जीडीपी में कृषि घटता हिस्सा,कहाँ हैं पीएम का अर्थशास्त्र ?
1GDP में कृषि की घटती हिस्सेदारी 1946-47 में 51 % 1960-61 में 47.6 % 1990-91 में 29.5% 2000-01 में 22.3 % 2010-11 में 14.6% सकल घरेलु उत्पाद ( GDP )
देश में मँहगाई बढ रही है , लोगों का जीना मुश्किल हो गया है , इस तरह की उक्ति हम आये दिन सुनते रहते है | संसद के हर सत्र
भारत एक कृषि प्रधान देश है| भारत की बहुसंख्यक आबादी कृषि से ही जुडी है| आज भी भारत की बहुसंख्यक आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भारत रूप से ग्रामीण जीवन से
बजट 2011- 12 में सरकार ने कृषि ऋण का लक्ष्य 4.75 लाख करोड़ रखा है। यह पिछले साल के मुकाबले 1 लाख करोड़ ज्यादा है। ऋण खेती की एक बुनियादी
GDP में कृषि की घटती हिस्सेदारी 1946-47 में 51 % 1960-61 में 47.6 % 1990-91 में 29.5% 2000-01 में 22.3 % 2010-11 में 14.6% सकल घरेलु उत्पाद ( GDP )
देश में मँहगाई बढ रही है , लोगों का जीना मुश्किल हो गया है , इस तरह की उक्ति हम आये दिन सुनते रहते है | संसद के हर सत्र
भारत एक कृषि प्रधान देश है| भारत की बहुसंख्यक आबादी कृषि से ही जुडी है| आज भी भारत की बहुसंख्यक आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भारत रूप से ग्रामीण जीवन से
बजट 2011- 12 में सरकार ने कृषि ऋण का लक्ष्य 4.75 लाख करोड़ रखा है। यह पिछले साल के मुकाबले 1 लाख करोड़ ज्यादा है। ऋण खेती की एक बुनियादी
भारत में कृषि की प्रधानता को इस नजरिये से देखा जा सकता है कि यहाँ की लगभग 68 फीसदी आबादी कृषि आधारित संरचना पर निर्भर रहती है , पेट भरने
जबसे उत्तर प्रदेश सरकार ने बुन्देलखण्ड राज्य के प्रस्ताव की चर्चा की है तबसे बुन्देलखण्ड के लिए संघर्ष कर रहे लोगों के साथ-साथ आम आदमी को भी इस बात का
हमको अपना सामाजिक कर्त्तव्य किस प्रकार निभाना चाहिए और हमारे सामाजिक कर्त्तव्य क्या है ?कौन सा काम किया जाय और किस प्रकार किया जाय की वो समाज के लिए सार्थक
जीवनदायिनी यमुना 1670 किलोमीटर का विस्तार लिए यमुना नदी भारत में गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है | पौराणिक कथाओं के अनुसार यमुना जी पवित्रतम नदी होने के साथ-साथ
मैं जब नन्हा-मुन्ना था तो मेरी दीदी मुझे सुलाने के लिए रोजाना एक लोरी गाती-’आ रे निंदिया निन्दरवन से,बौआ अलई नानी घर से,नानी घर बौआ कथी-कथी खाए,साठी के चूड़ा,पुरहिया गाय
खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में अब भी बड़ी संख्या में करों की उलझन बना हुआ है | खाद्य क्षेत्र में “कर ढांचे “को और अधिक तर्कसंगत बनाने की सख्त जरूरत