धरोहर हमारी विरासत है अतीत की या हमारे आज की और आने वाली पीढ़ी को। हमारी संस्कृति और प्राकृतिक धरोहर दोनों ही अनमोल स्रोत है अपनी जीवन में प्रेरणा के लिए। अपने पेसे से फोटोग्राफर होने के कारन बहुत से ऐतिहासिक धरोहरों का भ्रमण किया है भारत में। दिल्ली में यूँ तो आना जाना मेरा बहुत पहले से रहा है परन्तु दिल्ली में निवास करते हुए पहला प्राचीन धरोहर मैंने घुमा वो है क़ुतुब मीनार। जैसा मैंने कह की मैं दिल्ली 1996 से लगातार आता जाता रहा हूँ और क़ुतुब मीनार भी घुमा पर कभी परिवार क साथ तो कभी किसी रिश्तेदार के साथ जिस वजह से मुझे पता नही था की क़ुतुब मीनार में प्रवेश कैसे मिलेगा, वहां जाने के बाद पता चला की हमें अन्दर जाने के लिए 10/- का टिकट लेना पड़ा। अब मैं टिकट चेक करवा कर अन्दर गया और मेरे सामने था विश्व का एक अनमोल धरोहर सामने था जिसका नाम है क़ुतुब मीनार। क़ुतुब मीनार विश्व का सबसे ऊँचा मीनार है, जिसकी लम्बाई 72 .5 मीटर और इसका व्यास 14 .3 मीटर है। क़ुतुब मीनार 5 मंजिला है, मीनार के चारों ओर भारतीय संस्कृति ओर कला के कई नमूने मौजूद हैं। यह परिसर UNESCO के द्वारा विश्व के प्राचीन धरोहर में सुमार किया गया है। भारत के प्रथम मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने क़ुतुब मीनार का काम सन 1191 में शुरू/ आरम्भ करवाया, पर अभी इसका सिर्फ आधार का निर्माण हो पाया था की कुतुबुद्दीन की मौत हो गयी। उसके बाद इल्ल्तुत्मिस ने उस अधूरे निर्माण को पूरा करवाने का बीड़ा उठाया ओर 3 मंजिल तैयार होने के बाद इसकी भी मौत हो गई। बाकी के 2 मंजिल का काम सन 1368 में फिरोजशाह तुगलक ने बनवाया। कुतुबुद्दीन से लेकर तुगलक तक मीनार के बनावट में ओर शैली में काफी अंतर दिखाई देता है। क़ुतुब मीनार लाल बलुआ पत्थर से बना हुआ है। अगर आप क़ुतुब मीनार गए हैं तो आपने देखा होगा की वहां जो नक्काशी है वह फूलों के बेलों की है ओर साथ ही कुरान के आयातों की है।
इस मीनार के बारे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archelogical Survey of India ) के द्वारा कहा जाता है की यहाँ के 20 सुन्दर जैन मंदिर को तोड़कर उसके समग्रिः को जमा करके क़ुतुब मीनार को बनाया गया। इस मीनार के निर्माण का मुख्य उद्देश्य में कहा गया की यह कुव्वत-उल- इस्लाम मस्जिद से अजान देने निरक्षण एवं सुरक्षा करने या इस्लाम के दिल्ली पर विजय के प्रतिक के रूप में बना। UNESCO के इस धरोहर के इतिहास को जानकार मैं स्तब्ध रह गया ओर इस सोंच में पड़ गया की हम किस तरह के धरोहर की रक्षा कर रहे हैं, जो खुद दुसरे की संस्कृति को नष्ट करके बनाया गया है।
क्या हम अपने भविष्य की पीढ़ी को ऐसी संस्कृति देने जा रहे है, जो दुसरे धर्मों के लिए अनादर ओर अविश्वास पैदा करने जा रहा है। मैं इस इतिहास को जानकार यह सोंच रहा हूँ की उस वक़्त की जनता को कैसा लग रहा होगा जब यह घटना को अंजाम दिया गया।

