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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; संजय कुमार</title>
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		<title>&#8216;हिन्द स्वराज’ के बहाने विचार-मंथन</title>
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		<pubDate>Sat, 21 Jan 2012 06:25:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[साहित्य-सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[रंगकर्मी राजेश कुमार के नाटक ’हिन्द स्वराज’ की प्रस्तुति 30 जनवरी, 2012 को वाल्मीकि रंगशाला, उ0प्र0 संगीत नाटक अकादमी, लखनऊ में &#124; गाँधी के जीवन वृत, परस्पर संबंध व किसी घटना पर केन्द्रित अनेकों फ़िल्में, उपन्यास, नाटक रचे गये हैं पर कहानी को सुनाने व दिखाने की अपेक्षा विचारों को दिखाने का प्रयास पहली बार ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">रंगकर्मी राजेश कुमार के नाटक ’हिन्द स्वराज’ की प्रस्तुति 30 जनवरी, 2012 को वाल्मीकि रंगशाला, उ0प्र0 संगीत नाटक अकादमी, लखनऊ में |</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/01/hind.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-25733" title="hind" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/01/hind.jpg" alt="" width="348" height="506" /></a>गाँधी के जीवन वृत, परस्पर संबंध व किसी घटना पर केन्द्रित अनेकों फ़िल्में, उपन्यास, नाटक रचे गये हैं पर कहानी को सुनाने व दिखाने की अपेक्षा विचारों को दिखाने का प्रयास पहली बार नाटककार-निर्देशक राजेश कुमार अपनी आगामी प्रस्तुति ‘हिन्द स्वराज’ द्वारा करने जा रहे हैं। उनका मानना है कि आज सबसे बड़ा संकट “विचार” का है। वर्तमान राजनीतिक, सांस्कृतिक व साहित्यिक परिदृश्य से सर्वाधिक लुप्त विचार ही हो रहा है। या यों कहें कि महत्वहीन व हाशिये पर जा रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">लंदन से दक्षिण अफ्ऱीका लौटते हुए गाँधी जी ने नवम्बर, 1909 में संवाद शैली में गुजराती में जो ‘हिन्द स्वराज’ लिखा, निर्देशक राजेश कुमार ने इसे मौजूँ और नाटकीय ज़रूरत समझकर मंचन हेतु इसका चयन किया। नाटक के बँधे-बँधाये खाँचे में बँधे रंगकर्मियों को यह चयन नागवार लग सकता है या जो परम शुद्धतावादी हैं, उन्हें नाटक में उठाये गये सवालों से आपत्ति हो सकती है पर गाँधी जी ने इस पुस्तक में स्वराज्य, पार्लियामेन्ट, सभ्यता, हिन्दुस्तान के हालात, शस्त्रबल, डाक्टर, वक़ील, सत्याग्रह,शिक्षा, ब्रह्मचर्य और मशीन जैसे अहम विषयों पर जो विचार रखे हैं , वे किसी भी प्रतिबद्ध और सामाजिक सरोकार रखने वाले संस्कृतिकर्मी के लिए चुनौती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">“विचार” को मंचन देने वाले निर्देशक राजेश कुमार, इसकी प्रथम प्रस्तुति 30 जनवरी, 2012 को वाल्मीकि रंगशाला, उ0प्र0 संगीत नाटक अकादमी, लखनऊ में करने जा रहे हैं। पाठक और संपादक के माध्यम से गाँधी जी ने जिन विचारों को अभिव्यक्ति दी उसे रंगमंच पर प्रतिबद्ध रंगकर्मी नीतिन शर्मा और आलोक यादव उद्घाटित करेंगे। जिस ‘हिन्द स्वराज’ को पढ़कर गोखले ने कहा था, ‘एक साल हिन्दुस्तान में रहकर गाँधी जी ख़ुद ही इस किताब को फाड़कर फेंक देंगे।’ जिन विचारों, आकांक्षाओं और सपनों को गाँधी जी जीवन के अंत तक याद करते रहे और दूसरों को याद दिलाते रहे, उस पर नेहरू ने लिखा, ‘मेरा ख़्याल है कि हमारे सामने सवाल सत्य बनाम असत्य या अहिंसा बनाम हिंसा का नहीं है।’ उन्हें मंच पर उतारना आज इसलिए ज़रूरी हैं कि गाँधी जी ने जिस ब्रिटिश पार्लियामेन्ट को बाँझ और वेश्या बताया था,आधुनिक सभ्यता को शैतानी सभ्यता और डाक्टर, वक़ील और अंग्रेज़ी शिक्षा को ग़ुलामी की नींव बताया था। आज के हालात को उससे इतर नहीं हैं, बल्कि बद से बदतर हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">भूमंडलीकरण ने जिस तरह हमें अपनी हर ज़रूरत और सपने के लिए पश्चिम-यूरोप और अमेरिका की तरफ़ देखने के लिए मजबूर किया है, योजनाबद्ध ढंग से कुसंस्कारित किया है, विकास के नाम पर ज़र-ज़मीन-खनिज को लूटने में लगे हैं, ये आज ज़ोरों पर है और इन सवालों से रंगकर्मी  मुँह नहीं मोड़ सकता।</p>
<p style="text-align: justify;">‘धार’ के रंगकर्मी इस विचार के मंचन को गाँव, शहर-नुक्कड़ों पर ले जाने के प्रयास में हैं, क्योंकि इसे संसद से लेकर सड़क तक ले जाने में ही ‘हिन्द स्वराज’ की सार्थकता है।<span style="color: #888888;"><span style="color: #888888;"> </span></span></p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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		<title>&#8220;रंगवार्ता “ के नए अंक में रंगमंच पर स्त्री छवियां</title>
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		<pubDate>Sun, 01 Jan 2012 17:00:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[साहित्य-सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[संजय कुमार रंगमंच की अपनी दुनिया होती है। सामाजिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक सहित हर मानवीय पहलूओं की अभिव्यक्ति को अभिनेता, अपने भाव-भंगिमा से रंगमंच पर जीवंत बनाने की पुरजोर कोशिश करता है। रंगमंच एक ऐसा मंच होता है, जहां सच्चाई को ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">संजय कुमार</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/01/rangwarta.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-25340" title="rangwarta" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/01/rangwarta.jpg" alt="" width="193" height="261" /></a>रंगमंच की अपनी दुनिया होती है। सामाजिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक सहित हर मानवीय पहलूओं की अभिव्यक्ति को अभिनेता, अपने भाव-भंगिमा से रंगमंच पर जीवंत बनाने की पुरजोर कोशिश करता है। रंगमंच एक ऐसा मंच होता है, जहां सच्चाई को रेखाकिंत किया जाता है। रंगमंच की दुनिया से रू-ब-रू, रंग थियेटर के अंदर बैठे लोग होते हैं। वहीं   रंगमंच की दुनिया, की गतिविधियों को देश -दुनिया से जोड़ने का काम मीडिया के कंधों पर आता हैं। पत्र-पत्रिकाओं, टी. वी. चैनलों एवं रेडियो पर रिपोर्ट-खबर के माध्यम से व्यापक पैमाने पर लोगों के सामने आता है।</p>
<p style="text-align: justify;">रंगमंच की दुनिया से यों तो कई पत्र-पत्रिकाएं देश भर में प्रकाशित हो रही हैं। ऐसे में झारखंड से रंगमंच और विविध कला रूपों की त्रैमासिक पत्रिका “रंगवार्ता” संपादक अश्विनी कुमार ‘पकंज‘ और सह-संपादक अभिषेक ‘नंदन‘ के नेतृत्व में आयी हैं। पत्रिका अपने गेट-अप, सेट-अप और विषय-वस्तु को लेकर चर्चें में है। “रंगवार्ता” का यह पहला अंक नवम्बर-जनवरी, 2012, ‘‘ रंगमंच पर स्त्री छवियाँ ’’ पर केन्द्रित हैं। हालांकि,” रंगवार्ता“  का पहला अंक इसके पूर्व आया था, लेकिन इस बार आर. एन. आई. मिलने के बाद इसे पहला अंक करार दिया गया है। रंगमंचीय गतिविधि को यह अपने पूरे तेवर के साथ लेकर आया है।</p>
<p style="text-align: justify;">“रंगवार्ता” की शुरूआत चर्चित रंगकर्मी गुरूशरण सिंह पर रंग-नेपथ्य में राजेश चन्द्र ने ‘लहू है कि तब भी गाता है&#8230;.’, में स्वर्गीय गुरूशरण सिंह की व्यक्तित्व, कृत्तिव और उनके रंगमंची यात्रा पर प्रकाश डाला है। रंग-शख्स्यित ने विनोदनी दासी की आत्मकथा अमार कथा का संपादित अंश प्रकाशित किया गया है। बीस हजार बाद रंगमंच पर अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ने वाली पद्मश्री गुलाब बाई की कहानी को निराला जी ने रेखाकिंत किया है। रंगवात्र्ता के रंगमंच पर स्त्री अंक में बाल गंधर्व, जयशंकर सुन्दरी, चपल भादुड़ी, मास्टर फिदा हुसैन नरसी जैसी कई विख्यात महिला रंगकर्मियों को पत्रिका में प्रमुखता से जगह दी गयी है। अभिषेक नंदन ने भारतीय रंगमंच पर महत्वपूर्ण स्त्री हस्ताक्षरों का संक्षिप्त परिचय कराया है। जिनमें प्रमुख हैं- अमाल अल्लाना, अंजला महर्षी, कपिला मलिक वात्स्यायन, अनामिका हक्सर, उषा बैनर्जी, अमला राय, उषा सहाय कपूर, डा0 गिरीश  रस्तोगी, कुदसिया जैदी, उषा गांगुली, चेतना जालान, शबीना मेहता जेटली, कुसुम कुमार, शीला भाटिया, अनुराधा कपूर, उर्षा वर्मा, कुसुम हैदर, कमला देवी चट्टोपाध्याय, रेखा जैन, अरूधंति नाग, तोइजोम शीला देवी सहित कई चर्चित महिला नाटककारों को अपने आलेख में जगह देते हुए रंगमंच पर महिलाओं की अहम् भूमिका को ईमानदारी से रेखाकिंत किया है। वहीं कु.सत्यवती ने ‘रंगमंच पर स्त्रियों का स्थान’ आलेख में महिलाओं के रंगमंच से जुड़ने के दौरान सामाजिक सहित अन्य कारणों पर प्रकाश डाला है। हेलेना मोडेजेस्का का ऐतिहासिक वक्तव्य ‘द वल्र्ड कांग्रेस आॅफ रिपे्रजेन्टेशन वूमेन (1894) में संकलित आलेख स्त्री और रंगमंच का  रिश्ता को “रंगवार्ता”  ने प्रकाशित कर सराहनीय कार्य किया है। हेलेना ने बताने की कोशिश की है कि स्त्री और रंगमंच का रिश्ता कम-से-कम दसवीं शताब्दी के मध्य तक जाता है। आलेख मे उस दौऱ की महिला नाटककारों की चर्चा की गयी है। अरविन्द अविनाश अपने आलेख ‘ पश्चिम रंगमंच पर स्त्री आगमन’ में बताने की कोशिश की है कि विश्व के हर हिस्सें में रंगमंच पर आने के लिए स्त्रियां प्रतिबंधित रही हैं। अमितेष ने ‘युद्ध से युद्धरत स्त्री रंगमंच’ में पाकिस्तान की चर्चित निर्देशिका सीमा किरमानी और असम की पद्मश्री सावित्री हेइसमैन के रंगमंचीय भूमिका को पाठकों के समक्ष रखा है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘‘ रंगवार्ता ’’ के इस अंक में कई साक्षात्कार हैं। अभिषेक नंदन ने पटना की रंगकर्मी ‘मोना झा‘ से विस्तार से बातचीत की है तो वहीं अफगानिस्तानी रंकर्मी मुनीरे हाशिमी से पाणिनी आनन्द की बातचीत भी रोचक है। कृपा शंकर चैबे ने बंगला रंगमंच की बहुचर्चित वरिष्ठ अभिनेत्री केतकी दत्त से बंगला रंगमंच को लेकर लम्बी बाचीत की है। अन्य आलेखों में जयदेव तनेजा का आलेख ‘हिन्दी नाटकों में स्त्री’ है, किन्नरी बोहरा &#8211; रंगमंच पर एक स्त्री नजरिया, अनिता सिंह-स्त्री थिएटर का सौन्दर्यबोध, माया पंडित-राजनीतिक का स्त्रीकरण: जी. पी. देशपांडेय के नाटक, अश्विनी कुमार पंकज-जेन्डर, कास्ट और कम्युनिटी के वर्चस्व से जूझती 36 ग्राम की स्त्री ‘नौटंकी , आशा शर्मा- रंगमंच पर अदिति की दस्तक और अभिषेक कृष्ण &#8211; ‘गुरिल्ला स्त्रियों का छापामार थिएटर’ पठनीय तो है ही, साथ ही रंगमंच के क्षेत्र में शोध करने वालों के लिए संदर्भ साम्रगी के तौर पर भी है।</p>
<p style="text-align: justify;">पत्रिका: रंगवार्ता</p>
<p style="text-align: justify;">संपादक: अश्विनी कुमार पंकज</p>
<p style="text-align: justify;">अंक: एक,नवंबर-जनवरी 2012(त्रैमासिक)</p>
<p style="text-align: justify;">मूल्य: रु.30/-</p>
<p style="text-align: justify;">संपर्क: आधार अल्टरनेटिव मीडिया, 203, एमजी टावर, 23, पूर्वी जेल रोड, रांची</p>
<p style="text-align: justify;">834001, झारखण्ड</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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		<title>सोशल नेटवर्किंग साईट पर अभिव्यक्ति और अपसंस्कृति</title>
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		<pubDate>Thu, 08 Dec 2011 14:54:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[अभिव्यक्ति और अपसंस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[सोशल नेटवर्किंग साईट]]></category>
		<category><![CDATA[सोशल नेटवर्किंग साईट पर अभिव्यक्ति और अपसंस्कृति]]></category>

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		<description><![CDATA[सोशल नेटवर्किंग पर लगाम कसने की खबर से कोहराम मचा हुआ है। राजनीतिक व सामाजिक स्तर पर बहस जारी है। केन्द्रीय दूर संचार और सूचना टेक्नोलॉजी मंत्री कपिल सिब्बल ने जब यह कहा कि उनका मंत्रालय इंटरनेट में लोगों की ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/12/Popular-Social-Networking-Sites.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-25058" title="Popular-Social-Networking-Sites" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/12/Popular-Social-Networking-Sites.jpg" alt="सोशल नेटवर्किंग साईट"width="275" height="317" /></a>सोशल नेटवर्किंग पर लगाम कसने की खबर से कोहराम मचा हुआ है। राजनीतिक व सामाजिक स्तर पर बहस जारी है। केन्द्रीय दूर संचार और सूचना टेक्नोलॉजी मंत्री कपिल सिब्बल ने जब यह कहा कि उनका मंत्रालय इंटरनेट में लोगों की छवि खराब करने वाली सामग्री पर रोक लगाने की व्यवस्था विकसित कर रहा है और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स से आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के लिए एक नियामक व्यवस्था बना रही है। हडकंप मचना जाहिर सी बात है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार का मीडिया पर सेंसर लगाने का कोई इरादा नहीं है। सरकार ने ऐसी वेबसाइट्स से संबंधित सभी पक्षों से बातचीत की है और उनसे इस तरह की सामग्री पर काबू पाने के लिए अपने पर खुद निगरानी रखने का अनुरोध किया। लेकिन सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स के संचालकों ने इस बारे में कोई ठोस जवाब नहीं दिया।</h3>
<h3 style="text-align: justify;">सवाल उठता है कि आज सरकार की सोच को सरकारी नजरिये से देखते हुए, उस सोच के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं। लेकिन वहीं सवाल यह भी है कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी के मायने यह नहीं कि, फेसबुक, ट्विटर, गूगल, याहू और यू-ट्यूब जैसी वेबसाइट्स को लोगों की धार्मिक भावनाओं, विचारों और व्यक्तिगत भावना से खेले तथा अश्लील  तस्वीरें पोस्ट करें ? उनके व्यक्ति विशेष के उपर असंवैधानिक बातें/फोटो डाले ? देखा जाये तो सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर जो कुछ हो रहा है क्या उसे अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर स्वीकार कर लिया जाये ? थोड़ी देर के लिए इसे राजनीतिक दृष्टिकोण से हटा दिया जाये और सामाजिक पहलू को सामने रख देखा जाये तो क्या, हमारे व आपका चेहरा हो और नग्न धड़ किसी और का हो ? अगर यह स्वीकार है तो फिर गलथोथरी करते रहिये। क्योंकि सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर जो खतरा है वह है इस पर तेजी से अपसंकृति का फैलना व अश्लील सामग्रियों का साम्राज्य कायम होना।</h3>
<h3 style="text-align: justify;">इस बात से इंकार नहीं कि जा सकता है कि अंतरजाल के माध्यम से आज सोशल नेटवर्किंग का तिलस्मी दुनिया स्थापित हो चुकी है। वैष्विककरण के दौर में सोशल नेटवर्किंग का मायाजाल दिनोंदिन अपने जाल में लोगों को फांसता ही जा रहा है। इसका नशा बच्चे, बुढ़ें और जवानों पर सर चढ़ बोल रहा है। खासकर  युवाओं के उपर इसका नशा  इस कदर चढ़ चुका है कि उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। घंटों इससे चिपके रहते हैं। सोशल नेटवर्किंग को संवाद अदायगी के तौर पर देखा जा रहा है जहाँ जनांदोलन, सामाजिक मुद्दों व सत्ता परिर्वत्तन के नाम पर गोलबंदी की दुहाई भी दी जा रही है। इसका स्वप्न काफी मीठा है। इसके मिठास में खास ‘‘मीठापन’’ है वह है सोशल नेटवर्किंग के माध्यम से अश्लीलता व अपराध का बढ़ता मायाजाल, जो अपसंस्कृति को खुल्लेआम बढ़ावा दे रहा है।</h3>
<h3 style="text-align: justify;">संवाद के आदान-प्रदान का कारगर हथियार सोशल नेटवर्किंग है। इस पर कोई खास प्रतिबंध नहीं है। किसी का डर-भय नहीं है। बेटा अपने बाप से छुपाकर, बाप, बेटे से तो पति, पत्नी से और पत्ती, पति से यानी हर कोई इस तिलस्म से चोरी छुपे या खुल कर जुड़ना चाहता है। और इस जुड़ाव के केन्द्र में ज्यादातर युवक-युवतियां है। अपने शरीरिक आर्कषण से महिलाएं, पुरूषों को लुभाती व न्यौता देते दिखती हैं तो वहीं पुरूष भला क्यों पीछे रहे वह भी अपने शरीरिक आर्कषण से महिलाओं को लुभाते व न्यौता देते दिखते हैं।</h3>
<h3 style="text-align: justify;">सोशल नेटवर्किंग पर फर्जीवाड़ों का जमावड़ा है। उलटे-सीधे पोस्ट के आड़ में ये युवक-युवतियां फर्जी भी है और हकीकत में भी। इनके आर्कषण का इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इनके दोस्तों की संख्या हजारों में होती है और उनके पेज को पसंद करने वालों की संख्या भी हजारों का आंकड़ा पार होता है। यह सब सुंदर चेहरे जुड़ाव के कारण बनते हैं और उनके बीच अश्लील सामग्रियों का अदान-प्रदान शुरू हो जाता है।</h3>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 15px; font-weight: bold;">सोशल नेटवर्किंग को अपसंस्कृति के परिचायक के तौर पर भी देखा जा सकता हैं । पोर्न मसाला यहाँ  उपलब्ध है बस आपको उसके सर्च में जा कर तलाशना होगा। परिणाम में ढ़ेर सारे विकल्प सामने आ जायेगें। उदाहरण के लिए सबसे चर्चित नेटवर्किंग साइट फेसबुक की बात करें तो यहाँ हर ‘नजारा’ उपलब्ध है। नजारा जो परोसा जा रहा है। उसे देखने के लिये सर्च में जाना होगा। सेक्स को सर्च करें, बस विकल्प सामने होगा। मसलन, फेसबुक लेटनाइट टाॅक/रिलेशनशिप/मैरेज/सेक्स आदि-आदि पेज। बात कीजिये। फोटो देखिये व शेयर कीजिये। बात समझ में आ जायेगी कि इसके माध्यम से अश्लीलता को सहजता से देखा समझा जा सकता है। हांलाकि यह सेक्स शिक्षा की भी दुहाई देता मिल जायेगा। केवल फेसबुक ही नहीं कई सोशल नेटवर्किंग साइट है जिनका दोस्त बनो का संदेश मेल के माध्यम से आता है। सुंदर-आर्कषक महिला या लड़की फोटो प्रोफाइल के साथ फे्रंड रिक्वेसट भेजती हैं कि फ्लांना सोशल नेटवर्किंग साइट से जुड़े और मुझसे दोस्ती करें। और फिर सिलसिला चल पड़ता है।</span></p>
<h3 style="text-align: justify;">एक समय सेटेलाइट टी.वी. के माध्यम से देर रात में विदेशी  चैनलों से परोसे जाने वाले पोर्न सामग्री बुद्धू बक्सा के जरिये घर-घर पहुंचा तो बवाल हो गया। लोग व सरकार हरकत में आयी। रोक लगाने की प्रक्रिया हुई। और आज बुद्धू बक्सा के बाद प्रोन सामग्री कम्प्यूटर के माध्यम से रीडिंग टेबल पर आ चुका है। लेकिन इस बार इसे रोक पाना सरकार के बूते की बाहर की बात लगती है। यह अलग बात है कि कुछ तकनीकी व्यवस्था कर सरकारी / गैरसरकारी दफ्तरों में सोशल नेटवर्किंग को देखने पर रोक लगा दी गयी है। यह रोक कुछ मीडिया हाउसों में भी है। यह रोक शुद्ध रूप से फैलते अपसंस्कृति के दुष्परिणाम को देख कर उठाया गया कदम प्रतीत होता है। अपसंस्कृति परोसते इन सोशल नेटवर्किंग के पेज लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि फेसबुक लेटनाइट टाॅक / रिलेशनशिप / मैरेज/ सेक्स आदि के अश्लील पेज को पसंद करने वालों की संख्या बीसियों हजार तक पहुंच गयी हैं, दिनों दिन इसके पेज पर जाकर इसका रस्वादन करने वालों की संख्या बढ़ती  ही जाती है।</h3>
<h3 style="text-align: justify;">सोशल नेटवर्किंग पर अपसंस्कृति परोसने का मामला केवल पोर्न तक ही सीमित नहीं है बल्कि यहाँ  संस्कृति को लांघते हुए भी देखा जा सकता है। राजनेताओं/ खिलाड़ियों आदि की तस्वीरें इस तरह पोस्ट की जाती है जो भारतीय संस्कृति-परंपरा के कतई परिचायक नहीं प्रतीत होती हैं।</h3>
<h3 style="text-align: justify;">सोशल नेटवर्किंग साइट पर लड़के-लड़कियों के पोस्ट पर पोर्न तस्वीर पोस्ट करना आम बात है। फ्रेंड रिक्वेस्ट से सोशल नेटवर्किंग साइट पर दोस्त बने दोस्त एक दूसरे के पोस्ट पर पोर्न तस्वीर, खूब पोस्ट करते हैं, जिसके पेज पर पोर्न तस्वीर पोस्ट होता है, उसे तब पता चलता है जब कोई उसका करीबी उसे सूचित करता है कि देखों तुम्हारे पोस्ट में पोर्न तस्वीर पोस्ट है। हालांकि ऐसे पोस्ट को हटाने का विकल्प मौजूद है लेकिन तब तक वह पोर्न पोस्ट उसके लिस्ट के सभी दोस्तों के पास पहुंच जाता है। कई ऐसे मामले आये हैं जहाँ  लड़की के नाम से उसके दोस्त एकाउंट खोल देते हैं और उसकी तस्वीर पोस्ट कर, अष्लील बातें/फोटो शेयर करने लगते हैं जिस लड़की के नाम से एकाउंट होता है उसे इस बात का पता तब चलता है जब उसे उसके ही दोस्त बताते हैं या कमेंट पास करते हैं। फेक एकाउंट खोलने की खबर आये दिन मीडिया में आती रहती है। साइबर क्राइम का यह मामला अखबरों की सुर्खियां तक बन जाती है। यह तो हुई पोर्न की बात, सोशल नेटवर्किंग साइट अपराध को भी जमकर बढ़ावा दे रहा है। पिछले दिनों भिलाई के एक इंजीनियरिंग कालेज के छात्र के चैट किए गए तमाम शब्द की कॉपी कर हैकर ने उसके पिता को भेज दी थी। भेजने से पहले हैकर ने ब्लैकमेल की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। इस साइट के जरिए रोज किसी न किसी रूप में लोग साइबर क्राइम के शिकार हो रहे हैं।</h3>
<h3 style="text-align: justify;">देखा जाये तो लब्बो-लुआब यह है कि साकारात्मक के बीच सोशल नेटवर्किंग साइट तेजी से  नकारात्मकता यानी  सेक्स/अपराध का एक केन्द्र बन गया है। समाज के सेलिब्रेटी के नाम से फर्जी प्रोफाइल तैयार करने की घटनाएं भी आम होती जा रही हैं। भूमंडलीयकरण के दौर में सोशल नेटवर्किंग की अपनी दुनिया स्थापित हो चुकी है। जहाँ कोई कायदा-कानून नहीं। इसकी अपनी संस्कृति है और दुख इस बात का है कि इस संस्कृति की राह को पढ़ें-लिखें वर्ग ने ही पकड़ रखा है।</h3>
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		<title>पत्रकारिता के छात्रों के लिए महत्वपूर्ण पुस्तक ‘‘रेडियो पत्रकारिता’’</title>
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		<pubDate>Tue, 08 Nov 2011 15:23:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[इतिहास]]></category>
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		<description><![CDATA[पत्रकारिता का ताना-बाना आज पूरी तरह बदल गया है। रोज नये-नये तकनीक और पहलू, पत्रकारिता को एक अलग पहचान दिलाने में लगे हैं। सूचना तकनीक के विकास और विस्तार में पत्रकारिता के क्षेत्र इलेक्ट्रानिक मीडिया को दिनों-दिन विस्तार दे रहा है। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/11/Radio-PB.jpg"><img class="alignleft size-large wp-image-24443" title="Radio-PB" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/11/Radio-PB-500x376.jpg" alt="पत्रकारिता"width="500" height="376" /></a>पत्रकारिता का ताना-बाना आज पूरी तरह बदल गया है। रोज नये-नये तकनीक और पहलू, पत्रकारिता को एक अलग पहचान दिलाने में लगे हैं। सूचना तकनीक के विकास और विस्तार में पत्रकारिता के क्षेत्र इलेक्ट्रानिक मीडिया को दिनों-दिन विस्तार दे रहा है। इसके पारंपरिक संवाद ने  माध्यम को अपना बाना बदलने को विवश कर दिया है। बदलते दौर में इंटरनेट, एफ-एम रेडियो, मोबाईल मीडिया जैसे वैकल्पिक माध्यम हमारे जीवन के अंग बनते जा रहे हैं। ऐसे में प्रिंट मीडिया के साथ-साथ रेडियो पत्रकारिता के ताना-बाना का विकसित होना भी स्वाभाविक है। लेखक-पत्रकार संजय कुमार की सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘‘ रेडियो पत्रकारिता ’’ इन्हीं पहलूओं को समेटे हुए है।</h3>
<h3 style="text-align: justify;">रेडियो पत्रकारिता आज मीडिया के दौर में स्वतंत्र पाठ्यक्रम के तौर पर विकसित हो रही है। श्रोताओं को बांधे रखने के लिए रेडियो की तकनीक और स्वरूप में बदलाव आ रहा है। डिजीटल में यह कन्वर्ट हो रहा है। अब पाकेट में रेडियो आ चुका है। मोबाइल में रेडियो बजता है। रेडियो पत्रकारिता में हो रहे बदलाव को रेखांकित करता है पुस्तक ‘‘ रेडियो पत्रकारिता ’’।</h3>
<h3 style="text-align: justify;">इस पुस्तक में रेडियो पत्रकारिता खासकर समाचार के विभिन्न पहलुओं पर विशेष तौर से प्रमुखता दी गयी है। पुस्तक में रेडियो पत्रकारिता का इतिहास, समाचार लेखन, समाचार की भाषा, वाइस कास्ट, समाचार वाचन,साक्षात्कार, रेडियो के विभिन्न प्रकार और कार्यक्रमों के साथ-साथ भारत में प्रसारण के इतिहास पर रोशनी डाली गयी है। ‘‘ रेडियो पत्रकारिता ’’ पुस्तक, पत्रकारिता के छात्रों के लिए जहां महत्वपूर्ण है, वहीं पत्रकारिता में रूचि रखने वालों के लिए भी इसमें बहुत कुछ है।</h3>
<h3 style="text-align: justify;">पुस्तक: ‘‘ रेडियो पत्रकारिता ’’</h3>
<h3 style="text-align: justify;">लेखक: संजय कुमार</h3>
<h3 style="text-align: justify;">प्रकाशन वर्ष: 2011</h3>
<h3 style="text-align: justify;">मूल्य: पेपर बैक-रु. 75/-, हार्ड बाउंड-रु. 250/-</h3>
<h3 style="text-align: justify;">प्रकाशक: विशाल पब्लिकेशन, पटना / दिल्ली</h3>
<h3 style="text-align: justify;"></h3>
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		<title>निजी से बुरा नहीं सरकारी मीडिया</title>
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		<pubDate>Sat, 30 Jul 2011 16:15:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>

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		<description><![CDATA[सरकारी मीडिया को गरियाने का पुराना रिवाज रहा है। गाहे-बगाहे सरकारी मीडिया को गरियाने वाले लोग भले ही किसी न किसी रूप में सरकारी मीडिया से फायदा उठाते रहते हैं। वर्षों से सरकारी मीडिया के कार्यकलाप को लेकर खिंचाई होती ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a rel="attachment wp-att-18149" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/hindi-media-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ae/attachment/news-clipart/"><img class="alignleft size-medium wp-image-18149" title="news-clipart" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/news-clipart-300x271.jpg" alt="" width="210" height="190" /></a></p>
<p>सरकारी मीडिया को गरियाने का पुराना रिवाज रहा है। गाहे-बगाहे सरकारी मीडिया को गरियाने वाले लोग भले ही किसी न किसी रूप में सरकारी मीडिया से फायदा उठाते रहते हैं। वर्षों से सरकारी मीडिया के कार्यकलाप को लेकर खिंचाई होती रही है। लेकिन सरकारी बनाम निजी मीडिया की असलियत जनता जान चुकी है। वह जानती है कि कौन कितना सच खबर देता है। निजी मीडिया पर अपुष्ट खबरों के प्रकाशन व प्रसारण पर सवाल उठते रहते हैं लेकिन सरकारी मीडिया के साथ यह नौबत नहीं आती।</p>
<p>सरकारी और गैर सरकारी मीडिया ने आज पूरी तरह से व्यापकता को ले लिया है। देश में सरकारी मीडिया के समानांतर निजी मीडिया ने अपना साम्राज्य कायम कर लिया है। निजी मीडिया वहीं कुछ बकता है जो वह चाहता है। वह बाजार को देखता है और अपना बाजार बनाता है। सरकारी मीडिया सिर्फ और सिर्फ जनहित में अपने कार्यों को करता है। यह अलग बात है कि इसपर सरकार का भोंपू होने का आरोप मढ़ा जाता है।</p>
<p>दैनिक हिन्दुस्तान के 29 जुलाई के संपादकीय पेज पर नजरिया काॅलम में ‘‘एफएम खबरों से क्यों डरती सरकार’’ में जन संचार से जुड़े सहायक प्रोफेसर मुकूल श्रीवास्तव ने वहीं पुराना राग अलापा है। सरकार द्वारा एफएम निची चैनलों पर समाचारों के प्रसारण के लिए आकाशवाणी के समाचारों को प्रसारित करने की जो रियायत दी है उसपर उन्होंने अपने नजरिये में आकाशवाणी के समाचार को नीरस घोषित कर दिया है। समझ में नहीं आता कि जन संचार से जुड़े प्रोफेसर साहब को आकाशवाणी समाचार की नीरसता का आकलन कैसे हो गया। जनसंचार से वे जुड़े हुए है और उन्हें यह भी पता नहीं कि आकाशवाणी के समाचार जनहित का होता हैं । सरकार की नीति-योजना के बारे में दूर दराज के गांव में जहां अखबार भी नहीं पहुंचता वहां पहुंचायी जाती है। जो काम निजी मीडिया नहीं करता। मैं यहां सरकारी मीडिया से जुड़े होने के नाते सरकारी मीडिया की वकालत नहीं कर रहा, बल्कि सच्चाई बताने की कोशिश भर कर रहा हूं कि सरकारी मीडिया, निजी और कारपोरेट मीडिया से कहीं ज्यादा बेहतर विश्वसनीय है। यह अलग बात है कि सरकार ने एफएम चैनलों पर खबरों के प्रसारण के लिए किसे चुना। अगर उनकी बात मान ली जाती और एफएम निजी चैनलों को खबरिया चैनलों की तरह आम खबरों को प्रसारण की छूट दे दी जाती है तो क्या वे खबरिया चैनलों की तरह कथित अपुष्ट समाचारों का प्रसारण नहीं करेगें ? या फिर इस बात की गारंटी कौन लेगा कि एफएम निजी चैनलों पर प्रसारित होने वाले खबरों में वो कुछ नहीं जायेगा जो आज के मीडिया में जा रहा है।</p>
<p>ब्रेकिंग न्यूज और आगे निकलने की होड़ में खबरों के साथ खिलवाड़ करके चैनल खबर की सच्चाई पर नहीं जाते और प्रसारित कर देते हैं। जब खबर असत्य हो जाता है तो खंडन तक भी नहीं देते। रेडियो एक ऐसा सशक्त माध्यम है जो खबर को जंगल की आग की तरह फैलाता है और क्षण भर में ऐसा असर छोड़ जाता है कि हालात के बिगड़ने से रोक पाना असंभव प्रतीत होता है। इसके लिए उदाहरण रखने की जरूरत नहीं है। इसलिये इसके प्रसारण को लेकर नियम बने हैं। जिसका पालन होने से सरकारी भोंपू सा आरोप चिपका दिया जाता है। लोकतंत्र है सब को कुछ भी कहने का हक है ? ऐसे में सरकारी फैसला कहां तक सही है इसपर अध्ययन करने की जरूरत है। सरकार नतीजे को जानती है। जहंा तक नेपाल से प्रसारित एफ.एम रेडियो चैनल पर समाचार प्रसारण की बात श्री मुकूल श्रीवास्तव ने की है। लगता है  शायद वे सुनते नहीं होंगे ? भोजपुरी में प्रसारित ये समाचार भी कई बार पुष्ट व अपुष्ट के बीच पिसते मिल जाते हैं।</p>
<p>रेडियो के समाचार भले ही एकाध लोगों को नीरस लगता हो लेकिन उसका अपना वजूद है। अपनी पकड़ है। अपना विश्वास है। राज्यों से प्रसारित प्रादेशिक सामचार बात करना चाहूंगा। करोड़ों श्रोत्रा हैं इसके, इसपर जितना भरोसा करते है, शायद ही किसी अन्य माध्यम पर नहीं करते ? इसकी नीरसता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि रेडियो ने कभी भी अपुष्ट खबरें नहीं दी। पुष्टता इसकी पहचान है।</p>
<p>सबसे अहम् बात ये है कि जो आरोप सरकारी मीडिया पर लगता रहा है। वह बड़े हदतक सही नहीं है। रेडियो पर प्रसारित होने वाले समाचारों पर भले ही कथित तौर पर कभी कभी यह कह दिया जाए कि सरकार का भोंपू है, तो एक सवाल यहां पर उठता है क्या कोई मीडिया हाउस अपने खिलाफ खबर का प्रकाशन या प्रसारण करता है। भडास4मीडिया, मीडियाखबर, मीडियामोरचा, मोहल्लालाइव, सहित कई अंतरजालों पर अक्सर निजी मीडिया के अंदर की खबर आती रहती है। जो कभी प्रिंट या खबरिया चैनल पर नहीं आ पाता। बिहार के पटना से छपने वाले अंग्रेजी समाचार पत्र टाइम्स आॅफ इंडिया ने अपना प्रैस अचानक बंद कर दिया और कर्मचारी हड़ताल पर बैठ गये तो किसी मीडिया ने एक लाइन की खबर तक नहीं लगायी। हां, अंतरजालों पर यह खबर जरूर आयी। उदाहरण बहुत है नजरिया बदलना हो गया। हर का अपना महत्व है।</p>
<p>जहां  तक खबर का सवाल है तो हालात बदले हैं। सरकार के अंदर और बाहर की खबरें अब सरकारी मीडिया पर भी आने लगी हैं । रेडियो समाचारों को ध्यान से देखा जाए तो उसमें साफ है कि मुद्दों को/ सवालों को/ उसके लिमिट तक में ही उठाकर रखा जाता है। ऐसा कोई मौका नहीं जहां पक्ष और विपक्ष को बराबरी का मौका नहीं दिया जाता। यह संपादक पर निर्भर करता है कि बुलेटिन का स्वरूप कैसा हो पूरा का पूरा ध्यान जनहित पर होता है। खबरों में सांप, बिच्छू, सेक्स और उठा पठक की खबरों को रेडियो तरजीह कतई नहीं देता। ऐेसे में सवाल तो उठना ही है।</p>
<p>आलेख में एक और गंभीर बात लिखी गयी है जो पचता नहीं दिखता कि टेलीविजन में तो यह हाल है कि अगर दूसरे चैनल उपलब्ध हो तो कोई भी दूरदर्शन के समाचार नहीं देखना चाहता। पिछले ही दिनों एक चर्चित पत्रिका ने जाने माने मीडिया विश्लेषक की रिपोर्ट प्रकाशित की थी कि लोगों का रुझान दूरदर्शन समाचार के प्रति बढ़ा है। दूरदर्शन समाचार भी अन्य खबरिया चैनलों की राह पर नहीं चलता। ऐसे में खबरों को लेकर कोई सवाल ही नहीं उठते। दस-दस घंटें तक किसी खबर को रबर की तरह नहीं खींचता। सबसे ज्यादा नेटवर्किंग वाले दूरदर्शन को हमेशा कम आंका गया है। इसकी वजह है इसका सरकारी होना। बात वहीं पर आ जाती है कि कैसे कोई अपने ही संस्थान के खिलाफ जा सकता है। क्या कभी किसी मीडिया हाउस ने अपने ही खिलाफ कोई खबर छापी या प्रसारित की है ? शायद हाल ढूंढ़ते रह जाओगे वाला हाल हो जाये।  जो घटनाएं घटती है जिसमें जनहित से जुड़ी खबरें बनती है उसे दूरदर्शन जरूर दिखाता है ऐसा नहीं की खबरों पर आंखें बंद कर लेता है।</p>
<p>यह एक अलग बात है कि एफएम निजी रेडियो पर खबरों का अपना प्रसारण हो। स्वतंत्रता स्वायत्ता मिले लेकिन इसकी कौन गारंटी लेगा कि अगर सरकार निजी एफएम चैनलों पर उनके द्वारा तैयार खबरों के प्रसारण की अनुमति दे देती है तो खबरों के साथ वे न्याय कर पायेंगे ? जहां तक मेरा अपना मानना है कि रेडियो की सशक्तता को देखते हुए ही सरकार खबरों के प्रसारण निजी चैनलों को नहीं देना चाहती ताकि खबरों के बिगड़ते मिजाज के आगोश में रेडियो कहीं बदनाम न हो जाय। एक सवाल यह उठाया जाता रहा है कि अगर निजी टी.वी. चैनलों को खबर प्रसारण की छूट है तो निजी रेडियो को क्यों नहीं ? इसका एक जबाव है कि निजी टी.वी चैनलों की पहुंच इतनी नहीं, जितनी कि निजी रेडियो की हो सकती है। ऐसे में चैनलों के गलत खबर का असर उतना नहीं पड़ता जितना कि निजी रेडियो की पहुंच का हो सकता है। साथ ही चैनलों को मानीटर किया जा सकता है जबकि रेडियो को मानीटर करना आसान नहीं होगा।</p>
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		<title>सबक दे गया ‘न्यूज आफ द वर्ल्ड &#8216; का बंद होना</title>
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		<pubDate>Mon, 11 Jul 2011 10:20:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>

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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-17712" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/hindi-media-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/%e0%a4%b8%e0%a4%ac%e0%a4%95-%e0%a4%a6%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a4%be-%e2%80%98%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%9c-%e0%a4%86%e0%a4%ab-%e0%a4%a6-%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b2/attachment/endoftheworld1/"><img class="alignleft size-medium wp-image-17712" title="endoftheworld1" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/endoftheworld1-250x300.jpg" alt="" width="250" height="300" /></a>ब्रिटेन का सबसे ज्यादा प्रसारित साप्ताहिक टेबलेट अखबार ‘‘न्यूज आॅफ द वर्ल्ड’’ का अंतिम अंक 10 जुलाई 2011 को निकला और अपने अपने अंतिम संस्करण के मुख्य पृष्ठ पर ‘थैंक्यू एण्ड गुड बाय’ की घोषणा के साथ ही मीडिया जगत और पाठकों से विदा ले लिया। एक पूरे पृष्ठ पर प्रकाशित संपादकीय में अखबार ने पाठकों से माफी मांगते हुए लिखा कि ‘हम रास्ते से भटक गये थे’। अपने अखबार ने अंतिम संपादकीय में लिखा कि डेढ़ दशक से यह अखबार पाठकों की जिंदगी का हिस्सा बन गया था। इस अखबार ने 168 वर्षो में छह राजाओं के शासनकला को देखा। दुनिया को हिला देने वाली कई खबरों को प्रकाशित कर विश्व के मीडिया जगत में तहलका मचाया। अखबार का प्रकाशक न्यूज इंटरनेशनल ने पिछले सप्ताह फोन हैंकिंग के आरोपों  के बाद अखबार को बंद करने की घोषणा की थी।	‘न्यूज आॅफ द वर्ल्ड’ इसलिये चर्चित नहीं रहा कि इसने मीडिया जगत की खबरों को विश्व  स्तर पर उठाया। बल्कि इस अखबार को पीत पत्रकारिता के सबसे बड़े उदाहरण के तौर पर देखा जाता रहा है। 28 लाख प्रसार संख्या वाली इस अखबार ने अपने प्रसार संख्या को बनाये रखने के लिये कई हथकंडों वाली खबरों को प्रसारित किया। बड़े नामचीज लोगों की जिंदगी में ताक-झाक कर, पत्रकारिता के मापदंडों को ताक पर रखते हुए इसने ऐसी-ऐसी खबरें छापी जिससे यह पाठकों के एक वर्ग में अपनी पैठ बनाने में सफल तो रहा लेकिन मीडिया जगत में पीत पत्रकारिता का एक मिशाल बनकर उभरा। आज जब यह अखबार बंद हो चुका है तो मीडिया जगत में चर्चा आम है कि पीत पत्रकारिता के एक युग का अंत हो गया है। इस अखबार की पतन की शुरूआत उस समय हो गयी जब इसने पत्रकारिता को मिशन नहीं व्यवसाय के तौर पर देखा और पत्रकारिता के नैतिकता को ताक पर रख पीत पत्रकारिता को बढ़ावा दिया। कई ऐसे उदाहरण हैं, इसने खबर को सनसनी, मसालेदार बनाकर पेश किया। जहां एक ओर प्रसार संख्या बढ़ाने के लिये इस अखबार ने तमाम हथकंडे अपनाए वहीं पाठकों की सहानुभूति धीरे-धीरे जाती गयी। विज्ञापन देने वालों ने अपने हाथ खींच लिये। अंत में थक हार कर, इसके मालिक मर्डोक को अखबार को बंद ही करना पड़ा। ‘न्यूज आॅफ द वर्ल्ड ’ एक अक्टूबर 1843 को लंदन से यह शुरू हुआ था। शुरू में इसके पाठक बड़े ही साधारण वर्ग के थे। शुरू से ही यह चटपटी खबरें यह देता रहा था। इसकी वजह पाठकों का आम होना था। लेकिन धीरे-धीरे इस अखबार ने अपनी पकड़ बना ली। 1950 तक इसका प्रसार संख्या 90 लाख तक पहुंचा। 1969 को इसे मर्डोक ने खरीद लिया। लेकिन उन्होंने इस सुधारा नहीं बल्कि अखबार को शिखर पर पहुंचाने के लिये पीत पत्रकारिता से जुड़ी खबरों को ही तरजीह देते गये और फिर नतीजा सामने हैं।	‘न्यूज आॅफ द वर्ल्ड’ विश्व  के मीडिया में यह अखबार पीत पत्रकारिता कर अपने को शिखर पर पहुंचाया लेकिन आज जो उसका हश्र हुआ है वह मीडिया के लिये एक सबक है। खासकर भारतीय मीडिया के लिये जहां हजारों पत्र पत्रिकाएं राजधानी दिल्ली से लेकर जिला मुख्यालयों से प्रकाषित हो रही हैं और ये पत्र भी कहीं न कहीं से अपने मिशन को पीछे छोड़ पीत पत्रकारिता के आगोश  में है। तभी तो खबर लेकर पैसा छापने, पेड न्यूज, पत्रकारों द्वारा दलाली, सत्ता पक्ष को आंख बंद कर समर्थन देना सहित अन्य भ्रष्टचार के वे सभी आरोप हैं जो  भारतीय मीडिया पर लगता रहा है। 500 से ज्यादा देशभर में संचालित खबरिया चैनल भी टीआरपी के चक्कर में उसी रास्ते पर चल रहे हैं जिस ‘न्यूज आॅफ द वर्ल्ड ’ अखबार चल रहा था। अखबार का हश्र तो सामने है। अब भारतीय मीडिया को भी सोचना होगा, समझना होगा और पत्रकारिता के नैतिकता पर अमल करते हुए पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं मिशन के रास्ते पर लाना ही होगा। न्यूज आॅफ द वर्ल्ड ‘ अखबार का बंद होना भारतीय मीडिया के लिये भी एक संदेश  है। उनके लिये जो टीआरपी और प्रसार बढ़ाने के लिये खबरों के साथ आये दिन खिलवाड़ करते रहते हैं। झूठी खबरों का प्रसारण प्रकाशन कर थोड़ी देर के लिये वाहवाही तो लूट लेते हैं लेकिन खबर पर उठे सवाल पर और उसकी असत्सयता पर खंडन छापने या प्रसारित करने की भी जहमत तक नहीं उठाते। ऐसे में भले ही यह दुख बात है कि 168 वर्षो से प्रकाशित होना वाले अखबार की मौत हो गयी । वजह सामने हैं। वजह जो दिख रहा है वह उसके मिशन से हट जाना और पाठकों का विश्वास  खो जाना अह्म है और यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है, जो भारतीय मीडिया को सचेत कर गया है।</p>
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		<title>तेवर खोती उर्दू मीडिया</title>
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		<pubDate>Thu, 19 May 2011 08:59:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[उर्दू मीडिया]]></category>
		<category><![CDATA[तेवर खोती उर्दू मीडिया]]></category>
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		<description><![CDATA[यों तो देश के चर्चित उर्दू अखबरों में आठ राज्यों से छप रहा ‘रोजनामा’ हैदराबाद से ‘सियासत’ और ‘मुंसिफ’, मुंबई का ‘इंकलाब’, दिल्ली से ‘हिन्दुस्तान एक्सप्रैस ’ व ‘मिलाप’, कनाटर्क से ‘दावत’ और पटना से ‘कौमी तन्जीम’ सहित अन्य उर्दू ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-15999" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/hindi-media-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%82-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/attachment/urdu-paper-31/"><img class="alignright size-full wp-image-15999" title="urdu-paper-31" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/urdu-paper-31.png" alt="" width="295" height="545" /></a>यों तो देश  के चर्चित उर्दू अखबरों में आठ राज्यों से छप रहा ‘रोजनामा’ हैदराबाद से ‘सियासत’ और ‘मुंसिफ’, मुंबई का ‘इंकलाब’, दिल्ली से ‘हिन्दुस्तान एक्सप्रैस ’ व ‘मिलाप’, कनाटर्क से ‘दावत’ और पटना से ‘कौमी तन्जीम’ सहित अन्य उर्दू पत्र इस कोशिश में लगे हैं कि उर्दू पत्रकारिता को एक मुकाम दिया जाए। लेकिन बाजार और अन्य समस्याओं के जकड़न से यह निकल नहीं पा रहा है। भारतीय मीडिया में हिन्दी व अंग्रेजी की तरह उर्दू समाचार पत्रों का हस्तक्षेप नहीं दिखता है। वह तेवर नहीं दिखता जो हिन्दी या अंगे्रजी के पत्रों में दिखता है। आधुनिक मीडिया से कंधा मिला कर चलने में अभी भी यह लड़खड़ा रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">देखा जाये तो उर्दू पत्रकारों की स्थिति बद से बदतर है तो महिला पत्रकार नहीं के बराबर हैं। यह इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार से प्रकाशित एक दर्जन से ज्यादा उर्दू अखबरों में एक भी महिला श्रमजीवी पत्रकार नहीं है। पटना से प्रकाशित एक बड़ा उर्दू अखबार अपने पत्रकारों को पांच हजार से बीस हजार रूपये महीना तनख्वाह देता है जबकि मंझोल और छोट उर्दू अखबारों में शोषण जारी है। वहाँ पत्रकारों को तनख्वाह सरकारी दफ्तरों में कार्यरत आदेशपाल से भी कम मिलता है। वहीं अखबारों पर आरोप है कि वे विज्ञापनों के लिए निकल रही हैं। एक आध उर्दू पत्र दिख जाते हैं बाकि की फाइलें बनती है। एक ओर वर्षों से बिहार सहित देष भर में बडे/मंझोले/छोटे उर्दू अखबार उर्दू भाषी जनता के लिए अपनी परंपरागत तरीके से  अखबार निकाल रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर उर्दू अखबरों के प्रकाशन क्षेत्र में कारपोरेट जगत घुसपैठ कर उनकी नींद उड़ा रही है। सहारा ग्रुप तो पहले ही आ चुका है अब इस क्षेत्र में हिन्दी के बड़े अखबार घराने कूदने की पूरी तैयारी की चुकें हैं। ऐसे में पांरम्परिक उर्दू अखबारों के समक्ष चुनौतियों का दौर शुरू होने जा रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">इसमें कोई शक नहीं कि देश में उर्दू पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। आजादी के आंदोलन से लेकर भारत के नवनिर्माण में उर्दू के पत्रकारों और उर्दू पत्रकारिता ने अपना योगदान देकर एक बड़ा मुकाम बनाया है। लेकिन, हकीकत यह है कि मीडिया के झंझावाद ने लोकतंत्र के चैथे खम्भे को मजबूत बनाने में उर्दू के पत्रकारों और उर्दू पत्रकारिता के योगदान को आज दरकिनार कर दिया गया है। उर्दू पत्र व पत्रकार अपने बजूद के लिए आज हर मुकाम पर संघर्ष कर रहे हैं। इसके लिए किसी ने उर्दू पत्रकारिता की हालत बंदर के हाथ में नारियल जैसी बताया, तो किसी ने उर्दू पत्रकारिता को आज अपने मूल उद्देश्यों से हटकर चलते हुए। उर्दू पत्रकारिता की बदहाल दषा और दिशा पर कई पत्रकारों से बातचीत हुई। कई सवालों को खंगाला गया। उर्दू दैनिक ‘कौमी तन्जीम’ पटना के संपादक एस.एम. अजमल फरीद  सच को स्वीरकते हुए कहते है, सच है कि वर्तमान समय में उर्दू अखबारात अंग्रेजी और हिन्दी समाचार पत्रों की तुलना में उतनी गति हासिल नहीं कर पा रहे हैं  जितना कि इसका स्वर्णिम इतिहास रहा है। चाहे वो आधुनिक तकनीक अपनाने, विषय वस्तु विषेशज्ञ पत्रकारों की टीम तैयार करने या आज खुद को बिल्कुल नये रूप में ढालने की बात हो। इनका दायरा  थोड़ा सीमित है। उर्दू भाषा जिसकी महत्ता और उच्चारण की मधुरता को स्वीकार तो सब कोई करता है लेकिन इसके विकास के लिए सामूहिक प्रयास नहीं किए जा रहे हैं और इसको एक विषेश वर्ग से जोड़कर देखा जाने लगा है। श्री फरीद कहते हैं कि इन सब के बावजूद एक सीमित संसाधन में उर्दू अखबारात पाठक वर्ग तक बेहतर अखबार पहुंचाने का प्रयत्न कर रहे हैं और अच्छी संख्या में उर्दू अखबारात पाबंदी से प्रकाशित हो रहे हैं। उर्दू अखबारात की प्रसार संख्या और पाठकों की संख्या में भी अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है। उर्दू अखबारात का महत्व अंग्रेजी या हिन्दी समाचार पत्रों की तुलना में इस मायने में अब भी बरकरार है कि सकारात्मक पत्रकारिता उर्दू अखबारों का मूल उद्देश्य है जहां अंग्रेजी और हिन्दी समाचार पत्रों में पश्चिमी संस्कृति पूरी तरह हावी नजर आती है। खबरों से लेकर तस्वीरों की प्रस्तुति में जिस तरह का खेल अंग्रेजी और हिन्दी अखबारों में खेला जा रहा है। इससे उर्दू अखबारात अब भी बहुत हद तक सुरक्षित हैं। समाचार या लेख की प्रस्तुति में भी इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि भारतीय परंपरा और गंगा-यमुनी संस्कृति का ही समावेश  हो। पाठक वर्ग का ध्यान रखते हुए भले ही अल्पसंख्यकों के साथ नाइंसाफी या जुल्म की खबरों को थोड़ी प्राथमिकता मिलती है लेकिन इसमें सांप्रदायिक सौहार्द बना रहे यह अब भी उर्दू अखबारों का बड़ा लक्ष्य होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">श्री फरीद जोर देकर कहते है कि हाल के वर्षों में कारपोरेट घरानों का आकर्षण भी उर्दू अखबारों की ओर बढ़ा है और अब कारपोरेट घराने भी उर्दू अखबार निकाल रहे हैं, जिससे इस बात की आषंका बढ़ गई है कि भारतीय संस्कृति और परम्पराओं को बरकरार रखते हुए अबतक उर्दू पत्रकारिता जो एक स्वस्थ समाज की कल्पना के साथ आगे बढ़ रही थी वो बाधित हो सकती है, क्योंकि कारपोरेट घरानों के उर्दू अखबार भी पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित नजर आते हैं और अपने पाठकवर्ग के विचारों की अनदेखी करते हुए उनपर एक नयी  संस्कृति थोपने का प्रयास किया जा रहा है। वहीं उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार ख़ुर्शीद हाशमी  कहते है कि मुझे उर्दू पत्रकारिता की दशा और दिशा दोनों गड़बड़ नजर आती है। मेरी नजर में उर्दू पत्रकारिता की हालत आज वैसी ही है जैसी बंदर के हाथ में नारियल की होती है। बंदर नारियल के साथ कब तक खेलेगा, कब उसे पानी में उछाल देगा या कब उसे किसी के सिर पर दे मारेगा, कहना मुश्किल है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह स्थिति इसलिए है कि उर्दू पत्रकारिता मुख्यतः आज भी निजी हाथों में हैं। उर्दू पत्रकारिता के भाग्य विधाता वह लोग बने बैठे हैं, जो न उर्दू जानते हैं और न पत्रकारिता का ज्ञान रखते हैं। यह लोग उर्दू पत्र-पत्रिकाओं के मालिक होते हैं। मालिक होने के नाते नीति-निर्धारक से लेकर संपादक और व्यवस्थापक तक सब कुछ यही लोग होते हैं। वे जैसा चाहते हैं, करते हैं। उनकी नजर में पत्रकारों की कोई अहमियत नहीं होती है। वह उन्हें क्लर्क या एजेन्ट के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, इसलिए अधिक तेज या पढ़े-लिखे लोग उनको रास नहीं आते, वैसे भी अधिक पढ़े-लिखे लोग महंगे होंगे, और यह लोग चीफ एंड वेस्ट में विश्वास रखते हैं। ऐसी स्थिति में अगर कोई तेज पत्रकार आ भी जाता है तो वह उनकी उपेक्षा का शिकार हो जाता है। उसकी हर बात और हर राय की अनदेखी करके उसे उसकी औकात बता दी जाती है। वे कहते हैं कि हम बिजनेस करने के लिए आये हैं, और बिजनेस कैसे करना है, यह हम जानते हैं, लेकिन वास्तव में वह बिजनेस करना भी नहीं जानते, इसलिए वह उर्दू की सेवा या पत्रकारिता तो करते ही नहीं, ढंग से बिजनेस भी नहीं कर पाते हैं। श्री हाशमी कहते हैं, उर्दू पत्रकारिता में अब कारपोरेट सेक्टर ने भी पांव पसारना शुरू कर दिया है। वैसे तो वहां भी कुछ समझौते होते हैं और कई बार अयोग्य लोगों को कमान सौंप दी जाती है, जो अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए अपने से भी अधिक अयोग्य लोगों को लाकर पत्रकारिता की कबर खोदने का प्रयास करते हैं, फिर भी निजी हाथों की तुलना में कारपोरेट सेक्टर में स्थिति अच्छी है। मगर समस्या यह है कि कारपोरेट सेक्टर का नाम सुनते ही उर्दू के पाठक भड़क उठते हैं। उन्हें लगता है कि कारपोरेट जगत के अखबार उनकी आवाज मजबूती के साथ नहीं उठा सकते और उनके हितों की रक्षा नहीं कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार और पटना कामर्स कालेज के पत्रकारिता विभाग के काडिनेटर तारिक फातमी का मानना है कि उर्दू पत्रकारिता आज अपने मूल उद्देश्यों से हटकर एक ऐसे रास्ते पर चल पड़ी है जहाँ दूर-दूर तक बेहतर भविष्य के लिए  रौशनी की कोई किरण दिखाई नहीं देती है। उर्दू प्रेस के मालिकान उर्दू पत्रकारिता के भविष्य को लेकर चाहे जितने भी आशांवित हों लेकिन दरअसल एक कडवी सच्चाई यह भी है की उर्दू पत्रकारों का भविष्य उस अँधेरे कुँए की तरह है जहाँ से न रौशनी की उम्मीद की जा सकती और न प्यास बुझाने के लिए पानी की, दूसरे शब्दों में कहें तो उर्दू पत्रकार आज अपने भविष्य को लेकर एक अनिश्चितता के स्थिति से गुजर रहा है और अपने भविष्य की  इसी अनिश्चिता के कारण वह परेशान भी है। दुखी भी। जो लोग उर्दू पत्रकारिता के स्वर्णिम इतिहास की बातें करते हैं उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए की जिन लोगों ने उर्दू पत्रकारिता की नीवं रखी थी उनका उद्देश्य पैसा कमाना नहीं बल्कि समाज और मानवता की सेवा करना था, लेकिन आज स्थिति उलट गई है। आज उर्दू प्रेस मालिकों का एक मात्र उद्देश्य सरकारी और निजी  विज्ञापनों को प्रकाशित करके पैसा कमाना और उर्दू समाचार पत्रों में कार्यरत श्रमजीवी पत्रकारों से बेशर्मी के साथ उनका शोषण करना मात्र है। आप बिहार से प्रकाशित किसी भी उर्दू समाचार पत्रों  के कार्यालयों में चाहे वो कौमी तंजीम, फारूकी तंजीम, पिनदार, संगम, प्यारी उर्दू हो या कार्पोरेट जगत द्वारा प्रकाशित रोजनामा उर्दू सहारा, का भ्रमण करे तो आपको वहां कार्यरत पत्रकारों दशा देख कर मेरे दावे की पुष्टि हो जाएगी कौमी तंजीम, के संपादक  उर्दू पत्रकारिता के भविष्य को लेकर  खुशफहमी के शिकार हैं, सच्चाई  यह है की भविष्य उर्दू पत्रकारिता का नहीं उनका जरूर उज्जवल है क्योंकि उर्दू समाचार पत्र के मालिक हैं, वह स्वय पत्रकार नहीं, उन्हें संपादक का पद विरासत में मिला है, उन्होंने कभी चिलचिलाती धूप, कड़कड़ाती सर्दी या भरी बरसात में मीलों पैदल चल कर समाचारों का संकलन नहीं किया। इसलिए उन्हें उस दर्द का एहसास नहीं होगा, जो दो हजार से पांच हजार की पगार पर बारह-बारह घंटों तक दफ्तर में बेगारी करने वाले श्रमजीवी पत्रकारों को होता है। यही हाल बिहार से प्रकाशित होने वाले सभी दैनिक समाचार पत्रों का है, पिन्दार, फारूकी तंजीम,संगम, इन सभों के वर्तमान मालिकों (तथाकथित संपादकों) का पत्रकारिता से कोई लेना-देना कभी नहीं रहा। इन तथाकथित संपादकों में कोई किरानी की नौकरी करता था तो कोई चिकित्सक है, कोई ठेके पर समाचार पत्र निकाल रहा है, तो कोई कमीशन पर विज्ञापन प्रकाशित करने के लिए समाचार पत्र का संपादक बना बैठा है। जाहिर है जब स्थिति इतनी भयावह हो तो उर्दू पत्रकारिता की दशा और दिशा का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। सचाई तो ये है की आज पूरे देश विशेष कर बिहार में उर्दू पत्रकारिता उसी तरह दिशाहीन है जिस तरह देश का अल्पसंख्यक नेतृत्व, जिस तरह अल्पसंख्यक समुदाय आज मुस्लिम नेताओं के हाथों छला जा रहा है उसी तरह तथाकथित संपादकों द्वारा उर्दू पाठक और उर्दू समाचर पत्रों में कार्य करने वाले श्रमजीवी पत्रकारों का शोषण और दोहन जारी है। बिहार की उर्दू पत्रकारिता आज सत्ता के इर्द -गिर्द घूम रही है । हर समाचार पत्र सरकारी विज्ञापन पाने के लिए वर्तमान सरकार की हर सही-गलत नीतियों का समर्थन करना अपना धर्म और फर्ज समझता है ,पद और सम्मान पाने के लिए उर्दू समाचार पत्रों के कुछ पत्रकार सत्ता के गलियारों में नेताओं के आगे-पीछे दुम हिलाते और चापलूसी करते देखे जा सकते हैं। जाहिर है जब एक पत्रकार पद, पैसा और समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए राजनीतिज्ञों के पास अपना आत्मसम्मान गिरवी रख दे तो उस समाचार पत्र या पत्रकार से समाज कल्याण, मानव सेवा, भाषा, देश, राज्य और समाज के विकास में भागीदारी निभाने की आशा करना बेमानी है। देश और विशेष कर बिहार की उर्दू पत्रकारिता में आज जोश ,जज्बा और क्षमता नहीं है कि वह किसी बड़े आन्दोलन की अगवाई कर सके ?</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरी ओर ‘बिहार की खबरें’ के संपादक अंजुम आलम कहते हैं कि बिहार से सर्वप्रथम प्रकाषित होने वाला पत्र भी उर्दू था। इसके बावजूद इसकी वर्तमान दषा उत्साहवर्द्धक नहीं है। हालांकि अभी भी पटना सहित राज्य से दर्जनों उर्दू दैनिक एवं पचासों पत्रिकायें प्रकाशित हो रही हैं परंतु इनका स्तर उस बुलंदी पर नहीं है, जिसकी उम्मीद की जाती है। बिहार में उर्दू को द्वितीय राजभाषा का भी दर्जा प्राप्त है। उर्दू समाचार पत्रों को राज्य सरकार से विज्ञापन भी मिलता है। सरकारी विज्ञापनों के कारण उर्दू समाचार पत्रों की आर्थिक स्थिति सम्पन्न नहीं तो संतोषजनक अवश्य है। इसके बावजूद उर्दू पत्रकारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। परिणाम स्वरूप  युवा पीढ़ी उर्दू पत्रकारिता की ओर आकर्षित नहीं हो रही है। इस कारण आने वाले दिनों में उर्दू समाचार पत्रों को संकटमय स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। अखबार मालिकों को इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। श्री अंजुम आलम कहते है कि स्वतंत्रता के बाद से गुलाम सरवर, शीन मुजफ्फरी, शाहिद राम नगरी इत्यादि उर्दू पत्रकारों, जो मील का पत्थर छोड़ा था वहां तक आज कोई नहीं पहुंच पाया है। मौजूदा उर्दू पत्रकारिता जगत में आज भी कई अच्छे पत्रकार सक्रिय हैं। परंतु, उनकी दशा  से नई नस्ल प्रभावित नहीं हो पा रही है। आज का युवा वर्ग इसे करियर के रूप  में अपनाने का इच्छुक नजर नहीं आ रहा है। उर्दू में अभी बिहार से कई रंगीन एवं आकर्षक उर्दू समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे हैं लेकिन सीमित समाचार नेटवर्क का अभाव पाठकों को खटकता है। उर्दू समाचार पत्र सामान्यतः आम लोगों द्वारा प्रकाशित होते थे। परंतु हाल के वर्षों में सहारा इंडिया ने इस क्षेत्र में भी कदम रखा है।</p>
<p style="text-align: justify;">उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार राशिद अहमद का मानना है कि भारत की राजनीति विशेष रूप से स्वतंत्रता संग्राम में अदम्य भूमिका निभाने वाली उर्दू पत्रकारिता आज हिन्दी और अंग्रेजी की तुलना में पिछड़ गई है। यह एक कटु सत्य है मगर यह भी सच है कि जहां एक ओर इसके पिछड़ेपन की बात में कहानी और कल्पना अधिक है वहीं इसके पिछड़ेपन के आयाम भी विचारनीय हैं। उर्दू पत्रकारिता का पिछड़ापन पत्रकारिता के मूल तत्व से जुड़ा हुआ नहीं है क्योंकि अगर मुद्दों और सामाजिक सरोकारों की बात करें, तो समय की मांग और समस्या के मूल्यांकन में यह पीछे नहीं रही, तुलनात्मक अध्ययन करते समय कुछ बातों की अनदेखी की जाती है, जिसके कारण नतीजा गलत निकलता है। समाचार पत्र के सरोकारों का सीधा नाता उसके पाठकवर्ग से होता है। समाज की विस्तृत तस्वीर पेश  करने के साथ-साथ समाचार पत्र और उससे जुड़े पत्रकार उस पूरे फ्रेम में अपने पाठक के स्थान तलाश  करते हैं और उचित स्थान न मिल पाने के कारण और उससे जुड़ी समस्याआंे का मूल्यांकन करते हैं। अंग्रेजी हिन्दी पत्रकारिता का विश्लेषण करते समय तो पाठक तत्व का विशेष ध्यान रखा जाता है मगर उर्दू पत्रकारिता के विश्लेषण के समय उसके पाठक तत्व को अनदेखा करके उसे उर्दू और हिन्दी के पाठक तत्व की कसौटी पर परखा जाता है। कहने का मतलब केवल इतना है कि उर्दू पत्रकारिता की बदहाली मुद्दों और सरोकारों से दूर रहने की नहीं है बल्कि आर्थिक पिछड़ेपन की कहानी है।</p>
<p style="text-align: justify;">समाचार पत्र का अर्थ विज्ञापन से जुड़ा हुआ है। मगर उर्दू समाचार पत्रों को हमेशा विज्ञापन के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। संघर्षरत रहना पड़ता है। विज्ञापन सरकारी हो या गैर सरकारी। व्यापारी भी उर्दू पाठक को अपना उपभोक्ता तो जरूरत समझते हैं। उसके हाथ अपना सामान अधिक से अधिक बेचने का प्रयास तो जरूर करते हैं। मगर उन तक पहुंचने का रास्ता वह उर्दू समाचार पत्र के स्थान पर दूसरी भाषाओं के समाचार पत्रों में तलाश  करते हैं। यह मानना होगा कि आर्थिक तंगी के कारण नई तकनीक अपनाने में उर्दू पत्रकारिता पिछड़ जाती है। वह नए प्रयास नहीं कर पाती, यह भी सही है कि आर्थिक तंगी के कारण उर्दू समाचार पत्र अपने पत्रकारों को उतनी और सुविधायें नहीं दे पाते जितना हिन्दी और अंग्रेजी पत्रकारों को मिलती है। इस ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">वरिष्ठ उर्दू पत्रकार इमरान सगीर  कहते है शुरूआती दौर में उर्दू अखबारों को यह गौरव हासिल था कि उर्दू अखबार के संपादक या पाठक किसी विशेष वर्ग के नहीं हुआ करते थे, बल्कि यह पूरे तौर से सामान्य वर्ग के लिए था। लेकिन समय के साथ-साथ परिवर्तन यह हुआ कि उर्दू अखबार एक विशेष वर्ग तक सीमित होने लगा। ये उर्दू पत्रकारिता के लिए सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है। आज हिन्दी और अंग्रेजी पत्रकारिता में बड़ी क्रांति आयी है, लेकिन इसकी अपेक्षा उर्दू पत्रकारिता को उतनी गति नहीं मिल पा रही है। हिन्दी और अंग्रेजी समाचार-पत्रों की तुलना में  आधुनिक तकनीक को अपनाने में अब भी उर्दू अखबरात संघर्षरत हैं, इसका कारण स्पष्ट है कि सरकारी स्तर पर इसे अपेक्षाकृत सहयोग नहीं मिल पाता वहीं निजी या व्यवसायिक विज्ञापनों से भी उर्दू समाचार-पत्रों को उतनी आमदनी नहीं हो पाती जिससे की आर्थिक रूप से संपन्न हो सकें। इन सबके बावजूद सीमित संसाधनों में उर्दू अखबरात सकारात्मक सोच के साथ उर्दू पत्रकारिता के सफर को आगे बढ़ा रहे हैं। उर्दू अखबरात की सबसे बड़ी खूबी ये है कि ये आम आदमी का अखबार होने का धर्म निभाते हैं। हिन्दी या अंग्रेजी समाचार-पत्रों तक आम लोगों की पहुंच आसान नहीं हो पाती, वहीं उर्दू अखबार तक समाज में हाशिये पर खड़ा व्यक्ति की भी आसानी से पहुंच सकता है। अर्थात् समाज का कोई व्यक्ति उर्दू अखबारों से बिल्कुल जुड़ा हुआ महसूस करता है। ये उर्दू अखबारों की लोकप्रियता का बड़ा कारण है। उर्दू अखबारों की विश्वसनीयता और महत्ता इसके पाठक वर्ग में इसे लेकर भी है, कि ये उनके साथ होने वाली किसी भी स्तर पर नाइंसाफी की आवाज प्रमुखता से उठाते हैं, ऐसी खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं, जिन्हें भेदभाव के नतीजे में अंग्रेजी या हिन्दी समाचार-पत्रों में या तो जगह नहीं दी जाती या फिर उन्हें तोड़-मरोड़कर संक्षेप में किसी कोने में जगह दी जाती है। ऐसे में उर्दू समाचार पत्र ही उनकी उत्सुकता दूर कर पाते हैं। आज के आधुनिक युग में दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों में जहां लोगों को उर्दू अखबार नहीं मिल पाता, वैसे गांव के लोग अब भी उर्दू अखबार के दफ्तर से डाक के माध्यम से अखबार मंगाते हैं, और दो-तीन दिन पुरानी ही सही लेकिन इसे पढ़ना जरूर पसंद करते हैं। डाक से अखबार मंगा का कर पढ़ने का शौक उर्दू अखबारों की अहमियत का एक बड़ा उदाहरण है। ऐसे में उर्दू पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल ही कहा जायेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">उर्दू पत्रकारिता में महिलाएं नहीं के बराबर है। बल्कि उर्दू पत्रकारिता  से कोसो दूर है। स्वतंत्र  उर्दू पत्रकार डा0 सुरैया जबीं कहती है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में नई क्रांति तो आयी अंग्रेजी और हिन्दी समाचार-पत्रों की तुलना में न सही लेकिन उर्दू पत्रकारिता में भी क्रांति आयी है। बड़ी संख्या में उर्दू समाचार-पत्र नये रंग-रूप में प्रकाशित किये जा रहे हैं। जहां आधुनिक तकनीक का प्रयोग भी हो रहा है। समाचारों की प्रस्तुति में सीमित दायरे से बाहर निकलकर अब उर्दू अखबारों में भी सामान्य खबरें पढ़ने को मिलती हैं। अलग-अलग विषयों पर साप्ताहिक विशेषांक भी प्रकाशित होते हैं, और अंग्रेजी और हिन्दी समाचार-पत्रों की तरह खुद को स्थापित कर रहे हैं। यह उर्दू पत्रकारिता के लिए एक शुभ संकेत हैं। पहले उर्दू अखबारों में खबरों का दायरा बिल्कुल सीमित था। वर्तमान में उर्दू पत्रकारिता के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण बात ये भी है कि बिहार की उर्दू प्रिंट मीडिया में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर है, क्योंकि उर्दू अखबारों में महिला मीडियाकर्मियों को इन्ट्री नहीं मिल पाती, आज कालेजों में उर्दू पत्रकारिता में डिप्लोमा कोर्स भी चलाये जा रहे हैं। उर्दू पत्रकारिता में डिप्लोमा प्राप्त करने वालों में बड़ी संख्या छात्राओं की भी है, लेकिन इन्हें भी उर्दू अखबारों के दफ्तरों में इन्ट्री नहीं मिल पा रही है। उर्दू पत्रकारिता की सेवा से महिलाओं की दूरी अब भी कायम है, ये दुर्भाग्यपूर्ण है और ये दूरी मिटनी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">बिहार हो या देश का कोई हिस्सा उर्दू पत्रकारिता की दशा-दिशा को प्रभावित करने वाले कारणों पर उर्दू पत्रकारों ने जो विचार दिये वह सवाल छोड़ जाते हैं। उर्दू पत्रकारिता की बदहाली के पीछे आर्थिक तंगी, भाषा, कारपोरेट घराना और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव जहां महत्वपूर्ण हैं वहीं पर राजनीतिक-सामाजिक कारण भी अहम है। बिहार में उर्दू दूसरी राजभाषा होने के बावजूद शुरूआती दौर की तरह आज यह अपने शिखर पर नहीं है। इसके सिमट जाने से उर्दू एक वर्ग/समुदाय तक ही रह गयी है। शुरूआती दौर में यह किसी एक वर्ग/समुदाय तक ही समीति नहीं थी बल्कि गैरमुस्लिम विद्वान उर्दू समाचार पत्रों के संपादन किया करते थे। आज ढूंढ़ने पर भी गैरमुस्लिम विद्वान नहीं मिलेगें जो उर्दू के अखबारों का संपादन करते हो ? इसके पीछे वजह जो भी रही हो एक वजह साफ है कि उर्दू को मुसलमनों की भाषा से जोड़ कर देखा गया। बिहार में उर्दू दूसरी राजभाषा होने के बावजूद भी उर्दू अखबार गैरमुस्लिम घरों में नहीं जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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		<title>बिहार में ठहराव की स्थिति में दलित आंदोलन व साहित्य</title>
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		<pubDate>Fri, 15 Apr 2011 18:14:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[साहित्य-सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[दलित आंदोलन व साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[बिहार में ठहराव की स्थिति]]></category>

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		<description><![CDATA[बिहार में महाराष्ट्र की तरह दलित आंदोलन तो नहीं दिखता है, लेकिन यहां की जमीन, दलित उत्पीड़न-जुल्म-सितम और दलित चेतना-अवचेतना से भरी पड़ी है। देशा के अन्य भागों की तरह बिहार के दलित अभी भी हाशिए पर हैं। दलित आंदोलन ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">बिहार में महाराष्ट्र की तरह दलित आंदोलन तो नहीं दिखता है, लेकिन यहां की जमीन, दलित उत्पीड़न-जुल्म-सितम और दलित चेतना-अवचेतना से भरी पड़ी है। देशा के अन्य भागों की तरह बिहार के दलित अभी भी हाशिए पर हैं। दलित आंदोलन को लेकर महाराष्ट्र की तरह कोई बड़ा आंदोलन यंहा नहीं दिखता है। लेकिन दलित का दर्द। दलित की पीड़ा, यहां साफ झलकती है। जहां तक दलित आंदोलन को गति देने में या आंदोलन में साहित्य की भूमिका की बात है तो देखा जाए तो ज्यादा प्रभावशाली नहीं दिखता है। दलित आंदोलन से जुड़े लोगों का साफ मानना है कि यहंा ऐसा कुछ नहीं। मतलब, बिहार में ठहराव की स्थिति में दलित आंदोलन व साहित्य है ?</p>
<p style="text-align: justify;">हालांकि ऐसा नहीं है कि बिहार में दलित आंदोलन को गति देने में यहां के सहित्यकारों ने अहम् भूमिका नहीं निभायी हो। दलित और गैर दलित साहित्यकारों ने अपनी-अपनी रचनाओं से समय-समय पर गति प्रदान करने की पूरजोर कोशिश की है, लेकिन वह धार-तेवर नहीं दिखता जो दिखना चाहिए था। एक दौऱ में बिहार में दलित आंदोलन को साहित्यकारों ने उठाया भी था लेकिन धीरे-धीरे उसमें ठहराव आने लगा और आज उसमें इतना ठहराव आ गया है कि बिहार के दलित आंदोलन में यहंा के गैर और दलित साहित्यकारों की गोलबंदी नहीं के बराबर दिखती है। हालांकि, दलित आंदोलन और दलित पीड़ा को व्यवस्था, सामाज के सामने लाने की पहल वर्षों पहले हुई थी, वह भी एक दलित के माध्यम से।</p>
<p style="text-align: justify;">बिहार के दलित आंदोलन में हीरा डोम की भूमिका काफी सराहनीय और आज भी मजबूती लिए हुए है। हीरा डोम ने दलितों की पीड़ा संवेदना को (अपनी कविता) ‘‘अछुत की शिकायत’’ से की थी। भोजपुरी में लिखी यह कविता सरस्वती के 1914 के अंक में प्रकाशित हुई थी। इस कविता में उस समय जो दलितों की पीड़ा थी, समाज में भेदभाव था, दलित को लेकर अमानवीय व्यवहार था, उसे कविता में पीरोकर हीरा डोम ने सरकार और भगवान को घेरने की सार्थक कोशिश तो की थी। साथ ही, समाज को भी कठघरे में लाकर खड़ा किया था। हीरा डोम ने दलितों के साथ गैर बराबरी के व्यवहार को इतनी मजबूती से उठाया था कि उसके एक-एक शब्द आज भी प्रसांगिक तो है ही और दलित आंदोलन से जुड़े लोगों के समक्ष सवाल भी खड़े करते हैं कि, वर्षों बाद भी आज बिहार में दलितों के साथ वहीं व्यवहार हो रहा है जो हीरा डोम के दौर में था या उससे पहले। सरकार बदली, व्यवस्थाएं बदली, लोग बदले, समाज और देश बदला लेकिन समाज के अंदर बराबरी और गैरबराबरी का दंष नहीं हटा। दलितों की पीड़ा आज भी बिहार में या फिर दिनो-दिन घटनाओं में साफ झलकती है। मंदिर में घुसने का सवाल हो या दलितों के साथ बलात्कार, उत्पीड़न या यों कहें हर जुल्म-सितम जारी है। कहने के लिए सरकार / व्यवस्था में दलितों का राजनीतिकरण कर दिया है। दलितों के विकास और समाज के मुख्यधारा से जोड़ने के लिए महादलित आयोग बना दिया गया है लेकिन, साल दर साल गुजरता जा रहा है। दलित की  पीड़ा संवेदना जस की तस है। हमारे साहित्यकार बंधु भी ठस से मस नहीं हो रहे हैं। एक दौर था जब यहां के गैर दलित साहित्यकारों ने दलित संवेदना को उठाते हुए कई रचनात्मक कार्य किये और समाज को सोचने पर विमर्श कर दिया। चर्चित कथाकार मधुकर सिंह की कहानी दुश्मन आज भी उतना ही प्रसांगिक है जितना उन्होंने उस दौर में लिखी थी। मधुकर सिंह ने लगातार दलित पिछड़ों को केंद्र बनाकर रचनाकर्म करते रहे। मधुकर सिंह के बाद मिथलेश्वर, राजेन्द्र प्रसाद, प्रेम कुमार मणि, रामधारी सिंह दिवाकर, कामेंदुु शिशिर, रामयतन यादव सहित कई लेखकों ने अपनी रचनाक्रम से दलित आंदोलन को एक आयाम देने की कोशिश की है। इस दिशा में कुछ लोग तो काम कर रहे हैं, लेकिन कुछ लोग वही पर राजनीति की वैशाखी पकड़ चुके हैं। उनका लेखन कुंद हो चुका है। कहने के लिए वे लिख तो रहे हैं, लेकिन जो तेवर वर्षों पहले उनके लेखन में दलित संवेदना को लेकर थी वह अब नहीं दिखती है। जहां तक दलित लेखकों का सवाल है तो बिहार में दलित लेखकों का आंदोलन से भी उतना जुड़ाव नहीं हुआ जितना होना चाहिए। लगातार कोई लेखन नहीं हो रहा है। छिटपुट तौर पर दलित संवेदना को उठाते हुए आंदोलन खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। दलित लेखकों ने बाबूलाल मधुकर, रामाशंकर आर्या, बुद्ध शरण हंस, मुसाफिर बैठा, सुकन पासवान प्रज्ञा चक्ष्युु,, राकेष प्रियदर्शी, सहित कई रचनाकर हैं जो लिख तो रहे हैं लेकिन लगातार लिखते हुए दलित आंदोलन को जमीनी हकीकत नहीं दे पा रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">बिहार में दलित आंदोलन को गति देने में साहित्यकारों की भूमिका के ठहराव पर मुसाफिर बैठा कहते हैं कि लेखक आज मुद्दों को छोड़कर लिख रहे हैं। ऐसा नहीं है कि बिहार में दलित आंदोलन की जरूरत नहीं है यहां भी दलितों के साथ  वह सब कुछ हो रहा है जो अन्य जगहों पर। वर्षों से यहंा के दलित, पीड़ित उपेक्षित हैं। जहां तक साहित्यकारों की भूमिका की बात है तो ऐसा लगता है कि सबकुछ बाजारवाद की चपेट में है और ऐसे में देखा जाए तो बिहार में न तो दलित आंदोलन दिखता है और न ही आंदोलन से जुड़ा साहित्य। दलित आंदोलन से जुड़े शिव कुमार कांत का मानना है कि वर्तमान दलित आंदोलन में भी कमी है और दलित साहित्यकार की भूमिका का इसमें घोर अभाव है। देखा जाए तो इससे जुड़े दलित साहित्यकार, दलित समाज का दर्पण नहीं बनाकर आर्थिक दर्पण बना रहे हैं और जब साहित्य में आर्थिक दर्पण दिखेगा तो वैसे में साहित्य कभी भी सामाजिक आंदोलन का दर्पण नहीं बन सकता। जैसे एच.एल. दुसाध ने डायभरसीटी पुस्तक लिख है और उसमें दलितों के आर्थिक समस्या को उठाया है।</p>
<p style="text-align: justify;">बिहार का कथा साहित्य काफी मजबूत स्थिति में हैं। देश भर में छपने वाले साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में 75 प्रतिशत लेखक बिहार और उत्तर प्रदेश से होते हैं। इसमें बिहार की संख्या काफी होती है। पत्र-पत्रिकाओं के संपादक इस बात को स्वीकार कर चुके हैं। अब सवाल उठता है कि कथा साहित्य में बिहार इतना समृद्ध होते हुए भी दलित चेतना, संवेदना और आंदोलन से क्यों नहीं जुड़ पाया। हालात यह है कि बिहार में दलित रचनाधर्मी को चिन्हित करना मुश्किल है। यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे निपटने की पहल तक नहीं हुई। न दलित वर्ग से और न ही गैर दलित वर्ग से। बिहार की जमीन उर्वरक तो है और इसकी पड़ताल होनी ही चाहिये कि आखिर ऐसा क्यों हुआ। कभी कभी दलित व गैर दलित संस्थाओं द्वारा सेमिनार/गोष्ठी भर कर देने से कुछ नहीं होगा। एक अलग से दलित सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत यहंा महसूस की जा रही है। दलित आंदोलन की गंुजाइश रहने के बावजूद यहंा कुछ नहीं होने के पीछे केवल बिहार के दलित व गैर दलित साहित्यकारों/ चिंतकों को दोषी नहीं माना जा सकता है। देखा जाये तो बिहार के बाहर के दलित व गैर दलित साहित्यकारों/ चिंतकों ने भी इस दिशा में कोई कारगर पहल की शुरूआत यहंा आ कर नहीं की।</p>
<p style="text-align: justify;">दलित आंदोलन के लिए विचारधारा व जन जागृति से जुड़े मुद्दे चाहिए लेकिन इन सभी चीजों की कमी बिहार में साफ दिखती है। बिहार में दलित आंदोलन को फैलने से राजनीतिक पार्टियों से जुड़े कुछ हरिजन नेताओं पर आरोप लगाया जाता रहा है कि उनकी वजह से बिहार में दलित आंदोलन की गति अवरूद्ध हुई। बिहार में बाबा साहेब के आंदोलन को रोकने का प्रयास हुआ था। जब वर्ष 1952 में पटना के गांधी मैदान में बाबा साहेब डाॅक्टर भीम राव अम्बेडकर सभा को संबोधित करने आये थे, तब इस सभा में कुछ तथाकथित राजनीतिक दलों से जुड़े दलित नेताओं ने बखेड़ा खड़ा कर दिया था। सभा के दौरान बाबा साहेब पर पत्थर तक भेंके गये थे। बिहार में दलित आंदोलन को पीछे धकेलने के लिए यह घटना काफी थी। दलित आंदोलान के साथ यह राजनीति यही नहीं रूकी, बल्कि जारी रही। राजनीतिक पार्टियों पर आरोप लगता रहा कि एक साजिश के तहत दलितों का इस्तेमाल हर दल ने वोट बैंक के तौर पर किया। बिहार के सत्ता में दलित भागीदारी नहीं के बराबर रही। हालांकि बिहार की सत्ता पर दलित मुख्यमंत्री भी आसीन हुए, देश-राज्य की सत्ता में बिहार से कई दलित राजनेता शिखर पर पहुंचे, लेकिन उन्होंने राजनीति में दलित भागीदारी पर कोई कारगर प्रयास नहीं किया। राजनीतिक उदासनीता की वजह से ही आज बिहार में दलित आंदोलन हाशिये पर है। बिहार में अगड़ा-पिछड़ा की राजनीति तो खूब हुई लेकिन दलित उपेक्षित रहे।  इसकी वजह साफ है राजीतिक उदासनीता और इसमें रचनाधर्मी भी शामिल रहे।</p>
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		<title>खेल के बहाने मीडिया की जय हो!</title>
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		<pubDate>Thu, 07 Apr 2011 15:00:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>

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		<description><![CDATA[एक बार फिर मीडिया की जय हुई है ! विश्व कप क्रिकेट में भारत ने कब्जा जमाकर तहलका मचाया । भारत ने 28 साल बाद विश्व कप क्रिकेट को कब्जा कर जश्न का माहौल बनाया दिया। इस जश्न में भारत ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-14896" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/hindi-media-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%af-%e0%a4%b9/attachment/media-4/"><img class="alignleft size-full wp-image-14896" title="media" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/media.jpeg" alt="" width="300" height="200" /></a>एक बार फिर मीडिया की जय हुई है ! विश्व कप क्रिकेट में भारत ने कब्जा जमाकर तहलका मचाया । भारत ने 28 साल बाद विश्व कप क्रिकेट को कब्जा कर जश्न का माहौल बनाया दिया। इस जश्न में  भारत की जय तो होनी ही थी। हुआ भी। इस जय में पूरा देश  शामिल हुआ। छोटा-बड़ा , गरीब-अमीर, नेता-राजनेता, सरकार-अफसर बल्कि हर कोई जय करता मिला। इस जय में मीडिया भी शामिल हुआ। जीत की खुशी, अच्छी खुशी है। सबको खुश होना चाहिए, लेकिन मीडिया की खुशी  व मीडिया की जय ने मीडिया को घेरे में ला दिया है। मीडिया की भूमिका एक बार फिर संदेह के दायरे में आया। आरोपों के घेरे में आना ही था ? काम ही कुछ ऐसा हो गया। भारत-पाकिस्तान के बीच जब सेमीफाइनल होने जा रहा था तब भारतीय मीडिया ने भारत की जय हो किया और पाकिस्तान की&#8230;&#8230;.।</p>
<p style="text-align: justify;">पत्रकारिता के एथिक्स को दरकिनार कर मीडिया ने बाजारवाद के झंझावाद में फंसकर खेल को नहीं बल्कि बाजार की जय कर दी। क्रिकेट को भावनावाद के माया जाल में फांस कर बेचने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक राष्ट्रीय अखबार ने तो मैच होने के एक दिन पहले पाकिस्तानी खिलाड़ियों की ऐसी तस्वीरें छाप दी जिसे देख मीडिया पर सवाल उठना लाजिमी है। सिपाही के वर्दी में दो भारतीय खिलाड़ियों के बीच में एक पाकिस्तानी खिलाड़ी की तस्वीर इस कदर छापी गयी मानो वह एक अपराधी हो ? प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने ऐसा समां बांधा कि पाकिस्तान और भारत के बीच कोई क्रिकेट मैच न होकर युद्ध होने जा रहा है ? नजारा भी कुछ ऐसा ही था ऐसा प्रतीत हो रहा था भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच न होकर अघोषित जंग हो रहा हो!  यह जंग  जहाँ  प्रिंट मीडिया में नजर आयी वहीं खबरिया चैनलों ने तो अघोषित युद्ध ही छेड़ दिया। मीडिया ने खेल भावना और जज्बों से जमकर खेला। ऐसे में मीडिया की भूमिका पर भी बात होनी ही चाहिए। ‘फतह पाकिस्तान’, लय में हो, लेंथ बिगाड़ दो, महामुकाबला, महासंग्राम, फाइनल के पहले फाइनल, वार एंड पीस, जैसे स्लोगन देकर भारत-पाकिस्तान के बीच हुए मैच को मीडिया ने जमकर उछाला। अखबार के पन्ने क्रिकेट की खबरों से पटे रहे। सोशल साइटो और अंतरजालों में पाकिस्तान की हार के बाद कई ऐसी तस्वीरें मीडिया में आयी जो कहीं से भी सार्थक दृष्टिकोण/सोच का परिचायक नहीं लगी। फिर भी मीडिया ने परोस दिया। मसलन, युवराज ने जीत के बाद खुशी  से जिस तरह बल्ला धुमाया और पाकिस्तान के कप्तान का मैदान में हार के बाद झुकना। इस दृश्य  को हिन्दी फिल्म थ्री इडियट के संवाद से लबरेज कर जिस तरह से प्रस्तुत किया गया वह उचित प्रतीत नहीं होता ।</p>
<p style="text-align: justify;">अच्छी बात है देश  जीते। भावना  और बल तो जगना ही चाहिये। सवाल देशप्रेम का  जो है। लेकिन खेल भावना भी एक अहम् पहलू है, जिसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। लगभग सभी अखबारों ने मैच के पहले और दूसरे दिन मुख्य पृष्ठ से लेकर खेल पृष्ठ तक खेल की गंगा बहाई, ठीक इसी तरह जब भारत का मुठभेड़ श्रीलंका से होने को हुई तब अखबारों ने ‘लंका दहन’, ‘रावण दहन’ का स्लोगन दे डाला। दूसरे टीम पर व्यंग करते हुए कार्टून  बनाये गये। भारतीय टीम को दशाअवतार दिखाया गया तो दूसरी टीम को रावण आदि। आखिरकार यह कैसी पत्रकारिता है ? प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया सब जगह जैसे खेल नहीं उन्माद बोलते देखा गया और पूरे देश को उन्मादी बनाने पर मीडिया तुली दिखी। कहते हैं खेल प्रेम व भाईचारा बढ़ाता है, दूरियाँ खत्म कर एक दूसरे को करीब लाता है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मैच देखने आये। श्रीलंका के राष्ट्रपति भी आये। पड़ोसी मुल्कों से तमाम लोग आये। खेल हुआ। और हम जीते। पर जो उन्माद पैदा किया गया, खासकर मीडिया के जरिये उससे कौन विजयी हुआ ? खेल तो जीता लेकिन पूँजी व बाजार ने अपनी जमीन और मजबूत बना ली। खेल की निर्मल भावना को बेचा गया। अखबार के पन्ने जहाँ  खेल की खबरों से शुरू से अंत तक पटे रहे वहीं अखबार ने विज्ञापन भी जमकर बटोरा। मैच के पहले और मैच के बाद। यहीं सब खबरिया चैनलों पर भी देखा गया अन्य दिनों की तुलना में। बाजार ने जय कर दी । लेकिन इसमें मीडिया का एक पक्ष सामने आ गया।  भारतीय मीडिया की भूमिका पर पाकिस्तान के कप्तान ने टिप्पणी कर आपत्ति जाहिर की तो उनके टिप्पणी को ही तोड़ मरोड़ पर पेश कर दिया गया। पाकिस्तान के कप्तान शाहीद आफरीदी ने आखिर में पुनः बयान किया और आग्रह किया कि ‘‘ मेरे बयान को नकारात्मक नहीं लें। मैं मीडिया से आग्रह करता हूं  कि वह सकारात्मक भूमिका निभाए और अस तरह की छोटी बातों पर समय बबार्द न करें।’’ शाहीद आफरीदी के बयान की भी मीडिया ने जय की। एक इलैक्टोनिक मीडिया ने कार्टून दिखाया जिसमें शाहीद आफरीदी को खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचते  बताया।</p>
<p style="text-align: justify;">ठीक है भारतीय मीडिया की जय के पीछे देश भावना हो सकता है लेकिन क्या अंतरर्राष्टीय मीडिया की नजर नहीं पडेगी ? और  ऐसे में क्या छवि बनेगी। यह बात भारतीय मीडिया को सोचनी होगी ?</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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		<title>मधुबनी पेंटिंग  की याद दिलाता “अंग प्रदेश की लोक कला मंजूषा”</title>
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		<pubDate>Sat, 12 Feb 2011 16:54:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[Featured]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य-सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[मधुबनी पेंटिंग की तरह अंग प्रदेश की लोक कला मंजूषा काफी चर्चित है। मंजूषा कला को लेकर चंद्रप्रकाश “जगप्रिय” के संपादन में “मअंग प्रदेश की लोक कला मंजूषा” की सध: प्रकाशित पुस्तक आयी है। मंजूषा कला को मुख्यधारा में लाने ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-13497" href="http://www.janokti.com/art-literature-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2/attachment/majusa/"><img class="alignleft size-medium wp-image-13497" title="majusa" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/majusa-225x300.jpg" alt="" width="180" height="240" /></a>मधुबनी पेंटिंग की तरह अंग प्रदेश की लोक कला मंजूषा काफी चर्चित है। मंजूषा कला को लेकर चंद्रप्रकाश “जगप्रिय” के संपादन में “मअंग प्रदेश की लोक कला मंजूषा” की सध: प्रकाशित पुस्तक आयी है। मंजूषा कला को मुख्यधारा में लाने का प्रयास पिछले 2-3 सालों से चल रहा है। चक्रवती देवी, शेखर, ज्योति शर्मा, अर्पणा सिंह ने मंजूषा कला को लोगों से जोड़ने में विशेष भूमिका अदा की है। नावार्ड भागलपुर और दिशा ग्रामीण विकास मंच ने भी मंजूषा कला को विशेष पहचान दिलाने में प्रयास की है उनका प्रयास अभी भी जारी है।</p>
<p style="text-align: justify;">मंजूषा कला को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के तहत ही इस पुस्तक का लोकार्पण किया गया है। मंजूषा कला से जुड़ी दर्जनों तस्वीरों को प्रकाशित किया गया है। इस पुस्तक में लेखकों ने मंजूषा कला के क्षेत्र में हुए विकास और विकास के लिए किए गये प्रयासों को रखा गया है। पुस्तक के संपादक, चंद्रप्रकाश  “जगप्रिय” अपने संपादकीय में लिखा है कि मंजूषा कलाकार कुमार संभाव की चित्रों को देखने के बाद पुस्तक प्रकाशन का मन बना। पुस्तक में मंजूषा कला का मुख्य केन्द्र रहा है। बिहुली बिहसरी कथा पर बने चित्रों की चर्चा इस पुस्तक में विस्तार से की गयी है। लेखक ने इस कथा पर भी विस्तार से प्रकाश डाला है जबकि डा॰ आमरेन्द्र ने अपने आलेख “मंजूषा अंग महाजनपद की लोक कला “ में साबित किया है कि अंग प्रदेश की लोक कला “मंजूषा” है। इसके एतिहासिक और पौराणिक बिंदुओं पर चर्चा की है। डा॰ श्यामसुंदर घोष  ने लोक कला मंजूषा से जुड़े कलाकारों की चर्चा करते हुए चित्रों  पर से  विस्तार से चर्चा की है और मंजूषा चित्र कला के तत्कालीन संगोत्रीए चित्र कलाओं की भी अध्ययन किए जाने पर रोशनी  डालने की कोशिश किये जाने की वकालत की है।</p>
<p style="text-align: justify;">उन्होंने लिखा है कि ब्रिटिश अधिकारी डब्ल्यू बी0 आॅर्थर ने जब मंजूषा चित्रकला की पहचान की थी तो उन्होंने मधुबनी चित्रकला की भी खोज की थी। मंजूषा चित्र कला को पर्यावरण से जोड़कर देखने का प्रयास इसे जुड़े डाॅ॰अमरेन्द्र की साक्षात्कार में मिलता है। इस पुस्तक में  बिहुला बिहसरी लोककथा  को काव्य शैली में भी  दिया गया है। मंजूषा कला की चर्चित कलाकार चक्रवर्ती देवी, कुमार संभव  सहित कई कलाकारों के चित्रों को पुस्तक में समेटा गया है। कुल मिला कर यह पुस्तक एक अलग छाप लिये है। इसमें जो भी  चित्र है वे कभी प्रभावी है ओर  मधुबनी पेंटिंग की याद दिलाती है ।</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक : अंगप्रदेश  की लोक कला मंजूषा</p>
<p style="text-align: justify;">संपादक : चंद्रप्रकाश “जगप्रिय”</p>
<p style="text-align: justify;">प्रकाशक: निराली दुनिया पब्लिकेशन नई दिल्ली।</p>
<p style="text-align: justify;">संस्करण: 2001</p>
<p style="text-align: justify;">मूल्य : रु॰ 500/-</p>
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