Articles By: शारदा मोंगा शारदा मोंगा

तमाशबीन बने रहे, नाश देखते रहे

2 2011/05/25 5:52 pm

हरे भरे खेत  थे, पुष्प लाल श्वेत थे, नष्ट हो गए सभी, और हम खड़े खड़े, हो सका न कुछ मगर तमाशबीन बने रहे, नाश देखते रहे, विनाश देखते रहे, वृक्ष कट कट गिरे, बुलडोज़र थे चले, हमने सब देखा

जमी है महफिल…

0 2011/05/02 8:20 pm

जमी है महफिल शेरों की, शेरों  से डर लगता है, बड़े बड़े घाघों के डर से,  भगने को मन करता है. कभी सामना  किया  न हमने, पर हिम्मत जुटाई  है, इसही लिए लिखने को हमे अपनी कलम उठाई है. ज़रा सी जि़द ने इस ऑंगन का है बँटवारा

जग वाला मेला यारो थोड़ी जई देर दा,

0 2011/04/20 1:51 pm

जग वाला मेला यारो थोड़ी जई देर दा, हसदेयाँ रात लंगे पता नहीं सवेल दा. कोई एथे आवंदा ते कोई एथों जान्वदा, जेड़ा एथों जान्वदा ते मुडके नहीं आन्वदा. जग वाला मेला यारो थोड़ी जई देर दा, हसदेयाँ रात लंगे

.बिना नागा दारू पिया,

0 2011/03/22 7:54 am

बिना नागा दारू पिया, घर खर्चे का क्या होगा? बच्चों को नहीं दूध दही, उनके स्वास्थ्य का क्या होगा? बताओ तो, स्कूल की फीस? उनकी किताब का क्या होगा? तू पी पी के मस्त रहा, उत्तरदायित्व का क्या होगा? तूने

बसंत पर ग्रहण का साया!

0 2011/03/17 4:27 am

खुशियों का रंग लेके बसंत,  आया… बसंत आया यह शाश्वत कहानी, लगने लगी बेमानी, हुआ समय का फेरा, आतंकियों ने घेरा, कर अतिक्रमण, सीमा को दे चुनौती, सबल दानवता, मानवता रोती. बन मानवबम्ब, बसंत पर ग्रहण बदरंगी धुंधलका छाया. आया

दृढ़ संकल्पों की सडक मंजिल की ओर,

0 2011/03/16 2:41 pm

द्वंद विचारों के अनिर्णीत, दोराहों चौराहों पर शोर मचता जब घनघोर,  दृढ़ संकल्पों की सडक ही, भटकन से हमें बचा कर, पकड़ाती  मंजिल की डोर, ले जाती मंजिल की ओर. इस सडक की चाल कभी,  सीधी सी कभी टेढ़ी सी,    मुडती बलखाती कभी तो, भ्रम उपजाती नदिया सी, फिर चौड़ी होकर हमसब को,

मुख पर मलकर लाल गुलाल

8 2011/03/16 9:28 am

मुख पर मलकर लाल गुलाल, प्रेमरस में भीग बेहाल, माथे  पर टेसू की  रोली लिए संग फूलों की टोली बसंत चला खेलने होली, फूल-पत्तों के बंधन वार, सजाया प्रकृति ने है द्वार, सरसों का  बिछा कालीन, संगीत-गोष्ठी जमी सब लीन, कवि पांखी की  चिरपिर  बोली…बसंत चला… कोकिल मैना पपीहा आये, भ्रमर करें गुंजार, गुंजायें,

उड़ चली नारी

उड़ चली नारी

7 2011/03/06 9:01 pm

घर की चारदिवारी, घुटती नारी, बोतल में- बंद सी, सहती पीड़ा, सदियों से, पुस्तक पोथी, ने बतलाया, कारण? अज्ञान का साया, पढ़ डालीं पुस्तकें, तोड़ीं जंजीरें. ज्ञान से, आलोकित, पुंज प्रकाश, असीमित आकाश, तोड़ के चारदिवारी, उड़ चली नारी

क्या खोया क्या पाया जग में

क्या खोया क्या पाया जग में

0 2011/02/27 8:48 pm

जिंदगी के शोर, दुनियादारी की आपाधापी, रिश्ते नातों की गलियों और सोच के रास्ते  के नुक्कड़ पर इन्सान जब अकेला हो जाता है तो कवि कागज़ पर अपना घर बना लेता है. और जब सुनाने सुनाने वाले एक हो जाते हैं- इस संवेदनशील इन्सान के शब्द कुछ इस तरह बोल उठते हैं :-  क्या खोया क्या पाया जग में, मिलते  और बिछड़ते डग में, मुझे किसी से नहीं शिकायत, यद्यपि छला गया पग पग में, एक  दृष्टि बीती पर  डाली, यादों की

झंडा न झुकने पाये.

झंडा न झुकने पाये.

0 2011/01/09 3:54 am

प्राण भले ही जाये मित्रो, पर झंडा न झुकने पाये. झंडा हमारी शान है मित्रो, मर मिटने की आन है मित्रो.. इसके तीन रंगों का फलसफा महत्वपूर्ण और महतारा है केसरिया बाना वीरों का श्वेत शांति का नारा है हरा