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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; त्रिपुरारी कुमार</title>
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		<title>आरोप-प्रत्यारोप में अटका झारखण्ड</title>
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		<pubDate>Fri, 12 Nov 2010 07:08:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>त्रिपुरारी कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[बुनियादी सुविधाओं से भी मरहूम झारखंड में किसी भी विभाग की स्थिति अच्छी नहीं है। कह सकते हैं कि अच्छी स्थिति ना तो यहां के लोग चाहते हैं और ना ही राजनेता। रह गई बात नौकरशाहों की तो उन्हें आम ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">बुनियादी सुविधाओं से भी मरहूम झारखंड में किसी भी विभाग की स्थिति अच्छी नहीं है। कह सकते हैं कि अच्छी स्थिति ना तो यहां के लोग चाहते हैं और ना ही राजनेता। रह गई बात नौकरशाहों की तो उन्हें आम आदमी की बुनियादि जरूरतों से कोई खास वास्ता होता नहीं है इसलिए वे इस ओर उतना ही ध्यान देते हैं जितना उन्हें राजनेताओं द्वारा कहा जाता है। अगर वे अपना संपूर्ण दिमाग वाकई में विकास करने में लगा दें तो राज्य के विकास में कोई भी रोड़े नहीं डाल पाएगा। आईए एक नजर डालते हैं सूबे की बुनियादी सुविधाओं पर।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-10400" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%aa-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%aa-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%85%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%be/attachment/arjun-munda/"><img class="alignright size-full wp-image-10400" title="arjun munda" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/arjun-munda.jpg" alt="" width="287" height="300" /></a>झारखंड में हर डाल पर उल्लू बैठा है जी हां हम बात कर रहे हैं झारखंड की व्यवस्था की। अब आप ये मत समझियेगा कि हम उल्लू की उपाधि से कैसे राज्य को संबोधित कर रहे हैं। तो हम भी आपको बता ही देते हैं कि उल्लू की उपाधि यहां के राजनेताओं को दी गई है क्योंकि उनके आंखों के आगे काले चश्मे लगे हुए हैं कह सकते हैं कि उन्हें दिन के उजाले में नहीं दिखता है। इसके लिए उन्हें सूरमा लगाना पड़ता है। क्योंकि जब भी राज्य की बुनियादी जरूरतों की बात उठती है तो सबसे पहले राजनेता एक दूसरे पर छींटाकशी करते हैं । छोटी से छोटी बातों को लेकर भी एक दूसरे पर आरोप ही लगाए जाते हैं न कि उसका समाधान निकालते हैं। अब बात कर लें इंसान के जीने के लिए आवश्यक आवश्यकता जल की ,तो जल की बात जल की ही तरह निराली है। गंगा तेरा निर्मल पानी झर-झर करता जाए। पर यहां तो राजनीति रूपी गाड़ी भर-भर करती जाती है। पिछले दस सालों में झारखंड सिंचाई और पीने के पानी के क्षेत्र में भी कोई खास काम नहीं कर पाया। इस संबंध में जब केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय से बात की गई तो उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि ज्यादातर समय तो भाजपा ने ही झारखंड पर राज किया है तो उन्होंने क्यूं नहींे सुधार किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-10401" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%aa-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%aa-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%85%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%be/attachment/subodh-kant-sahay/"><img class="alignleft size-full wp-image-10401" title="Subodh-Kant-Sahay" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/Subodh-Kant-Sahay.gif" alt="" width="213" height="221" /></a>फ़िर वही बात आरोप -प्रत्यारोप। अब कोई उनसे पूछे कि पूरे देश में सबसे अधिक तो कांग्रेस ने ही राज किया है फ़िर देश की ये हालात क्यों है ?  अब बात करते हैं झारखंड के उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की। उनका कहना है कि सारे विभागों में जंग लग गई है अधिकारियों की क्लास लगाई गई है। लेकिनक सवाल ये उठता है कि क्या इसके पहले उनकी सरकार नहीं थी जो वे कह रहे हैं कि विभागों में जंग लग गई है। कह सकते हैं कि उल्टे चोर कोतवाल को डांटे। पकड़े गए तो चेक कर रहे थे और नहीं पकड़ाए तो जैसे -तैसे काम चलाकर अपना उल्लू सीधा करते रहो।</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरे उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो तो एक कदम और भी आगे हैं । वे राज्य के युवा तुर्कों में आते हैं । युवा वर्गों के साथ-साथ उनकी पकड़ बुजुर्गों के बीच भी है पर काम के नाम पर सिर्फ हवा-हवाई ही बात होती है। जब उनसे पूछा गया कि सड़कों और जल संसाधनों की क्या स्थिति है तो वे ऐसे भागे जैसे गदहे के सिर से सिंग गायब होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">कुल मिलाकर इस मसले का भी पूरा लब्बोलुबाब यही है कि जैसे चल रहा है वैसे ही चलेगा । सुधार के नाम पर सिर्फ बतौलेबाजी ही होगी। क्योंकि  काम करने के लिए इच्छाशक्ति के साथ-साथ ठोस विजन भी होना चाहिए जो इन नेताओं के पास नहीं है। हमारी तो यही गुजारिश है यहां के राजनेताओं से कि अब भी कोशिश की शुरूआत करें क्योंकि शुरूआत करने के बाद उसे अम्लीजामा पहनाने में भी लंबा वक्त लगेगा।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>पड़ोस में विकास की गंगा ,झारखण्ड है प्यासा</title>
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		<pubDate>Fri, 12 Nov 2010 06:58:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>त्रिपुरारी कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[झारखंड जब बना तो यहां के लोगों का एक ही मकसद था कि अलग राज्य बनाकर विकास के पहिए में तेज गति दी जाय। पर शायद झारखंड के राजनेताओं का समय के साथ ही मिजाज भी बदल गया तभी तो ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-10394" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%aa%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%8b%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%9d%e0%a4%be/attachment/jharkhand-map-2/"><img class="alignright size-full wp-image-10394" title="jharkhand-map" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/jharkhand-map1.jpg" alt="" width="350" height="275" /></a>झारखंड जब बना तो यहां के लोगों का एक ही मकसद था कि अलग राज्य बनाकर विकास के पहिए में तेज गति दी जाय। पर शायद झारखंड के राजनेताओं का समय के साथ ही मिजाज भी बदल गया तभी तो राज्य आज फिर उसी पायदान पर खड़ा है जहां आज से दस साल पहले था।</p>
<p style="text-align: justify;">बिहार नाम ही ऐसा है जिसे लोग बड़े ही शौक से लेते हैं और इस नाम को लेने के बाद एक सूकून की प्राप्ती होती है। ये अलग बात है कि बिहार और विहार ये दो शब्द हैं और दोनों के मायने भी अलग-अलग हैं। ये अलग बात है कि अभी हम भटक कर बिहार चले गए पर बात है झारखंड की । झारखंड का निर्माण जब 2000 में हुआ तो बिहार के राजनेताओं के बीच मायूसी का माहौल बना हुआ था वहीं झारखंड के नेताओं के बीच इस बात की खुशी थी कि लंबे जद्दोजहद के बाद नए राज्य यानि झारखंड का निर्माण तो हो रहा है। आश्चर्य की बात तो ये है कि जिस मकसद के लिए राज्य का निर्माण किया गया वो अब तक पूरा नहीं हो पाया है। जब बिहार था तो बिहार के राजनेता इसी झारखंड की बदौलत राज्य में विकास की गंगा बहाने की बात करते नहीं थकते थे पर आज की तस्वीर बिल्कुल उल्टी है। 2005 से बिहार के 39 जिलों में चारो तरफ सड़कों का जाल बिछाने की कवायद शुरू हुई । कह सकते हैं जनता की बुनियादी सुविधाओं की लगभग जरूरतों को पूरा करने का नीतीश कुमार ने प्रयास किया। पंचायत चुनाव में महिलाओं को आरक्षण देकर कई ऐसे गांवों का विकास किया जहां बेटी के जन्म होने पर उसे मार दिया जाता था पर आज उसी गांव में बेटी के जन्म लेने पर एक पौधा  लगाया जाता है साथ ही बिहार सरकार ने भी उस गांव के लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए उपहार भी प्रदान किया। वहीं झारखंड में आए दिन ट्रेफिकिंग की शिकार महिलाओं की खबरें आते रहती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है बुनियादी सुविधाओं का ना उपलब्ध होना। जिस इलाके की लड़कियां ट्रेफिकिंग की शिकार होती हैं उस इलाके में ना तो सड़कों की अच्छी व्यवस्था होती है और ना हीं पानी की। और जब सड़क और पानी की ही व्यवस्था नहीं होगी तो बिजली के बारे में सोचना ही बेमानी होगी। ज्यादातर नक्सली वैसे ही इलाके से आते हैं जहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव होता है। बिहार के मुख्यमंत्री को कई अवार्ड से सम्मानित किया गया तो झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री जेल की शोभा बढ़ा रहे हैं। अगर उत्तरांचल की बात करें तो गन्ने के मामले में वहां के मालिकों की चांदी है कई इंजीनियरिंग काॅलेज और कारखानों का निर्माण हुआ ,साथ ही पर्यटन के क्षेत्र में भी काफी बढ़ावा मिला। मसूरी का नाम सुनकर लोगों के मन में वहां की शीतलता का एहसास होने लगता है पर झारखंड के मौसम के बारे में लोग कहते हैं कि यहां का मौसम बहुत ही अच्छा है तभी तो एकीकृत बिहार की राजधानी रांची हुआ करती थी और यहीं पर विधानसभा का सत्र भी चलता था। पर पर्यटन के क्षेत्र में राज्य में विकास नहीं हो पाया। जबकि यहां के लगभग जिलों में पर्यटन के क्षेत्र में विकास किया जा सकता है। अगर देवघर की बात करें तो सिर्फ सावन के महीने में करोड़ों की राजस्व उगाही होती है। पर ना जानें ये पैसे कहां चले जाते हैं। साहेबगंज के राजमहल की बात की जाय तो वहां भी हजारों वर्षों पुराने फाॅसिल्स पड़े हुए हैं पर ना तो झारखंड सरकार ने कभी इस ओर घ्यान दिया । अगर इस इलाके में पर्यटन के क्षेत्र में विकास किया जाय तो स्वभाविक तौर पर उस इलाके का विकास हो जाएगा। यहां के भी आदिवासियों का मुख्य पेशा जल जंगल जमीन वाली बात पर ही टिकी हुई है। दूसरा कोई रोजगार नहीं है नतीजा इस इलाके को भी नक्सलियों की शरणस्थली के रूप में जाना जाता है। राजमहल के पहाड़ी इलाके में पहाड़ के उपर आदिवासियों का एक छोटा सा गांव है गांव वालों की मानें तो उनके इलाके से कई तस्करों ने वहां के फाॅसिल्स को राज्य से बाहर ले जाकर बेच दिया । अब तो स्थानीय लोगों को भी ये समझ में आने लगा है कि अगर इस फाॅसिल्स को बचा लिया जाय तो इलाके का विकास हो सकता है। क्योंकि अगर इस जगह को पर्यटन के रूप में विकसित कर दिया जाय तो देश के अलावे विदेशों से भी पर्यटक यहां आएंगे । रांची के ही दशम फाॅल को अगर विकसित कर दिया जाय तो पर्यटकों की यहां भरमार हो सकती है। पर इस क्षेत्र में किसी भी राजनेता ने ध्यान नहीं दिया। गिरिडीह के पारसनाथ की बात की जाय तो पर्यटन के क्षेत्र में काफी विकास हो सकता है पर वहां भी लगातार पेड़ों की अवैध कटाई और अवैध उत्खनन से इलाके की खनिज संपदा को तार-तार किया जा रहा है। जितनी एनर्जी यहां के लोग इसे बर्बाद करने में लगा रहे हैं अगर इतनी ही एनर्जी इसे आबाद करने में लगा दें तो शायद राज्य के विकास के साथ-साथ उनके खुद का भी विकास संभव हो सकता है। बिहार में विकास की गंगा बह रही है और झारखंड में विकास के नाम पर विनाश हो रहा है। यहां के सत्तालोलुपों को सिर्फ अपनी कुर्सी और अपने स्वार्थ की चिंता है तभी तो राज्य कीे तीन करोड़ जनता के खून-पसीने की कमाई को यहां के राजनेताओं ने पानी समझ कर यूं बहा दिया जैसे उसकी कोई जरूरत ही नहीं हो। झारखंड के साथ और भी दो राज्यों का निर्माण हुआ था छत्तीसगढ़ और उत्तरांचल । इन दोनों राज्यों की अगर तुलना की जाय तो झारखंड की तुलना में दोनों राज्य हर मामले में काफी आगे हैं। दोनों राज्यों में विकास के कई आयाम गढ़े गए। सबक तो यहां के राजनेताओं केा झारखंड के भाईयों से भी लेना चाहिए जिस बिहार के नाम पर लोग जाने से डरते थे आज उसी बिहार में विकास की गंगा बह रही है। पन्द्रह सालों के जंगलराज से मुक्ति दिलाना इतना आसान भी नहीं था पर कहते हैं ना कि अगर दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो किसी भी काम को करना नामुमकिन नहीं है । जब इंसान पहाड़ों का सीना चीर कर रास्ता बना सकता है तो झारखंड के भी राजनेता विकास में चार चांद लगा सकते हैं। जरूरत है विजनरी नेतृत्व की ,तभी राज्य को विकास के पायदान पर खड़ा किया जा सकता है।</p>
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		<title>नक्सलियों के आय के प्रमुख स्रोत</title>
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		<pubDate>Wed, 10 Nov 2010 13:16:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>त्रिपुरारी कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
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		<category><![CDATA[मार्क्स]]></category>
		<category><![CDATA[वर्ग संघर्ष]]></category>

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		<description><![CDATA[निशा दास की रिपोर्ट रांची से झारखंड में नक्सल समस्या एक जटिल समस्या बनी हुई है। लंबे समय से इस जंजाल से निकलने का यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों ने भी प्रयास किया ,पर अबतक कोई खास सफलता इसमें ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>निशा दास की रिपोर्ट रांची से</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-10328" href="http://www.janokti.com/sansad-political-news-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/national-news-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af/%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96/attachment/naxal11/"><img class="aligncenter size-full wp-image-10328" title="naxal11" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/naxal11.jpg" alt="" width="310" height="240" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">झारखंड में नक्सल समस्या एक जटिल समस्या बनी हुई है। लंबे समय से इस जंजाल से निकलने का यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों ने भी प्रयास किया ,पर अबतक कोई खास सफलता इसमें उन्हें नहीं मिल पाई है। आईए एक नजर डालते हैं नक्सलियों के आय के मुख्य श्रोतों पर।</p>
<p style="text-align: justify;">नक्सलियों के दिन प्रतिदिन मजबूती से उभरने का सबसे बड़ा कारण है यहां के राजनेताओं के साथ -साथ नौकरशाहों के बीच कमजोर इच्छा शक्ति का होना। क्योंकि कोई चाहता है इसका सफाया तो कोई नक्सलियों के सफाये के नाम पर सिर्फ राजनीति करते हैं ना कि काम। किसी भी अपराधी गिरोह या और भी कोई दूसरा संगठन चलाने के लिए धन की काफी अहम भूमिका होती है। नक्सलियों को भी संगठन को मजबूती देने के लिए मोटे धन की आवश्यकता होती है। और ये धन झारखंड में चलने वाले सरकारी योजनाओं में काम करनेवाले ठेकेदारों और विभागों से मिलते हैं हालांकि इसका कोई रिकोर्ड नहीं है क्योंकि हर कोई चाहता है कि काम हो जाय और जान भी बच जाय। यानि की सुरक्षा के नाम पर हमारी पुलिस बौनी साबित हो रही है नक्सलियों के सामने तभी तो नक्सलियों के सामने ठेकेदार और विभागीय कर्मचारी घुटने टेकते हुए नजर आते हैं। और इसी का फायदा उठाते हैं नक्सली। झारखं डमें चलने वाले खानों से भी नक्सली लेवी वसूलते हैं इसके साथ -साथ विस्फोटक पदार्थ भी वहंीं से लेते हैं। जाहिर सी बात है कि जब सरकारी योजनाओं और खानों से नक्सलियों को सहज ही लेवी और धन उपलब्ध हो जाय तो वे मजबूती से उभरेंगे ही। हमारे ही हथियार और हमारे ही पैसे से हमारे ही लोगों को नक्सली मारते हैं और इस बात की तस्दीक करते हैं कि गरीबों और पीड़ितों के लिए नक्सलवाद का निर्माण किया गया। ये कैसा मरहम लगाने का तरीका है गरीबों पर ,जो आम इंसानों के खून से अपने हाथों को रंगता हो। और भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर गरीब लोगों के आंखों में धूल झोंकता हो। सवाल ये भी उठता है कि आखिर खानों से निकलने वाले विस्फोटक और पैसे का हिसाब कहां जाता है। क्योंकि जब इतने अधिक मात्रा में लेवी और सामानों की निकासी होती है तो इसका हिसाब किसी के पास क्यूं नहीं रहता है। मामला साफ है कि सबके सब इसमें आकंठ डूबे हुए हैं। ये अलग बात है कि नक्सलियों का डर ही इन्हें ऐसा करने पर मजबूर करता होगा पर सवाल ये भी उठता है कि आखिर हमारी पुलिसिया तंत्र क्या करती है जो अपने ही विभागों की रक्षा नहीं कर पाती है। एक कहावत है कि अगर सांप को मारना हो तो पहले उसके कमर पर वार करो उसके बाद कहीं दूसरे जगह। ठीक इसी तरह से नक्सलियों के उपर भी वार करना होगा तभी नक्सलियों के आतंक से मुक्ति मिल सकती है। क्योंकि जबतक वे पैसे से कमजोर नहीं होंगे तब तक ऐसे ही वे भी लड़ेंगे और हमारी पुलिस नक्सलियों से मुकाबला करती रहेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>झारखंड में ट्रांस्फर -पोस्टींग का खेल</title>
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		<pubDate>Wed, 10 Nov 2010 13:06:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>त्रिपुरारी कुमार</dc:creator>
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		<category><![CDATA[झारखंड]]></category>
		<category><![CDATA[भ्रष्टाचार]]></category>

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		<description><![CDATA[झारखंड में जब -जब नई सरकार बनीं तब-तब अधिकारियों के ट्रांस्फर -पोस्टींग का खेल चरम पर रहा। यहां के हुक्मरानों ने अधिकारियों को अपने मन मर्जी से ही चलाया। उनके उपर अपनी मनमानी का डंडा चलाया। उनके बेसकीमती दिमाग का ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-10321" href="http://www.janokti.com/government-failure-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%9d%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%a1-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ab%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%b8/attachment/jharkhand-2/"><img class="alignright size-medium wp-image-10321" title="jharkhand" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/jharkhand-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>झारखंड  में जब -जब नई सरकार बनीं तब-तब अधिकारियों के ट्रांस्फर -पोस्टींग का खेल चरम पर रहा। यहां के हुक्मरानों ने अधिकारियों को अपने मन मर्जी से ही चलाया। उनके उपर अपनी मनमानी का डंडा चलाया। उनके बेसकीमती दिमाग का इस्तेमाल अगर किया तो सिर्फ भ्रष्टाचार के मामले में विकास के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया।</p>
<p style="text-align: justify;">झारखंड की भी गजब की फितरत रही है। इसका इतिहास ही रहा है इसने देश के मानचित्र पर जब भी किया औरों से अलग हटकर। ये अलग बात है कि इसमें ज्यादातर मामले भ्रष्टाचार के ही रहे। बात करते हैं झारखंड में अधिकारियों के ट्रांस्फर पोस्टींग की। किसी भी राज्य के विकास में अधिकारियों के इच्छाशक्ति की भूमिका काफी अहम मानी जाती है। और ये यहां भी लागू होती है। यहां तो गर्म कपड़े की ही तरह सरकार बदलती है। अगर अधिकारियों की बात की जाय तो यहां वही अधिकारी मलाईदार पोस्ट पर जमे रहते हैं जो यहां के हुक्मरानों के इशारे पर नाचते हों जिसने भी थोड़ी सी आनाकानी की या तो उनका ट्रांस्फर हो गया या फिर उन्हें इस कदर परेशान किया जाता है कि वे खुद ही पनाह मांगने लगते हैं। हाल ही के घटना में सत्ता दल के एक मंत्री ने एक डीसी से चमड़ी उधेड़ लेने की बात कह दी थी । हालांकि ये मामला दो-चार दिनों तक चर्चा में रहा पर उसके बाद ऐसे गायब हो गया जैसे गाय के सिर से सींग गायब हो गया हो। नतीजा वहां का विकास कुछ दिनों के लिए रूक गया। ट्रांस्फर पोस्टींग भी  पूरी तरह से यहां के हुक्मरानों के साथ -साथ बिचैलियों की जेबें गर्म करता है। राज्य में कई ऐसे बिचैलिये आए जिसने सिर्फ अधिकारियों ओर हुक्मरानों के बीच तालमेल बैठाने के नाम पर करोड़ों रू0 के वारे न्यारे किए। ये अलग बात है कि जनता का पैसा जनता के नाम पर बिचौलिये और हुक्मरानों की ही झोली में जाता रहा है ,विकास के नाम पर विकास की कोरी बातें हीं होकर रह जाती है ,नतीजा गरीबी और बेबसी ही जनता की झोली में आती है। स्थानीय लोगों की मानें तो वे भी यहां के हुक्मरानों को ही दोषी मानते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">विकास करने के लिए अधिकारियों को तो पहले इलाके का ज्ञान होना चाहिए और ये ज्ञान तभी संभव हो सकता है जब वे इलाके का अवलोकन करेंगे। लेकिन यहां ना तो अवलोकन होता है और न हीं इलाके का निरीक्षण। ज्यादातर योजनाएं कागजों पर ही सिमट कर रह जाती है। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि अधिकारियों को हुक्मरानों का व्रदहस्त प्राप्त रहता है। और एक कहावत है कि जब सैंयां भए कोतवाल तो फिर डर काहे। ठीक यही कहावत यहां फिट बैठती है। क्योंकि जिस अधिकारी की यहां के मंत्रियों से सेटिंग हो गई उनकी तो पौ बारह रही और जो सेटिंग-गेटिंग के फारमूले में पीछे पड़ गए उनकी खटिया खड़ी हो गई। और जब वे खुद ही अपने आप से आश्वस्त नहीं होंगे तो वे विकास की रेखा को खींचने में कैसे कामयाब हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">बात चाहे जो भी हो अगर सही मायने में  विकास करना है तो ट्रांस्फर -पोस्टींग जैसे बीमारी को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा तभी हम कह सकते हैं कि वाकई में हम विकास की ओर अग्रसर हो रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>चुनाव और चुनौती</title>
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		<pubDate>Wed, 22 Sep 2010 10:56:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>त्रिपुरारी कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[चुनाव में दो तरह की चुनौती होती हैं एक तो जनता को रिझाने की और दूसरी बिखरते कुनबे को समेटने की। नेता और दल सही मायनों में वही कहलाता है जो इन चुनौतियों के झंझावत को झेलकर सत्ता दिला दें। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;"><a rel="attachment wp-att-7543" href="http://www.janokti.com/bihar-election-up-election/bihar-election-lalu-nitish-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a5%8c%e0%a4%a4%e0%a5%80/attachment/lalu-sadu-subhash/"><img class="alignright size-medium wp-image-7543" title="lalu-sadu-subhash" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/lalu-sadu-subhash-300x194.jpg" alt="" width="300" height="194" /></a>चुनाव में दो तरह की चुनौती होती हैं एक तो जनता को रिझाने की और दूसरी बिखरते कुनबे को समेटने की। नेता और दल सही मायनों में वही कहलाता है जो इन चुनौतियों के झंझावत को झेलकर सत्ता दिला दें। बिहार में इन दिनों ये नजारा आराम से देखा जा सकता है। हर तरफ चुनावी चैपाल है और चैपाल पर चुनावी पंडितों का जमावड़ा। नेता कुनबे को समेंट कर रख नहीं पा रहे और मतदाताओं को रिझाने की बात कर रहे हैं। अब साधू के बाद सुभाष ने जीजा का साथ छोड़ दिया तो भला लालू का क्या कसूर। ये तो राजनीति में होता ही है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">जीजा लालू से अब साले सुभाष का लव खत्म हो गया है। क्योंकि सुभाष ने लालू को रिटायरमेंट की नसीहत देते हुए पार्टी को अलविदा कह दिया है। नेताआंें के सन्यास की आवाज पहले भी उठी थी लेकिन ये बात भी आई थी कि राजनीति में राजनेता साठ के बाद सठियाते नहीं है। इसलिए उन्हें सन्यास या रिटायरमेंट लेने की जरूरत नहीं। लेकिन राहुल के दौरे के बाद बिहार में युवाओं की हवा चल पड़ी है और राहुल के लगातार प्रयास के बाद युवाओं का रूझान भी राजनीति की ओर बढ़ा है। अब सुभाष यादव राहुल तो हैं नहीं जो युवाओं की वकालत करें लेकिन उन्होंने उम्रदराज हो चले नेताओं कोे ये जरूर कह दिया कि 65 के बाद रिटायरमेंट नेताओं को ले लेना चाहिए। लालू प्रसाद की ओर इशारा करते हुए उन्होंने ये भी कहा है कि राजद में क्रिमनल लोगों का जमावड़ा है। लेकिन ये बात आज तक लोगों के समझ में नहीं आई कि नेताओं को चुनाव के वक्त ही क्यों दल को बदलने की जरूरत होती है और पुराना दल उन्हें दल-दल लगने लगता है। साधू तो साधूवाद की तरह चले गये लेकिन सुभाष आग में घी का काम करके जा रहे हैं। अब कौन समझाये लालू को कि भाई तो नाराज होंगे ही जब बहन के पावर को सीज किया जायेगा। जी हां चुनाव में लालू जी ने राबड़ी के तमाम राजनीतिक फैसले लेने पर विराम लगा दिया। अब सूबे की कुर्सी की कवायद में लालू ने पूरी ताकत झोंक दी है। सुभाष ने जब राजद को बाय बाय कहा तो ये कयास लगाये गये कि कांग्रेस में जाने की कवायद है लेकिन कांग्रेस ने ये कहकर तस्वीर साफ कर  दी कि पार्टी में कोई वेकैंसी नहीं है। अब बेचारे सुभाष क्या करते सो उन्होंने भी नीतीश की तरीफ में कसीदे पढ़ना शुरू कर दिये। जाना कहां है अभी तक सुभाष यादव ने साफ नहीं किया है लेकिन उन्होंने ये तो जता दिया कि लालू के घर में अब घुटन लगती है। चुनावी लहरों में वैसे नेताओं की नईया नीतीश की नाव के आगे डोलती नजर आ रही है लेकिन एक बात भी तय है कि कांग्रेस भी इसबार पूरे तेवर में दिखाई दे रही है। और लालू पासवान के सहारे वैतरणी पार करने की सोच रहे हैं। लेकिन ये भी सच है कि जब अपनों का भरोसा टूट जाता है तो बाहर के लोग भी शक की निगाहों से देखने लगते हैं । लिहाजा राजद के लिए मुश्किलों का दौर तो पहले से ही शुरू  हो गया था लेकिन साधू के बाद सुभाष का झटका कहीं लालू की जीत का रोड़ा ना बन जाये।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>झारखंड में फ़िर से बनेगी सरकार ?</title>
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		<pubDate>Wed, 08 Sep 2010 14:20:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>त्रिपुरारी कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[झारखंड में सरकार बनाने का फंडा जारी है। भाजपा ,झामुमो और आजसू की गठजोड़ से बनी सरकार गिरने के बाद एक बार फिर सरकार बनाने की मुहिम पूरे जोर पर है। झारखंड विधानसभा ने इन दस सालों में सात मुख्यमंत्री ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-6657" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/%e0%a4%9d%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%a1-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%b8/attachment/jharkhan/"><img class="alignright size-medium wp-image-6657" title="jharkhan" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/09/jharkhan-300x257.jpg" alt="" width="300" height="257" /></a>झारखंड में सरकार बनाने का फंडा जारी है। भाजपा ,झामुमो और आजसू की गठजोड़ से बनी सरकार गिरने के बाद एक बार फिर सरकार बनाने की मुहिम पूरे जोर पर है।  झारखंड विधानसभा ने इन दस सालों में सात मुख्यमंत्री देख लिए हैं। इस बार जब भी सरकार बनेगी तो वो आठवां मुख्यमंत्री देखेगी । सूबे के विधानसभा की भी क्या तकदीर है जब से विधानसभा का निर्माण हुआ है तब से लेकर आज तक राजनीतिक झंझावतों को ही झेल रही है। ऐसा कभी नहीं हो पाया कि वो सकून से अपने पांच साल बिता सके। देश की बड़ी पार्टियों ने भी इस पर राज किया पर वे भी कमजोर इरादे वाले ही निकले। हालांकि इस बार के भाजपा , झामुमो और आजसू के गठजोड़ के शुरूआत से ही यहां के लोगों को लग रहा था कि फिर झारखंड विधानसभा के साथ वही होगा , जैसा इसके पहले होता आया है। कह सकते हैं कि चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात ।</p>
<p style="text-align: justify;">ये तो थी पुरानी बात । अब बात करते हैं सूबे की वर्तमान राजनीति की। राजनीतिक हलचलों के बीच एक बार फिर सरकार बनाने की मुहिम अपने द्रुत गति से आगे की ओर बढ़ रही है। हर दिन समीकरण बदल रहे हैं। झामुमो जिस तरह से इसके पहले भाजपा के साथ सरकार बनाने के मुद्दे पर अड़ियल रूख के साथ पेशआती थी। वो आज की तारीख में पूरी तरह ठंडे तरीके से पेश आ रही है। एक कहावत तो आपने जरूर सुना होगा कि वक्त पड़ने पर गदहे को भी बाप कहना पड़ता है। झामुमो के साथ आजकल ऐसा ही हो रहा है। भाजपा की ओर से अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जा चुका है | सोरेन आदिवासी मुख्यमंत्री के कार्ड का इस्तेमाल कर दुबार सत्ता में वापसी चाहते हैं। वहीं झामुमों में भी सबकुछ ठीक चल रहा है ऐसी बात नहीं है। पिछली बार जब भाजपा ने अपना समर्थन वापस लिया था उसके बाद से झामुमो के कुछ नेता भाजपा के साथ सरकार बनाने का विरोध करते रहे। और जब एक बार फिर भाजपा के साथ सरकार बनाने की बात चरम पर है तो साइमन मरांडी ,टेकलाल महतो , और नलिन सोरेन इसका विरोध कर रहे हैं कि भाजपा दगाबाज पार्टी है वो कभी भी समर्थन वापस ले सकती है। उनका मानना है कि या तो भाजपा का साथ छोड़े या फिर विधानसभा चुनाव की तैयारी करे। दुबारा चुनाव कराने के मुद्दे पर कांग्रेस भी अंदर से राजी है लेकिन वो वर्तमान राजनीति पर उपर से नजर रख रही है। कांग्रेस हर बार अपना पत्ता तभी खोलती है जब सारे राजनीतिक दलों के तरकश से सारे तीर निकल चुके होते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि इस बार झामुमो और भाजपा सरकार बनाने में सफल रहती है या फिर एक बार फिर वही कहानी दुहराएगी जो इससे पहले दुहरा चुकी है।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>जिधर मिले मलाई , उधर के हैं भाई !</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Jul 2010 05:07:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>त्रिपुरारी कुमार</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5224" title="neta ji dal badal" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/neta-ji-dal-badal-300x126.png" alt="" width="300" height="126" />बिहार में विधान सभा चुनाव की घोषणा हो गई है। इसे देख कर कुछ दिनों से बिहार में हर दिन राजनीति में कुछ-न-कुछ हो रहा है। वोट की राजनीति करने के लिए यहां के नेता कुछ भी करने  को तैयार हैं। इसी क्रम में  नीतीश सरकार में पूर्व आबकारी मंत्री रहे जमशेद ने कांग्रेस से हाथ मिला लिया। एक नजर बिहार की वर्तमान राजनीति पर।</p>
<p style="text-align: justify;">कहते हैं राजनीति में सभी एक ही थैली के चट्टे -बट्टे होते हैं। कब ,कैसे और किधर पाला बदल ले ,कहना मुश्किल है । यानि कि जिधर मलाई देखा ,उधर ही मुड़ गया। चाहे इसके लिए जनता कुछ भी सोचे ? उन्हें तो अपनी कुर्सी प्यारी है जनता की भावनाओं का कोई ख्याल नहीं है।  चुनाव का समय है और किसी राजनीतिक पार्टी का सहारा चाहिए। क्योंकि जनता के भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का एक बार फिर से समय आ गया है। और जनता से वोट मांगने के लिए राजनीतिक दलों का सहारा बहुत जरूरी हो गया है वर्तमान समय में। तभी तो नीतीश सरकार से जब खटपट हुई ,तो जमशेद ने  आबकारी विभाग के अधिकारियों की पोल खोलनी शुरू  कर दी। उन्होंने नीतीश सरकार पर मनमानी करने का आरोप लगाया था, और कहा था कि इस सरकार में सिर्फ नीतीश  और मोदी की ही चलती है, बाकी मंत्रियों की कोई नहीं सुनता है। सवाल ये है कि जब उनकी मनमानी चलनी बंद हो गई तो सरकार की पोल खोलने में लग गए और जब तक सब कुछ ठीक था किसी के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा। बिहार में लगातार दल बदलने का क्रम जारी है और ये चुनाव तक जारी ही रहेगा। पिछले लोकसभा चुनाव में भी कई नेताओं ने पार्टी बदली और चुनाव हारने या जीतने के बाद फिर पार्टी बदल ली। कह सकते हैं कि कपड़े के ही समान पार्टी बदली। आज की तारीख में पार्टी का मतलब होता है कुर्सी। यानि कि जितनी बड़ी कुर्सी उतनी ही बड़ी पार्टी।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे में कांग्रेस में शामिल हुए जमशेद कांग्रेस के लिए कौन सा इंद्रजाल करते हैं और कांग्रेस जमशेद के  लिए क्या करती है  , ये तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा। तब तक पार्टी बदलने का दौर बिहार में जारी रहने की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है। क्योंकि अभी तो आगाज हुआ है पूरा होने में अभी समय है।</p>
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		<title>चुनाव नजदीक तो नेता नजदीक</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Jul 2010 02:51:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>त्रिपुरारी कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[चुनाव नजदीक तो  नेता नजदीक। जी हां हम बात कर रहे हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा जारी रिपोर्ट कार्ड की। उन्होंने अपने कार्यकाल में किये कामों की रिपोर्ट कार्ड जारी की है। बिहार में चुनाव अक्टूबर,नवंबर में होना ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-5221" title="25NITISH KUMAR COMPAIGN KERNE JATE" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/25NITISH-KUMAR-COMPAIGN-KERNE-JATE.jpg" alt="" width="378" height="400" />चुनाव नजदीक तो  नेता नजदीक। जी हां हम बात कर रहे हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश  कुमार द्वारा जारी रिपोर्ट कार्ड की। उन्होंने अपने कार्यकाल में किये कामों की रिपोर्ट कार्ड जारी की है। बिहार में चुनाव अक्टूबर,नवंबर में होना तय है। इसको लेकर सभी राजनीतिक दलों के नेता अपने-अपने तरीके से जनता को लुभाने का प्रयास करना शुरू  कर दिये हैं।  ये बात अलग है कि चुनाव के समय में उनका रिपोर्ट कार्ड जारी करना कहीं-न-कहीं चुनावी स्टंट को ही दर्शाता है। उन्होंने अपने रिपोर्ट कार्ड में कौन-कौन सी घोषणाएं किए हैं आईये एक नजर डालते हैं-,</p>
<p style="text-align: justify;">1: किसानों को डीजल पर 20 रू0 की सब्सिडी मिलेगी।,</p>
<p style="text-align: justify;">2: 27000 शिक्षकों की होगी बहाली,</p>
<p style="text-align: justify;">3ः राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकारों की नियमावली में संशोधन ,मदद राशि  बढ़ाई जाएगी,</p>
<p style="text-align: justify;">4ः बिहार को विकसित राज्य बनाने का संकल्प 2015 तक,</p>
<p style="text-align: justify;">5: प्रत्येक स्कूल में उर्दू शिक्षक  होंगे,</p>
<p style="text-align: justify;">6: संस्कृत शिक्षक की भी बहाली होगी,</p>
<p style="text-align: justify;">7: 1617 पुल बने, कुछ और पुलों पर भी काम जारी,</p>
<p style="text-align: justify;">8: किरोसिन तेल पर 96 पैसे की छूट,</p>
<p style="text-align: justify;">9: हर मुहल्ले की गलियों का पक्कीकरण,</p>
<p style="text-align: justify;">ये तो थी इनके रिपोर्ट कार्ड में जारी घोषणाओं  की बात। लेकिन इतना तो तय है कि अगर नीतीश के घोषणाओं में दम होगा तो जनता के लिए बल्ले-बल्ले है। लेकिन बात तो वहीं आकर रूक जाती है ,क्योंकि घोषणा करनेवाले नेता हैं, और नेताओं के घोषणाओं में कितना फर्क रहता है ये आप सभी जानते हैं। ये तो बिहार विधान सभा में होनेवाले चुनाव को लेकर वायदों की शुरुआत  है । आगे-आगे देखिये और कितनी कसमें खाई जाती हैं।</p>
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		<title>पत्थरों पर है मानव का भरोसा</title>
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		<pubDate>Sat, 17 Jul 2010 03:38:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>त्रिपुरारी कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[यूँ तो रत्नों की परंपरा आदिकाल से ही चली आ रही है। दुनियां में जितने भी युग आए ,चाहे वो सत्युग हो द्वापर हो या फिर कलियुग। युग-युगांतर से रत्नों की महत्ता आज भी बरकरार है। समय के साथ सबकुछ ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="color: #000000;"><img class="alignright size-medium wp-image-4742" title="grah-ratna ( grah stones)" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/grah-ratna-grah-stones-300x300.jpg" alt="" width="300" height="300" />यूँ तो रत्नों की परंपरा आदिकाल से ही चली आ रही है। दुनियां में जितने भी युग आए ,चाहे वो सत्युग हो द्वापर हो या फिर कलियुग। युग-युगांतर से रत्नों की महत्ता आज भी बरकरार है। समय के साथ सबकुछ बदला, अगर नहीं बदली ,तो वो है रत्नों की मांग। आईए जानते हैं रत्नों के कौन-कौन से प्रकार होते हैं</span><span style="color: #0000ff;">।</span></p>
<p style="text-align: justify;">रत्नों की शुरुआत करते हैं <span style="color: #0000ff;">माणिक्य </span>से। माणिक्य का रंग लाल होता है,वैसे ये गुलाबी,काला,और नीले रंग में भी पाया जाता है। पृथ्वी पर पाए जानेवाले रत्नों में हीरा के बाद सबसे ज्यादा कठोर माणिक्य ही होता है। इसकी खासियत ये है कि इसे अंधेरे कमरे में रखने पर भी प्रकाश होता रहता है।</p>
<p style="text-align: justify;">माणिक्य के बाद <span style="color: #0000ff;">मूंगा</span> की बात करते हैं। मूंगा गुलाबी ,काला, लाल और सुनहरे रंगों में पाया जाता है। लेकिन आमतौर पर मूंगे के रंगों के बारे में लाल को ही ज्यादा तवज्जो दी जाती है। ज्योतिशियों के अनुसार लाल मूंगा स्त्रियों के लिए बहुत ही भाग्यशाली माना जाता है। इस रत्न को धारण करने से मनुश्य के शरीर में साहस और वीरता का संचार होता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #0000ff;">मोती</span> को चंद्र रत्न की संज्ञा दी गई है। इसका रंग सफेद होता है। हालांकि इसका रंग हल्का पीला और हल्के गुलाबी भी होता है। मोती का निर्माण भी समुद्र के गर्भ में पाए जानेवाले घोंघे से होता है। मोती फारस की खाड़ी,श्रीलंका बेनेजुएला,मैक्सिको,आस्ट्रेलिया तथा बंगाल की खाड़ी में पाए जाते हैं। मोती को पहनने से क्रोध शांत रहता है और मानसिक तनाव को भी दूर भगाता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #ff6600;">पन्ना </span>बुद्ध ग्रह का प्रतिनिधि रत्न माना जाता है। इसके कई नाम हैं। पन्ना ग्रेनाइट तथा पैग्मेटाइट चट्टानों और दरारों के बीच जन्म लेता है। पन्ना की विशिष्टता है कि इसे आंखों की रोषनी और बुखार की बिमारी में भी पहना जाता है। पन्ना का रंग हरा होता है। यह पारदर्शी और अपारदर्शी दोनों ही तरह का होता है। इसकी पहचान करने का तरीका है लकड़ी पर रगड़ने से इसकी चमक में वृद्धि होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">कहा जाता है कि <span style="color: #000080;">पुखराज</span> बहुत जल्द ही फायदा पहुंचाता है लोगों के जीवन में। यह पत्थर पीला उजला और लाल रंगों में पाया जाता है। इसे ज्यादातर सोने के अंगुठी में ही पहना जाता है। ष्वेत पुखराज ज्ञानवर्द्धक,लाल पुखराज शक्तिवर्द्धक और पीला पुखराज सुख और धनवर्धक माने गए हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #0000ff;">नीलम</span> की तो बात ही निराली है। इस रत्न के स्वामी शनि देवता हैं। शनि के कोप को षांत करने के लिए नीलम का धारण बहुत ही उपयोगी माना जाता है। इसका रंग मोर की गर्दन के रंग की तरह होता है। इसे पहनने के पहले बहुत से प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। ज्योतिशियों की मानें तो नीलम का फायदा और नुकसान 24 घंटे के अन्दर ही मालूम पड़ जाता है। नीलम श्रीलंका,बर्मा, और थाईलैंड में बेहतर किस्म के पाए जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #ff9900;">गोमेद</span> का रंग पीला और लाल होता है। गोमेद गोमूत्र का ही अपभ्रंष रूप है। यह रत्न श्रीलंका, भारत,थाईदेश ,कंबोडिया,और मैडागास्कर में पाया जाता है। गोमेद का भौतिक गुण ये होता है कि ये चुंबक को अपनी ओर खींच लेता है। ऐसा लोहे और जस्ते के मिश्रण के कारण होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">लहसुनियां को केतु का रत्न माना गया है। इसे भी कई नामों से नवाजा गया है- वैदूर्य,विडालाक्ष,केतु रत्न, सूत्र मणि तथा अंग्रेजी में इसे कैट्स आई कहते हैं। लहसुनिया हल्के पीले रंग का होता है। रासायनिक दृश्टि से यह बैरीलियम का एल्युमीनेट होता है। यह विदेशों के अलावे भारत के उड़ीसा में पाया जाता है</p>
<p style="text-align: justify;">अब बात करते हैं सबसे मंहगे रत्न <span style="color: #0000ff;">हीरे</span><span style="color: #0000ff;"> </span>की। ये काफी मंहगी होती है। इसे एक बार धारण करने के बाद लगभग सात सालों तक इसका प्रभाव रहता है। शुद्ध हीरे को गर्म पानी ,गर्म दूध या तेल में डालने पर यह उसे ठंडा कर देता है। खासकर स्त्रियों के धारण करने से ज्यादा फायदा मिलता है। जिस हीरे के मुख पर लाल या पीला हो उसे पहनने का एक अलग ही महत्व है।</p>
<p style="text-align: justify;">कुल मिलाकर रत्नों की यही परिभाषा है कि इसके वैज्ञानिक और मनौवैज्ञानिक दोनों फायदे हैं। इसीलिए रत्नों का क्रेज आज भी बरकरार है। लोग चांद पर चले गए एक-से-एक खोज होते गए ,लेकिन पत्थर है कि उसका वजूद आज भी उसी तरह से बरकरार है जिस तरह आज से हजारों साल पहले था।</p>
<p style="text-align: justify;">ग्रहों की बात करें तो इसके उपरत्न भी होते हैं। कह सकते हैं कि लगभग हर चीजों के विकल्प होते हैं। चाहे वो खाने-पीने के सामान हो पहनने के कपड़े हो या फिर ग्रहों के काट का हो। आईए देखते हैं इस रिपोर्ट में ग्रहों के कौन-कौन से उपरत्न हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">देवताओं और ग्रहों में सूर्य का एक अलग ही महत्व है। दुनियां में हर किसी को सूर्य की आवष्यकता होती है। इसके बिना कुछ भी नहीं है। न ही रात है और न ही दिन। सूर्य के रत्न हैं माणिक्य। और इसके उपरत्न हैं स्टार माणिक, रतवा हकीक,तामड़ा लाल तुरमली।</p>
<p style="text-align: justify;">सूर्य के बाद बात करते हैं चन्द्र की। चन्द्रमा का भी अपना अलग ही महत्व है। हर किसी को षीतलता की आषा और जरूरत होती है। जब भी किसी व्यक्ति को सुकून की जरूरत महसूस होती है ,तो वे चन्द्रमा की कामना करते हैं, कि काश चन्दा के जैसी शीतलता यहां होती ,तो कितना अच्छा होता!  इसका रत्न है मोती, और उपरत्न दूधिया हकीक,सफेद मूंगा,चन्द्रकांत मणि,और सफेद पुखराज।</p>
<p style="text-align: justify;">गुरू की तो बात ही निराली है। तभी तो तुलसीदास ने कहा है कि &#8221; मन तड़पत हरि दर्शन को आज,बिन गुरू ज्ञान कहां से पाउं ।&#8221;  गुरू के रत्न हैं पुखराज। और उपरत्न पीला हकीक,सुनहैला,पीला गोमेद,और बैरूज ।</p>
<p style="text-align: justify;">गुरू के बाद बात करते हैं मंगल की। मंगल से ही मंगलवार का दिन बना है। इस दिन का खास महत्व है। इसके रत्न हैं मूंगा। और उपरत्न लाल हकीक,लाल आनेक्स,तामड़ा,और लाल गोमेद। बहुत से लोग मंगलवार के दिन व्रत रखकर लाल वस्त्र भी धारण करते हैं। धार्मिक दृश्टिकोण से ऐसा माना जाता है कि मंगलवार के दिन लाल वस्त्र पहनने से हनुमान जी प्रसन्न होते हैं और जब हनुमान जी खुशहोते हैं तो भगवान राम भी खुश हो जाते हैं।</p>
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		<title>सीएम संग पीएम बोले</title>
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		<pubDate>Thu, 15 Jul 2010 18:06:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>त्रिपुरारी कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[नक्सली हिंसा से निपटने की ताजा रणनीति के तहत केन्द्र सरकार ने नक्सल प्रभावित राज्यों के सीएम ( मुख्यमंत्रियों) के साथ प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के साथ एक बैठक आयोजित की। इस बैठक में सभी नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-4676" title="manmohan singh" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/manmohan-singh-300x300.jpg" alt="" width="300" height="300" />नक्सली हिंसा से निपटने की ताजा रणनीति के तहत केन्द्र सरकार ने नक्सल प्रभावित राज्यों के सीएम ( मुख्यमंत्रियों) के साथ प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के साथ एक बैठक आयोजित की। इस बैठक में सभी नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित गृह मंत्री पी चिदंबरम ने भी अपने सुझाव को शामिल किया।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में सात राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उनके प्रतिनधियों ने भाग लिया। बैठक में झारखंड का प्रतिनिधित्व प्रदेश  के राज्यपाल और पश्चिम बंगाल का प्रतिनिधित्व प्रान्त के एक वरिष्ठ मंत्री ने किया। सातों नक्सल प्रभावित राज्यों के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि केन्द्र सरकार झारखंड, छत्तीसगढ़,,उड़ीसा,पश्चिम बंगाल की प्रदेश  सरकारों से आग्रह करेगी ,कि वे नक्सल विरोधी अभियान के लिए एक एकीकृत कमान बनाएं ,और इस कमान के सदस्य के तौर पर सेना के एक सेवानिवृत जनरल की नियुक्ति करें।</p>
<p style="text-align: justify;">साथ ही ये भी कहा कि उग्रवाद से निपटने के लिए इन प्रान्तों को साजो-सामान के सहयोग के तौर पर हेलिकोप्टर भी उपलब्ध कराएगी। केन्द्र सरकार वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित प्रान्तों में दो साल की अवधि में 400 थानों की स्थापना ,और उन्हें सषक्त बनाने के लिए 80ः20 के अनुपात के आधार पर धन भी देगी। इस राशि  में प्रति थाने के हिसाब से दो करोड़ रू0 की वित्तीय व्यवस्था देने की बात कही है | जो बैठक आज बुलायी गयी ,ये बहुत पहले ही हो जानी चाहिए थी। क्योंकि नक्सली हिंसा से पिछले पांच सालों में लगभग 10 हजार नागरिकों और जवानों की मौत हो चुकी है।</p>
<p style="text-align: justify;">साल  2005 से मई 2010 के बीच नक्सली हिंसा से कुल 10,268 लोग हतातह हुए।साल  2009 में कुल 2,372,साल  2008 में 1,769और साल 2007 में कुल 1,737 लोग नक्सली हिंसा की वजह से मारे गए।</p>
<p style="text-align: justify;">इसके अलावे नक्सली केवल वर्श 2009 में 362 मोबाइल टावरों सहित कई स्कूल इमारतों और सड़कों को अपना निशाना बना चुके हैं।बिहार -झारखण्ड में तो अपने प्रभुत्व वाले इलाकों में नक्सलियों द्वारा  &#8221; लेवी&#8221; के नाम से विकास के बदले रंगदारी भी वसूली जाती है  | कोई भी ठेकेदार किसी भी तरह का कार्य बगैर इनको रंगदारी दिए पूरा नहीं कर सकता |</p>
<p style="text-align: justify;">फिलवक्त ,इस बैठक का परिणाम तो समय आने के बाद ही पता चलेगा । लेकिन इतना तो तय है ,कि अगर दृढ़ इच्छाशक्ति को अपनाकर राज्य सरकार और केन्द्र सरकार इस अभियान में उतरे ,तो वो दिन दूर नहीं ,जब देश से नक्सलवाद जैसे कोढ़ का सफाया संभव हो सकता है। बस जरूरत है इस ओर ठोस कदम उठाने की।</p>
<p style="text-align: justify;">
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