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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; संसद मार्ग</title>
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		<title>एकछत्र शासन का घोषणापत्र- 37</title>
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		<pubDate>Sat, 31 Jul 2010 05:22:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयदीप शेखर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[37. सजा का निर्धारण 37.1          किसी भी अपराध को निम्नलिखित पाँच में से किसी एक या &#8216;एकाधिक&#8217; श्रेणी/श्रेणियों के अर्न्तगत लाकर सजा का निर्धारण किया जाएगा- क) कायदे-कानूनों का उल्लंघन,... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/31/%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%9b%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%98%e0%a5%8b%e0%a4%b7%e0%a4%a3%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-37/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><img class="alignright size-medium wp-image-5401" title="guncrime" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/guncrime-294x300.jpg" alt="" width="294" height="300" />37. सजा का निर्धारण</strong></p>
<p style="text-align: justify;">37.1          किसी भी अपराध को निम्नलिखित पाँच में से किसी एक या &#8216;एकाधिक&#8217; श्रेणी/श्रेणियों के अर्न्तगत लाकर सजा का निर्धारण किया जाएगा-</p>
<p style="text-align: justify;">क) कायदे-कानूनों का उल्लंघन, जिससे किसी को नुक्सान नही पहुंचता हो- सजा: चेतावनी या जुर्माने से लेकर एक वर्ष से कम की कैद;</p>
<p style="text-align: justify;">ख) व्यक्ति, परिवार या संस्था को नुकसान पहुंचाने वाले अपराध- सजा: एक से तीन वर्ष तक की कैद;</p>
<p style="text-align: justify;">ग) समाज, संस्कृति या सभ्यता को नुक्सान पहुँचाने वाले अपराध- सजा: चार से छह वर्ष तक की कैद;</p>
<p style="text-align: justify;">घ) राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय एकता या राष्ट्रीय सम्पत्ति (सरकारी खजाना सहित) को नुकसान पहुँचाने वाले अपराध- सजा: सात से नौ वर्ष तक की कैद, और</p>
<p style="text-align: justify;">ङ) मानवता, पर्यावरण या जैव-विविधता को नुकसान पहुंचाने वाले अपराध- सजा: दस से बारह वर्ष तक की कैद।</p>
<p style="text-align: justify;">37.2          एक ही अपराध जब एक से अधिक श्रेणियों के अर्न्तगत आए, तो सजा भी जोड़कर दी जायेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">37.3          अदालत में अपना दोष स्वयं स्वीकार करनेवाले दोषियों को सजा में रियायत देने का &#8216;विवेकाधिकार&#8217; न्यायाधीशों को प्राप्त होगा। (इस विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते समय न्यायाधीशों को &#8216;जनभावना का ध्यान रखना चाहिए।)</p>
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		<title>मुलायम-कल्याण मैत्री अध्याय का लाभ कांग्रेस को</title>
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		<pubDate>Fri, 30 Jul 2010 12:49:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमेश भट्ट</dc:creator>
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		<description><![CDATA[बीते लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में कांग्रेस ने लोकसभा की 22 सीटें जीतकर सबकों चौंका दिया। शायद खुद कांग्रेस के लोगों के लिए यह जीत किसी अचम्भे से कम नही... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/30/%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a3-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%8d/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5491" title="congress (1)" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/congress-1-226x300.jpg" alt="" width="226" height="300" />बीते लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में कांग्रेस ने लोकसभा की 22 सीटें जीतकर सबकों चौंका दिया। शायद खुद कांग्रेस के लोगों के लिए यह जीत किसी अचम्भे से कम नही थी। मगर जीत तो जीत है चाहे उसके लिए कोई भी कारण गिनाए जाए। कांग्रेसियों के इसके पीछे राहुल फैक्टर काम करता दिखाई दिया। पिछले कुछ सालों में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने उत्तरप्रदेश को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला बनाया है। देश को सबसे ज्यादा प्रधानमन्त्री देने वाले इस राज्य में कांग्रेस का ग्राफ 1989 के बाद लगातार गिरता चला गया। एक समय जो मुस्लिम समुदाय कांग्रेस का प्रबल समर्थक था, बाबरी विध्वंस के बाद वह उससे दूर होता चला गया। मगर 2009 के लोकसभा चुनाव में वह वापस कांग्रेस की तरफ आता दिखाई दिया। यही कारण है कि कांग्रेस को न सिर्फ वोट फीसदी बल्कि सीट का भी फायदा मिला। उपर से मुलायम कल्याण मैत्री अध्याय का लाभांश सीधे-सीधे कांग्रेस के खाते में गया। बहरहाल कारण जो भी हो कांग्रेसी 2012 में यूपी के दुर्ग में झण्डा गाड़ने का सपना अकेले दम पर देखने लगे है। अब सवाल यह कि क्या यह ख्याली पुलाव है या वाकई इस बात पर दम है। दरअसल पिछले कुछ महिनों में यूपी में हुए 16 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के छोली में 2 सीटें ही गई। जबकि सबसे अहम मुददा यह रहा कि फिरोजाबाद सीट पर 1800 वोट लाने वाली कांग्रेस मात्र 6 महिने में 350000 वोट के साथ सपा के गड़ में सेंध लगा गई। इस चुनाव ने मुलायम को एक सबक भी दिया की जनता ज्यादा दिन तक परिवारवाद और मनमाने फैसले के बोझ तले नही दबी रह सकती। कांग्रेस पार्टी ने इस समय युद्ध स्तर पर सदस्यता अभियान चला रखा है। हाल के आंकड़ों से यह पता लगता है कि यह अभियान के तहत कांग्रेस से जुड़ने वाले लोगों की संख्या 20 लाख से बड़कर 60 लाख के आसपास पहुंच गई है। इस साल यूपी में पंचायत चुनाव तय है। 2011 में शहरी निकाय के चुनाव और 2012 में विधानसभा चुनाव है। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव। बहरहाल सबसे पहले राहुल गांधी यूपी में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में नए जोश का संचार कर रहे है। दलितों के घर भोजन कर रहे है ताकि माया की दलित जमीन को दरका सके। इधर मायावती की सामाजिक संरचना को तोड़ना किसी भी पाट्री के लिए नामुमकिन दिख रहा है। मुलायम सिंह मुसलमानों से कल्याण को गले लगाने के लिए माफी मांग चुके है। देखना दिलचस्प यह होगा कि यह माफीनामा वापस मुस्लिमों को उनकी ओर खींच पायेगा या नही। इधर अजीत सिंह की पार्टी का कांग्रेसीकरण होना मुश्किल लग रहा है। इस काम में सबसे बडी चुनौति उनके खुद के बेटे है जो मथुरा लोकसभा सीट से सांसद हैं। बहरहाल देश को सबसे बड़े राज्य जहां से 404 विधायक चुने जाते है। 80 सांसदों दिल्ली चुन कर आते है। वह राजनीतिक लिहाज से कितना महत्वपूर्ण है आप और हम समझ सकते है।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>अगर सरकारें अप्रासंगिक हो गयीं हैं&#8230;तो</title>
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		<pubDate>Fri, 30 Jul 2010 12:23:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[लेखक : भूतनाथ &#8221; विकिलिक्स &#8221; द्वारा अमेरिकी कार्यवाइयों के भंडाफ़ोड किये जाने और अमेरिकी सरकार द्वारा इसे संघीय व्यवस्था का उल्लंघन बताये जाने पर एक प्रश्न अपने-आप ही उठ खडा... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/30/%e0%a4%85%e0%a4%97%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b9/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h2 style="text-align: right;"><strong><span style="color: #0000ff;">लेखक : भूतनाथ</span></strong></h2>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5486" title="Indian Gov &amp; Politics" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/Indian-Gov-Politics-259x300.jpg" alt="" width="259" height="300" />&#8221; विकिलिक्स &#8221; द्वारा अमेरिकी कार्यवाइयों  के भंडाफ़ोड किये जाने और अमेरिकी सरकार द्वारा इसे संघीय व्यवस्था का उल्लंघन बताये जाने पर एक प्रश्न अपने-आप ही उठ खडा होता है कि क्या सिर्फ़ सरकारें ही व्यवस्था को बनाये रखती हैं,बाकि सब तंत्र उसका उल्लघंन ही करते हैं??</p>
<p style="text-align: justify;">जबसे हमने लिखित इतिहास को पढा और उसके माध्यम से सब कालों में &#8220;सरकारों&#8221;का जो आचरण जाना और समझा है उससे तो ठीक उल्टा ही प्रमाणित होता है,अब तक के लिखित इतिहास के अनुसार हमने यही देखा है कि तरह-तरह की सरकारों ने किस-किस प्रकार के &#8220;सुनियोजित-कुकर्म&#8221; किये हैं और जब विभिन्न व्यक्तियों या किन्ही सामाजिक संगठनों ने उनके विरुद्द किसी भी प्रकार की आवाज़ उठायी या आंदोलन भी किया तो किस प्रकार से इस &#8220;तथाकथित &#8221; सरकारों ने उनका गला घोंटा है या कि अपनी सेना और अपने अधीन तंत्र के द्वारा किस प्रकार की हिंसा के द्वारा कुचला है और मज़ा तो यह भी है कि यह सब आज इस तथाकथित लोकतांत्रिक कहे जाने वाले &#8220;सभ्य&#8221; युग में भी हो रहा है,अंतर सिर्फ़ इतना है कि ऐसा आचरण करने वाली लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकारों का ढंग और कम्युनिस्ट सरकारों का ढंग एक-दूसरे थोडा अलग है.</p>
<p style="text-align: justify;">इससे कभी-कभी ऐसा भी प्रतीत होता है कि लोकतांत्रिक देशों में लोक-तंत्र का अर्थ महज इतना ही होता है कि नागरिक अपनी मनमानी करें और अगर सरकार को यह नागवार गुजरे तो वह अपनी मनमानी करे&#8230;फर्क सिर्फ़ इतना है कि सरकार की मनमानियां एक भयानक अत्याचार से भी भीषण हो सकती हैं,बाद में भले वह हटा दी जाये और बाद वाली सरकार उससे भी जाहिल साबित हो&#8230;..</p>
<p style="text-align: justify;">अब तक यही समझा जाता रहा है कि लोगों द्वारा चुनी गयी सरकारों में लोगों के हित ज्यादा सुरक्षित होते हैं,हालांकि ज्यादातर इतिहास इस बात की न सिर्फ़ तस्दीक नहीं करता बल्कि इसे नकारता भी है.सरकार के लोग,उपर से नीचे तक चाहे वो कोई भी हों,खुद के कर्म को उचित और आम नागरिक के कर्मों को ज्यादातर गलत बताते हैं&#8230;.यह गलत होना गैर-कानूनी होने से लेकर देशद्रोह होना तक भी हो सकता है,यहां तक कि इसी तर्ज़ पर आज तक तमाम लोकतांत्रिक देशों के कानून उनके खुद के ही संविधान की धज्जियां उडाते दिखायी देते हैं&#8230;..और मज़ा यह है कि जिन कानूनों के बिना पर आम लोगों को कडी-से-कडी सज़ा तक दे दी जाती है&#8230;.उन्हीं कानूनों की चिथडे उनके रखवाले हर वक्त करते हुए दिखायी देते हैं, मगर चुंकि हर आदमी अपनी ही समस्याओं से भरा उन्हें निपटाने में पगलाया रहता है&#8230;..उसे गरज़ ही नहीं होती इस सबको देखने की [जब तक कि वो खुद नहीं इस सब झमेले में फ़ंस जाये ]&#8230;.और सिर्फ़ और सिर्फ़ इसीलिए यह सब चलता रहता है&#8230;..लोग आंख मूंद कर अपना-अपना जीवन व्यतीत करते रहते हैं&#8230;.और सरकारी दुनिया में बिल्ली के भाग से छींका टूटता रहता है&#8230;..उस टूटे हुए छींके से ये सरकारी लोग [बिल्लियां]मलायी मार-मार कर खाते रहते हैं&#8230;.यहां तक कि कोई आम नागरिक भी अगर इस मलायी को चाटना चाहे तो उसे निस्संदेह किसी ना किसी सरकारी हाथ की मदद का ही सहारा लेना होता है&#8230;.मज़ा यह कि कल को अगर यह सब उजागर भी होता है तो इसका ठीकरा हर हालत में उस गैर-सरकारी व्यक्ति या समूह के माथे पर ही फ़ूटना होता है&#8230;.अगर सरकारी हाथ कुछ ज्यादा ही काला हो गया हो तो तो सरकार खुद आगे बढ्कर उसे बचाया करती है&#8230;क्युंकि सरकार में भी तो ना जाने कितने ही पक्ष होते हैं,जिन्होने इस मलायी को चाटने में अपना भी मूंह मारा होता है&#8230;&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">इसका सीधा मतलब आप यह भी लगा सकते हो कि सरकार का दामन हमेशा साफ़ ही होता है&#8230;हम जैसे बेईमान और भ्रष्ट लोग ही सरकार का मूंह काला किये जाते हैं[सरकार के साथ मूंह काला नहीं करते....!!!]और इसीलिये सरकार का विरोध करने वाले&#8230;..सरकार अलग सोचने वाले&#8230;सरकार से बिल्कुल ही भिन्न नीति रखने वाले&#8230;.और सरकार के गलत कार्यों का विरोध करने वाले ना सिर्फ़ उसकी [गोपनीय]संघीय व्यवस्था का उल्लंघन करने वाले समझे जाते हैं,अपितु देशद्रोही तक भी साबित किये जा सकते हैं&#8230;&#8230;प्रत्येक सरकारी व्यक्ति,चाहे वह कितना ही अदना-सा&#8230;.किसी भी सामान्य समझदारी का गैर-जानकार&#8230;या कि बिल्कुल ही टुच्ची सी समझ रखने वाला भी क्यों ना हो&#8230;..उसके अधिकार.. उसकी ताकत&#8230;.उसका अहंकार&#8230;.उसका रुतबा&#8230;उसकी कडकता&#8230;.उसका रूआब&#8230;.और सबसे बढ्कर ना जाने किन अनजान जगहों से आने वाला अथाह धन उसे हमसे इतर साबित करते हैं&#8230;.मगर वह देश-द्रोही कभी नहीं कहला सकता&#8230;.अगर कभी कहला भी गया तो यह माना जाता है कि जरूर ही उसके खिलाफ़ कोई गहरी राजनीतिक साजिश रची गयी है&#8230;और इसके पीछे अवश्य ही विपक्षी राजनीतिक दल है&#8230;.और इस प्रकार उस गद्दार व्यक्ति या समूह इस तरह के तमाम देश-द्रोही कार्यों के प्रति आंख मूंद ली जाती है&#8230;.और ऐसा क्यों ना हो&#8230;..आखिर उस हमाम में सभी शरीक जो हैं&#8230;..</p>
<p style="text-align: justify;">सरकार के अनुदान से चलने वाला बहुतेरा मीडिया भी इस हमाम का ही वासी ही होता है&#8230;.इस मलायी का चटोरा&#8230;..सो एक तरफ़ मीडिया का एक हिस्सा उस गलत व्यक्ति/समूह या सरकार के इन कारनामों को उजागर कर रहा होता है&#8230;.वहीं&#8230;.यह मीडिया-विशेष अपनी पूरी ताकत और जद्दोजहद के संग उन गलत कार्यों में बराबर का भागीदार बन कर सरकार का वकील बनकर उन तमाम गलत पक्षों के पक्ष में तमाम निराधार और घटिया दलीलें पेश करता है&#8230;.जिन्हें हम बेसिर-पैर के  कुतर्क साबित कर सकते हैं&#8230;.और समय-समय पर ऐसा करते भी हैं&#8230;&#8230;मगर ऐसा कब तक चले&#8230;..और क्योंकर चले&#8230;..??सरकारों का कार्य क्या सिर्फ़ मनमानी करना है&#8230;.??सरकारें क्या किसी और लोक से उतरी हैं और किसी के भी प्रति उत्तरदायी  नहीं हैं&#8230;..??और आम आदमी का कोई और काम नहीं है क्या,जो वह सरकारों और उससे जुडे तमाम लोगों पर नज़र रखे&#8230;.और अपना महत्वपूर्ण काम-धाम छोड देने की कीमत चुका कर &#8220;ऐसे लोगों” की पोल खोजता चले&#8230;..??सरकारें एयरकंडीशंड रूमों में बैठ कर तमाम उल्टे-सीधे निर्णय ले ले&#8230;.फिर आम आदमी या संगठन  सडक पर आंदोलन करता चले&#8230;..??जब सब राय आम आदमी को देनी है&#8230;.और सरकार को उसके हर किये हुए कर्म का अच्छा-बूरा बतलाना है&#8230;..तो फिर ऐसे निकम्मे लोगों को सरकार बनाने का न्योता ही क्यों देना है&#8230;??</p>
<p style="text-align: justify;">क्या सरकार होने का मतलब यही होता है&#8230;..कि आप मनमानी करते रहो&#8230;..मनमाने निर्णय लेकर अपने ही नागरिकों की जान सांसत में डालते रहो&#8230;.उनका जीवन जीना हराम करते रहो&#8230;..??अपनी ऊंची अट्टालिकायें खडी करते रहो&#8230;..सब तरह का नाजायज काम उन्हीं नियमों के छेदों की आड में करते रहो&#8230;जिसकी बिना पर तुम किसी दूसरे को जेल में झोंक देते हो&#8230;.???और मीडिया-कोर्ट और सभी तरह के संगठन सरकार के पीछे भोंपू और लाठी लेकर दौडते फ़िरें&#8230;.???समझ नहीं आता कि आखिर सरकार है तो आखिर है क्या&#8230;.??सरकारें हम बनाते हैं हममे से कुछ लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाकर हमारे बीच सब किस्म की व्यवस्था कायम करने के लिये&#8230;.वो भी अपने खर्च से हुए चुनाव से और अपने ही खर्च पर दिये जाने वाले उन हज़ारों नेताओं और तमाम सरकारी लोगों को वेतन देकर&#8230;..और सब सरकार बनाते ही सिर्फ़ &#8220;अपनी व्यवस्था &#8221; कायम करने लग जायें&#8230;.तो उन्हें वापस कैसे बुलाया जाये&#8230;..और उनके लिये किस तरह की सज़ा तय हो&#8230;अब सिर्फ़ इसी एक बात पर विचार करना है हमारे समाज रूपी तंत्र को&#8230;.अगर सरकारें अप्रासंगिक हो गयीं हैं&#8230;तो उसी की वजह से न सिर्फ़ यह कु-व्यवस्था फ़ैलती है&#8230;.बल्कि नस्लवाद-आतंकवाद नाम नासूर भी यहीं से पनपता है&#8230;.पल्लवित होता है&#8230;..जिस तरह अपराधियों का इलाज लाठी-डंडे-कोडे तथा अन्य तरह की सज़ायें तय हैं&#8230;..उसी तरह यही सजायें क्या इन लोगों के लिये नहीं तय की जा सकती&#8230;.अगर माननीय न्यायालय कानूनों में छेद की वजह से उचित फ़ैसला कर पाने में अक्षम है&#8230;.तो फिर जनता को ही क्यों नहीं इसका ईलाज करना चाहिये&#8230;.!! मुझे उम्मीद है कि यह अनपढ-गरीब और सतायी हुई जनता एकदम ठीक फैसला लेगी&#8230;..हो सकता है कि सभ्य लोगों को उसका फैसला &#8220;जंगल का कानून सरीखा लगे&#8230;&#8221;मगर अगर सब तरफ़ जंगली लोग ही हों&#8230;और आम जनता के अधिकारों का बर्बरतापूर्वक हनन कर रहे हों तो आप किस तरह उनका इलाज सो कोल्ड सभ्य कानूनों द्वारा कर सकते हैं&#8230;.!!</p>
<p style="text-align: justify;">पानी सर से अत्यधिक उपर जा चुका है&#8230;.जनता को अब फैसला लेना ही होगा&#8230;.कि उसे क्या चाहिये&#8230;..एक अमानवीय और किसी भी प्रकार की उचित सोच से रहित सरकार&#8230;&#8230;और उसकी नाक तले ऊंघ रहा निकम्मा प्रशासन&#8230;&#8230;कि इन सबसे मुक्ति&#8230;..अगर दूसरे रास्ते की मन में है&#8230;.तब तो आगे बिल्कुल रद्दोबदल कर डालिये&#8230;&#8230;अपने बीच से एकदम नये लोग निकालिये&#8230;.और उन्हें चेतावनी देकर ही संसद और विधान सभाओं में भेजिये&#8230;..और अभी&#8230;&#8230;अभी के लिये यही कहुंगा कि इस वर्तमान को अभी-की-अभी उखाड फेंकिये&#8230;..और यह आप सब&#8230;.हम सब&#8230;.यानि कि आम जनता ही कर सकती है&#8230;..क्योंकि भ्रष्टाचारियों को सज़ा देने में हमारा कानून&#8230;..और हमारा संविधान भी पस्त हो चुका है&#8230;..!!!</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211;</p>
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		<title>गुलाममंडल खेल और नेहरू स्टेडियम</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Jul 2010 15:22:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>विजय कुमार</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="aligncenter size-full wp-image-5442" title="MINOLTA DIGITAL CAMERA" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/Jawaharlal_Nehru_Stadium.jpg" alt="" width="520" height="383" />दिल्ली में होने वाले गुलाममंडल खेलों के उद्घाटन, समापन आदि के लिए बने जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम का नाम बिल्कुल ठीक रखा गया है, क्योंकि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत में गुलाम परम्पराओं को जीवित रखने के सबसे बड़े अपराधी नेहरू ही हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">वे स्वयं को गर्वपूर्वक भारत में अंतिम अंग्रेज कहते थे। इसी प्रकार वे स्वयं को जन्म से हिन्दू, कर्म से मुसलमान और विचारों से ईसाई मानते थे। जो लोग इस तमाशे के समर्थक हैं, वे सब नेहरूवादी गुलाम मानसिकता के शिकार हैं। मणिशंकर अय्यर ने जीवन में बस यही अच्छा काम किया है कि वे इस सर्कस के विरोधी हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इस तमाशे पर कितना धन खर्च हो रहा है, यह ठीक-ठीक किसी को नहीं पता। 15 से लेकर 50 हजार करोड़ रु0 तक की बात लोग कह रहे हैं। इससे भारत के हर विकास खंड में एक चिकित्सालय और विद्यालय तथा हर जिले में एक खेल स्टेडियम बन सकता था; पर गांव और गरीब किसी की प्राथमिकता में तो हो&#8230;। पांच करोड़ रु0 तो केवल ए.आर.रहमान को ही दिया जा रहा है, जो उद्घाटन कार्यक्रम में कुछ देर गीत-संगीत प्रस्तुत करेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">दुर्भाग्यवश भारत के सभी बड़े नेता, राजनीतिक दल तथा संस्थाएं चुप हैं। उन्हें डर है कि इससे कहीं युवा शक्ति उनसे नाराज न हो जाए। वे भूलते हैं कि जींसधारी आधुनिक युवक भले ही कितने फैशनपरस्त हों; क्रिकेट, सिनेमा या कैरियर के लिए भले ही वे दीवाने हों; पर उनके मन में देशभक्ति की आग विद्यमान है। यदि उन्हें ठीक से बात समझाएं, तो यह आग शीघ्र ही दावानल बन सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;">छह दिसम्बर, 1992 और अयोध्या को याद करें। जिन युवकों को बुजुर्ग लोग नालायक बताते नहीं थकते थे, उन्होंने कुछ घंटो में ही बाबरी गुलामी के उस कलंक को ढहा दिया था। यदि सही नेतृत्व द्वारा आह्नान किया जाए, तो यही फैशनपरस्त युवक बड़े से बड़ा बलिदान देने में पीछे नहीं हटेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">हर्ष की बात है कि स्वामी रामदेव जी ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई है। यदि वे आह्नान करें, तो इस मुद्दे पर करोड़ों भारतवासी उनके साथ आ सकते हैं। क्या ही अच्छा हो यदि स्वामी जी के नेतृत्व में तीन अक्तूबर, 2010 (रविवार) को दिल्ली के देशभक्त नागरिक सत्याग्रह करें। वे सुबह से ही सड़कें जाम कर किसी खिलाड़ी, नेता या दर्शक को उद्घाटन कार्यक्रम में न जानें दें। विश्व भर का मीडिया उस दिन यहां होगा। उनके माध्यम से दुनिया देखेगी कि ‘हम भारत के लोग’ इस गुलामी के चोगे को उतार फेंकना चाहते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">यदि स्वामी रामदेव जी अभी से तीन अक्तूबर, 2010 को दिल्ली में रहकर इस सत्याग्रह का नेतृत्व करने की घोषणा कर दें, तो गुलाममंडल खेलों के विरुद्ध वातावरण बनने लगेगा। दिल्ली के आसपास के लाखों लोग भी उस दिन यहां आ जाएंगे। दो अक्तूबर गांधी जी का जन्मदिवस भी है, जिन्होंने सत्याग्रह रूपी शस्त्र का अंग्रेजों के विरुद्ध प्रयोग किया था। अंग्रेज रानी की गुलामी में सम्पन्न होने वाले ‘गुलाममंडल सर्कस’ के विरुद्ध इस शस्त्र को एक बार फिर आजमाने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>जनता के साथ हैं और महंगाई के विरोध में</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Jul 2010 07:18:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-5419" title="mehngai" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/mehngai.jpg" alt="" width="369" height="232" />मॉनसून सत्र के तीसरे दिन भी संसद में हंगामा जारी है | सारा विपक्ष एक स्वर में महंगाई के मुद्दे पर चर्चा और मतदान की मांग पर अड़ा हुआ है | कांग्रेस सरकार की हवा निकलती हुई दिख रहा है | जिस तरह से मॉनसून सत्र के ठीक पहले सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ और हिन्दू आतंकवाद का जिन्न निकाला गया उससे सरकार के रणनीतिकार काफी निश्चिन्त थे कि मुख्य विपक्षी दल भाजपा को इन मुद्दों पर घेर कर महंगाई के मुद्दे को दबा दिया जायेगा | लेकिन , भाजपा नेतृत्व ने अमित शाह प्रकरण में सीबीआई को लेकर सरकार को घेरने के बजाय महंगाई के दर्द को उठाना उचित समझा और नतीजा सामने है कि वाम हो या दक्षिण या फ़िर समाजवादी ताकतें सभी एकजुट हैं | सरकार चारों ओर से सदन में कमजोर पद रही है | एक ओर जहाँ राज्यसभा में सत्तापक्ष की संख्या का संतुलन बिगड़ गया है वहीँ लोकसभा में सहयोगी दलों के ऊपर भरोसा ना होने से सरकार उहापोह की स्थिति का सामना कर रही है | और यही कारण है कि सरकार 184 के तहत चर्चा नहीं करवाना चाहती क्योंकि इस नियम में चर्चा के बाद मतदान का प्रावधान है | यदि मतदान की नौबत आई तो सरकार की हार तय है क्योंकि इस बार सीबीआई के भय से ना तो सपा मानने वाली है और ना ही बसपा ! वैसे भी मामला महंगाई का है और सबको अपनी चुनावी जमीन बचाए रखना है |</p>
<p style="text-align: justify;">कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी कहते हैं सरकार बहस को तैयार है और विपक्ष भी बहस की मांग कर रही है फ़िर आखिर पेंच कहाँ है ? क्यों सदन हंगामे की भेंट चढ़ रहा है ?  पेंच तो है और वो भी क़ानूनी !  मामला १८४ और १९३ के बीच फंसा हुआ है | दरअसल कांग्रेस नेतृत्व को विपक्ष की समझदारी का अंदाजा ही नहीं था | खास कर भाजपा को उन्होंने रणनीति विहीन समझ लिया था |</p>
<p style="text-align: justify;">गौर किया जाए तो सरकार महंगाई के पाप को गुजरात सरकार को कटघरे में खड़ा कर छुपाना चाहती थी , विपक्ष ( जिसमें भाजपा को अछूत समझने वाले वामपंथी भी शामिल हैं ) को सांप्रदायिक मुद्दों में फंसा कर बाँटना चाहती थी | कुछ लोग इसे गलत आरोप कह सकते हैं लेकिन अमित शाह और हिन्दू आतंकवाद टेप प्रकरण में कुछ सवाल छुपे हैं जो सीधे सरकार की मंशा को स्पष्ट करते हैं | पहला बड़ा सवाल , बम ब्लास्ट के आरोपी दयानंद पण्डे के लेपटॉप से प्राप्त विडिओ मीडिया के पास कैसे पहुंचा जबकि वह लेपटोप तो सरकारी जांच एजेंसियों के पास था  ? दूसरा सवाल , अमित शाह से पूछताछ के पहले 30 हजार पन्नों का चार्जशीट पेश करना क्या सीबीआई की कार्यवाई को पूर्वनियोजित नहीं दर्शाती ? ( यहाँ पर मेरी कोशिश आरोपियों को सही या गलत साबित करने की कोशिश नहीं है , वो तो कानून का काम है| इन सवालों का मकसद सरकार द्वारा अपने हित में गलत समय पर इन मुद्दों को उछालने की साजिश का पर्दाफाश करना है )</p>
<p style="text-align: justify;">खैर , कांग्रेस के यह कोशिश उनके सपनों में ही दम तोड़ गयी | टूटे सपनों से दुखी मनीष तिवारी महंगाई के मुद्दे पर सरकार का बचाव करते हुए एनडीए सरकार में बढाई गयी कीमतों का ब्यौरा देने लग जाते हैं | लेकिन यह कोई बात हुई भला , तुमने बढ़ाई  तो हम भी बढ़ाएंगे !  अरे , तिवारी साहब भारत की जनता ने &#8221; हाथ &#8221; को आम आदमी के साथ मानकर ही तो आपको गद्दी सौंपी थी ! अब जब वही हाथ साथ छोड़ कर अपनी जेबें भरने लग जाए और जनता का गर्दन तक जा पहुंचे तो हंगामा होगा ही ! एक ओर , सरकार महंगाई बढ़ने के लिए वैश्विक परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराती है वहीँ दूसरी ओर सरकार की लापरवाही से लाखों टन अनाज सड़ रहे हैं ! लोग भूखों मर रहे हैं लेकिन सरकार ३ रूपये किलो पर अनाज बाँटने का ढोंग रचा रही है सपने दिखा रही है, उन आँखों को जिन्हें सिर्फ रोटी दिखाई देती है |</p>
<p style="text-align: justify;">बहरहाल , संसद में मुंह की खा रही कांग्रेस को बचाने के लिए लोकतंत्र का जर्जर खंभा मीडिया भी प्रयासरत है तभी तो महंगाई के मुद्दे के बीच-बीच में गुजरात , मोदी ,अमित शाह और सी बी आई के शिगूफा छेड़ना नहीं भूलती | दर्शकों में भ्रम पैदा करने का और उनका ध्यान महंगाई से हटा कर अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक , सांप्रदायिक , दंगे  , फर्जी मुठभेड़  आदि की ओर मोड़ने का प्रयास भी किया जा रहा है | मीडिया का क्या कहें साहब , अभी -अभी संसद हंगामा और महंगाई के मुद्दे पर चल रही चर्चा में आईबीएन -७ पर आशुतोष वामपंथी नेता मोहम्मद सलीम से एक ही सवाल बार-बार पूछे जा रहे थे कि इस मुद्दे पर &#8221; भाजपा &#8221; के साथ खड़े रहेंगे ? वाह भाई वाह ! क्या पत्रकारीय दायित्व निभा रहे हैं साहब ! वैसे आशुतोष को जवाब भी खूब मिला ! मोहम्मद सलीम ने कहा -&#8221; हम भाजपा के साथ इसलिए खड़े हैं क्योंकि हम जनता के साथ हैं और महंगाई के विरोध में हैं &#8221; | लेकिन मुख्यधारा की मीडिया सरकार के साथ है और सत्ता की दलाली इनका कर्तव्य है !</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;"><strong>ये लेखनी कैसी कि जिसकी बिक गयी है आज स्याही ,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>ये कलम कैसा कि जो देता दलालों की गवाही !</strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>एकछत्र शासन का घोषणापत्र- 36</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Jul 2010 06:31:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयदीप शेखर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[36. तीव्र एवं सस्ती न्यायिक प्रक्रिया 36.1          राष्ट्रपति महोदय के विरुद्ध अभियोग लाने से पहले विधायिका प्रमुख (प्रधामंत्री), न्यायपालिका प्रमुख (सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश) और कार्यपालिका प्रमुख (मुख्य चुनाव... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/29/%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%9b%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%98%e0%a5%8b%e0%a4%b7%e0%a4%a3%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-36/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><img class="alignright size-medium wp-image-5398" title="court" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/court-211x300.jpg" alt="" width="211" height="300" />36. तीव्र एवं सस्ती न्यायिक प्रक्रिया</strong></p>
<p style="text-align: justify;">36.1          राष्ट्रपति महोदय के विरुद्ध अभियोग लाने से पहले विधायिका प्रमुख (प्रधामंत्री), न्यायपालिका प्रमुख (सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश) और कार्यपालिका प्रमुख (मुख्य चुनाव आयुक्त को कार्यपालिका प्रमुख का दर्जा दिया जाएगा) की सहमती अनिवार्य होगी; इसी प्रकार, इन तीनों प्रमुखों के विरुद्ध अभियोग लाने से पहले राष्ट्रपति महोदय की अनुमति अनिवार्य होगी- बाकी इस देश में किसी के भी खिलाफ अभियोग लाने/मुकदमा शुरू करने से पहले किसी से भी किसी भी किस्म की अनुमति या सहमती लेने की जरुरत नही रहेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">36.2          किसी भी व्यक्ति को उसके जीवनकाल में अधिकतम तीन बार जमानत दी जा सकेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">36.3          &#8216;अग्रिम&#8217; जमानत की प्रथा समाप्त की जायेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">36.4          न्यायाधीशों के पास &#8216;फर्जी&#8217; मुकदमों तथा (मुकदमों को लटकाने के उद्देश्य से उठाये जाने वाले) &#8216;गौण&#8217; मुद्दों को खारिज करने का &#8216;विवेकाधिकार&#8217; होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">36.5          किसी भी मुक़दमे में सिर्फ़ यह देखा जायेगा कि &#8216;अभियुक्त दोषी है या नही&#8217;, अन्यान्य मुद्दों पर अदालत का समय नष्ट नही किया जाएगा।</p>
<p style="text-align: justify;">36.6          जिला न्यायालय के समान प्रखण्ड स्तर पर प्रखण्ड न्यायालय स्थापित किए जायेंगे- दोनों का स्तर बराबर होगा और दोनों ही उच्च न्यायालय के अधीन होंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">36.7          विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और सेना के अन्दरूनी मामलों की सुनवाई के लिए अलग से &#8216;राजकीय अदालत&#8217; का गठन किया जाएगा, जिसमे इन चारों के लिए अलग-अलग प्रकोष्ठ होंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">36.8          सभी अदालतें 90 दिनों के अन्दर किसी एक मामले को निपटायेगी; जिन मामलों में ऐसा सम्भव नही होगा, उन्हें अन्तरिम फैसले, सुझाव या सिफारिश के साथ 91 वें दिन उच्चतर अदालत में स्थानान्तरित कर दिया जायेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">36.9          कोई भी उच्चतर अदालत- सर्वोच्च न्यायालय भी- अपने अधीनस्थ अदालतों में चल रहे मामलों में 90 दिनों तक दखल नही दे सकेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">36.10      दो साल से अधिक पुराने मामलों को निपटाने के लिए 5-5 न्यायाधीशों की &#8216;न्यायिक पंचायतों&#8217; का गठन किया जाएगा, जिसमे मामले के &#8216;सभी पक्षों&#8217; से &#8216;सीधी बातचीत&#8217; के बाद &#8216;सामान्य विवेक&#8217; से निर्णय लिए जायेंगे। (न्यायिक पंचायतों के लिए अवकाशप्राप्त न्यायाधीशों की भी मदद ली जायेगी। )</p>
<p style="text-align: justify;">36.11      कुछ गम्भीर किस्म के मामलों- जैसे, राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, मादक द्रव्य व्यापार, पर्यावरण इत्यादि के लिए कोर्ट-मार्शल- सरीखी एक संक्षिप्त अदालती प्रक्रिया विकसित की जायेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">36.12      सम्मनों की अवहेलना, (मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए) बयान से मुकरना और फरारी को दण्डनीय अपराध बनाया जाएगा।</p>
<p style="text-align: justify;">36.13       जनता (मुवक्किल) से फीस न लेने वाले और इस आशय का शपथपत्र दाखिल करने वाले वकीलों को सरकारी वेतन दिया जाएगा- वकीलों के इस वेतनमान में &#8216;ग्रेड&#8217; का निर्धारण लड़े गए और जीते गए मुकदमों की संख्या के आधार पर किया जाएगा। (वकील जब चाहे, सरकारी वेतन छोड़कर फीस लेना शुरू कर सकेंगे।)</p>
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		<title>जनगणना में जाति को शामिल करना देशद्रोह : जाखड़</title>
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		<pubDate>Wed, 28 Jul 2010 15:23:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[नई दिल्ली &#124; जनगणना में जाति को शामिल करने के विरोध में &#8220;सबल भारत&#8221; द्वारा संचालित &#8220;मेरी जाति हिंदुस्तानी आंदोलन&#8221; ने आज एक विशाल मार्च का आयोजन किया&#124; सैकड़ों, छात्र... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/28/%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%ab-%e0%a4%96%e0%a5%82%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-5389" title="jati htaao janganna se.2" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/jati-htaao-janganna-se.2-300x212.jpg" alt="" width="300" height="212" />नई दिल्ली | जनगणना में जाति को शामिल करने के विरोध में &#8220;सबल भारत&#8221; द्वारा संचालित &#8220;मेरी जाति हिंदुस्तानी आंदोलन&#8221; ने आज एक विशाल मार्च का आयोजन किया| सैकड़ों, छात्र , लेखकों, पत्र्कारों, बुद्घिजीवियों, उद्योगपतियों एवं किसानों ने 13, बाराखंबा रोड से जंतर-मंतर तक मार्च किया| इस मार्च का नेतृत्व आंदोलन के सूत्र्धार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने किया|</p>
<p style="text-align: justify;">मार्च में भाग लेनेवाले अनेक राष्ट्रीय ख्याति के लोग नारे लगाते जा रहे थे कि &#8220;सौ बातों की बात यहीं, जनगणना में जात नहीं&#8221;, &#8220;जनगणना में जात नहीं, भारत को तू बांट नहीं&#8221;, &#8220;भारतमाता की यह बानी, मेरी जाति हिंदुस्तानी&#8221; आदि|</p>
<p style="text-align: justify;">मार्च का समापन जंतर-मंतर पर हुआ| जंतर-मंतर पर एक विराट सभा हुई| सभा में विशेष रूप से भाजपा के वरिष्ठ नेता, जाने-माने अधिवक्ता तथा राज्यसभा सांसद श्री राम जेठमलानी, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष तथा पूर्व राज्यपाल श्री बलराम जाखड़, प्रसिद्घ पत्र्कार टाइम्स आफ इंडिया के पूर्व मुख्य संपादक डॉ. दिलीप पडगांवकर, पूर्व केन्द्रीय मंत्र्ी श्री आरिफ मो. खान, भारत के पूर्व जाइंट चीफ आफ इंटेलिजेंस श्री आर के खंडेलवाल, राजस्थान भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तथा पूर्व राज्यसभा सांसद श्री महेशचंद्र शर्मा, पूर्व राजदूत श्री जगदीश शर्मा, प्रसिद्घ नृत्यागंना सुश्री उमा शर्मा, प्रसिद्घ समाजसेवी श्रीमती अलका मधोक एवं फिल्म मेकर डॉ. लवलीन थडानी, जैन मुनि डॉ. लोकेशचंद्र, ईसाई नेता श्री फ्रांसिस आदि वक्ताओं ने सभा को संबोधित किया| सभा की अध्यक्षता आंदोलन के सूत्र्धार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने की|</p>
<p style="text-align: justify;">सभा को संबोधित करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता तथा भाजपा के सांसद श्री राम जेठमलानी ने कहा कि मैं इस आंदोलन का पुरजोर समर्थन करता हूं तथा इस आंदोलन के लिए मैं अपने रक्त की अंतिम बूँद तक बहाने को  तैयार हूं| हमारे देश को गुलाम बनाए रखने के लिए जाति का आधार ही अंग्रेजों का मुख्य हथियार था| उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि राबर्ट क्लाइव ने ईस्ट इंडिया कंपनी को लिखे अपने पत्र् में कहा था कि हम भारत में खुश हैं, हमारी ताकत तथा व्यापार दिन प्रतिदिन मजबूती से बढ़ रहा है, क्योंकि भारत के लोग जाति के नाम पर बंटे हुए हैं|</p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5390" title="jati htaao janganna se" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/jati-htaao-janganna-se-300x212.jpg" alt="" width="300" height="212" />श्री बलराम जाखड़ ने कहा कि जनतंत्र् में हम सभी को अपनी बात कहने का हक है| भारत की अखंडता एवं एकता की रक्षा हमारा धर्म है| हमें ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे देश बंटे| जनगणना में जाति को शामिल करना देशद्रोह के समान है| यह सबसे बड़ा कुकर्म है| इससे बड़ा बुरा काम कोई और नहीं हो सकता|</p>
<p style="text-align: justify;">जुलूस में भाग ले रहे वरिष्ठ पत्र्कार डॉ. दिलीप पडगांवकर ने कहा कि जातिगत बातें मात्र् वोट बैंक की राजनीति के लिए है| हमारे लिए देश का संविधान सबसे प्रमुख है और गणतंत्र् को बचाने के लिए जातीय जनगणना का विरोध करना आवश्यक है| संविधान में स्पष्ट कहा गया है कि जाति, धर्म के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं होना चाहिए| आंबेडकर का अंतिम भाषण सभी को पढाया जाना चाहिए, जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा था कि कोई भी जातीय-भेदभाव नहीं होना चाहिए|</p>
<p style="text-align: justify;">देश के पूर्व राजदूत जगदीश शर्मा ने कहा कि जातीय आधार पर देश को बांटने की कोशिश भारत को सारी दुनिया में बदनाम कर देगी| भारत की सेना इसीलिए महान मानी जाती है कि उसका आधार जाति नहीं, राष्ट्र है|</p>
<p style="text-align: justify;">भारत के पूर्व जाइंट चीफ आफ इंटेलिजेंस आर. के. खंडेलवाल ने कहा कि देश को जोड़ने के लिए गांधीजी ने हिन्दु-मुस्लिम एकता का काम किया था| आज हम जातिगत बंटवारा कर के देश को कहां ले जा रहे है ?</p>
<p style="text-align: justify;">पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री आरिफ मो. खान ने कहा कि जातीय गणना बिल्कुल अवैज्ञानिक है| इसके आधार पर गरीबों का नहीं, कुछ जातियों की मलाईदार परतों का ही भला हो सकता है|</p>
<p style="text-align: justify;">रैली को संबोधित करते हुए जैन मुनि लोकेशजी ने कहा कि जाति से बड़ा हमारा राष्ट्र है| यदि राष्ट्र एक और अख्ंाड रहा तो हम रहेंगे, वर्ना हम ही कहां रह पाएंगे| दलित ईसाई नेता फ्रांसिस ने कहा कि जाति एक घातक बीमारी है| हम सब एक हैं| जातिगत आधार पर कोई भेदभव नहीं होना चाहिए|</p>
<p style="text-align: justify;">इस मौके पर प्रसिद्घ कलाकार उमा शर्मा, समाजिक कार्यकर्ता श्रीमती अलका मधोक और श्रीमती लवलीन थडानी ने भी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया| कार्यक्रम का संचालन आंदोलन के सूत्र्धार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने किया| श्री अशोक कावडि़या ने मुख्य अतिथियों और जुलूस में भाग लेनेवाले साथियों को धन्यवाद दिया|</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>अमित शाह और सोहराबुद्दीन का भूत</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 10:18:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[लेखक : सुनील बघेल गुजरात के अहमदाबाद से ताल्लुक रखने वाले अमित शाह कोई मामूली राजनीतिज्ञ नहीं हैं. छियालीस वर्षीय शाह पिछले कई सालों से भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/27/%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%a8/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5293" title="amit shah gujraat" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/amit-shah-gujraat-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></p>
<h3><span style="color: #0000ff;">लेखक : सुनील बघेल</span></h3>
<p style="text-align: justify;">गुजरात के अहमदाबाद से ताल्लुक रखने वाले अमित शाह कोई मामूली राजनीतिज्ञ नहीं हैं. छियालीस वर्षीय शाह पिछले कई सालों से भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी की गांधीनगर सीट से जीत में अहम भूमिका निभाते आए हैं. गुजरात की राजनीति की बात करें, तो वे मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘कोर ग्रुप’ के सबसे अहम सदस्य माने जाते हैं. 2001 में नरेंद्र मोदी की गुजरात की सत्ता में दोबारा वापसी के बाद राज्य समेत देशभर में ‘मोदी ब्रांड’ को स्थापित करने में भी शाह की दिमागी सूझबूझ ने ही सबसे अहम भूमिका निभाई थी. ऐसे दौर में, जबकि समूचे देश में आतंकवाद का दंश झेलने को हर राज्य, हर हिस्सा मजबूर है, गुजरात में चाक-चैबंद कानून-व्यवस्था के लिए भी शाह को ही तारीफें मिलती हैं, जो राज्य के गृह राज्यमंत्री के तौर पर बेहद सजग, सचेत नजर आते हैं. इन सबसे बढ़कर, मोदी के कोर ग्रुप के भीतर शाह को एक ऐसे दूरदृष्टि राजनीतिज्ञ के तौर पर जाना जाता है जो भविष्य में आने वाली हर चुनौती को भांप लेता है.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन, अब यही दूरदृष्टि राजनेता गुजरात की राजनीति से दूर हो गया है. देश को झकझोर कर रख देने वाले बहुचर्चित सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले के मुख्य षड्यंत्रकर्ता के तौर पर शाह न सिर्फ गृह राज्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने को मजबूर हो गए हैं, बल्कि सीबीआई की गिरप्त में आकर जेल की सलाखों के पीछे भी पहुंच गए हैं. कुल मिलाकर, 2005 के सोहराबुद्दीन मामले में शाह पर कानूनी शिकंजा पूरी तरह से कस गया है.</p>
<p style="text-align: justify;">इस मामले में शाह और भाजपा की उलझन यह है कि वे इस मुद्दे का राजनीतिकरण भी नहीं कर सकते. मतलब यह कि इस मुद्दे को लेकर भाजपा कांग्रेस पर यह आरोप भी नहीं लगा पा रही है कि केंद्र में होने का फायदा उठाकर वह सीबीआई को शाह के खिलाफ कार्रवाई के लिए प्रेरित कर रही है. हालांकि मोदी समेत कुछेक भगवा नेताओं ने दिल्ली में ड्रामेबाजी करके कांग्रेस पर हल्लाबोल की कोशिश की, लेकिन जल्द ही उन्हें भी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की ओर से चुप रहने को कह दिया गया.</p>
<p style="text-align: justify;">इसकी वजह यह है कि सोहराबुद्दीन मामले में सीबीआई के पास पर्याप्त सबूत हैं, जिनके आधार पर शाह के खिलाफ सारे आरोप सही साबित किए जा सकते हैं. 6 नवंबर 2005 को गुजरात में अपराध की दुनिया में तेजी से पैठ बना चुके सोहराबुद्दीन शेख को पुलिस ने एक मुठभेड़ में मार गिराया था. गुजरात सीआईडी ने इस मामले में तीन पुलिस अधिकारियों पर संदेह जताया था, लेकिन बाद में देश की सर्वोच्च अदालत ने इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया.</p>
<p style="text-align: justify;">बस यही से शाह के खिलाफ शिकंजा कसने की शुरुआत हुई. सीबीआई ने अपनी जांच में पाया कि सोहराबुद्दीन की हत्या करवाने के लिए शाह ने अपने पद का फायदा उठाते हुए पुलिस विभाग के अधिकारियों पर दबाव बनाया. सीबीआई ने यह भी नोटिस किया कि इस दौरान शाह ने सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर की योजना बनाने के लिए पुलिस अधिकारियों को तीन सौ से भी ज्यादा बार फोन लगाए. बस, इन्हीं सबूतों के बाद सोहराबुद्दीन मामले में शाह को प्रमुख अभियुक्त बनाया गया. सीबीआई ने कोर्ट में जो आरोप पत्र दाखिल किया है, उसके मुताबिक सोहराबुद्दीन गुजरात में अपहरण, फिरौती की घटनाओं को अंजाम देता था. लेकिन इस दौरान उसने गलती यह कर दी कि कुछ ऐसे उद्योगपतियों को पैसे के लिए धमका दिया, जो शाह के करीबी थी. इसके बाद ही शाह ने सोहराबुद्दीन की हत्या की साजिश रची.</p>
<p style="text-align: justify;">मामले में शाह की इस पुख्ता दखलंदाजी के चलते ही भाजपा भी चुपचाप बैठी हुई है. ऐसे बुरे वक्त में नरेंद्र मोदी भी अपने सबसे विश्वसनीय साथी की मदद नहीं कर पा रहे हैं. वैसे, यह मोदी के कार्यकाल में दूसरी बार हुआ है, जब उनके किसी मंत्री को अपराध में संलिप्तता के चलते अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी है. इससे पहले मोदी की सरकार में महिला और बाल विकास मंत्री माया कोडनानी को भी 2002 के गुजरात दंगों के दौरान हत्या के एक मामले में संलिप्तता के चलते अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी थी.</p>
<p style="text-align: justify;">अब शाह की नियति भी उसी तरह लिखी जा रही है. अपने पद से इस्तीफा देने से चंद घंटे पहले तक भी शाह को उम्मीद थी कि सीबीआई उन तक नहीं पहुंच पाएगी. इसी मुगालते में उन्होंने यह बयान भी दे दिया था कि कांग्रेस द्वारा उनके राजनीतिक एनकाउंटर की कोशिश की जा रही है. लेकिन चंद घंटों बाद ही दूरदृष्टि रखने वाले शाह का आकलन गलत साबित हो गया, जब उन्हें भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की ओर से इस्तीफा देने के निर्देश दे दिए गए. शाह की नियति से ज्यादा फिक्र भाजपा को गुजरात में अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर है. उसे पता है कि अगर वह शाह के पक्ष में खड़ी होती है, तो आगामी चुनावों में इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है. इसीलिए शाह को अकेला छोड़ दिया गया. अपने राजनीतिक करियर में चैबीसों घंटे भगवा पार्टी की बेहतरी की सोचने वाले शाह यकीनन अपने और पार्टी के रिश्तों की प्रगाढ़ता का अंदाजा लगाने में भी गलत साबित हुए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>एकछत्र शासन का घोषणापत्र- 35</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Jul 2010 14:43:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयदीप शेखर</dc:creator>
				<category><![CDATA[संसद मार्ग]]></category>

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		<description><![CDATA[35. यौन अपराध 35.1          यौन अपराध- खासकर बलात्कार- के मामले बंद अदालतों में चलाये जायेंगे। 35.2          इन अदालतों में &#8216;ज्यूरी&#8217; का होना अनिवार्य होगा, जिसमें सामाजिक कार्यकर्त्ता, मनोविज्ञानी, पुलिस अधिकारी,... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/26/%e0%a4%98%e0%a5%8b%e0%a4%b7%e0%a4%a3%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-35/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><em><span style="color: #0000ff;">35. यौन अपराध</span></em></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-full wp-image-5274" title="sex crime" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/sex-crime.jpg" alt="" width="310" height="240" />35.1          यौन अपराध- खासकर बलात्कार- के मामले बंद अदालतों में चलाये जायेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">35.2          इन अदालतों में &#8216;ज्यूरी&#8217; का होना अनिवार्य होगा, जिसमें सामाजिक कार्यकर्त्ता, मनोविज्ञानी, पुलिस अधिकारी, वकील, डॉक्टर तथा पत्रकार के रूप में छह महिला और छह पुरूष सदस्य होंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">35.3          अदालत में पीड़िता स्त्री द्वारा एक बार अपराध में अपनी &#8216;असहमति&#8217; या अपने समर्पण को किसी किस्म की &#8216;मजबूरी&#8217; बताये जाने के बाद इसे ग़लत साबित करने के लिए बहस नही की जायेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">35.4          वास्तव में, अपनी पत्नी तथा &#8216;नगरवधू&#8217; (25.3) के अलावे किसी और के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने या ऐसी कोशिश करने को ही इस देश में दण्डनीय अपराध माना जाएगा- नाबालिगों के मामले में यह &#8216;काल कोठरी&#8217; में डाल दिए जाने लायक अपराध होगा। (&#8216;काल कोठरी&#8217;, यानि अन्तिम साँस तक जहाँ सूर्य के दर्शन नही होंगे।)</p>
<p style="text-align: justify;">35.5          स्त्री द्वारा अपनी सहमती या समर्पण की बात स्वीकार करने पर यह &#8216;बलात्कार&#8217; नही, बल्कि &#8216;अनैतिक सम्बन्ध&#8217; का मामला बन जाएगा; और स्त्री-पुरूष दोनों को चेतावनी, जुर्माने से लेकर कारावास तक की सजा दी जा सकेगी। (जाहिर है कि किसी &#8216;तीसरे पक्ष&#8217; द्वारा शिकायत दर्ज कराने के बाद ही &#8216;अनैतिक सम्बन्ध&#8217; के मामले अदालतों तक आ पाएंगे।)</p>
<p style="text-align: justify;">35.6          बलात्कार के प्रत्येक मामले में बलात्कारी को जेल की सजा तो मिलेगी ही; इसके अलावे, &#8220;स्त्री-हारमोन&#8221; का इंजेक्शन लगाकर उसका लिंग-परिवर्तन किया जाय या नही- इसके लिए जनमत सर्वेक्षण कराया जाएगा और उसी अनुरूप कारवाई की जायेगी।</p>
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		<title>महंगाई जैसे कई मुद्दों पर गरजेगा मानसून सत्र</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Jul 2010 08:55:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रोहित गुप्ता</dc:creator>
				<category><![CDATA[संसद मार्ग]]></category>

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		<description><![CDATA[संसद के आज से शुरू हो रहे मानसून सत्र में आतंकवाद, माओवादी हिंसा, गुजरात से जुड़े घटनाक्रम जैसे विषयों से ऊपर ‘महंगाई’ मुख्य मुद्दा रहेगा। महंगाई पर विपक्ष ने कार्यस्थगन... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/26/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%88-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-5259" title="parliament-house-443_m" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/parliament-house-443_m-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" />संसद के आज से शुरू हो रहे मानसून सत्र में आतंकवाद, माओवादी हिंसा, गुजरात से जुड़े घटनाक्रम जैसे विषयों से ऊपर ‘महंगाई’ मुख्य मुद्दा रहेगा। महंगाई पर विपक्ष ने कार्यस्थगन प्रस्ताव लाने का फैसला किया है। मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी सीबीआई के दुरूपयोग का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाएगी। इसके साथ ही यूनियन कार्बाइड के पूर्व प्रमुख एंडरसन को देश से निकल भागने का मौका देने तथा पीड़ितों को उचित मुआवजा दिए जाने समेत कई अन्य मुद्दों पर भी सरकार को घेरने की पूरी तैयारी कर चुका है। किन्तु भाकपा के वरिष्ठ नेता गुरदास दासगुप्ता ने कहा, ‘‘असली मुद्दा महंगाई है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">संसद के मानसून सत्र की पूर्वसंध्या पर लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक के बाद यह बात साफ है कि संसद के सत्र में महंगाई के मुद्दे को प्रमुखता से उठाने पर सभी विपक्षी दलों में एकराय हैं। यही नहीं इसमें सत्तापक्ष के कुछ दल भी शामिल हैं। बैठक के बाद सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने कहा कि महंगाई का मुद्दा सबसे बड़ा मुद्दा है और इसे सदन में उठाया जाएगा। महंगाई के मुद्दे पर कार्य स्थगन प्रस्ताव के जरिए संसद में चर्चा कराने की रविवार को विपक्ष द्वारा पूरी एकजुटता दर्शाते हुए की गई घोषणा के मद्देनजर संसद के शुरू हो रहे मॉनसून सत्र के काफी हंगामेदार रहने की आशंका है।</p>
<p style="text-align: justify;">भाजपा ने सरकार से टकराव होने के सभी संकेत दिए हैं और आशंका है कि मुख्य विपक्षी दल सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में गुजरात के एक मंत्री के खिलाफ सीबीआई के आरोपपत्र के मुद्दे पर दोनों सदनों को नहीं चलने देगा।</p>
<p style="text-align: justify;">महंगाई, पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में वृद्धि, एक के बाद एक होती रेल दुर्घटनाएं और माओवादी विरोधी रणनीति जैसे मुद्दों ने भी विपक्ष को सरकार को घेरने के लिए पर्याप्त हथियार दे दिए हैं। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद तथा शरद यादव की यादव तिकड़ी विधेयक का मौजूदा स्वरूप में कड़ा विरोध कर रही है तथा अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के लिए आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान किए जाने की मांग पर अड़ी है। संसद का यह सत्र 26 जुलाई से 27 अगस्त तक चलेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">
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