मित्रों,आजादी के बाद से ही सरकार घोषणाएं करती हैं,कानून भी बनती है और फिर सबकुछ भूल जाती है.वह कानून कैसे लागू होगा अथवा उसका कहाँ तक पालन हो रहा है;की बिलकुल भी चिंता नहीं की जाती.ताजा उदाहरण खुद मेरे घर से है.मेरे भांजों को जबसे जीजाजी का दिल्ली स्थानांतरण हुआ है,केंद्रीय विद्यालय में नामांकन का इंतजार है.इस बीच जीजाजी ने लगभग हरेक राजनीतिक दल का दरवाजा खटखटा,अधिकारीयों के दरों पर मत्था टेका लेकिन परिणाम कुछ भी नहीं निकला.हारकर मेरे भांजों ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री को पत्र लिखकर अपनी व्यथा-कथा से परिचित कराया.श्री कपिल सिब्बल ने पत्रोत्तर में उसे पत्र लेकर समीपस्थ केंद्रीय विद्यालय के प्राचार्य से मिलने की सलाह दी.वे दोनों उक्त पत्र को लेकर प्राचार्य से मिले भी परन्तु उन्हें एक बार फिर से टका-सा जवाब मिला.प्राचार्य महोदय ने ऐंठते हुए साफ़ तौर पर कहा कि वो किसी भी कीमत पर नामांकन नहीं लेंगे.यह स्थिति भारत की राजधानी दिल्ली के एक सरकारी स्कूल की है और तब है जब पूरे भारत में १४ साल से कम उम्र के बच्चों को शिक्षा का अधिकार प्राप्त है.अंततः निराशा ने वेदना को जन्म दिया और वेदना ने शब्दों का रूप धर लिया.तब जन्म हुआ एक नए ब्लॉग का और एक नन्हे मासूम ब्लॉगर का.ब्लॉग का नाम है सच्चाई और पता है-http://www.sachchai.blogspot.com और मेरे १३ वर्षीय ब्लॉगर भांजे का नाम है कौशिक राज.यहाँ मैं उसके पहले ब्लॉगपोस्ट जिसमें उसने अपनी व्यथा का वर्णन किया है प्रस्तुत कर रहा हूँ-
भाई साहब…
आपके भांजे का ब्लॉग देखा, और उसका फोटो भी…
अब ये बताइये कि आपके भांजे की 13 वर्ष की उम्र में ही मूँछें आ गईं… वो भी एक 16 – 17 साल के लड़के की तरह ?
आश्चर्य है
भाई साहब…
आपके भांजे का ब्लॉग देखा, और उसका फोटो भी…
अब ये बताइये कि आपके भांजे की 13 वर्ष की उम्र में ही मूँछें आ गईं… वो भी एक 16 – 17 साल के लड़के की तरह ?
आश्चर्य है,,, ?
कुछ तो गड़बड़ है जी…
बेचारे का उसके साथी इस बात के लिए मजाक उड़ाते ही हैं अब आप भी उनलोगों में शामिल हो गए?कोई हार्मोनल गड़बड़ी है शायद.