Archive for category: प्रकृति

जल ही जीवन है ………

जल ही जीवन है ………

0 जनोक्ति डेस्क / 2010/07/04 5:28 pm

जल ही जीवन है। परन्तु सबके लिये। इसमें अमीर गरीब का भेदभाव बर्दाशत नहीं किया जा सकता। शहरी उपभोगतावादी संस्कृति में यह आम बात है कि कहीं ‘वाटर पार्क’ में मस्ती चल

लकड़ी और लोहे का विकल्प पौलीवूड स्लीपर

लकड़ी और लोहे का विकल्प पौलीवूड स्लीपर

1 नरेन्द्र निर्मल / 2010/06/05 12:39 pm

देश भर में गर्मी विकराल रूप लेता जा रहा है। इस वर्ष भी बारिश के सही से न होने पर पूरे देश में पानी के लिए हहाकार सा है। कई

जहर उगलती इंसानी मशीने और पर्यावरण विनाश

जहर उगलती इंसानी मशीने और पर्यावरण विनाश

0 नरेन्द्र निर्मल / 2010/06/05 11:38 am

सवेरा अब होने को है बस चंद पलो का इंतजार है सूरज की लाल किरनें जब धरा पर उतरेंगी प्रभात की बेला में हर ओर मेला सा लग जाएगा पेड़-पौधे

विलुप्तप्राय की श्रेणी में पर्णपाती जंगल

विलुप्तप्राय की श्रेणी में पर्णपाती जंगल

0 जनोक्ति डेस्क / 2010/06/01 9:16 pm

शिरीष खरे पोरबंदर/ एशियाई शेरों के सुरक्षित घर कहे जाने वाले गिर अभयारण्य में बरसों पहले मालधारियों का भी घर था. ‘माल’ यानी संपति यानी पशुधन और ‘धारी’ का मतलब

सरदार सरोवर परियोजना का सबक

सरदार सरोवर परियोजना का सबक

0 जनोक्ति डेस्क / 2010/04/14 9:44 am

साभार : इंडिया वाटर पोर्टल लेखक : शिरीष खरे सर्वविदित है कि सरदार सरोवर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध है, जो 800 मीटर नदी में बनी  महत्वाकांक्षी सरकारी परियोजना

क़यामत आने वाली है

क़यामत आने वाली है

0 कैसर कुरैशी / 2010/03/25 10:57 pm

उफ़ … ये गरमी , आग उगलता सूरज रोज़ बढता पारा और मुश्किल होता जीना घर से बाहर जाए तो जाए कैसे । अभी कुछ दिन पहले की ही तो

हिन्दुस्तान बनेगा  रेगिस्तान ?

हिन्दुस्तान बनेगा रेगिस्तान ?

0 जनोक्ति डेस्क / 2010/03/19 5:25 pm

“डा ० अतुल कुमार” जी, हाँ! हैरत की बात नहीं। पर्यावरण मंत्रालय की के पीआईबी बेब (पीआई.एनआईसी.आईएन) पर प्रस्तुत लेख ‘भारत में यूकेलिप्टस वृक्षों के बाग तैयार करना’ में सूचना

आओं, बाघ बचाएं

आओं, बाघ बचाएं

0 पुष्पेन्द्र आल्बे / 2010/03/16 9:04 am

इन दिनों भारतीय टेलीविजन के लगभग सभी खबरियां और मनोरंजक चैनलों पर देश में बाघों की संख्या से जुड़ा एक बहुत ही संवेदनशील संदेश दर्शकों को अपनी ओर खींच रहा

कभी बाघ भी हुआ करते थे !

कभी बाघ भी हुआ करते थे !

1 उमेश पंत / 2010/02/19 9:29 am

बाघ अब नहीं जीते। सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो 2015 तक ये चर्चा हम आप कर रहे होंगे। ऐसा वन्य जीव विशेषज्ञों का मानना है। आज कौन मानेगा

सरिता संगम-संस्कृति

सरिता संगम-संस्कृति

0 जनोक्ति डेस्क / 2010/01/28 4:32 pm

जो भूमि केवल वर्षा के पानी से ही सींची जाती है और जहां वर्षा के आधार पर ही खेती हुआ करती है , उस भूमि को ‘देव मातृक’ कहते है,