Archive for category: विविध

“बहन “जी के “भाई” जी

3 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/05 10:38 pm

“चढ़ गुंडों की छाती पर, मोहर लगाओ हाथी पर ” जी हाँ ये वक्तव्य थे किसी दौर में उत्तर प्रदेश में अपराधियों के ख़िलाफ़ जमकर अभियान चलाने वाली बहुजन समाज

मानसिक गुलामी (भाग-१)

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/05/05 8:43 pm

कांग्रेस और कांग्रेसी नेताओं का स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व व पश्चात् का अतीत यही प्रर्दशित करता है कि उनको भारतीय लोगों और भारतीय विरासत में विश्वास के अभाव का रोग

"कबीरा " का आमंत्रण … जरूर पढ़े

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/04/28 11:29 pm

कबीरा शब्द अपने आप में एक व्यापक अर्थ समेटे हुए है । मेरे ब्लॉग का नाम कबीरा खड़ा बाज़ार में रखने के पिछे एक बड़ा उद्देश्य है। “कबीर ” मात्र

सब ताज उछाले जायेंगे

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/04/26 8:50 am

जब जुल्मो-सितम के कोहे-गरां रुई की तरह उड़ जायेंगे हम महकूमों के पांव तले ये धरती धड़ -धड़ धड़केगी और अहले -हकम के सर ऊपर जब बिजली कड़ -कड़ कड़केगी

रुदालियों के माफिक रोना छोड़ो भाई ….

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/02/08 7:23 pm

लोग देश के पिछड़ेपन पर इस प्रकार रोते हैं जैसे दूसरो की मैय्यत पर रुदालियाँ । हर छोटी- बड़ी कुव्यवस्था के लिए सिस्टम (व्यवस्था ) को जी भर गालियाँ सुना

‘बिहारी’ संबोधन या उपहास ?

5 जनोक्ति डेस्क / 2009/02/05 8:20 pm

#क्यूँ हो गर्व बिहारी होने पर ?* बिहारी होने पर अभिमान करने के अनगिनत कारक हमारे अतीत और वर्तमान से जुड़े हैं । उनका क्षेत्र इतना व्यापक है कि उसे

सुनिए तो जरा, माननीय गृह मंत्री की दिखावटी दहाड़ …………… …

3 जनोक्ति डेस्क / 2009/02/03 7:17 pm

नई दिल्ली , 12 जनवरी ।गृहमंत्री श्री पी चिदंबरम ने देश में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने के संकेत दिए हैं। उन्होंने देश में

भविष्य की कृषि खतरे में …..

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/01/29 4:37 pm

सभ्यता के आरभ से ही ” कृषि ” मानव की तीन जीवनदायनी आधारभूत आवश्यकताओं में से एक -भोजन की आपूर्ति के लिए अपरिहार्य बना हुआ है । कृषि के अलावा

बाप के बाद बेटा फ़िर पोता ……………………………….

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/01/27 10:39 pm

लोकतंत्र मूर्खों का शासन होता है पर, यहाँ तो मूर्खों ने लोकतंत्र को हीं राजशाही की ओर ठेल दिया है। राजतन्त्र नहीं तो और क्या है ? गाँधी, सिंधिया, पायलट,

वर्तमान आर्थिक संकट अथवा सांस्कृतिक घुसपैठ …

3 जयराम "विप्लव" / 2009/01/13 8:47 pm

शीर्षक पढ़कर अजीब लग रहा हैं न !आप सोच रहे होंगे कि आर्थिक जगत की बातों का संस्कृति से क्या सम्बन्ध ? सच तो यही हैं कि भारतीय बाजार की