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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; दिल्ली -एनसीआर</title>
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	<description>राज-समाज और जन की आवाज</description>
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		<title>NGO माफियाओं का अड्डा बना कंस्टिट्यूशन क्लब</title>
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		<pubDate>Fri, 27 Nov 2009 12:57:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>नरेन्द्र निर्मल</dc:creator>
				<category><![CDATA[दिल्ली -एनसीआर]]></category>
		<category><![CDATA[NGO in india]]></category>
		<category><![CDATA[अफसरशाहों]]></category>
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		<category><![CDATA[स्वयंसेवी संस्था]]></category>

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		<description><![CDATA[स्वयंसेवी संस्था जिसके नाम से ही प्रतीत होता है कि यह संस्था गरीबो, लाचारों, असहाय लोगों की मदद पहुचाती होगी। सरकार भी अफसरशाहों और नौकरशाहों के रवैये से इस कदर... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2009/11/27/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%af%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ac/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/ngo.jpg"><img alt="ngo" class="aligncenter size-medium wp-image-1181" height="300" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/ngo-300x300.jpg" title="ngo" width="300" /></a> स्वयंसेवी संस्था जिसके नाम से ही<span style="font-size: 12px;"> <span lang="HI" style="font-family: Mangal;">प्रतीत </span></span>होता है कि यह संस्था गरीबो, लाचारों, असहाय लोगों की मदद पहुचाती होगी। सरकार भी अफसरशाहों और नौकरशाहों के रवैये से इस कदर परेशान है कि आने वाले कुछ वर्षों में अपने सारे सहायतार्थ योजनाएं को स्वयंसेवी संस्थाओं को देने पर विचार कर रही है। इन्ही हालातों को देखकर भारत में स्वयं सेवी संस्थाओं का निर्माण धड़ल्ले से हो रहा है। लेकिन सच तो यह है कि आज देश में संस्थाओं का निर्माण लोक हितों को ध्यान में रखकर नहीं किया जा रहा है। बल्कि निज स्वार्थों को साधने और धनोपार्जन करने के उद्देश्य से बनाए जाते है। <br />
	देश में लगभग हजारों संस्थाए है, जिसमें ज्यादातर हाथी के दांत हीं हैं और इस रैकेट में न केवल छोटी संस्थाए है बल्कि बड़ी संस्थाए भी&nbsp; शामिल है। बाहर से कुछ और अन्दर कुछ और । अपनी राजनीतिक गलियारों और सरकारी तंत्र में पहुंच बनाकर बड़े-बड़े कार्यक्रमों का आयोजन कर सामाजिक, सांस्कृतिक और रचनात्मक भूमिका समाज में बढ़ाने के नाम पर लाखोंलाख की धनराशि का बंटाधार कर देते है। हांलाकि, इन कार्यक्रमों से न तो असहायों को मदद पहंच पाती है । ना ही सामर्थ लोगों में वह उत्साह जगा पाती है जिससे वे असहाय और कमजोर लोगों को मदद पहुंचा सके। लेकिन ये संस्थाए अवश्य ऐसे समृद्ध लोगों अर्थात धनाड्य लोगों को मदद पहुचाती है जो येन-केन-प्रकारेन कमाए गये अपने काले धन को अपनी तिजोरियां या घर की चार दिवारी में छुपा सकें। <br />
	कई लोग तो ऐसे है जो संस्था का निर्माण केवल अपनी राजनीतिक पहुच बनाने के लिए करते है। ऐसी संस्थाओं के कार्यालय ज्यादातर उनके घर पर होते है और संस्थाओं में काम करने वाले लोग परिवार जन। कुछ संस्थाए तो ऐसी होती है जो केवल जयंतियाँ और श्रद्घांजलि&nbsp; समारोह मनाने में माहिर होती है। प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार हो उनके दिवंगत हो चुके प्रमुख लोगों के जयंतियाँ और श्रद्घांजलि कार्यक्रमों का वे अक्सर आयोजन करते रहते है। विडम्बना यह भी है ऐसे कार्यक्रमों के लिए उन्हे फंड भी आसानी से उपलब्ध हो जाते है। हाँ थोड़ी बहुत उन्हें राजनेताओं के तलवे चांटने होते है। <br />
	<a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/constitution-club.jpg"><img alt="constitution club" class="aligncenter size-medium wp-image-1182" height="225" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/constitution-club-300x225.jpg" title="constitution club" width="300" /></a> कंस्टिट्यूशन&nbsp; क्लब ऐसी ही स्वयंसेवी संस्थाओं के दलालों का गढ़ बनता जा रहा है। जहां बैठने वाला हर छोटा बड़ा शक्स किसी न किसी संस्था का अध्यक्ष या सचिव होता है। कंस्टिट्यूशन क्लब नेताओं और दलालों का हब सेंटर के रूप में उभरता जा रहा है। जहां राजनैतिक सौदेबाजी और सरकारी नौकरशाह अक्सर दलालों से बड़े साठ-गाँठ में लगे रहते है। इस सांठगाठ में ऐसे पत्रकार भी शामिल है जो पत्र-अकारिता में ज्यादा विश्वास करते है। <br />
	कंस्टिट्यूशन क्लब में जितने भी कार्यक्रम में मैंने उपस्थिति दर्ज कराई उसमें ज्यादातर कार्यक्रम नेहरू परिवार से जुड़े दिखाई दिए। वह फिर चाहे इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, जवाहरलाल नेहरू की जयन्ती समारोह हो या फिर श्रद्घांजलि समारोह। इसके अलावा अगर कोई अवॉर्ड फंक्शन भी होता है तो उस फंक्शन के नाम के आगे इंदिरा गांधी या राजीव गांधी अवश्य लगा दिया जाता हैं। इससे एक बात तो साफ है कि इन नामों के लगने और एक कांग्रेसी नेता की पैरवी से ऐसी संस्थाओं को कार्यक्रमों के लिए लाखों रूपय आसानी से मिल जाते है। वहीं देश के अन्य क्रांतिकारियों और देश भक्तों के नाम से कार्यक्रमों का आयोजनों के लिए न तो कारपोरेट जगत ही उन्हें मदद करते है और ना ही सरकारी निगम। <br />
	दरअसल स्वयं सेवी संस्थाओं का एक मात्र काम होना चाहिए कि वह असहाय, निर्बल, असमर्थ, विकलांग, मजबूर लोगों के अलावा लावारिश जीव-जन्तुओं की मदद का कार्यक्रम चलाए। जिस तरह बढती आबादी के जंगलों की सफायें का कार्यक्रम चलाया जा रहा है जिससे जंगली जीव-जन्तु के जीवन पर जो खतरा मंडरा रहा है इससे पृथ्वी का संतुलन और जीवन चक्र भी खासा प्रभावित हो रहा है। उसे भी बचाने की जिम्मेवारी इन स्वयंसेवी संस्थाओं की होनी चाहिए। क्योंकि पूंजीपति वर्ग केवल लाभ चाहता है और इसके लिए वह किसी भी हद तक गिरने से कतराता नहीं है। और नेताओं और पूंजीपतियों की मिलीभगत किसी से छुपी भी नहीं है। संस्थाओं को लेकिन इसके लिए संस्था के नेता को राजनेता से साठ-गांठ कम आम जनता से जुड़कर कुछ नया प्रयास करने की जरूरत है। <br />
	इसलिए सरकार को चाहिए की संस्थाओं के निर्माण की रूपरेखा में बदलाव के साथ इस पर नियंत्रण स्थापित करने की जरूरत है और इसके लिए सरकार से ज्यादा आम जनता को संस्थाओं के रवैये को समझने और उसपर पैनी निगाह रखने की जरूरत है क्योंकि आने वाले दिनों में जब सरकार अपने कामकाजी भार कम करने के लिए स्वयं सेवी संस्थाओं पर आत्म निर्भर करने लगेगी तो ऐसे में जनता के मौलिक अधिकारों की जवाबदेही सरकार से कम इन स्वयं सेवी संस्थाओं से लेनी पड़ सकती है।</p>
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		<title>ब्लूलाइन के बाद अब डीटीसी का कहर</title>
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		<pubDate>Fri, 06 Nov 2009 12:16:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उमेश  पंत</dc:creator>
				<category><![CDATA[दिल्ली -एनसीआर]]></category>

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		<description><![CDATA[दिल्ली की बसों में एक और बड़ा दर्दनाक वाकया हुआ। बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस हादसे में 3 रुपये की टिकट नहीं रही । दिल्ली... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2009/11/06/%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%82%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%85%e0%a4%ac-%e0%a4%a1%e0%a5%80%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a5%80/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">दिल्ली की बसों में एक और बड़ा दर्दनाक वाकया हुआ। बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस हादसे में 3 रुपये की टिकट नहीं रही । दिल्ली में बसों के किराये बढ़ गये। पांच का टिकट दस का हो गया और दस का पन्द्रह में बदल गया। सात की बिसात भी अब नहीं रही। इस घटना का सीधा असर यहां ब्लाग पढ़ रहे आप हम लोगों में से बहुत कम पर होगा। हमें शायद ये घटना बहुत दर्दनाक&nbsp; ना लगे। पर बस में चढ़ने वाला एक बड़ा तबका दिल्ली में मजदूरी कर रहे लोगों का है। वो लोग जिनके गन्दे से कपड़ों से जब बदबू आ रही होती है तो कुछ नाकें अपना मुंह सिकोड़ लेती हैं। जिनको बस का कन्डक्टर हिकारत भरी नजरों से <a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/dtc-249x189.jpg"><img alt="dtc-249x189" class="aligncenter size-full wp-image-1083" height="189" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/dtc-249x189.jpg" title="dtc-249x189" width="249" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">देख आगे बढ़ जाने का डांटता हुआ सा आदेश दे देता है। और जो पांच की जगह तीन रुपये की टिकट में अपना काम चला रहे होते हैं क्योंकि ऐसा करके वो अपने किसी छोटे से बच्चे की किताबों या कपड़ों की संख्या में थोड़ा इजाफा कर लेने के सपने देख रहे होते हैं। पर शीला आंटी की सरकार ने बसों का किराया बढ़ाकर तीन रुपये के टिकट की मौत की घोश्णा कर दी। और इस तरह के कई मजदूरों की रोजी रोटी का एक बड़ा हिस्सा छीन लिया। कई किताबों कई कपड़ों के सपने जमीदोज हो गये। और ये इसलिये हुआ कि शीला आंटी की सरकार चाहती है कि कौमनवेल्थ खेलों में हमारी बसें चकाचक दिखें। उन्होंने घोषणा की है कि हर बस पर बीस हजार रुपल्ली का खर्चा किया जायेगा। उसे सजाने सवारने के खातिर। बस में सफर करने वाला वो मजदूर सकते में है। उसे कुछ कहते नहीं बन रहा। उसकी कमाई उसका मेहनताना जस का तस है। टिकट बढ़ गया। उसे रोज जाना आना है अपनी फैक्टी, अपने आफिस, अपनी जेल में। वह कैसे आ जा पायेगा शीला आंटी की सरकार की फिक्र से ये बात परे है। केवल किराये ही बढ़ाये होते तो बात और थी होलाकि तब भी जायज नहीं थी, पर जुल्म की इन्तहां और भी है। टिकट की दूरी की मियाद भी कम कर दी गई है। माने ये कि अब तीन किलोमीटर पर पांच रुपये की टिकट देनी होगी। जबकि पहले चार किलोमीटर पर तीन की टिकट थी। पिचहत्तर रुपये के स्टूडेन्ट पास को सीधे चार सौ रुपये पर पहुंचा दिया है। खैर डीटीसी तो इस फैसले से अपनी खूब कमाई कर ही लेगी। बावजूद इसके कि आम मजदूर वर्ग जिसकी कमाई महीने के कुछ हजारों में है उसके महीने का आने जाने का खर्च हजारों में पहुच जायेगा और इन कुछ हजारों में से कुछ और कट जायेंगे, कुछ कपड़े लत्ते, कुछ किताबें, खाने की कुछ चीजें भी। क्योंकि इसका कोई विकल्प नहीं है सिवाय पैदल चलने के। जो दिल्ली जैसे दूरियों वाले शहर में नामुमकिन है। <br />
	इस लेख को पढ़कर कोई सोच सकता है कि कैसी पांच दस रुपयों की टुच्ची अदनी सी बात पर बहस खड़ी की जा रही है पर ये दिल्ली के उस तबके की दिल्ली सरकार को आह है जिसके लिये ये टुच्ची सी बात बड़ी अहमियत रखती है। वो वर्ग सचमुच परेशान है। आप बस में सफर कीजिये तो आप आह भरे उन शब्दों को सुन पाएंगे। ब्लू लाईन कन्डक्टर्स जैसे अचानक से मालिकाना अन्दाज में आ गये हैं। ये वर्ग चैंकता हुआ कहता है क्या बात कर रहे हो हम तो हमेशा पांच रुपये देते थे दस कहां से हो गया। कन्डक्टर बड़े रौब में आकर कह देता है चल भई उतर ले और दिल्ली सरकार से पूछ के आ। उपर से और्डर हैं। कुछ उतर ही जाते हैं और कुछ मरे मन से दस का नोट कन्डक्टर की तरफ बढ़ा देते हैं। ये उपर से और्डर होने की कहानी होने का एन्टी क्लाईमेक्स हमारे देश में अक्सर दुखान्त ही होता है। पर तीन के टिकट की ये मौत आजकल निम्न वर्गीय चेहरे की सिकन में बसों से चढ़ते उतरते देखने को मिल रही है। उनकी फुसफुसाहट में छुपी मजबूरियों को सुनने वाला यहां कोई नहीं है। उन्हें कहने का हक किसी ने दिया नहीं है। कहने को ये शहर दिल्ली है सियासत का केन्द्र पर इस दिल्ली में सियासत किस चालाकी से निम्नवर्ग का गला गला घैंाटे जा रही है तीन के टिकट की मौत <a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/dtc+bus.jpg"><img alt="dtc+bus" class="aligncenter size-medium wp-image-1084" height="202" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/dtc+bus-300x202.jpg" title="dtc+bus" width="300" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">इसकी बानगी है। शीला आंटी या उनके नीतिकारों तक ये बात पहुचनी ही चाहिये कि पीएसयू का दस प्रतिशत सो कौल्ड आम आदमी को दे देने के फैसले से आम आदमी को खुश करने की गलतफहमी में न रहें। क्योंकि आम आदमी का स्तर इस देश में अभी और नीचे है जो फलाईओवरों के नीचे या यमुना किनारे बनी झुग्गियों में रह रहा है। जहां तक भले ही लालबत्ती की गाड़ियों से झांकने पर नजर ना जाती हो पर चुनावों में वोट वहां से भी आते हैं। वो अनाम सा रहने वाला आम आदमी जो दिल्ली की काया पलटने में गजब की भूमिका निभा रहा है उसके लिये तीन के टिकट की मौत बड़ी खबर है बावजूद इसके कि उस खबर की इतनी औकात नहीं है कि वो ब्रेकिंग न्यूज बन सके।</p>
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