यूपी-बिहार|2010/09/25 5:38 pm

राजनीति और वंशवाद

हिंदुस्तान की राजनीति ने वंशवाद को बढावा दिया है ,राजनीति को कुछ लोगो ने बपौती बना रखा है ,पिता रिटायर हूए नहीं,बेटा का करियर बनाने में जुट को जाते है राजनीति भी एक नशा है,यह अफीम के नशे की तरह है .यदि एक बार किसी को गलती से भी इसकी लत पड़ जाये तो यह कभी पीछा बही छोड़ती भारतीय राजनीति की भी यही दशा है |इतिहास पर नजर डाले तो ,अब तक राजनीतिक वंशवाद को लेकर जितनी भी खबरे आती थी वह कांग्रेस महकमे से ही आती थी ,लेकिन राजद प्रमुख अब अपने छोटे बेटे तेजस्वी को प्रशिक्षू राजनेता बता कर वंशवादी राजनीतिक गलियों की सैर करा रहे हैं |तेजस्वी बिहार विधानसभा चुनाव में अपने पिता के चुनाव को जिताने की पूरी कवायद में जुटे हूए हैं |लालू प्रसाद यादव ने पटना कार्यालय में आयोजित एक सभा में तेजस्वी को मीडिया और पार्टी कार्यकर्ताओं के सामने पेश किया ,उन्होने अपने व्यक्तव्य में यह कहा की “तेजस्वी अपनी इच्छा से राजनीति में आना चाहता है,और अपनी इच्छा से विधानसभा चुनाव के प्रचार प्रसार में उनकी और माँ राबड़ी देवी की मदद करना चाहता है |लालू ने अपने व्यक्तव्य में यह भी कहा ‘राजनितिक पृष्ठभूमि को देखते हूए लगता है की तेजस्वी बहुत आगे तक जायेगा ,यह अभी ट्रेनी नेता है |मेरा साथ रहेगा और राजनीति की एबीसी सीखेगा| लेकिन जब लालू से तेजस्वी की चुनाव लडने की संभावनाओं के बारे में पुछा जाने लगा तो लालू ने कहा की उसकी उम्र अभी चुनाव लडने की नहीं है इसका जनविवाह कर दूंगा तब यह चुनाव लडेगा |

सवाल यह उठता है की ,क्या भारतीय राजनीति वंशवाद तक ही सिमट कर रह जाएगी .कब राजनीती में नए लोगो को आने का मौका मिलेगा , तिलक, गांधी, नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद, सुभाष और अंबेडकर आदि के लिए सियासत देश सेवा का माध्यम थी। लेकिन आजादी के बाद राजनीति का धीरे-धीरे जो पतन शुरू हुआ, वह आज अपने चरम पर पहुंच चुका है। नेताओं ने राजनीति को इतना हावी कर दिया है कि हर चीज राजनीति से तय होने लगी है। हमारे नेताओं ने सभी जनतात्रिक संस्थाओं को ध्वस्त कर दिया है, पारदर्शिता खत्म हो गई है।

एक बात समझ में नही आती कि देश में राजनीती के सिवाय कोई और माध्यम नही है क्या ? जिसे अपनाकर देश सेवा की जा सके,अगर राहुल गाँधी नही पहल करेंगे तो कौन करेगा,सभी बड़े राजनेता अपने -अपने बेटे को राजनीती में स्थापित करते जा रहे हैं,चाहें वो बीजेपी के हों या कांग्रेस के या सपा के या डीएमके के सुनने में आ रहा है की, दिग्विजय सिंह के बेटे राजनीती में आने वाले हैं–अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह पहले से सक्रिय हैं–सचिन पाइलट , ज्योतिरादित्य सिंधिया, नवीन जिंदल , अरुण यादव , आर.पी.एन.सिंह , कहाँ तक नाम गिनाऊं कांग्रेस ने तो राष्ट्रपति के बेटे को भी विधायक का टिकट दिया ,किसी अन्य दल की बात क्या करूँ लगभग सभी दलों में ऐसी ही स्थिति है………राहुल गाँधी का नाम इसलिए ले रही हूँ की वो युवाओं की बात करते हैं…युवाओं को राजनीती मे आने की बात करते है ,जबकि वो खुद परिवारवादी राजनीती के सिरमौर हैं | ऐसे कई उदहारण है जिससे कुल मिलाकर लगने यह लगा है कि ,एक अरब से भी ज़्यादा जनसंख्या वाले, विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में क्या चुनावी राजनीति सिर्फ़ 400-500 परिवारों की बपौती बनकर रह जाएगी.|

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1 Comment

  • jaruri nahi ki rahul gandhi ya unke jaise aur yuva neta hi iski pehel kare ….rahul gandhi tho bas 2014 ke election ke baad PM bannne ke liye itna kuch kar rahein hain..aur phir wo tho baad mein hi pata chal payega ki wo desh ke liye chunav lad rahe the ya phir congress ke liye……….