है, हां फिल्म की कहानी लिखने की कला उनकों और ज्यादा तराशनी होगी. फिर भी,, पहली फिल्म के लिहाज से तो अभी उनकी तारीफ होनी चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;">कूल जमा, यह फिल्म प्यार करने वालों के लिए हैं, युवाओं के लिए हैं. अगर आप युवा हैं, या फिर आपका दिल जवान हैं और आप प्यार में यकीन रखते हैं, तो फिर चले जाइए अपने नजदीकी सिनेमाघर की ओर-जहां आई हेट लव स्टोरीज चल रही हो&#8230;..यकीनन आप यह कहते हुए बाहर निकलेंगे-आई लव लव स्टोरीज&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>इस राजनीति की तारीफ कीजिए</title>
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		<pubDate>Tue, 22 Jun 2010 06:08:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
				<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-3842" title="Rajneeti" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/Prakash-Jha-Rajneeti-Wallpaper-300x206.jpg" alt="" width="300" height="206" />2 जून को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज हुई राजनीति में एक बहुत ही उम्दा संवाद है- ‘राजनीति में फैसले अच्छा या बुरा देखकर नहीं लिए जाते हैं, बल्कि उनकी अहमियत देखी जाती है, मौका देखकर.’ नाना पाटेकर, अजय देवगन, मनोज वाजपेयी, रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ जैसे इंडस्ट्री के आधा दर्जन बड़े सितारों से सज्जित इस फिल्म में दर्जनों ऐसे उम्दा संवाद हैं, जिन्हें सुनकर सिनेमाघर में दर्शक तालियां पीट रहे हैं. प्राचीनकालीन महाभारत की कथा से प्रेरित प्रकाश झा के निर्देशन में बनी इस फिल्म को न सिर्फ आलोचकों ने सराहा है, बल्कि दर्शकों ने भी सिर माथे पर बिठाया है. नतीजतन, राजनीति 2010 की अब तक की सबसे कामयाब फिल्म साबित हो रही है. हालांकि फिल्म की कहानी को देखते हुए आलोचकों ने इसकी कामयाबी पर संदेह जताया था. लेकिन फिल्म ने देशभर में छप्परपफाड़ कमाई करके सभी को हैरत में डाल दिया है. 2 जून, शुक्रवार को देशभर के पंद्रह सौ से ज्यादा सिनेमाघरों में रिलीज होने के बाद फिल्म ने पहले छह दिनों में ही 50 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई करके 2010 में सबसे अच्छी शुरुआत की. इतना ही नहीं, फिल्म थ्री इडियट्स और गजनी के बाद पहले सप्ताह में कमाई के मामले में भारतीय फिल्म इतिहास की तीसरी सबसे बड़ी फिल्म साबित हुई है.</p>
<p style="text-align: justify;">फिल्म की कामयाबी ने नाकाम फिल्मों के ढेर पर खड़ी इंडस्ट्री को भी राहत पहुंचाई है. 2010 की पहली छमाही में- काइट्स, ब्ल्यू जैसी महंगी फिल्मों की नाकामी झेलने के बाद इंडस्ट्री भारी घाटे से गुजर रही थी. इस बीच, आईपीएल और परीक्षाओं के चलते भी इंडस्ट्री को भारी नुकसान झेलना पड़ा. लेकिन राजनीति की ऐतिहासिक कामयाबी ने इंडस्ट्री के चेहरे पर फिर से मुस्कान ला दी है. साथ ही, राजनीति की टिकट खिड़की पर कामयाबी से यह मिथक भी टूट गया है कि दर्शक अब बहुसितारा फिल्मों को लेकर उत्सुक नहीं रहते हैं. प्रकाश झा के महाभारत के इस आधुनिक संस्करण में आधा दर्जन से भी ज्यादा चर्चित सितारे थे और दर्शकों ने सभी का खुले दिल से स्वागत किया. फिल्म की कामयाबी ने रणबीर कपूर को एक बार फिर सबसे चर्चित युवा सितारा बना दिया है, जिनका करियर राॅकेट सिंह: सेल्समेन आॅफ द ईयर की नाकामी के बाद डगमगा गया था. इसी तरह कैटरीना कैफ के हिस्से में एक और सफल फिल्म दर्ज हो गई है.</p>
<p style="text-align: justify;">वहीं, फिल्म की कामयाबी ने प्रकाश झा को भी इंडस्ट्री के शीर्ष निर्देशकों में जमात में पहुंचा दिया है. हालांकि झा की पिछली दो फिल्में अपहरण और गंगाजल भी टिकट खिड़की पर कामयाब रही थी. लेकिन राजनीति ने झा के करियर की सभी फिल्मों की कुल कमाई से भी ज्यादा कमाई की है. असल में, राजनीति झा के साथ ही इसके प्रत्येक सितारे के करियर की भी सबसे कामयाब फिल्म साबित हो रही है.</p>
<p style="text-align: justify;">खास बात यह है कि फिल्म देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को साहस के साथ सामने लाती है. महाभारत से प्रेरित फिल्म की कहानी में परिवार के भीतर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की लड़ाई को दिखाया गया है. यह लड़ाई ऐसे निम्न स्तर तक पहुंच जाती है कि दो भाइयों के बेटे एक-दूसरे की जान लेने पर आमादा हो जाते हैं. वर्तमान में, भारतीय राजनीति भी इसी तरह के संक्रामक दौर से गुजर रही है, जहां नैतिक मूल्यों की कोई जगह नहीं है. क्षेत्रीय क्षत्रपों के प्रभुत्व वाले इस दौर में समाजसेवा और देशसेवा जैसे शब्द निरर्थक साबित हो चुके हैं और ताकत, पैसा हासिल करना ही राजनेताओं का एकमात्र लक्ष्य रह गया है. कुर्सी के पीछे नैतिक मूल्यों को तार-तार करने वाले शिबू सोरेन, पारिवारिक मोह में फंसकर धृतराष्ट्र बनकर रह गए समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव, एम. करुणानिधि जैसे नेताओं को देखने के बाद प्रकाश झा की राजनीति एक सार्थक फिल्म प्रतीत होती है.</p>
<p style="text-align: justify;">फिल्म की धमाकेदार कामयाबी के साथ झा उन चुनिंदा निर्देशकों में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने राजनीति की गंदगी को कामयाबीपूर्वक सिनेमाई पर्दे पर उकेरा. दशकों पहले 1971 मेरे अपने नामक एक फिल्म आई थी. महान फिल्मकार-गीतकार गुलजार के करियर की यह पहली फिल्म थी, जिसने तत्कालीन राजनीतिक दौर की विसंगतियों को बखूबी उकेरा था. सत्तर के दशक के उस दौर में भी आम जनता के लिए राजनीति में कोई जगह नहीं थी और प्रकाश झा की फिल्म यही साबित करती है कि वक्त बीतने के साथ हालात बदतर ही हुए हैं. बिहार की राजनीति में अच्छा-खासा दखल रखने वाले झा इस फिल्म के लिए बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने राजनीति के कीचड़ में रहते हुए भी इस यादगार फिल्म के जरिए एक मनमोहक फूल खिला दिया है.</p>
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		<title>सिनेमा का नया ‘अवतार’</title>
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		<pubDate>Thu, 13 May 2010 09:20:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>स्वर्ण सुमन</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>

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			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignright size-medium wp-image-3022" title="Avatar- cinema" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/05/Avatar-cinema-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" />1980 दशक में सिनेमा की दुनिया में ‘टर्मिनेटर’ ने क्रांति लायी थी. फिर 90 के दशक में ‘टाइटेनिक’ ने सिनेमा का जायका बदला और अब 21 वीं सदी में फिल्म ‘अवतार’ के जरीए सिनेमा ने नया अवतार लिया है. यह एनिमेशन और लाइव चित्रों से बनी फिल्मो का अद्भुत नमूना प्रस्तुत करती है. उल्लेखनीय है की फिल्म केवल ४० % लाइव एक्शन है और ६०% फोटो-रियलिस्टिक सी जी आई (कम्प्युटर जेनेरेटेड इमेजनरी) द्वारा बनायी गयी है. यह पहली ऐसी फिल्म है, जो शुरुआत से अंत तक 3डी फ्यूजन कैमरे के साथ शूट हुई है. हालांकि इस फिल्म को केवल तीन ऑस्कर ही मिले परन्तु फ़िल्म की दुनिया में इसने एक नयी शुरुआत कर दी है.</p>
<p>फिल्म दो ग्रह के जीवों के बीच की अनोखी प्रेम कहानी में अनेक ज्वलंत मुद्दे को उठाती है जो आज के परिदृश्य में मायने रखते हैं. पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दे को फिल्म में अप्रत्यक्ष रूप से दिखाया गया है जो दिल को छू लेती है. फिल्म के निर्देशक जेम्स कैमरून जो फ़िल्मी दुनिया में तकनीक के बादशाह माने जाते हैं ने अवतार से तकनीक का एक नया मापदंड स्थापित कर दिया है. तकनीक का सुंदर प्रयोग कर जेम्स कैमरून ने सिनेमा की कला में एक और नया आयाम जोड़ दिया है जिससे सिनेमा का स्वरुप और देखने का नजरिया ही बदल गया.</p>
<p>3डी के साथ स्पेशल इफेक्ट का बेजोड़ प्रदर्शन कर इस फिल्म ने साबित कर दिया की २१ वीं सदी की सिनेमा अब नया रूप ले रही है. एक ऐसा रूप जहाँ छोटे से परदे पर कल्पना के भी परे दृश्यों को बखूबी उतारा जा सकता है. अवतार देखने के बाद ऐसा प्रतीत होता है की परदे पर अब कुछ भी असंभव नहीं. सचमुच सितारों से आगे जहाँ और भी है. भारतीय निर्देशक को धूम, कृष, अलादीन, कैश, जैसे स्पेशल इफेक्ट वाले फिल्मों से आगे भी सोचना चाहिए.</p>
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		<title>सपनों का सिनेमा</title>
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		<pubDate>Sat, 08 May 2010 15:20:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उमेश  पंत</dc:creator>
				<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>
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		<description><![CDATA[अक्सर इंसान सपने देखता है , कल्पनाओं में उनको जीता है और जब तन्द्रा टूटती हैं तो सोचने लगता है कि जो हमने देखा उसका अर्थ आंखिर था क्या ?... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/05/08/%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-2885" title="lost-in-dreams" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/05/lost-in-dreams-202x300.jpg" alt="" width="202" height="300" />अक्सर इंसान सपने देखता है , कल्पनाओं में उनको जीता है और जब तन्द्रा टूटती हैं तो सोचने लगता है कि जो हमने देखा उसका अर्थ आंखिर था क्या ? अधिकांश सपनों को वो यूँ ही भुला देता हैं , जैसे उन्हें उसने कभी देखा ही न हो। क्या आपने कभी सोचा है कि किसी दूसरे के सपने अपनी आंखों से देखना कैसा लगता है ? और वो भी तब जब सपने किसी सुन्दर फिल्म में फिल्मा लिये गये हो और वो भी अकिरा कुरुसावा जैसे निर्देशक के द्वारा। कुरुसावा की फिल्म ड्रीम्स एक ऐसा ही अनुभव है। कहाजाता है कि ये पूरी फिल्म अकीरा कुरुसावा के उन सपनों के बारे में है जो उन्होंने अलग अलग समय में देखे। फिल्म में 8 छोटी छोटी कहानियां हैं, मुश्किल से पांच पांच मिनट की। इन कहानियों में कुरुसावा मनुष्य और प्रकृति के बीच के तारतम्य के असन्तुलित से हो जाने के लिये अपनी चिन्ता जाहिर करते मालूम होते हैं। सभी कहानियों के पात्र किसी न किसी रुप में या प्रकृति से जुड़े हैं या प्राकृतिक जीवनदर्शन से। इन कहानियों में कहीं प्रकृति अपने पूरे साफ सुथरे नैसर्गिक रुप में दिखाई देती है तो कहीं उसके साथ हुए खिलवाड़ से पनपी विभीषिका पूरे भयावह रुप में सामने आ जाती है। और उसके समानान्तर चलता है आनन्द और विभीषिका दोनों से जूझता इन्सान। ये कुरुसावा के सपनों का फिल्मांकन तो है ही साथ ही हमारे इर्द गिर्द की दुनिया की चिन्ताएं भी हैं। भले इनका रुप प्रतीकात्मक है पर ये चिन्ताएं आज के सन्दर्भ में भी उतनी ही प्रासांगिक हैं। और इस लिहाज से ये फिल्म महत्वपूर्ण हो जाती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong> बरसात में सूरज की चमक- </strong>सनशाईन थ्रो रेन फिल्म की पहली कहानी है। फिल्म को देखकर लगा कि कई बार लोकोक्तियां या कहावतें जिन्हें हम नितान्त क्षेत्रीय समझ रहे होते हैं वो विश्वव्यापी भी हो सकती हैं। हम अपने घर में अक्सर सुना करते थे कि जब धूप और बारिस दोनों साथ साथ हो रही होती हैं तो उस वक्त लोमणियों की शादी होती है। इस कहावत के जापानी वर्जन को फिल्म के इस हिस्से में देखा जा सकता है। एक बच्चा जिसकी मां उसे इस मौसम में बारिश में जाने से मना कर रही है पर बच्चा जाता है और जब वो घर लौटता है तो उसकी मां उसे बताती है कि एक लोमड़ी वहां आयी थी जो उसे एक चाकू देके गई है। माने यह कि वे चाहती है कि तुम इससे खुद को मार लो। मां बच्चे से कहती है कि वो लोमड़ी से माफी मांग ले हो सकता है कि वो माफ कर दे। बच्चा लोमड़ी तलाश में घर से जंगल की तरफ चला आता है। और वहां एक इन्द्रधनुष है फूलो के बगीचे के इर्द गिर्द पहाड़ों के बीच कहीं उगता हुआ। और बच्चा आगे बढ़ा जा रहा है अनन्त की ओर। फिल्म के इस हिस्से में सफेद कुहासे के बीच से उभरते लोमणियों के प्रतीकात्मक चेहरे जब पार्श्व में बजते किसी जापानी लोकसंगीत के साथ आगे बढ़ रहे होते हैं तो एक अजीब किस्म की रहस्यात्मक अनुभूती होती है। और उस मासूम बच्चे के लिये एक खास किस्म की सहानुभूति का भाव मन में पैदा होने लगता है न जाने क्यों।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><em>आडू के बाग़ -</em></strong> द पीच और्चर्ड फिल्म की दूसरी कहानी है। ये कहानी गुड़ियाओं के एक त्योहार के बारे में है। माना जाता है कि इस त्योहार को तब मनाया जाता है जब आड़ू के बगीचों में सुन्दर गुलाबी फूल उगते हैं। और त्योहार में प्रदर्शित की गई हर गुड़िया एक आड़ू के पेड़ का प्रतीक मानी जाती है। लेकिन एक छोटा सा लड़का इस बार त्योहार में खुश नहीं है। क्योंकि उसके परिवार ने इस बार आड़ू के बगीचे से सारे पेड़ काट दिये। बच्चा एक लड़की के पीछे पीछे कटे पेड़ों वाले उस बगीचे में जाता है और देखता है कि गुड़ियाएं आड़ू के पेड़ों की आत्माओं में बदल गई हैं। और बच्चे को बताती है कि कैसे उन्हें काट दिया गया। लेकिन जब उन्हें महसूस होता है कि बच्चे को उनका खिलना कितना अच्छा लगता था वो फैसला करते हैं कि एक बार उसे फिर से आड़ू के उस खिले बगीचे का दर्शन करा दिया जांये। बगीचा एक बार फिर खिल जाता है पर थोड़ी देर बाद ही वहां सारे कटे हुए पेड़ वापस आ जाते हैं। वो लड़की जिसके पीछे बच्चा यहां आया था एक बार फिर दिखाई देती है। और थोड़ी देर में वो भी गायब हो जाती है और उसकी जगह एक गुलाबी फूलों वाला आड़ू का पेड़ वहां उग जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><em>मौत के परिंदे -</em></strong> क्रोज़ा इस सिलसिलेवार हिस्से की पांचवी कहानी है। इस भाग में मशहूर चित्रकार विनसेंट वानगाग की पेटिंग के जरिये उनके जीवन के एक खास हिस्से को बड़े ही दार्शनिक तरीके से कुरुसावा जीवन्त कर देते हैं। फिल्म के इस हिस्से में विन्सेन्ट वानगाग की भूमिका में विश्वविख्यात फिल्म निर्देशक मार्टिन स्कोर्सीजी खुद मौजूद हैं। फिल्म शुरु होती है वानगाग की एक पेटिंग से जिसके अन्दर एक लड़का किसी को ढूढ़ते हुए प्रवेश कर जाता है। वो लड़का वानगाग की कई पेंटिंग्स से गुजरता है और अन्त में उसे एक बूढ़ा आदमी पेंटिंग बनाता हुआ दिखाई दे जाता है। इस आदमी के दोनों कानों में पटिटयां बंधी हुई हैं और वो अपने चित्रों की दुनिया में खोया पेंटिंग बनाये जा रहा है। लड़का उस आदमी से पूछता है कि आपके कानों में पटिटयां क्यों बंधी हुई हैं तो वा आदमी उसे बताता है कि मैने अपने दोनों कान ही काट लिये क्योंकि ये कान मुझे मेरा काम करने में रुकावट पैदा करते थे। माना जाता है कि वानगौग ने अपने जीवन के अन्तिम समय में इसी तरह अपने कान काट लिये थे और अपने आंखिरी समय में वो जीवन से इतने परेशान हो गये थे कि उन्होंने आत्महत्या ही कर ली। क्रोज के आंखिरी दृश्य में कुछ कौवे आसमान को चीरते हुए उड़ते चले आते हैं। सम्भवतह कुरुसावा ने इस दृश्य में वौनगौग की आत्महत्या को ही प्रतीकात्मक रुप में दिखाया है। वानगाग की पेंटिग्य को फिल्म का यह हिस्सा जिस तरह से जीवन्त कर देता है वो सचमुच एक कमाल का अनुभव लेने जैसा है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>माउन्ट फूजी का लाल सच</strong>- माउन्ट फूजी इन रेड फिल्म की छटी कहानी है जिसमें दिखाया गया है कि कैसे माउन्ट फूजी में स्थित न्यूक्लियर प्लांट में फैले रेडियेशन के चलते इतना जहरीला प्रदूषण हुआ कि आसमान लाल हो गया। और वहां के सभी लोगों ने समुद्र में शरण लेकर मौत को गले लगाना बेहतर समझा। अन्त में तीन लोग एक आदमी औरत और बच्चा ही षश रह गये हैं जो लगभग जान ही चुके हैं कि जल्द ही उनकी मौत भी तय है। और उनके भीतर पसरा मौत का डर इस कहानी में साफ देखा जा सकता है। फिल्म की अगली दो कहानियां जापान में हुए परमाणु हमलों की वजह से हुए ज़हरीले विकीरण पर कुरुसावा की चिन्ता को दिखाती हैं। ये कहानिया उस विभीषिका की सांकेतिक अभिव्यक्ति हैं जो जापान ने सम्भवतह उन परमाणु हमलों की वजह से झेली।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><em>रोते हुए दैत्य -</em></strong> द वीपिंग डैमन फिल्म की सांतवीं कहानी है जिसमें दिखाया गया है कि एक पहाड़ पर कई ऐसे दैत्यनुमा लोग बुरी तरह चीख रहे हैं। अजीब सी आवाजें निकालेने वाले इन एक सींग वाले दैत्यों में से एक दैत्य लड़के को बतात है कि ये लोग न्यूक्लियर रेडियेशन के शिकार हैं। इसी विकीरण की वजह से इन लोगों की एक सींग उग आई और ये लोग भटकती हुई आत्माएं बन गये। और इनका सबसे बड़ा दुख ये है कि अब ये मर भी नहीं सकते और इसी तरह भटकते रहना इनकी मजबूरी है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><em>पवनचक्कियों का गाँव - <span style="font-style: normal; font-weight: normal;">एक सुन्दर सा गांव जहां हौले हौले एक नदी बह रही है। पेड़ों से मन्द मन्द हवा बहती आ रही है। और नदी और हवा के बहते जाने के बीच कई पनचक्कियां चल रही हैं। कुछ बच्चे हैं जो एक पत्थर पे फूल चढ़ा रहे हैं और वो नौजवान लड़का जो उन्हें देख रहा है फूल चढ़ाते हुए। लड़का इतने अच्छे वातावरण में बड़ी राहत महसूस करते हुए आगे बढ़ता है वहां उसे एक बूढ़ा सा आदमी दिखाई देता है जो पनचक्की बना रहा है। फिल्म के इस हिस्से में उस बूढ़े आदमी और इस लड़के के बीच जो बात होती है वो बेहद रोचक है। उस बात को सुनने के बाद आपको महसूस होगा कि आदमी अगर चाहे तो पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों की मदद से ही जी सकता है बिना प्रकृति को नुकसान पहुंचाये। ये भी कि इस तरह जीते हुए आदमी अपनी मौत को एक जश्न के रुप में मना सकता है। संवाद की शुरुआत में लड़का पूछता है कि इस गांव का नाम क्या है तो बूढ़ा जवाब देता है हम इसे गांव ही कहते हैं। इसका कोई नाम नहीं है। लड़का बिजली के बारे में पूछता है तो बूढ़ा आदमी जवाब देता है कि हमें बिजली की जरुरत महसूस ही नहीं होती। लड़का फिर पूछता है कि यहां रातें तो बड़ी गहरी होती होंगी। तब आप क्या करते हैं? बूढ़ा आदमी जवाब देता है कि रातें गहरी काली ही होनी चाहिये। तभी तो हम आकाश में बिखरे तारोें को साफ साफ देख पायेंगे। अन्धाधुन्ध हो रहे आविष्कारों पर सवाल उठाते संवादों के सिलसिले के अन्तिम पड़ाव में पहुचते हुए फिल्म जिन्दगी को एक को इत्मिनान से जिये गये पर्व और मौत को किसी जश्न की तरह दिखाती है। और बताने की कोशिश करती है कि अगर प्रकृति की नैसर्गिकता बर्करार रखते हुए और उसपे अपनी शर्तें न थोपते हुए सरलता से जिया जाये तो मौत को भी उत्सव की तरह अपनाया जा सकता है। क्योंकि तब न मौत आने में जल्दी करेगी, न हम मौत को बुलाने की जल्दबाजी में रहेंगे। ये सब उसी तरह होगा जैसे प्रकृति। बिल्कुल अपनी प्राकृतिक निरन्तरता में, अपने समय से। फिल्म के इस हिस्से के आंखिरी पलों में 103 साल का बूढ़ा आदमी जो 99 साल की औरत की अन्तिम यात्रा के जश्न में शामिल होने जा रहा है नौजवान से कहता है कि मेरे खयाल से मेरी उम्र मौत को अपनाने की बिल्कुल सही उम्र है। और अन्त में सम्भवतह जापानी लोकगीत की सुन्दर सी धुन के साथ पारम्परिक वाद्ययंत्रों और एक समान पोशाक पहने छोटे छोटे बच्चों से लेकर सौ साल से बूढ़े लोगों के जुलूस की जुगलबन्दी फिल्म के इस हिस्से को अहसास कर पाने की हद तक दर्शनीय बना देती है।</span></em></strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">अकिरा कुरुसावा के सपनों की ये फिल्मी दुनिया न केवल फिल्म देखने की सुखानुभूति देती है बल्कि एक सरल सन्देश भी दे जाती है कि प्रकृति और इन्सान का रिस्ता मानवीय रिस्तों से अलहदा नही है। जब तक हमें उसकी गरज है तब तक ही उसे हमारी फिक्र। जिस दिन इन्सान ने प्रकृति के बारे में सोचना छोड़ दिया उस दिन प्रकृति भी हमें ऐसे तरसाना शुरु कर देगी। और इसका असर हमारे सपनों में भय बनकर समा जायेगा। कुरुसावा के ये सपने इसी असर की असरदार नुमाईश हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>अच्छी कहानी , फ्लॉप फ़िल्में</title>
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		<pubDate>Thu, 22 Apr 2010 12:48:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
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		<category><![CDATA[फिल्म तकनीक]]></category>
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			<content:encoded><![CDATA[<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-full wp-image-2570" title="पाठशाला हिंदी फिल्म" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/04/पाठशाला-हिंदी-फिल्म.jpg" alt="" width="225" height="338" />पिछले सप्ताह बॉक्स ऑफिस पर रिलीज हुई दो फ़िल्में &#8221; पाठशाला&#8221; और &#8220;फूंक-२&#8221; हिंदी सिनेमा में एक नए चलन की ओर इशारा करती है. यह  इन दिनों रिलीज हो रही फिल्मों की कहानियों और पर्दे पर उनके फिल्मांकन में आये बदलाव का संकेत है . गौर कीजिए, &#8221; पाठशाला&#8221; और &#8220;फूंक-२&#8221; दोनों ही फिल्मों की कहानी बेहद उम्दा थी. बावजूद इसके दोनों ही फिल्में टिकट खिड़की पर औंधे मुंह गिरी. न सिर्फ दोनों फिल्में दर्शकों का दिल जीतने में नाकामयाब रही, बल्कि आलोचकों ने भी दोनों फिल्मों को सिरे से नकार दिया.</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर अच्छी कहानी के बावजूद दोनों फिल्मों का बुरा हश्र क्यों हुआ ? इसका जवाब यही है कि बेशक दोनों फिल्मों की कहानी अच्छी थी, लेकिन दोनों ही निर्देशक इन अच्छी कहानियों को सही ढंग से पर्दे पर उकेर नहीं पाएं. मतलब यह कि कहानी का ‘आइडिया’ अच्छा था, लेकिन जब इसे दृष्यों में बांटने की नौबत आई, तो निर्देशक और उनके कहानीकार साथी इसमें नाकाम रहे. इसका नतीजा यह रहा कि अच्छी-भली कहानी होने के बावजूद दोनों ही फिल्में न तो दर्शकों का दिल जीत पाई और न ही आलोचकों की कलम को.</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">और ऐसा भी नहीं है कि यह पहली बार हुआ है. हैरानी इसलिए होती है कि बॉलीवुड में पिछले कईं सालों से यही हो रहा है. बेशक हमारी इंडस्ट्री में बीतें कुछ सालों में नए प्रतिभावान  निर्देशक और कहानीकार आएं है, जो लीक से हटकर काम करने में भरोसा करते हैं. अनुराग कश्यप , दीबाकर बनर्जी, शशांत शाह जैसे चिर-परिचित नामों के साथ ही प्रत्येक साल दर्जनों ऐसे नए  निर्देशक और कहानीकार अपनी फिल्मों को लेकर भारतीय  दर्शकों  के सामने आते हैं, जो एक नई कहानी, नया विचार परोसते हैं. लेकिन दुर्भाग्य की बात यही है कि इसके बावजूद उनकी फिल्में औंधे मूंह गिर जाती है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-2571" title="funk -2 हिंदी फिल्म" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/04/funk-2-हिंदी-फिल्म-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" />पिछले एक-दो साल के दौरान रिलीज हुई फिल्मों पर नजर डालें, तो लक बाय चांस, सिकंदर, कुर्बान, वेल डन अब्बा, तुम मिले, दिल्ली-6, कार्तिक कालिंग कार्तिक ऐसी ही कुछ फिल्में है, जिनकी कहानी का मूल ‘आइडिया’ बेहद उम्दा था, बावजूद इसके ये फिल्में दर्शकों और आलोचकों दोनों के लिए ही बोझिल अनुभव ही साबित हुई. पहले बात करते हैं,फिल्म सिकंदर  की. जम्मू-कश्मीर  के आतंकी माहौल के बीच एक लड़के की दास्तां दिल झकझोर देने वाली साबित हो सकती थी, लेकिन नए निर्देशक पियूष झा  ने कहानी में राजनीतिक कोण डालकर पूरी कहानी का कबाड़ा कर दिया. नतीजतन, वह एक संवेदनशील फिल्म बनने के बजाए राजनीतिक भाषणबाजी वाली फिल्म बनकर रह गई. इसी तरह सैफ अली खान और करीना कपूर अभिनीत कुर्बान मुस्लिम आतंकवाद की थीम वाली अच्छी कहानी थी, लेकिन निर्देशक  ने इसे इस कदर उबाउ बना दिया कि फिल्म में मनोरंजक दृष्यों के लिए ही दर्शक तरस गए. वहीं, इमरान हाशमी और सोहा अली खान अभिनीत फिल्म तुम मिलें मुंबई की बारिश  के बीच फंसे एक प्रेमी जोड़े की उम्दा कहानी थी, लेकिन फिल्म में निर्देशक मोहित सूरी ने इतने फ्लेशबैक डाल दिए कि फिल्म अपने मूल भाव से भटक गई.</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">बात बिल्कुल साफ है, कि अच्छी कहानियों के बावजूद हमारे फिल्मकार अच्छी फिल्में नहीं बना पा रहे हैं. नतीजा यही है कि बॉलीवुड अभी भी साल में 300 से ज्यादा फिल्में बनाता है और अभी भी इसमें से नब्बे फीसदी फिल्में बूरी तरह से नाकाम साबित होती है. जाहिर है, इस खराब रिकोर्ड को सुधारने के लिए बॉलीवुड को अभी भी अपनी कार्यप्रणाली में भरपुर सुधार करने की गुंजाइश  है.</div>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>&#8221;कर्मयुद्ध&#8221; की शूटिंग</title>
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		<pubDate>Sat, 10 Apr 2010 17:53:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शशि सिन्घल</dc:creator>
				<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[bollywood]]></category>
		<category><![CDATA[cinema]]></category>
		<category><![CDATA[film]]></category>
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		<category><![CDATA[film/tv]]></category>

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		<description><![CDATA[इन दिनों मुंबई के फ्यूचर स्टूडियो में धारावाहिक &#8221;कर्मयुद्ध&#8221; की शूटिंग लगातार चल रही है. ऐसे ही एक शूट हो रहा था अभिनेत्री वैष्णवी जो की इस धारावाहिक में पुलिस... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/04/10/%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a5%82%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="_mcePaste"><img class="alignright size-medium wp-image-2436" title="Rohini-Hattangadi,-Vaishnavi,-Harsh-Chhaya[1]" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/04/Rohini-Hattangadi-Vaishnavi-Harsh-Chhaya1-300x200.jpg" alt="" width="300" height="200" />इन दिनों मुंबई के फ्यूचर स्टूडियो में धारावाहिक &#8221;कर्मयुद्ध&#8221; की शूटिंग लगातार चल रही है. ऐसे ही एक शूट हो रहा था अभिनेत्री वैष्णवी जो की इस धारावाहिक में पुलिस ऑफिसर शिवांगी चौहान बनी हैं, के बीच व सोनल जो कि उनकी बेटी पल्लवी बनी हैं.</div>
<div>वैष्णवी पुलिस की यूनिफोर्म में अपने घर आती हैं जहाँ उनकी बेटी पल्लवी उन्हें बताती है कि,&#8221; माँ पापा (हर्ष छाया) बहुत ही तनाव में हैं ऐसा लगता है कि उनके साथ कुछ हुआ है. शिवांगी (वैष्णवी) कहती हैं कि ठीक है मैं देखती हूँ तुम चिंता मत करो, कुछ ऑफिस का टेंशन होगा.&#8221; इस शूट के बाद सेट पर उपस्थित कलाकारों से बातचीत हुई, सबसे पहले वैष्णवी ने बताया कि, &#8221;मैं शिवांगी नामक एक पुलिस ऑफिसर की भूमिका में हूँ जो कि यशवंत चौहान (हर्ष छाया) की पत्नी है, दोनों को आपस में एक दूसरे से बहुत ही प्यार है लेकिन विचारों में मतभेद है.&#8221;</div>
<div id="_mcePaste">हर्ष छाया ने बताया कि, &#8221;धारावाहिक &#8216;कर्मयुद्ध&#8221; में वो एक युवा राजनीतिज्ञ यशवंत चौहान का चरित्र अभिनीत कर रहें हैं जो समाज में फैलें भ्रष्टाचार को दूर करना चाहता है. घर में उसकी माँ (रोहिणी हटंगड़ी) , पत्नी शिवांगी जो पुलिस ऑफिसर है व उसके दो युवा बेटा &#8211; बेटी है.&#8221; अभिनेत्री रोहिणी हटंगड़ी ने बताया कि &#8221; मैं इसमें माँ सा बनी हूँ जरूरत होने पर अपने बच्चों को सही गलत के बारें में बताती हूँ. यशवंत की माँ व शिवांगी की सास हूँ लेकिन जब सत्य का साथ देने का समय आता है तो अपनी बहू के साथ होती हूँ.&#8221;</div>
<div id="_mcePaste">कर्मयुद्ध में यशवंत चौहान के बेटे रोहित की भूमिका में हैं जीतेन्द्र हीरावत व बेटी पल्लवी की भूमिका में है सोनल, इन दोनों से भी बात हुई, दोनों ने बताया कि,&#8221; आज जिस तरह के धारावाहिकों का प्रसारण इन दिनों हो रहा है यह धारावाहिक &#8221;कर्मयुद्ध&#8221; उन सबसे अलग है.&#8221; पूछने पर कि इसमें तो इतने बड़े &#8211; बड़े कलाकार अभिनय कर रहें हैं तो क्या ऐसे में उनके लिए कुछ काम होगा करने के लिए? दोनों ने जवाब दिया, &#8221; हमें भी पूरा मौका मिला है अपनी अभिनय प्रतिभा दिखाने का, इतने बड़े कलाकारों के साथ काम करते हुए हमें बहुत सीखने को मिल रहा है. निर्देशक भी दोनों ही बहुत ही अच्छे हैं. हम दोनों ही बहुत ही खुश हैं कि हम &#8221;कर्मयुद्ध&#8221; का हिस्सा हैं.&#8221;</div>
<div id="_mcePaste">निर्देशक केवल सेठी से पूछने पर कि &#8221;कर्मयुद्ध&#8221; की जो कहानी है उस पर ही धारावाहिक बनाने के बारें में क्यों सोचा? उन्होंने बताया कि,&#8221;मुझे बहुत ही अच्छी लगी यह कहानी एक वजह तो यह है, इसके अलावा आज के समय में लगभग हर चैनल पर एक से ही विषय पर धारावाहिक बन रहें हैं ऐसे में इसकी कहानी सबसे अलग है जो दर्शको को भी पसंद आएगी.&#8221;</div>
<div id="_mcePaste">निर्देशक रविन्द्र गौतम ने &#8221;कर्मयुद्ध&#8221; में अभिनय करने वाले कलाकारों के बारें में बताया कि,&#8221;सभी कलाकार ऐसे है जो कि दर्शको में लोकप्रिय हैं साथ ही अभिनय में भी माहिर हैं हमें इनके साथ ही काम करना था इसलिए हमने इनका चुनाव किया है.&#8221;</div>
<p>इन दिनों मुंबई के फ्यूचर स्टूडियो में धारावाहिक &#8221;कर्मयुद्ध&#8221; की शूटिंग लगातार चल रही है. ऐसे ही एक शूट हो रहा था अभिनेत्री वैष्णवी जो की इस धारावाहिक में पुलिस ऑफिसर शिवांगी चौहान बनी हैं, के बीच व सोनल जो कि उनकी बेटी पल्लवी बनी हैं.<br />
वैष्णवी पुलिस की यूनिफोर्म में अपने घर आती हैं जहाँ उनकी बेटी पल्लवी उन्हें बताती है कि,&#8221; माँ पापा (हर्ष छाया) बहुत ही तनाव में हैं ऐसा लगता है कि उनके साथ कुछ हुआ है. शिवांगी (वैष्णवी) कहती हैं कि ठीक है मैं देखती हूँ तुम चिंता मत करो, कुछ ऑफिस का टेंशन होगा.&#8221; इस शूट के बाद सेट पर उपस्थित कलाकारों से बातचीत हुई, सबसे पहले वैष्णवी ने बताया कि, &#8221;मैं शिवांगी नामक एक पुलिस ऑफिसर की भूमिका में हूँ जो कि यशवंत चौहान (हर्ष छाया) की पत्नी है, दोनों को आपस में एक दूसरे से बहुत ही प्यार है लेकिन विचारों में मतभेद है.&#8221;<br />
हर्ष छाया ने बताया कि, &#8221;धारावाहिक &#8216;कर्मयुद्ध&#8221; में वो एक युवा राजनीतिज्ञ यशवंत चौहान का चरित्र अभिनीत कर रहें हैं जो समाज में फैलें भ्रष्टाचार को दूर करना चाहता है. घर में उसकी माँ (रोहिणी हटंगड़ी) , पत्नी शिवांगी जो पुलिस ऑफिसर है व उसके दो युवा बेटा &#8211; बेटी है.&#8221; अभिनेत्री रोहिणी हटंगड़ी ने बताया कि &#8221; मैं इसमें माँ सा बनी हूँ जरूरत होने पर अपने बच्चों को सही गलत के बारें में बताती हूँ. यशवंत की माँ व शिवांगी की सास हूँ लेकिन जब सत्य का साथ देने का समय आता है तो अपनी बहू के साथ होती हूँ.&#8221;<br />
कर्मयुद्ध में यशवंत चौहान के बेटे रोहित की भूमिका में हैं जीतेन्द्र हीरावत व बेटी पल्लवी की भूमिका में है सोनल, इन दोनों से भी बात हुई, दोनों ने बताया कि,&#8221; आज जिस तरह के धारावाहिकों का प्रसारण इन दिनों हो रहा है यह धारावाहिक &#8221;कर्मयुद्ध&#8221; उन सबसे अलग है.&#8221; पूछने पर कि इसमें तो इतने बड़े &#8211; बड़े कलाकार अभिनय कर रहें हैं तो क्या ऐसे में उनके लिए कुछ काम होगा करने के लिए? दोनों ने जवाब दिया, &#8221; हमें भी पूरा मौका मिला है अपनी अभिनय प्रतिभा दिखाने का, इतने बड़े कलाकारों के साथ काम करते हुए हमें बहुत सीखने को मिल रहा है. निर्देशक भी दोनों ही बहुत ही अच्छे हैं. हम दोनों ही बहुत ही खुश हैं कि हम &#8221;कर्मयुद्ध&#8221; का हिस्सा हैं.&#8221;<br />
निर्देशक केवल सेठी से पूछने पर कि &#8221;कर्मयुद्ध&#8221; की जो कहानी है उस पर ही धारावाहिक बनाने के बारें में क्यों सोचा? उन्होंने बताया कि,&#8221;मुझे बहुत ही अच्छी लगी यह कहानी एक वजह तो यह है, इसके अलावा आज के समय में लगभग हर चैनल पर एक से ही विषय पर धारावाहिक बन रहें हैं ऐसे में इसकी कहानी सबसे अलग है जो दर्शको को भी पसंद आएगी.&#8221;<br />
निर्देशक रविन्द्र गौतम ने &#8221;कर्मयुद्ध&#8221; में अभिनय करने वाले कलाकारों के बारें में बताया कि,&#8221;सभी कलाकार ऐसे है जो कि दर्शको में लोकप्रिय हैं साथ ही अभिनय में भी माहिर हैं हमें इनके साथ ही काम करना था इसलिए हमने इनका चुनाव किया है.&#8221;</p>
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		<title>मैंने गाँव के एक अंतर्मुखी शिक्षक की भूमिका निभायी है – राहुल बोस</title>
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		<pubDate>Thu, 08 Apr 2010 03:33:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शशि सिन्घल</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[bollywood]]></category>
		<category><![CDATA[cinema]]></category>
		<category><![CDATA[film]]></category>
		<category><![CDATA[rahul boss]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[राहुल बोस ऐसे अभिनेता हैं कि जब भी किसी फ़िल्म में अभिनय करते हैं वो फ़िल्म चर्चा का विषय बन जाती है उनकी ऐसी ही एक आने वाली फ़िल्म है... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/04/08/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%b5-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignright size-medium wp-image-2394" title="Rahul-Bose-Green[1]" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/04/Rahul-Bose-Green1-300x200.jpg" alt="" width="300" height="200" />राहुल बोस ऐसे अभिनेता हैं कि जब भी किसी फ़िल्म में अभिनय करते हैं वो फ़िल्म चर्चा का विषय बन जाती है उनकी ऐसी ही एक आने वाली फ़िल्म है &#8221;जैपनीज वाइफ&#8221;, संगीत कंपनी सारेगामा द्वारा निर्मित इस फ़िल्म की निर्देशिका हैं अपर्णा सेन, लेखक कुनाल बसु के उपन्यास पर आधारित इस फ़िल्म में राहुल के साथ राईमा सेन व जापानी अभिनेत्री चिगुसा तकाकू मुख्य भूमिका में हैं. राहुल केवल एक अभिनेता ही नहीं बल्कि वो एक रग्बी खिलाड़ी, लेखक, सामाजिक कार्यकर्त्ता, निर्देशक व गायक भी हैं, पिछले दिनों बहुमुखी प्रतिभा के धनी अभिनेता राहुल से मुंबई के सिने मैक्स में बातचीत हुई, प्रस्तुत हैं कुछ मुख्य अंश -</p>
<p>• सबसे पहले अपनी इस फ़िल्म &#8221;जैपनीज वाइफ&#8221; के बारें में बताइए, क्या कहानी है?</p>
<p>यह कहानी है एक स्कूल शिक्षक की, जिसका नाम स्नेहमोय है और मियागे नामक जापान की एक लड़की है, ये दोनों ही पत्रों के माध्यम से एक दूसरे से मिलतें हैं और आपस में उनमें प्यार हो जाता है इसके अलावा पत्र के माध्यम से ही वो शादी भी कर लेते हैं उनकी शादी को १७ साल हो चुके हैं जबकि वो आज तक एक दूसरे से कभी नहीं मिले हैं. यह फ़िल्म उनके प्यार, उनकी खुशी, उनके दुख की है, उनके इस प्यार को एक कविता की तरह पेश किया है निर्देशिका अपर्णा सेन ने, जो बहुत ही अदभुत है.इस फ़िल्म में मेरे साथ जापानी अभिनेत्री चिगुसा तकाकू, राईमा सेन व मौसमी चटर्जी हैं. फ़िल्म का निर्माण किया है संगीत कंपनी सारेगामा ने, यह फ़िल्म लेखक कुनाल बसु के उपन्यास पर आधारित है.</p>
<p>• आपको इस फ़िल्म में ऐसा क्या विशेष लगा कि आपने इस फ़िल्म में काम करना पसंद किया?</p>
<p>मुझे इसकी कहानी ने बहुत ही प्रभावित किया, एक अनोखी प्रेम कहानी है इसमें, आज ऐसी प्रेम कहानी कहाँ देखने व सुनने को मिलती है. इसके अलावा अपर्णा सेन इसे निर्देशित कर रही थी तो जैसे सोने पे सुहागा वाली बात हो गयी.</p>
<p>• क्या आपको लगता है कि यह फ़िल्म भी निर्देशिका अपर्णा सेन की पिछली फ़िल्म की तरह दर्शको को प्रभावित कर सकेगी?</p>
<p>अपर्णा ने इस फ़िल्म में भी अपनी पिछली फिल्मों की तरह बहुत ही मेहनत की है, कहानी भी बहुत अच्छी है, और इसे फिल्माया भी बहुत ही प्रभावी तरीके से है मुझे लगता है कि दर्शको को बहुत पसंद आएगी यह फ़िल्म.</p>
<p>• क्या इस फ़िल्म के लिए आपको फिर से अवार्ड मिलेगा?</p>
<p>देखिये मैं कोई भी फ़िल्म केवल इसलिए नहीं करता कि मुझे अवार्ड मिलें, मैं उन्हीं फिल्मों में काम करना पसंद करता हूँ जिनसे की मुझे संतुष्टि मिलती है, सभी ने इस फ़िल्म में अच्छा काम किया है चाहे वो चिगुसा हो या राईमा हो मौसमी जी हो या मैं हूँ.</p>
<p>• आप अभिनेता, लेखक, व निर्देशक तो हैं ही, क्या किसी बंगाली फ़िल्म में आपने गाया भी हैं?</p>
<p>हाँ मैंने बंगाली फ़िल्म &#8221;अनुरारन&#8221; में एक गीत गाया था.</p>
<p>• अभी कौन &#8211; कौन सी फ़िल्में आपकी आने वाली हैं?</p>
<p>एक होरर फ़िल्म है नाम है &#8221;फायरड&#8221;, इसके अलावा &#8221;मुंबई चकाचक&#8221; व &#8221;आई एम एंड कुछ लव जैसा&#8221; मेरी आने वाली फ़िल्में हैं.</p>
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		<title>&#8220;प्रिंस बेहतरीन एक्शन फ़िल्म है’’ – विवेक ओबेरॉय</title>
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		<pubDate>Sun, 07 Mar 2010 17:44:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शशि सिन्घल</dc:creator>
				<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[bollywood]]></category>
		<category><![CDATA[cinema]]></category>
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		<category><![CDATA[film-tv]]></category>
		<category><![CDATA[फिल्म तकनीक]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[अभिनेता विवेक ओबेरॉय ने निर्देशक राम गोपाल वर्मा की फ़िल्म &#8221;कंपनी&#8221; से अपना अभिनय सफ़र आरम्भ किया, इस फ़िल्म में उन्होंने शानदार अभिनय किया और दर्शको की वाह वाही लूटी.... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/03/07/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b8-%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a5%9e%e0%a4%bf%e0%a4%b2/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignright size-medium wp-image-1946" title="Vivek-Oberoi" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/03/Vivek-Oberoi-300x300.jpg" alt="" width="300" height="300" />अभिनेता  <strong>विवेक ओबेरॉय</strong> ने निर्देशक राम गोपाल  वर्मा की फ़िल्म &#8221;<strong>कंपनी</strong>&#8221; से अपना अभिनय सफ़र  आरम्भ किया, इस  फ़िल्म में उन्होंने शानदार अभिनय किया और दर्शको की वाह वाही लूटी. अपने  गजब के अभिनय से विवेक ने अपनी पहली ही फ़िल्म से एक अलग ही जगह बनाई. इस  फ़िल्म के बाद <strong>रोड</strong>, <strong>दम</strong>,  <strong>साथिया</strong>,  <strong>युवा</strong>, <strong>मस्ती</strong>, <strong>ओमकारा</strong>, <strong>शूटआउट एट लोखंडवाला</strong> व <strong>मिशन इस्तानबुल</strong> आदि  अनेको उनकी फ़िल्में आ चुकी हैं. पिछले दिनों आयी  फ़िल्म &#8221;<strong>कुर्बान</strong>&#8221; में भी उनका अभिनय  बहुत ही अच्छा था. इस समय विवेक एक बार फिर चर्चा में हैं   क्योंकि उनकी एक नयी फ़िल्म <strong>&#8221;</strong><strong>प्रिंस &#8211; इट्स शो  टाइम</strong>&#8221;  जल्दी ही रिलीज़ होने वाली है. टिप्स  फिल्मस की प्रस्तुति <strong>&#8221;</strong><strong>प्रिंस &#8211; इट्स शो  टाइम</strong>&#8221; के निर्माता हैं कुमार एस तौरानी व  निर्देशक हैं कूकी गुलाटी. विवेक से बातचीत हुई उनकी इसी आने वाली फ़िल्म  को लेकर, पेश हैं कुछ अंश –</p>
<ul>
<li><strong>इस   फ़िल्म की कहानी क्या है</strong><strong>?</strong></li>
</ul>
<p>कहानी   है एक चोर की, जिसको पकड़ने के लिए इंडिया की सीक्रेट  सर्विस सी बी आई लगी हुई है, उसके हाथ में चोट लग  जाती है सुबह जब उसकी नींद खुलती है तो उसे कुछ भी याद नहीं आता कि वो कौन  है और  कैसे उसे यह चोट लगी. उसे बस इतना ही याद है कि वो सारंग व माया के लिए  काम करता है. टिप्स फिल्मस की पेशकश इस फ़िल्म के निर्माता हैं कुमार एस  तौरानी व निर्देशक हैं कूकी गुलाटी.</p>
<ul>
<li><strong>टिप्स   के कुमार तौरानी के साथ काम करना कैसा रहा</strong><strong>?</strong></li>
</ul>
<p>बहुत  ही अच्छा, टिप्स फिल्मस की कोई यह पहली फ़िल्म नहीं  है इससे पहले भी उन्होंने एक से बढ कर एक फ़िल्में बनायीं हैं,  वो अपने दर्शको के बारें में जानते हैं की उन्हें कैसी फ़िल्में  पसंद  आती हैं. यह फ़िल्म भी निशिचित रूप से उन्हें पसंद आएगी.</p>
<ul>
<li><strong>ऐसा   आप कैसे कह सकते हैं कि दर्शको को यह फ़िल्म पसंद आएगी</strong><strong>?</strong></li>
</ul>
<p>क्योंकि   इस एक्शन थ्रिलर फ़िल्म को बहुत ही खूबसूरती से पेश किया है निर्देशक कूकी  गुलाटी ने, इस फ़िल्म में कई सारे ऐसे एक्शन सीन हैं  जिन्हें दर्शक पहली ही बार देखेगें. बिल्कुल होलीवुड स्टाइल के एक्शन सीन  हैं.</p>
<ul>
<li><strong>सुना   है कि आपने यह एक्शन सीन खुद किये हैं</strong><strong>?</strong></li>
</ul>
<p>हाँ  मैंने खुद ही किये हैं ये सारे सीन, बहुत खतरनाक स्टंट  सीन हैं लेकिन इन्हें करने में बहुत ही मजा आया.</p>
<ul>
<li><strong>इसमें   नया क्या है आज कल तो सभी हीरो स्टंट सीन खुद ही करते हैं</strong><strong>?</strong></li>
</ul>
<p>हाँ  वो तो है, लेकिन मेरी इस फ़िल्म को देखने के बाद आपको  पता चलेगा कि ये सीन दूसरी फिल्मों से कितने अलग हैं.</p>
<ul>
<li><strong>आपके   साथ इस फ़िल्म में एक नहीं तीन &#8211; तीन हीरोइने हैं</strong><strong>, </strong><strong>तो कितना मजा आया इन सभी के साथ</strong><strong>?</strong></li>
</ul>
<p>बहुत  ही मजा आया, तीनो ने बहुत ही अच्छा काम किया है, तीनो ही बहुत ही खूबसूरत लगी हैं फ़िल्म में.</p>
<ul>
<li><strong>सुना   आपके और अभिनेत्री अरुणा शील्ड्स के बीच तो किसिंग सीन भी हैं</strong><strong>, </strong><strong>तो क्या कहना है इस बारें में</strong><strong>, </strong><strong>तो कितने रीटेक हुए इन सीन के</strong><strong>?</strong></li>
</ul>
<p>मैंने   पहली ही बार इस तरह के सीन परदे पर किये हैं तो निसंदेह रूप से रीटेक तो  हुए ही हैं, लेकिन कोई जान बूझ कर कोई रीटेक नहीं हुए  हैं.</p>
<ul>
<li><strong>आपकी   आने वाली फ़िल्में कौन सी हैं</strong><strong>? </strong></li>
</ul>
<p>एक  तो रामू की &#8221;रक्त चरित्र&#8221; है,  इसके अलावा दो तीन फ़िल्में और भी हैं.</p>
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