क्या हम सचमुच स्वतंत्र हैं?

स्वतंत्रता दिवस हमें उन वीरों की याद दिलाता है, जिन्होंने अपने तन, मन, धन और परिवार की परवाह किए बिना भारत माता को विदेशियों के चंगुल से स्वतंत्र करने के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। भारत माता कहने को तो 15 अगस्त, 1947 को विदेशियों के चंगुल से आज़ाद हो गई, किंतु उसे अपने ही कुछ कपूतों ने एक नई किस्म की जंजीर में जकड़ दिया। यह जंजीर है—विकारों की, भ्रष्टाचार की, जातिवाद की, परस्पर वैमनस्य की, कुरीतियों की।

भारत के बापू महात्मा गांधी ने आज़ादी की लड़ाई के दौरान जिस रामराज्य के सपने देखे थे, वह सपना अधूरा ही रह गया। भारत माता की ही कुछ संतानों ने रामराज्य को रावणराज्य में बदल दिया। जिस प्रकार राम केवल एक जड़ मूर्ति या चित्र या किसी पौराणिक कथा के केवल एक पात्र नहीं, अपितु एक चैतन्य आत्मा हैं, जिन्होंने भारत में ही मर्यादा पुरुषोत्‍तम जीवन जीकर दिखाया, उसी प्रकार रावण कोई दस शीश वाला व्यक्तित्व नहीं, अपितु कुछ चैतन्य आत्माएँ हैं, जिनमें काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार की अधिकता होती है। रावण का अर्थ है—रुलाने वाला अर्थात् जो मनुष्यात्माएँ रावण की भूमिका अदा करती हैं, वो ऐसे कर्म करती हैं जिससे दूसरों को दुख पहुँचे।

रावण के सिर पर गधे का मुख दिखाया जाता है, जो कि हम मनुष्यात्माओं में भरे देहअभिमान का यादगार है। जिस प्रकार गधे को कितना भी साफ करो, वह फिर मिट्टी में लोट कर मैला हो जाता है, उसी प्रकार भगवान हमें स्वयं को चैतन्य बिंदुरूप आत्मा समझ कर दिव्य गुणों को धारण करने की शिक्षा दे रहे हैं, किंतु हम 63 जन्मों के देह अभिमान के संस्कारों के कारण बारंबार अपने आप को देह समझ कर, दुखों और विकारों के जंजीरों में फँस जाते हैं। हम हर साल रावण को जलाते हैं; लेकिन हर साल उसका पुतला बड़ा बनाते जाते हैं। वास्तव में, हर साल बड़ा होता रावण का पुतला हमारे मन में बढ़ते विकारों का प्रतीक है। पुतला तो दुश्मन का जलाया जाता है और हमारे असली दुश्मन तो देहभान और ये विकार हैं, जिन्हें हमें जलाकर राख करना है। गीता में भी लिखा है—काम महाशत्रु है। रावण की कामवासना के कारण भी सीता को जेल में जाना पड़ा। जब सीता ने परम्पराओं के मोह के कारण श्रीमत की लकीर का परमत पर उल्लंघन किया तब उसे रावण की जेल में जाना पड़ा। आज भी अरेबियन यवन भारत से कन्याओं-माताओं को फुसला-बरगलाकर अपने कामवासना की पूर्ति के लिए विदेशों में ले जा रहे हैं। जब सूपर्णखा की कामवासना की पूर्ति ना हो सकी तब उसने दशमुखी रावण को भड़का कर राम-रावण का युद्ध करवा दिया। यह तो केवल पौराणिक कथा है, किंतु इसके पीछे छिपा रहस्य यह है कि काम विकार ही आदि, मध्य और अंत दुखों का कारण है। यदि हम ईश्वर द्वारा बताई हुई मर्यादाओं में रहें, तो न कोई राव‌ण रहेगा और न हम आत्माओं रूपी सीता का कोई शील भंग कर सकेगा।

भारत के बापूजी प्रतिदिन प्रार्थना सभाओं में पतित-पावन सीता-राम कहकर उस परमात्मा राम को बुलाते थे। तो क्या वह परमात्मा राम इस संसार  रूपी रावणराज्य या शोक वाटिका को रामराज्य अथवा अशोक वाटिका में बदलने के लिए नहीं आएँगे? गीता में उल्लिखित धर्म ग्लानि का समय बहुत पहले ही आ चुका है और सारे विश्व के बापू अर्थात् निराकार परमात्मा राम (ईश्वर, अल्लाह या गॉड) इस नर्क, दोजख या हैल को स्वर्ग, जन्नत या हेविन में बदलने के लिए राम की तरह एकú साधारण वनवासी (अर्थात् बेहद की वैराग्यवृत्ति वाले) मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर ईश्वरीय ज्ञान और राजयोग की शिक्षा दे रहे हैं, किंतु उन्हें किसी चमत्कार के आधार पर नहीं, अपितु ज्ञानचक्षुओं के आधार पर पहचाना जा सकता है। स्वयं को तथा दूसरों को चैतन्य बिंदु रूप आत्मा और निराकार परमात्मा की संतान समझ कर रावण रूपी विकारों को जलाने से ही सच्चा रामराज्य या वसुधैव कुटुंब की स्थापना हो सकेगी, जिसके लिए बापूजी तथा लाखों भारतवासियों ने अपना बलिदान दिया था।

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