पहले नारद, फिर ब्लागवाणी और अब चिट्ठाजगत भी बन्द हो गया (यदि यह तात्कालिक तौर पर आई हुई कमी के कारण नहीं है तो). दर-असल यह एग्रीगेटर काफी अच्छे ढंग से काम कर रहे थे. इधर आपने लेख को प्रकाशित किया उधर एग्रीगेटर ने आपके चाहने वालों तक पहुंचाया. किस पोस्ट को कितनी बार पढ़ा गया( अर्थात हिट किया गया, फिर चाहे लिखने वाला स्वयं ही क्यों न करें {इसमें एग्रीगेटर की कोई गलती नहीं है}), किस पोस्ट पर कितनी टिप्पणी आईं (यह फिर अलग बात है कि लिखने वाला ही अलग आई-डी और नामों से ही कर रहा हो, और इसमें भी एग्रीगेटर की कोई कमी नहीं है), कितनों को पसन्द आई और कितनों को नापसन्द. सब कुछ, एक ही जगह. कुछ लोगों को आपत्तियां रहीं इनके रैंकिंग सिस्टम से, इनके सक्रियता क्रमांक वगैरा को लेकर. लेकिन मुझे कभी नहीं रही. आप कह सकते हैं कि मेरे ऊपर अंगूर खट्टे होने वाली कहावत चरितार्थ हो रही है, इसलिये मैं ऐसा लिख रहा हूं लेकिन मुझे इसमें भी कोई आपत्ति नहीं. मुझे इन एग्रीगेटरों के बन्द होने या रूठने या फिर बीमार पड़ने का निहायत अफसोस है.कारण है कि कई ब्लाग तो मैंने अपने साइड बार में लगा रखे हैं लेकिन सौ से ऊपर संख्या होने के बाद और अधिक जोड़ने से मुझे उलझन हो रही थी. लिहाजा मैंने एक छोटी सी जावा स्क्रिप्ट संशोधित की और अपने ब्लाग में नीचे की ओर लगा ली जिसके द्वारा मैं चिट्ठाजगत की फीड़ अपने ब्लाग के जरिये ही प्राप्त करता रहता था. बिना चिट्ठाजगत पर जाये ही मुझे चिट्ठाजगत पर प्रस्तुत ब्लाग की जानकारी मिल जाया करती थी. लेकिन पहले ब्लागवाणी और अब चिट्ठाजगत के बन्द होने से काफी कठिनाई होने लगी है. रफ्तार पर प्रस्तुतियों का अपडेशन उतना तेज नहीं था जितना इन दोनों एग्रीगेटरों पर था. लोगों को जो भी आपत्तियां रही हों, लेकिन इन सब के बावजूद ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत बहुत ही सुविधाजनक एग्रीगेटर थे. दोनों ही एग्रीगेटरों ने चिट्ठों के वर्गीकरण की भी सुविधा प्रदान की थी, व्यक्ति विशेष के सभी चिट्ठों को पढ़ने की, एक चिट्ठा कितने चिट्ठों में उद्धृत किया गया है, उसकी सूचना भी. और भी तमाम तरह की सूचनायें भी इन एग्रीगेटरों के माध्यम से उपलब्ध थी. अभी भी तमाम एग्रीगेटर हैं, लेकिन उतनी सूचनायें समाहित नहीं हैं जितनी इनमें थीं. चिट्ठाजगत के गिरगिट के माध्यम से एक भाषा में लिखा गया ब्लाग कई भारतीय भाषाओं में पढ़ा जा सकता था, जो वाकई एक बेहद अच्छी सुविधा थी. ब्लागवाणी में भी दो-तीन भारतीय भाषाओं के लिये यह सुविधा उपलब्ध थी.
निस्संदेह इन एग्रीगेटरों के बन्द होने से हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषा-प्रेमियों को बहुत बड़ा धक्का पहुंचा है. मैं पहले भी एक बार अपनी एक पोस्ट के माध्यम से ब्लागवाणी चालू करने के लिये विनती कर चुका हूं तथा फिर पुन: इस पोस्ट के माध्यम से करबद्ध विनती करता हूं कि नारद, ब्लागवाणी तथा चिट्ठाजगत को तकनीकी-गैर तकनीकी दिक्कतों को दूर कर दुबारा प्रारम्भ किया जाये. एग्रीगेटर स्वामियों का यह कदम हम हिन्दी प्रेमियों तथा समस्त भारतीय भाषा के प्रेमियों के लिये अनूठा तथा अनमोल उपहार होगा.

भारतीयों में एक दिक्कत हैं कि वे अपना दोष दूसरों के माथे मढते हैं। खुद अच्छा नहीं लिख रहे या खुद सक्रिय नहीं हैं लेकिन ये एग्रीकेटर उनका पूरा नहीं विशेष ध्यान रखें और उन्हें हमेशा हिट लिस्ट में दर्ज करें। ऐसा नहीं हुआ तो एग्रीकेटर को बुरा भला लिखेंगे। अब ये ही आपसे पैसा लेना प्रारम्भ कर दें तब चुपचाप रहेंगे लेकिन मुफ्त की सर्विस में अपना रौब जरूर दिखाएंगे।
मैं उपरोक्त लेख और उस पर अजित जी टिप्पणी से सहमत हूँ , मुझे इस लेख को पढ़ कर ही पता लगा कि चिट्ठा जगत भी अब नहीं दिख दिखा रहा | बड़ा अफ़सोस हुआ | मैं बहुत दिन बाद कंप्यूटर पर बैठा हूँ देश की मिटटी का लोगो भी नहीं दिख रहा | जनोक्ति को खुलने में पंद्रह मिनट हो गए और भी, ना जाने क्या-क्या हो गया है अभी भी मुझे पता लगना मुश्किल है क्योंकि अब समय बहुत कम मिल पा रहा है | वो तो “आम आदमी” का धन्यवाद है कि उनका लेख सही शीर्षक से लगा था जो मैं पढ़ने को रोक न सका ?