कौन है, दूध का धुला हुआ
1भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू पता नहीं क्यों आजकल रोज़ ही बर्र के छत्ते में हाथ डाल देते हैं। उनके एक बयान से लगी आग अभी बुझती ही नहीं कि वे दूसरा आगभड़काऊ बयान दे डालते हैं। उन्होंने
भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू पता नहीं क्यों आजकल रोज़ ही बर्र के छत्ते में हाथ डाल देते हैं। उनके एक बयान से लगी आग अभी बुझती ही नहीं कि वे दूसरा आगभड़काऊ बयान दे डालते हैं। उन्होंने
यदि कार्ल मार्क्स अपनी कब्र से उठकर कभी भारत आ पहुंचें तो वे हक्के-बक्के रह जाएंगे| वे अपने भारतीय चेलों को चीनी चेलों से भी आगे-आगे दौड़ता हुआ पाएंगें| बंगाल के हमारे कामरेडों ने पहले देसी और विदेशी पूंजीपतियों के
कश्मीर पर हुई सर्वदलीय बैठक को कई बागी नेताओं ने निर्थक घोषित कर दिया है। सैयद अली शाह गिलानी का कहना है असली मर्ज़ पर किसी ने उंगली ही नहीं रखी। सर्वदलीय बैठक में कश्मीर की ‘आजादी’ का कोई जि़क्र
[pullquote]देश में सब कुछ ठीक -ठाक चल रहा है | ठीक-ठाक का सही मतलब भारत में क्या होता है ये आप सभी जानते हैं | क्योंकि जब तक कोई कारगिल , संसद , मुंबई आदि पर हमले या भोपाल गैस
जातीय गणना के इरादे को देश सफल चुनौती दे रहा है| जबसे ‘सबल भारत’ ने ‘मेरी जाति हिंदुस्तानी’ आंदोलन छेड़ा है, इसका समर्थन बढ़ता ही चला जा रहा है| देश के वरिष्ठतम नेता, न्यायाधीश, विधिशास्त्री, विद्वान, पत्रकार , समाजसेवी और
क्या आपको पता है कि भारत में कितने लोग रोज़ भूखे पेट सोते हैं ? क्या आपको यह भी पता है कि दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब लोग किस देश में रहते हैं ? आपको यह जानकर दुख होगा कि
अखबारों का क्या दोष है ? अगर डेढ़-दो घंटे की पत्रकार परिषद में आप कोई काम की बात नहीं बोलेंगे तो वही होगा, जो आज अखबारों ने किया है| अगर आप खबर नहीं देंगे तो वेअ-खबर को खबर बनाएंगे| इसीलिए
अगर हम दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आरक्षण देते रहना चाहते हैं तो जन-गणना में जाति का हिसाब तो रखना ही होगा| उसके बिना सही आरक्षण की व्यवस्था कैसे बनेगी ? हॉं, यह हो सकता है कि जिन्हें आरक्षण नहीं