Articles By: Sourav Roy

उत्थिष्ठ भारत

उत्थिष्ठ भारत

0 2011/08/15 8:13 am

अमर क्रांति की चिनगारी से लगी प्राणों में आग सदियों से सोयी जो ज्वाला आज गयी है जाग | सर ऊंचा हिमालय जैसा गर्दन पर गंगा पसीना चरण धोतें हैं सागर तीनों चित्तौड़ हमारा सीना | शूर शहीदों की बलि

गाना गाया

गाना गाया

0 2011/03/09 6:38 pm

जीवन के इस तरफ उस तरफ का अन्धकार उस तरफ जाने क्या ? आगे बढ़ा मैं रेंगता हुआ दौड़ जीता | इस जीत में शामिल थे मेरे चाहने वाले और वो जो मुझे पसंद नहीं थे | अन्दर को बाहर

चप्पल से लिपटी चाहतें

0 2011/03/08 10:58 pm

चाहता हूँ एक पुरानी डायरी कविता लिखने के लिए एक कोरा काग़ज़ चित्र बनाने के लिए एक शांत कोना पृथ्वी का गुनगुनाने के लिए | चाहता हूँ नीली – कत्थई नक्शे से निकल हरी ज़मीन पर रहूँ | चाहता हूँ

बोकारो

0 2011/03/08 10:54 pm

छोटे छोटे स्टेशन देहाती इधर से राधागाँव उधर से तुपकाडीह बीच में गलियाँ जहां छोड़ आया मैं खुदको दोस्तों संग साइकिल पर घंटों का रास्ता मिनटों में तय करते हुए | जहां साढ़े चार बजे मैं आज भी दोस्तों को

मैं आप वो

0 2011/03/08 10:53 pm

मैं ‘मैं’ हूँ ! ‘आप’ कौन हैं ये आपसे बेहतर कौन जानता है ? वो तो ख़ैर वो ही है… जब मैं और आप नहीं थे वो था | जब मैं और आप नहीं होंगे वो बन जायेंगे | आप

ख़ुशी

0 2011/03/08 10:51 pm

आज मैं ख़ुश हूँ | रोज़ की तरह आज भी ख़ुश हूँ | एक बेटी अपने पिता की छाती पर लात रख छत पर टांक दी गयी | मैं ख़ुश हूँ | एक बूढा अपने कब्र में पैर टांग गुरुत्वाकर्षण

दाढ़ी बना डाला

0 2011/03/08 10:50 pm

घर में बैठे जब मुझे घर की याद आई खुन्नस में मैंने ब्लेड निकाला नस काटने की हिम्मत नहीं थी दाढ़ी बना डाला | मेरी सूरत देखती है कि बदला नहीं- जब उगने-उगाने को कुछ नहीं बचता दाढ़ी उग-उग आती

करवटों के जोकर

0 2011/03/08 10:49 pm

भारत का संविधान जानते हो कई लोगों को पहचानते हो समझते हो देश की तकलीफें आते हो आकर चले जाते हो | इस नितम्बाकार अजायबघर में क्यों बैठे हो ? बाहर आकर देखो दुनिया सदियों से दु-निया है | प्रसंगों

चिता

0 2011/03/08 10:48 pm

मुख से फेनिल गाढ़ा खून उगलते अन्दर से झुलसाती आग नाक के संकरे सुरंगों में कैद घिनौनी बू, जली चर्बी की झाग महसूस करो तुम्हारे चेहरे की खाल गल रही है अन्दर मुड़कर धुंधलाती तुम्हारी दृष्टि लाल दरारों के जाल

दो बहनें

0 2011/03/08 10:47 pm

‘विरक्ति’ और ‘अशांति’ दो बहनें हैं | दो चंचल बहनें जो पता नहीं कितनों से ‘ब्याही’ हैं कितनो से ‘बंधी’ हैं | स्वांगमय-गरिमामय रूप उनका | मैं एक से ब्याहा हूँ दूसरी से बंधा हुआ ! दोनों को छोड़ दूं