जल ही जीवन है ………
0जल ही जीवन है। परन्तु सबके लिये। इसमें अमीर गरीब का भेदभाव बर्दाशत नहीं किया जा सकता। शहरी उपभोगतावादी संस्कृति में यह आम बात है कि कहीं ‘वाटर पार्क’ में मस्ती चल
जंगलों में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और लगातार बढ़ती जनसंख्या के अलावा बड़े पैमाने पर लग रहे उद्योगों से छत्तीसगढ़ का पर्यावरण असंतुलित होने लगा है। उद्योगों के कारण उपजाऊ भूमि सिमट रही है,
यह कहानी है देश के राष्ट्रीय पशु बाघ की। यह कहानी है बाघ की उस दहाड़ की, जो पर्यावरण संतुलन के लिए बेहद जरूरी है। लेकिन यह दहाड़ अब रोमांचित
जीवनदायिनी यमुना 1670 किलोमीटर का विस्तार लिए यमुना नदी भारत में गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है | पौराणिक कथाओं के अनुसार यमुना जी पवित्रतम नदी होने के साथ-साथ
जल ही जीवन है। परन्तु सबके लिये। इसमें अमीर गरीब का भेदभाव बर्दाशत नहीं किया जा सकता। शहरी उपभोगतावादी संस्कृति में यह आम बात है कि कहीं ‘वाटर पार्क’ में मस्ती चल
देश भर में गर्मी विकराल रूप लेता जा रहा है। इस वर्ष भी बारिश के सही से न होने पर पूरे देश में पानी के लिए हहाकार सा है। कई
सवेरा अब होने को है बस चंद पलो का इंतजार है सूरज की लाल किरनें जब धरा पर उतरेंगी प्रभात की बेला में हर ओर मेला सा लग जाएगा पेड़-पौधे
शिरीष खरे पोरबंदर/ एशियाई शेरों के सुरक्षित घर कहे जाने वाले गिर अभयारण्य में बरसों पहले मालधारियों का भी घर था. ‘माल’ यानी संपति यानी पशुधन और ‘धारी’ का मतलब
साभार : इंडिया वाटर पोर्टल लेखक : शिरीष खरे सर्वविदित है कि सरदार सरोवर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध है, जो 800 मीटर नदी में बनी महत्वाकांक्षी सरकारी परियोजना
उफ़ … ये गरमी , आग उगलता सूरज रोज़ बढता पारा और मुश्किल होता जीना घर से बाहर जाए तो जाए कैसे । अभी कुछ दिन पहले की ही तो
“डा ० अतुल कुमार” जी, हाँ! हैरत की बात नहीं। पर्यावरण मंत्रालय की के पीआईबी बेब (पीआई.एनआईसी.आईएन) पर प्रस्तुत लेख ‘भारत में यूकेलिप्टस वृक्षों के बाग तैयार करना’ में सूचना
इन दिनों भारतीय टेलीविजन के लगभग सभी खबरियां और मनोरंजक चैनलों पर देश में बाघों की संख्या से जुड़ा एक बहुत ही संवेदनशील संदेश दर्शकों को अपनी ओर खींच रहा
बाघ अब नहीं जीते। सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो 2015 तक ये चर्चा हम आप कर रहे होंगे। ऐसा वन्य जीव विशेषज्ञों का मानना है। आज कौन मानेगा
जो भूमि केवल वर्षा के पानी से ही सींची जाती है और जहां वर्षा के आधार पर ही खेती हुआ करती है , उस भूमि को ‘देव मातृक’ कहते है,