यूपी-बिहार|2012/02/21 5:16 pm

निवेश नहीं तो फिर किसके लिए था सम्मलेन?

bihar_globalmeet_janoktiतक़रीबन ३ करोड रूपये खर्च कर बदलते बिहार पर जिस वैश्विक सम्मलेन का आयोजन राज्य सरकार के सहयोग से हुआ, अगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की माने तो वह निवेश के लिए नहीं था। सवाल है फिर वह किसके लिए था? अख़बारों की रपटों पर भरोसा करें तो इस सम्मलेन में विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने, उनके जीवन स्तर में सुधार लाने तथा उनकी आमदनी बढ़ाने सहित समावेशी विकास के हर पहलुओं पर मंथन हुआ। समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों, उद्योगपतियों समेत इतिहास, कला-संस्कृति, रंगमंच, स्वास्थ्य, पर्यटन क्षेत्र के विशेषज्ञों का जमावड़ा विकास के रास्ते सुझाने के लिए हुआ या सरकार ने अपनी ब्रांड इमेज बनानी चाही, उद्देश्य चाहे जो भी हो आखिर इसका फायदा क्या होगा, और किसे होगा? सवाल यह भी है कि आर्थिक तंगी, बेरोजगारी, गरीबी और पिछड़ेपन से जूझ रही राज्य की जनता का पैसा पिकनिक नुमा समारोह आयोजित कर  सिर्फ़ बौद्धिक समागम पर उड़ाना कितना उचित है?

विदित हो कि बिहार सरकार के सहयोग से ‘ग्लोबल सम्मिट ऑन चेंजिंग बिहार’ नामक तीन दिवसीय वैश्विक सम्मलेन  का आयोजन किया गया था। 17-19 फरवरी तक आयोजित इस सम्मलेन का उद्घाटन नेपाल के प्रधानमंत्री बाबुराम भट्टराई ने किया था। इस सम्मलेन में भारतीय रिजर्ब बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव, योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह आहुलवालिया, मेघनाथ देसाई सहित कई देश-विदेश के शोधकर्ता व विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ मौजूद थे। इस सम्मलेन की सबसे खास बात यह थी कि इसमें किसी भी राजनीतिक पार्टी को आमंत्रित नहीं किया गया था। विपक्ष की नजर में यह सम्मलेन सीएम् का ‘रिन्यूवल ऑफ इमेज’ रहा तो सत्ता पक्ष के अनुसार सम्मलेन में आए सुझाव नीतियाँ बनाने में मार्गदर्शन करेंगे। यहाँ यह याद दिलाना भी ज़रुरी है कि आज से ठीक पाँच साल पहले इसी तरह सिर्फ़ विचार मंथन के लिए ‘ग्लोबल मीट फॉर रिसर्जेन्ट बिहार’ का आयोजन हुआ था। तर्क उस समय भी तक़रीबन यही थे, लेकिन नतीजा सिफ़र रहा। इसलिए इस सम्मलेन की समाप्ति पर सबसे  बड़ा सवाल यही उठा कि कहीं इसका हश्र भी उसी सम्मलेन की तरह तो नहीं होने जा रहा?

यह विडम्बना ही है कि आम आदमी की तरक्की की बात हमेशा वातानुकूलित कमरों और सुसज्जित महलों में हुआ करती है। दुर्भाग्य से आम आदमी का सीधा सम्बन्ध इनमे से किसी भी चीज़ से नहीं है। दुर्भाग्य से यह सवाल भी राज्य सरकार और उसके रहनुमाओं से कोई नहीं पूछ सकता कि जब सबकुछ आम आदमी की बेहतरी के लिए ही हो रहा है, तो वही आम आदमी वीआईपी के नाम पर सड़कों पर पांच घंटे जाम में क्यों फँसा रहा? गरीबों, मजदूरों के पेट पर लात मारकर कौन सा परिवर्तन राज्य सरकार लाना चाहती है यह समझ से बाहर है। तरक्की, विकास, बेहतरी और बदलाव के बीच वास्तविक हकीकत न तो तारीफ करने वालों को दिखती है न ही सरकार को। पिसता है वही आम आदमी जिसकी बेहतरी का दावा किया जाता है।

राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी गुड गवर्नेंस की बात करते हैं। जबकि इस गुड गवर्नेंस की कलई राजधानी पटना में ही खुलती दिखती है। शिक्षा, संस्कृति, समाज में महिलाओं की स्थिति इन विषयों पर सम्मलेन तो हर रोज होते हैं लेकिन इन सम्मेलनों से निकले निष्कर्ष पर वास्तविक कार्यान्वयन कभी नहीं होता। इतिहास के पन्नों को पलटिए तो यह बात स्पष्ट तौर पर सामने आती है। किसी भी चीज़ को बहुप्रचारित करने का यह मतलब कतई नहीं होता कि वह हमारे भले के लिए ही होगा। समाज में आम आदमी तक लाभ पहुँचे इसकी चिंता देश के मनीषियों ने भी की, गाँधीजी, सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, जयप्रकाशनारायण, भीमराव अम्बेडकर, राजेन्द्र प्रसाद आदि ने भी विकास का लाभ समाज के अंतिम आदमी तक पहुँचाने की बात कही, लेकिन कभी भी होटलों के सुईट में रहकर या वातानुकूलित कारों में घूमकर नहीं। मँहगे होटल, महाभोज और मनोरंजन की तमाम व्यवस्था कर ये तथाकथित आधुनिक सामाजिक हितसोचक आम आदमी की बेहतरी के लिए लंबे-लंबे वक्तव्य देते हैं तो बड़ा ही हास्यास्पद लगता है।

हमारे समाज का तानाबाना ऐसा बुना गया है जहाँ सच के लिए मुँह खोलना उसका सबसे बड़ा अपराध हो जाता है। अथितियों को देवता माननेवाला हमारा समाज अथितियों से भी ऐसी अपेक्षा नहीं रखेगा कि वह उनकी कमजोरियों और खामियों की ओर ध्यान आकृष्ट कराएँ। इस सम्मलेन में भी ऐसा ही हुआ। बिहार का भौगोलिक इतिहास जाने बिना सबने बिहार के कायापलट का रास्ता सुझा दिया।  राज्य सरकार भी अपनी तारीफ़ सुनकर फुले नहीं समा रही, लेकिन अफ़सोस की किसी ने वास्तविक स्थिति का अवलोकन नहीं किया। ज़ाहिर सी बात है अगर आप किसी को घर बुलाएँगे तो वह आपकी बुराई नहीं करेगा। वैसे ही जैसे किसी बारात में दूल्हा कितना भी खराब दिखे, घर में मौजूद महिलाएँ हमेशा यही गाती हैं ‘हमरे दूल्हा के रूप अनमोल’। विकास, तरक्की और खुशहाली के सरकारी दावों की हकीकत यही है कि न पहले से बंद पड़े उद्योग खुल रहे हैं, न नये उद्योग लगाये जा रहे हैं। शिक्षक पात्रता परीक्षा को महापरीक्षा का नाम देकर और मानवीय संवेदनाओं का हवाला देकर अयोग्य उम्मीदवारों को चयनित किया जा रहा है। प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले ही बाज़ारों में बिकने लगते हैं,  और परीक्षार्थी इसलिए निश्चिन्त है, क्योंकि  उसका सोर्स इतना बड़ा है कि वह तो शिक्षक बनकर ही रहेगा। भले ही उसे मजदूरों से भी कम वेतन क्यों न मिले।  गुड गवर्नेंस की असली तस्वीर, दरअसल यही है।

यह सम्मलेन बिहार को तरक्की के किस राह पर ले जाएगा या इसकी स्थिति भी ढाक के तीन पात वाली होगी यह तो आनेवाला वक्त बताएगा लेकिन जिस उद्देश्य से इसका आयोजन हुआ था, सिद्धांततः अगर उसे मान भी लिया जाए तो व्यवहारतः उसपर अमल होगा इसकी गारंटी कौन देगा? सवाल यह भी है कि दावे और वास्तविकता के बीच इतना बड़ा अंतर आखिर क्यों है? अदम गोंडवी साहब की पंक्ति याद आ रही हैं- तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है मगर यह आंकडे झूठे है, यह दावा किताबी है

 

 

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