Articles By: विजय कुमार

बदलाव की प्रेरणा देता है मकर संक्रांति

बदलाव की प्रेरणा देता है मकर संक्रांति

2 2012/01/13 1:11 pm

भारत एक उत्सवप्रिय देश है। शायद ही कोई दिन बीतता हो, जब किसी पंथ, सम्प्रदाय या क्षेत्र में उत्सव न हो। उत्सव न हों, तो जीने की इच्छा-आकांक्षा ही समाप्त हो जाये। अपने चारों ओर बिखरे संकटों, अव्यवस्थाओं और निराशाओं

व्यंग्य – आधार से निराधार तक

2 2012/01/10 1:53 pm

हर व्यक्ति के जीवन में छात्र जीवन का बड़ा महत्व है। इस समय एक दौर ऐसा भी आता है, जब लोग प्रायः कविहृदय हो जाते हैं। डायरी में गुलाब का फूल रखने से लेकर रोमांटिक शेर लिखना तक उन दिनों

व्यंग्य – सदाखुश बाबू

0 2012/01/09 1:44 pm

शर्मा जी में यों तो कई विशेषताएं हैं; पर सबसे बड़ी विशेषता है कि वे स्वयं भी खुश रहते हैं और बाकी लोगों को भी खुश रखते हैं।  अतः लोग उन्हें सदाखुश बाबू भी कहते हैं।  जिस दिन विश्व की

लोकपाल : पजामे से चड्ढी तक (व्यंग्य)

लोकपाल : पजामे से चड्ढी तक (व्यंग्य)

3 2011/12/31 2:21 pm

पजामा एक वचन है या बहुवचन, स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग, उर्दू का शब्द है या हिन्दी का, इसका प्रचलन भारत में कब, कहां, कैसे और किसने किया; इस विषय की चर्चा फिर कभी करेंगे। आज तो शर्मा जी के पजामे

व्यंग्य : गरीब दर्शन

1 2011/12/09 6:13 pm

युवराज पिछले काफी समय से बोर हो रहे थे। महारानी जी बीमारी में व्यस्त थीं, तो राजकुमारी अपनी घर-गृहस्थी में मस्त। युवराज की बचकानी हरकतों से दुखी होकर बड़े सरदारों ने भी उन्हें पूछना बंद कर दिया था।   युवराज की

आतंकी हमले के बाद सरकारी वक्तव्य !( व्यंग )

0 2011/09/28 6:18 pm

वक्तव्य की तैयारी भारत सरकार चाहती है कि देश में शांति रहे। देश में भले ही न रहे; पर दिल्ली में अवश्य रहे, चूंकि राजधानी होने के कारण यहां की राई को भी मीडिया वाले पहाड़ बनाकर पूरे देश और

हिन्दी का वार्षिक श्राद्ध !

हिन्दी का वार्षिक श्राद्ध !

1 2011/09/13 4:49 pm

सितम्बर हिन्दी के वार्षिक श्राद्ध का महीना है। हर संस्था और संस्थान इस महीने में हिन्दी दिवस, सप्ताह या पखवाड़ा मनाते हैं और इसके लिए मिले बजट को खा पी डालते हैं। इस मौसम में कवियों, लेखकों व साहित्यकारों को

अमर योगी महाराजा भर्तृहरि

अमर योगी महाराजा भर्तृहरि

2 2011/09/04 3:37 pm

प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (नूतन संवत्सर) पर हम राजा विक्रमादित्य और उनकी गौरव गाथा याद करते हैं; पर उनके बड़े भाई महाराजा भर्तृहरि की कथा भी अत्यन्त प्रेरक है। यदि भर्तृहरि वैरागी न बनते, तो न राजा विक्रमादित्य होते और

व्यंग्य: मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना

0 2011/08/29 12:53 pm

अन्ना हजारे के आंदोलन से छात्र हो या अध्यापक, किसान हो या मजदूर, व्यापारी हो या उद्योगपति; सब प्रभावित हैं। यह बात दूसरी है कि कानून बनाने वाले अभी कान में तेल डाले बैठे हैं।   शर्मा जी का खाद बनाने

वंदे मातरम से हाय-तौबा !

वंदे मातरम से हाय-तौबा !

5 2011/08/26 10:31 am

खुजली एक जाना-पहचाना चर्म रोग है। कहते हैं कि यह किसी को हो जाए, तो आसानी से पीछा नहीं छोड़ता। छोड़ भी दे, तो फिर कब उभर आयेगा, यह निश्चित नहीं है।  शारीरिक खुजली की तरह ही कुछ वैचारिक और