किसी भी क्षेत्र के विकास में उस क्षेत्र संस्कृति की अहम् भूमिका रहती है। संस्कृति, भाषा, बोली आदि के साथ-साथ उस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, लोकसाहित्य, लोककथाओं, लोकगाथाओं, लोकविश्वासों, लोकरंजन के विविध पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सांस्कृतिकता का, ऐतिहासिकता का लोप होने, उसके विनष्ट होने से उस क्षेत्र में विकास की गति और भविष्य का उज्ज्वल पक्ष कहीं दूर तिरोहित होने लगता है।
बुन्देली संस्कृति के सामने, इस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, भाषा-बोली के सामने अपने अस्तित्व का संकट लगातार खड़ा हो रहा है। किसी समय में अपनी आन-बान-शान का प्रतीक रहा बुन्देलखण्ड वर्तमान में गरीबी, बदहाली, पिछड़ेपन के लिए जाना जा रहा है। विद्रूपता यह है कि इसके बाद भी बुन्देलखण्ड के नाम पर राजनीति करने वालों की कमी नहीं है। सांस्कृतिक विरासत से सम्पन्न, स्वाभिमान से ओत-प्रोत, शैक्षणिक क्षेत्र में सफलता के प्रतिमान स्थापित करने वाले इस क्षेत्र की विरासत को पूरी तरह से नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। विचार करना होगा कि इस क्षेत्र में पर्याप्त नदियाँ हैं; वैविध्यपूर्ण उपजाऊ मृदा है; प्रचुर मात्रा में खनिज सम्पदा है; वनाच्छादित हरे-भरे क्षेत्र हैं फिर भी इस क्षेत्र को विकास के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार का मुँह ताकना पड़ता है।
संसाधनों की पर्याप्तता के बाद भी क्षेत्र का विकास न होना यदि सरकारों की अरुचि को दर्शाता है तो साथ ही साथ यहां के जनमानस में भी जागरूकता की कमी को प्रदर्शित करता है। किसी भी क्षेत्र, समाज, राज्य, देश के विकास में किसी भी व्यक्ति का योगदान उसी तरह से महत्वपूर्ण होता है जैसे कि उस व्यक्ति का अपने परिवार के विकास में योगदान रहता है। परिवार के विकास के प्रति अरुचि होने से विकासयात्रा बाधित होती है, कुछ ऐसा ही बुन्देलखण्ड के साथ हो रहा है। यहां के निवासी उन्नत अवसरों की तलाश में यहाँ से पलायन कर रहे हैं। युवा पीढ़ी अपने आपको किसी भी रूप में इस क्षेत्र में स्थापित नहीं करना चाहती है। इस कारण से इधर के शैक्षणिक संसाधन, औद्योगिक क्षेत्र, खेत-खलिहान, गाँव आदि बदहाली की मार को सह रहे हैं।
बुन्देलखण्ड के कुछ जोशीले, उत्साही नौजवानों और अनुभवी बुजुर्गों के प्रयासों, प्रदर्शनों, संघर्षों, माँगों आदि के द्वारा बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण हेतु कार्य किया जा रहा है। इस प्रयास के चलते और बुन्देलखण्ड के नाम पर राजनीति करने की मंशा से सरकार ‘पैकेज’ आदि के द्वारा आर्थिक सहायता का झिझकता भरा कदम उठाने लगती हैं। बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक विरासत को देखते हुए इस तरह के प्रयास खुशी नहीं वरन् क्षोभ पैदा करते हैं। यह सब कहीं न कहीं इस क्षेत्र के जनमानस का अपने क्षेत्र के प्रति स्नेह, अपनत्व, जागरूकता में कमी के कारण ही होता है।
जागरूकता में कमी अपनी सांस्कृतिक विरासत को लेकर बहुत अधिक है जो नितान्त चिन्ता का विषय होना चाहिए। युवा पीढ़ी को बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिकता, ऐतिहासिकता से किसी प्रकार का कोई सरोकार नहीं दिखाई देता है। उसे क्षेत्र के लोकसाहित्य, लोककला, लोकगाथा, लोककथा, लोकविश्वास, लोकपर्व आदि के साथ ही साथ इस क्षेत्र की विशेषताओं के बारे में भी पता करने की आवश्यकता नहीं। किसी क्षेत्र का स्वर्णिम अतीत उसके उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला बनता है किन्तु वर्तमान पीढ़ी को अतीत को जानने की न तो चाह है और न ही वह इसके भविष्य को उज्ज्वल बनाने को प्रयासरत् है। यहां की बोली-भाषा को अपनाना-बोलना उसे गँवारू और पिछड़ेपन का द्योतक लगता है। इस दोष के शिकार युवा हैं तो बुजुर्गवार भी कम दोषी नहीं हैं जो अपने गौरवमयी अतीत की सांस्कृतिक विरासत का हस्तांतरण नहीं कर रहे हैं।
हमें समझना होगा कि संस्कृति का, विरासत का हस्तांतरण किसी भी रूप में सत्ता का, वर्चस्व का हस्तांतरण नहीं होता है। इस प्रकार का हस्तांतरण क्षेत्र की सांस्कृतिकता का, सामाजिकता का विकास ही करता है। यह ध्यान हम सभी को रखना होगा कि संस्कृतिविहीन, भाषाविहीन मनुष्य पशु समान होता है और बुन्देलखण्ड को हम संस्कृतिविहीन, भाषाविहीन, बोलीविहीन करके उसकी गौरवगाथा को मिटाते जा रहे हैं। यदि इस दिशा में शीघ्र ही प्रयास न किये गये; वर्तमान पीढ़ी को बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत से, भाषाई-बोली की मधुरता से परिचित न करवाया गया तो बुन्देलखण्ड को एक शब्द के रूप में केवल शब्दकोश में देख पायेंगे। इसके अलावा हम बुन्देलखण्ड के लोक से सम्बन्धित विविध पक्षों को भी सदा-सदा को विलुप्त कर चुके होंगे। स्थिति बद से बदतर हो इसके पूर्व ही हम सभी को सँभलना होगा, इस दिशा में सकारात्मक प्रयास करना होगा।


good article…
जबकि शादी की और पार्टी के रूप में विभिन्न अवसरों पर एक सूट पहन, शिष्टाचार बहुत जरूरी हैं. लोगों को विश्वास है या नहीं, वहाँ एक तुम अपनी पीठ में देखने लड़की किया जाना चाहिए. यह हमेशा के अवसरों में हो रहा है. बस मत हो शर्मीले और अवसर पकड़ने के लिए. तुम्हें पता है. तुम यही अवसरों पर .. करना चाहिए:)
कुमारेंद्र जी आपके लेख तो बहुत पढे,बहुत अच्छा लगा. और अच्छा लग आपके बारे मे लता सेंगर से जान कर.मिलने की बहुत इच्छा है .हम लोग तो मुम्बई आकर अपनी ज़मीन से ही कट से गये है.