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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; पुष्पेन्द्र आल्बे</title>
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		<title>मुरली के संन्यास के पीछे का सच</title>
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		<pubDate>Sat, 24 Jul 2010 08:59:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल-कूद]]></category>

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		<description><![CDATA[श्रीलंका के महानतम स्पीनर मुथैया मुरलीधरन ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया है. फिलहाल भारतीय टीम तीन टेस्ट मैचों की श्रंृखला खेलने श्रीलंका गई है, जहां गॉल मैदान में खेले गए श्रृंखला के पहले टेस्ट के बाद मुरली ने ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5119" title="murlidharan" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/murlidharan-300x199.jpg" alt="" width="300" height="199" />श्रीलंका के महानतम स्पीनर मुथैया मुरलीधरन ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया है. फिलहाल भारतीय टीम तीन टेस्ट मैचों की श्रंृखला खेलने श्रीलंका गई है, जहां गॉल मैदान में खेले गए श्रृंखला के पहले टेस्ट के बाद मुरली ने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लिया. मुरली के अब टेस्ट मैचों में 800 विकेट हैं और वनडे में भी उनके नाम 515 से ज्यादा विकेट दर्ज हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">तो आखिर मुरली ने यह फैसला क्यों लिया ? याद कीजिए कुछ साल पहले की बात जब मुरली ने इस बात का ऐलान किया था कि वे तब तक खेलते रहेंगे, जब तक कि टेस्ट क्रिकेट में 1000 विकेट लेने  का कारनामा न कर दिखाएं. उन दिनों मुरली के लिए टेस्ट मैच खेलना सबसे बड़ी प्राथमिकता हुआ करती थी और इसके लिए उन्होंने वनडे मैचों मंे खेलना भी बंद कर दिया था ताकि शरीर को पांच दिन के मैच के लिए बचाकर रखा जा सके. लेकिन अब हालात बदल गए हैं और इसके साथ ही मुरली की प्राथमिकताएं भी बदल गई हैं. अब मुरली चेन्नई सुपर किंग्स के लिए आईपीएल में खेलते हैं, जो उन्हें एक साल में करोड़ों रुपए पगार के तौर पर देती है. सो, आईपीएल के इसी पैसे ने मुरली को यह फैसला लेने के लिए प्रेरित किया है. श्रीलंका बोर्ड अपने खिलाड़ियों को एक वनडे खेलने के लिए 12000 रुपए देता है और एक टेस्ट मैच खेलने के लिए दो लाख रुपए. वहीं आईपीएल के एक सत्र में खेलने के लिए वर्तमान में चेन्नई की टीम मुरली को तीन करोड़ रुपए से भी ज्यादा दे रही है. इसका मतलब यह हुआ कि मुरली अगर आईपीएल के सभी 14 मैच खेलें तो भी उन्हें एक मैच के लिए बीस लाख रुपए दिए जाते हैं. यानी कि बीस ओवर प्रति पारी के ट्वेंटी-20 मैच में मात्रा 4 ओवर फेंकने  के लिए बीस लाख रुपए. बस इसी पैसे ने मुरली को पे्ररित किया है कि वे अपने देश की टीम को अलविदा कह दें और आईपीएल को अपना बचा हुआ करियर समर्पित कर दें.</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे इस बात में कोई बुराई भी नहीं, क्योंकि यह व्यावसायिक दुनिया है और मुरली एक प्रोफेशनल खिलाड़ी. और फिर ऐसा भी नहीं है कि मुरली ने ही इस तरह का फैसला लिया हो. 2007 में ही जब आईपीएल का पहला संस्करण हुआ था तो कई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों की नियत डोल गई थी. आखिर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पूरी ताकत, ऊर्जा झोंकने के बाद भी उन्हें चंद लाख रुपए नसीब होते थे, वहीं आईपीएल उन्हें करोड़ों रुपए दे रहा है. ऐसे में वाजिब है कि खिलाड़ी अपने देश के बजाए आईपीएल को ही तरजीह  देंगे. शेन वार्न को ही देख लीजिए, जो आईपीएल में तो राजस्थान के लिए न सिर्फ खेलते हैं, बल्कि उसके कप्तान और कोच की भूमिका भी निभाते हैं. लेकिन अपने देश ऑस्ट्रेलिया की टीम से वो चार साल पहले हीे संन्यास ले चुके हैं. मैथ्यू हेडन, ग्लैन मैग्राथ, एडम गिलक्रिस्ट जैसे खिलाड़ियों ने भी बिलकुल यहीं किया. वे चाहते तो अपने देश की टीम के लिए तीन-चार साल और खेल सकते थे, लेकिन उन्होंने आईपीएल को अपने देश से ज्यादा तवज्जो दी.</p>
<p style="text-align: justify;">मुरली भी ठीक यही कर रहे हैं. उनको मालूम है कि उनका करियर अब ज्यादा नहीं बचा है. वे ज्यादा से ज्यादा दो-तीन साल और खेल सकते हैं. इसीलिए मुरली इस समय का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठा लेना चाहते हैं. चूंकि राष्ट्रीय टीम के लिए खेलते हुए कहीं चोटिल हो गए तो आईपीएल भी हाथ से चला जाएगा. इसलिए उन्होंने टेस्ट मैचों से किनारा कर लिया है, लेकिन कह रहे हैं कि अभी आईपीएल में चेन्नई की ओर से खेलते रहेंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">जाहिर है मुरली ने भी शेन वॉर्न, मैथ्यू हेडन और गिलक्रिस्ट की तरह ही सोचा. लेकिन काश, इन गोरे ऑस्ट्रलियाई खिलाड़ियों की ओर देखने की बजाए मुरली अपने पक्के दोस्त और अपनी टीम के सबसे बुजुर्ग खिलाड़ी सनत जयसूर्या से ही सबक ले लेते. जयसूर्या इन दिनों श्रीलंका की टीम से बाहर हैं. श्रीलंका बोर्ड ने उन्हें अपने अनुबंधित खिलाड़ियों की सूची से भी बाहर पफेंक दिया है. लेकिन जयसूर्या अभी भी अपने देश की टीम में आने के लिए प्रतिबध हैं. इकतालीस साल की उम्र में भी वे इंग्लैंड में काउंटी क्रिकेट खेल रहे हैं, जिससे कि अच्छा प्रदर्शन करके श्रीलंका टीम में वापस आ जाएं. काश, मुरली भी अपने इस साथी खिलाड़ी से प्रेरणा ले लेते&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>क्रिकेट के देश में बैडमिंटन का जलवा</title>
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		<pubDate>Wed, 14 Jul 2010 12:36:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल-कूद]]></category>
		<category><![CDATA[टेनिस]]></category>
		<category><![CDATA[बैडमिंटन]]></category>
		<category><![CDATA[साइना नेहवाल]]></category>

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		<description><![CDATA[टेनिस में भले ही आजाद भारत के साठ बरस के इतिहास में सिर्फ सानिया मिर्जा ने ही आंशिक कामयाबी हासिल की हों, लेकिन बैडमिंटन के खेल में समय-समय पर ऐसी प्रतिभाएं सामने आती रही हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-4599" title="saina nehwal champion" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/saina-nehwal-champion.jpg" alt="" width="303" height="400" />टेनिस में भले ही आजाद भारत के साठ बरस के इतिहास में सिर्फ सानिया मिर्जा ने ही आंशिक कामयाबी हासिल की हों, लेकिन बैडमिंटन के खेल में समय-समय पर ऐसी प्रतिभाएं सामने आती रही हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमाई है. हैदराबाद के लाल बहादुर स्टेडियम से निकलकर दुनिया की तीसरे नंबर की खिलाड़ी बनने तक का सफर तय करने वाली साइना नेहवाल के पहले भी अपर्णा पोपट और प्रकाश पादुकोण जैसे खिलाड़ियों ने बैडमिंटन के खेल में भारत का मान बढ़ाया है.</p>
<p style="text-align: justify;">खासकर, 80 के दशक में प्रकाश पादुकोण की बैडमिंटन के खेल में उपलब्धियों ने समूचे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था. सायना नेहवाल की तरह ही पादुकोण ने भी 1980 में स्वीडन ओपन, डेनमार्क ओपन और आल-इग्लैंड टूर्नामेंट जीतकर इतिहास रचा था. हालांकि उस दौर में अधिकृत तौर पर व्यावसायिक टूर्नामेंट आयोजित नहीं किए जाते थे. हालांकि बैडमिंटन की विश्व स्पर्धा की शुरूआत 1977 में ही हो गई थी, लेकिन खिलाड़ियों को ‘व्यावसायिक खिलाड़ी’ का दर्जा हासिल नहीं था. तब बैडमिंटन के खिलाड़ियों को ‘लाइसेंसी खिलाड़ी’ कहा जाता था और उन्हें एशियन गेम्स जैसी कुछ स्पर्धाओं में तो भाग लेने की इजाजत भी हासिल नहीं थी. बावजूद इसके प्रकाश पादुकोण की उपलब्धियों को लेकर किसी को संदेह नहीं था. उस दौर में खिलाड़ियों के प्रदर्शन को आंकने के लिए विश्व रैकिंग की सुविधा मौजूद नहीं थी, बावजूद इसके पादुकोण उस दौर के निर्विवाद श्रेष्ठ खिलाड़ी थे.</p>
<p style="text-align: justify;">बाद के सालों में महिला खिलाड़ियों ने भी पादुकोण की कामयाबी के सफर को आगे बढ़ाने की पुरी कोशिश की. 80 के दशक में ही मधुमिता गोस्वामी ने अपने तेज और आक्रामक खेल से राष्ट्रीय स्तर पर धमाकेदार आगाज किया. हालांकि सुरक्षात्मक खेल के उस दौर में आक्रामक नजरिए के बावजूद गोस्वामी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी कामयाबियों को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर दोहराने में नाकाम रही. इसके बाद नब्बे के दशक में अर्पणा पोपट ने भी खूब सुर्खियां बटोरी. पूणे निवासी पोपट को प्रकाश पादुकोण ने अपनी देखरेख में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी के लिए तैयार किया था. 1998 में कुआलालम्पुर में आयोजित कॉमनवेल्थ खेलों में पोपट ने रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा की झलक भी दिखाई, लेकिन आने वाले सालों में वे भी अपनी प्रतिभा को सफलता में नहीं बदल पाई.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन सायना नेहवाल मानसिक और शारीरिक दृढ़ता दोनों में ही अपनी पूर्ववर्ती महिला खिलाड़ियों से ज्यादा मजबूत नजर आती है. पूर्व राष्ट्रीय चैंपियन विमल कुमार का मानना है कि इन्हीं खूबियों के बूते सायना लंबे समय तक टूर्नामेंट जीतने में कामयाब रहेगी. विमल कुमार के मुताबिक-‘अपनी शारीरिक और मानसिक मजबूती के चलते सायना लंबे चलने वाले मुकाबलों में अपने विपक्षी पर भारी पड़ती है.’ प्रकाश पादुकोण की भी सायना के बारे में इसी तरह की राय है, जिनके मुताबिक-‘अगर वे अपने खेल मेें निरंतरता बनाए रखती है, तो फिर यह तय है कि वे भारतीय बैडमिंटन की सबसे कामयाब महिला खिलाड़ी साबित होगी.’ सायना के खेल से बेहद प्रभावित पादुकोण ने सालभर पहले ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि हैदराबाद की यह खिलाड़ी जल्द ही दुनिया की शीर्ष तीन खिलाड़ियों में शामिल हो जाएगी. अब नंबर तीन की खिलाड़ी बनकर सायना ने इस भविष्यवाणी को सही भी साबित कर दिया है.</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे भी, सायना का लक्ष्य एकदम स्पष्ट है-भारत की सर्वकालिक महान महिला एथलिट बनना. वे कहती भी हैं-‘मैं आने वाले सालों में भारत के लिए कईं टूर्नामेंट जीतकर शीर्ष पर पहुंचना चाहती हूं.’ ठीक चार दशक पहले 1980 में बैंकांक में आयोजित एशियन खेलों में कंवलजीत संधू ने 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर भारत के लिए पदक जीतने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया था. इसके बाद अस्सी के दशक में पीटी ऊषा ने भी अपनी कामयाबियों से देश का मान बढ़ाया था. इक्कीसवीं सदी में सानिया मिर्जा भले ही अपनी प्रतिभा को सफलता में तब्दील करने में नाकाम रही हो, लेकिन सायना नेहवाल से उनके प्रशंसकों को कामयाबी के दौर के लंबे समय तक रहने की उम्मीदें हैं. भले ही बैडमिंटन के खेल में क्रिकेट की तरह आंखें चूंधिया देने वाला पैसा नहीं बरसता, लेकिन सायना ने देश के गौरव को बढ़ाने को अपना लक्ष्य मान लिया है. प्रकाश पादुकोण की तरह ही सायना नेहवाल भी मौजूदा दौर में सर्वश्रेष्ठ भारतीय एथलिट नहीं है, लेकिन उनमें वे दो खूबियां मौजूद है, जो किसी भी खिलाड़ी के कामयाब होने के लिए बेहद जरूरी है-मेहनत और समर्पण. इन्हीं खूबियों के बूते बीस वर्षीया हैदराबादी सायना बैडमिंटन के क्षेत्र में भारतीय तिरंगा लहराने के अपने सफर का आगाज कर चुकी है.</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>हेट नहीं, आई लव, लव स्टोरीज !</title>
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		<pubDate>Thu, 01 Jul 2010 13:45:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
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		<description><![CDATA[रोमांटिक फिल्मों के मामलें में बॉलीवुड का रिकॉर्ड रोजर फेडरर के खेल के माफिक ही उजला रहा है. चाहे वह साठ के दशक की राजकूपर-नरगिस अभिनीत &#8220;आवारा&#8221; हो या फिर नब्बे के दशक की हम आपके हैं कौन, दिलवाले दुलहनिया ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-4087" title="sonam-kapoor01" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/sonam-kapoor01-300x228.jpg" alt="" width="300" height="228" />रोमांटिक फिल्मों के मामलें में बॉलीवुड का रिकॉर्ड रोजर फेडरर के खेल के माफिक ही उजला रहा है. चाहे वह साठ के दशक  की राजकूपर-नरगिस अभिनीत &#8220;आवारा&#8221; हो या फिर नब्बे के  दशक  की हम आपके हैं कौन, दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे या फिर इक्कीसवीं सदी के पहले  दशक की लव आजकल, जब वी मेट हों. रोमांस, नाच-गाना बॉलीवुड की सबसे बड़ी पहचान है और प्रयोगवादी सिनेमा के वर्तमान दौर में भी ऐसी फिल्मों का बनना लगातार जारी है. सो, इसी माहौल में नए निर्देशक पुनीत मल्होत्रा इस शुक्रवार रोमांटिक फिल्मों के शौकीन दर्शकों  के लिए &#8220;आई हेट लव स्टोरीज&#8221; लेकर हाजिर हैं. करण जौहर के कैंम्प की इस फिल्म को उनतीस साल के पुनीत ने वैसी ही फिल्म में ढाला है, जैसे कि उनके गुरू करण ने दिलवालिया दुलहनियां ले जाएंगे में ढाला था. छोटी सी कहानी,, प्यार के पीछे भागते किरदार और एक-दूसरे को लेकर बदलते नायक-नायिका के अहसास, आई हेट लव स्टोरीज में सबकुछ हैं. फिल्म की कहानी इमरान खान के किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है, जो बॉलीवुड में एक फिल्म निर्देशक के साथ असिस्टेंट के तौर पर जुड़ा है. पेंच यहां पर यह है कि उसका बॉस रोमांटिक फिल्मों का सबसे बड़ा निर्देशक है, लेकिन इमरान तो ‘यूज एंड थ्रो’ की पालिसी वाला बंदा है. लेकिन उसकी जिंदगी तब बदल जाती है, जब सोनम कपूर उसके बॉस  की फिल्म में प्रोडक्शन डिजाइनर के तौर पर जुड़ती है. सोनम कपूर की जिंदगी में प्यार ही सबकुछ है, जबकि बंदे इमरान का इससे कोई वास्ता नहीं.. ऊपर से तुक्का यह कि सोनम कपूर पहले ही किसी के साथ प्यार में डूबी हुई है. सो, आगे इमरान भी प्यार के मायने समझता है और प्यार करने लग जाता है अपनी उसी से, जिसने उसे प्यार के मायने समझाए, मतलब सोनम कपूर से&#8230;.बस, आगे की कहानी में वहीं सबकुछ है, जो आप देखना चाहते हैं&#8230;..प्यार, मनाना.</p>
<p style="text-align: justify;">अब बात, फिल्म के कलाकारों की. इमरान खान ने ऐसा ही रोल अपनी पहली फिल्म जाने तू या जाने में भी किया था, लेकिन इस बार कुछ ज्यादा निखार आ गया है, उनकी एक्टिंग में. लेकिन फिल्म की यूएसपी है सोनम कपूर. पहली फिल्म सांवरियां और दिल्ली 6 में तो अनिल कपूर की यह लाडली बिटिया मुरझाई सी लगी थी.. लगा था एक-दो फिल्मों के बाद घर न बैठ जाएं. लेकिन अपनी तीसरी फिल्म में सोनम ने वो अदाकारी दिखाई है कि इंडस्ट्री की टॉप हिरोईनों की तो रातों की नींद उड़ी समझो. ऐसा ही कुछ कर दिखाया है पुनीत मल्होत्रा ने बतौर निर्देशक अपनी पहली ही फिल्म में. निर्देषन शानदार किया है, हां फिल्म की कहानी लिखने की कला उनकों और ज्यादा तराशनी होगी. फिर भी,, पहली फिल्म के लिहाज से तो अभी उनकी तारीफ होनी चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;">कूल जमा, यह फिल्म प्यार करने वालों के लिए हैं, युवाओं के लिए हैं. अगर आप युवा हैं, या फिर आपका दिल जवान हैं और आप प्यार में यकीन रखते हैं, तो फिर चले जाइए अपने नजदीकी सिनेमाघर की ओर-जहां आई हेट लव स्टोरीज चल रही हो&#8230;..यकीनन आप यह कहते हुए बाहर निकलेंगे-आई लव लव स्टोरीज&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>भोपाल के गुनहगार कौन-कौन?</title>
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		<pubDate>Sat, 26 Jun 2010 15:12:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
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		<description><![CDATA[दुनिया के इतिहास के सबसे भयावह औद्योगिक हादसे ‘भोपाल गैस कांड’ के गुनहगार को कानूनी फैसले ने पीड़ितों की पहुंच से दूर कर दिया है. विपक्ष के तमाम हो-हल्ले और सरकार के तमाम आश्वासनों के बावजूद कड़वी हकीकत यह है ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="aligncenter size-medium wp-image-3930" title="bhopal gas tragedy" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/bhopal-gas-tragedy4-300x253.jpg" alt="" width="300" height="253" />दुनिया के इतिहास के सबसे भयावह औद्योगिक हादसे ‘भोपाल गैस कांड’ के गुनहगार को कानूनी फैसले ने पीड़ितों की पहुंच से दूर कर दिया है. विपक्ष के तमाम हो-हल्ले और सरकार के तमाम आश्वासनों के बावजूद कड़वी हकीकत यह है कि हादसे के शिकार हुए भोपालवासियों को एक बार फिर छला गया है. सरकार ने उनके साथ एक बार फिर विश्वासघात किया है. देश की जीर्ण-शीर्ण कानून व्यवस्था ने उनके साथ ठीक उसी तरह क्रूर मजाक किया है, जैसा मजाक पच्चीस साल पहले कार्बाइड यूनियन से निकली जहरीली गैस ने उनके साथ किया था. लेकिन चूंकि इस हादसे के लिए जिम्मेदार शख्सियतें अमेरिकी हैं, उस अमेरिकी की मदद करने वाले तथाकथित महान नेता हैं, सो पूरी कोशीश की जा रही है इस मामलें को भी उसी तरह दफन करने की, जिस तरह पच्चीस साल पहले भोपाल ने हजारों लाशो को एक साथ दफन किया था. ऐसे में देश के जागरूक नागरिक होने के नाते यह हमारे फर्ज बनता है कि उस घटनाक्रम को फिर से लोगों के दिलों में ताजा करते हुए इसके लिए जिम्मेदार लोगों को कटघरे में खड़ा किया जाए.</p>
<p style="text-align: justify;">तो, हादसे के बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार का हादसे के लिए जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड के मालिक वारेन एंडरसन को बचाने का षड़यंत्र 7 दिसंबर 1984 को भोपाल के श्यामला हिल्स से शुरू होता है. चूंकि उस जमाने में पिछडे राज्यों की श्रेणी में आने वाले मप्र में यूनियन कार्बाइड विकास का प्रतीक हुआ करती थी, इसलिए सरकारी महकमें में उसका एकछत्र राज था. एंडरसन श्यामला हिल्स में था, तभी मप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को दिल्ली में कांग्रेस शासित केंद्र सरकार के सबसे ऊंचे आॅफिस से एंडरसन से संबंधित फोन आया. बस इस फोन के आने भर की देर थी कि एंडरसन एकदम से राजकीय अतिथि में तब्दील हो गया. गेस्ट हाउस में जज को लाया गया और एंडरसन की जमानत की औपचारिकताएं पूरी की गईं. तब तक एंडरसन पर 304 का मामला दर्ज हो चुका था, जिसके तहत जमानत देने का अधिकार सिर्फ कोर्ट के पास था न कि थाने के पास. लेकिन चूंकि दिल्ली से आदेश थे, इसलिए एंडरसन की जमानत भी थाने से ही हो गई. इसके बाद पुलिस की ही कार में एंडरसन को भोपाल के एयरपोर्ट तक पहुंचाया गया, जहां उसके लिए राज्य सरकार का विमान पहले से ही खड़ा हुआ था. बस फिर क्या था, उस विमान में एंडरसन को ससम्मान बिठाया गया और दिल्ली तक पहुंचा दिया गया.</p>
<p style="text-align: justify;">एंडरसन 15,000 लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार था. इसके बावजूद अमेरिकी प्रभुत्व के चलते उसे राजकीय अतिथि का दर्जा दिया गया. इतना ही नहीं, दिल्ली पहुंचने के बाद एंडरसन सीधे अमेरिका के लिए भाग नहीं गया, बल्कि इसके पहले उसने उस वक्त देश के राष्ट्रपति ज्ञानी जेलसिंह के साथ बैठकर चाय भी पी. इसके बाद उसे देश से ससम्मान विदा किया गया. हालांकि एंडरसन ने भोपाल हादसे में मारे गए हजारों लोगों को देखने की बात कही थी, लेकिन सरकार ने उन्हें इससे दूर रहने के लिए कहा. वजह, सरकार को लग रहा था कि भोपाल जाने से एंडरसन की जान को खतरा हो सकता था. मतलब यह कि 15000 मौतो के लिए जिम्मेदार एंडरसन की जान तत्कालीन कांग्रेस सरकार के लिए ज्यादा मायने रखती थी, बनिस्बत गैस लीक से मारे गए गरीब भोपालवासियों के.</p>
<p style="text-align: justify;">जाहिर है, इस पूरे घटनाक्रम में कई अहम सवाल अनसुलझे रह जाते हैं. सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि अर्जुन सिंह को दिल्ली से किसका फोन आया था, कहां से आया था? इस बारे में राजकुमार केसवानी, जो यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से गैस के लीक होने की खबर सामने लाने वाले सबसे पहले पत्रकारों में शुमार थे, कहते हैं- ‘इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतना तय है कि दिल्ली से फोन पर निर्देश मिलने के बाद ही अर्जुन सिंह ने एंडरसन को दिल्ली पहुंचाने के लिए राज्य सरकार का विमान मुहैया कराया.’ गौरतलब है कि केसवानी ही वह शख्स हैं, जिन्होंने गैस हादसे से कईं महीने पहले इस बात का खुलासा कर दिया था कि ‘भोपाल बारूद के ढेर पर खड़ा हुआ है.’ इसकी और इशारा करता उनकी एक खबर जनसत्ता में भी छपी थी, लेकिन चूंकि सरकारें यूनियन कार्बाइड से लाखों-करोड़ों रूपए की चकाचैंध से आकर्षित थी, इसलिए केसवानी की चेतावनी को सिरे से खारिज कर दिया गया. एंडरसन को भगाने के लिए और भी कई लोग जिम्मेदार है, उनमें से एक है मप्र के तत्कालीन मुख्य सचिव ब्रह्मस्वरूप.  भोपाल के तत्कालीन कलेक्टर मोतीसिंह के मुताबिक- ‘एंडरसन हमारी हिरासत में था, लेकिन तभी ब्रह्मस्वरूप ने मुझे अपने कैबिन में बुलाया और निर्देश दिए कि एंडरसन को रिहा करना होगा और एयरपोर्ट पर उसके लिए एक विमान तैयार है, जिससे उसे दिल्ली पहुंचाया जाएगा.’ तो फिर इसका जवाब किससे पूछा जाए कि अर्जुन सिंह को दिल्ली से किसका फोन आया था. इस बारे में पूर्व रसायन मंत्री वसंत साठे का मानना है कि इस सवाल का जवाब सिर्फ अर्जुन सिंह से मांगा जाना चाहिए. पूरा देश उनसे इस सवाल का जवाब पूछ रहा है और भोपाल गैस कांड के समय मप्र के मुख्यमंत्री होने के नाते उनकी यह जिम्मेदारी भी बनती है.’</p>
<p style="text-align: justify;">बात सही है. इस सवाल का जवाब ही भोपाल गैस कांड की हकीकत से पर्दा उठा सकता है. दुनिया के इस सबसे भयावह औद्योगिक हादसे में 15,000 से ज्यादा बेगुनाहों की जान गई थी. ऐसे में, यह अर्जुन सिंह की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे इस अहम सवाल का जवाब दें. साथ ही यह कांग्रेस की भी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह इस मामले से जुड़े प्रत्येक सवाल का जवाब दे. चूंकि हादसे के दौरान केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार थी, इसलिए उसे जवाब देना होगा कि आखिर अर्जुन सिंह को दिल्ली से किसका फोन आया था? कांग्रेस को यह भी जवाब देना होगा कि आखिर दिल्ली पहुंचने के बाद एंडरसन देश के राष्ट्रपति के साथ चाय पीने लायक दर्जा कैसे पा गया? भारतीय संविधान के मुताबिक कोई भी व्यक्ति प्रधानमंत्री कार्यालय की अनुमति मिले बगैर देश के राष्ट्रपति के साथ मुलाकात नहीं कर सकता. तो फिर 15,000 लोगों की मौत का जिम्मेदार एंडरसन तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जेलसिंह के साथ मुलाकात में कैसे कामयाब हो गया?</p>
<p style="text-align: justify;">भोपाल गैस कांड के इस हादसे में और भी कई सवाल अनसुलझे हैं और कई दूसरों की भूमिका को लेकर भी संदेह होता है. भोपाल गैस कांड में सीबीआई की भूमिका भी संदेह के घेरे में आती है. दाउद इब्राहिम, अनीस, छोटा शकील जैसे अंडरवल्र्ड के गुर्गो के पीछे हाथ धोकर पड़ी रहने वाली सीबीआई ने दुनिया के सबसे भयावह औद्योगिक हादसे के सबसे प्रमुख आरोपी एंडरसन का नाम भी हाल तक ‘मोस्ट वांटेड’ की अपनी सूची में शामिल नहीं किया था.  न ही सीबीआई कभी एंडरसन को दोबारा भारत में लाने में कामयाब हो पाई. तो इसकी वजह क्या है? इस बारे में सीबीआई अधिकारी बीआर लाल, जिन्होंने पी. नरसिंहराव के कार्यकाल में 1995 में भोपाल गैस कांड की जांच की थी, ने सार्वजनिक तौर पर यह दावा किया था कि उस दौरान उन्हें विदेश विभाग से लिखित में इस बात के निर्देश मिले थे कि अमेरिका से एंडरसन के प्रत्यर्पण की मांग न की जाए. यह भी एक हास्यास्पद बात है कि 1984 के गुनाहगार को अमेरिका से मांगने की हिम्मत सीबीआई 2001 में जुटा पाई, जब उसने एंडरसन के प्रत्यर्पण के लिए अपील की.</p>
<p style="text-align: justify;">इसके साथ ही इस मामले की सुनवाई करने वाले उच्चतम न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश एएच अहमदी की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं. गौरतलब है कि जस्टिस अहमदी ने 1996 में एंडरसन समेत सभी आरोपियों के ऊपर लगी धारा 304 को बदलकर 304-ए कर दिया था. भारतीय कानून के मुताबिक 304 में आरोपियों को 10 साल की सजा का प्रावधान है, जबकि 304-ए के तहत मात्र दो साल की सजा का प्रावधान है. अगर यह जानबूझकर किया गया है, तो यह एक राष्ट्रद्रोह है. जस्टिस अहमदी की भूमिका हाल ही में हुए इस खुलासे के बाद और भी ज्यादा संदिग्ध हो जाती है कि उनके द्वारा चलाए जा रहे एक चैरिटी फंड को भोपाल गैस कांड के जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड कंपनी पैसा मुहैया कराती है.</p>
<p style="text-align: justify;">जाहिर है, ये सभी ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब हर हाल में ढूंढे जाने चाहिए. इसके लिए जरूरत है दृढ़ इच्छाशक्ति की. साथ ही इसके लिए पारदर्शिता बरते जाने की भी सख्त जरूरत है. खास बात यह है कि वर्तमान में केंद्र में उसी कांग्रेस की सरकार है, जो इन आरोपों का सामना कर रही है. तो क्या, कांग्रेस अपने ऊपर लग रहे आरोपों को लेकर देश के सामने यथास्थिति स्पष्ट करेगी? यकीनन एक बहुत बड़ा सवाल है. लेकिन इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस सवाल के जवाब में ही भोपाल गैस कांड का आखिरी नतीजा भी छुपा हुआ है. साथ ही इन सवालों के जवाब के बाद ही अमेरिका से एंडरसन के प्रत्यर्पण की कोशिश की जा सकती है. वैसे भी, अमेरिका के न्यूयार्क में शानो-शौकत की जिंदगी गुजार रहा एंडरसन अपनी जिंदगी के आखिरी दौर में पहुंच चुका है. एंडरसन को भारत लाने के लिए यह बेहद जरूरी है कि अमेरिका के सामने भोपाल गैस में उसकी सीधी संलिप्तता के ठोस सबूत पेश किए जाएं. भारतीय कानून व्यवस्था और राजनीतिक अकर्मण्यता को देखते हुए तो यकीनन यह बहुत दूर की कौड़ी नजर आती है. ऐसे में इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि भोपाल के गुनहगार भारतीय कानून की पहुंच से दूर ही रहेंगे.</p>
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		<title>इस राजनीति की तारीफ कीजिए</title>
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		<pubDate>Tue, 22 Jun 2010 06:08:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
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		<description><![CDATA[2 जून को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज हुई राजनीति में एक बहुत ही उम्दा संवाद है- ‘राजनीति में फैसले अच्छा या बुरा देखकर नहीं लिए जाते हैं, बल्कि उनकी अहमियत देखी जाती है, मौका देखकर.’ नाना पाटेकर, अजय देवगन, ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-3842" title="Rajneeti" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/Prakash-Jha-Rajneeti-Wallpaper-300x206.jpg" alt="" width="300" height="206" />2 जून को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज हुई राजनीति में एक बहुत ही उम्दा संवाद है- ‘राजनीति में फैसले अच्छा या बुरा देखकर नहीं लिए जाते हैं, बल्कि उनकी अहमियत देखी जाती है, मौका देखकर.’ नाना पाटेकर, अजय देवगन, मनोज वाजपेयी, रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ जैसे इंडस्ट्री के आधा दर्जन बड़े सितारों से सज्जित इस फिल्म में दर्जनों ऐसे उम्दा संवाद हैं, जिन्हें सुनकर सिनेमाघर में दर्शक तालियां पीट रहे हैं. प्राचीनकालीन महाभारत की कथा से प्रेरित प्रकाश झा के निर्देशन में बनी इस फिल्म को न सिर्फ आलोचकों ने सराहा है, बल्कि दर्शकों ने भी सिर माथे पर बिठाया है. नतीजतन, राजनीति 2010 की अब तक की सबसे कामयाब फिल्म साबित हो रही है. हालांकि फिल्म की कहानी को देखते हुए आलोचकों ने इसकी कामयाबी पर संदेह जताया था. लेकिन फिल्म ने देशभर में छप्परपफाड़ कमाई करके सभी को हैरत में डाल दिया है. 2 जून, शुक्रवार को देशभर के पंद्रह सौ से ज्यादा सिनेमाघरों में रिलीज होने के बाद फिल्म ने पहले छह दिनों में ही 50 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई करके 2010 में सबसे अच्छी शुरुआत की. इतना ही नहीं, फिल्म थ्री इडियट्स और गजनी के बाद पहले सप्ताह में कमाई के मामले में भारतीय फिल्म इतिहास की तीसरी सबसे बड़ी फिल्म साबित हुई है.</p>
<p style="text-align: justify;">फिल्म की कामयाबी ने नाकाम फिल्मों के ढेर पर खड़ी इंडस्ट्री को भी राहत पहुंचाई है. 2010 की पहली छमाही में- काइट्स, ब्ल्यू जैसी महंगी फिल्मों की नाकामी झेलने के बाद इंडस्ट्री भारी घाटे से गुजर रही थी. इस बीच, आईपीएल और परीक्षाओं के चलते भी इंडस्ट्री को भारी नुकसान झेलना पड़ा. लेकिन राजनीति की ऐतिहासिक कामयाबी ने इंडस्ट्री के चेहरे पर फिर से मुस्कान ला दी है. साथ ही, राजनीति की टिकट खिड़की पर कामयाबी से यह मिथक भी टूट गया है कि दर्शक अब बहुसितारा फिल्मों को लेकर उत्सुक नहीं रहते हैं. प्रकाश झा के महाभारत के इस आधुनिक संस्करण में आधा दर्जन से भी ज्यादा चर्चित सितारे थे और दर्शकों ने सभी का खुले दिल से स्वागत किया. फिल्म की कामयाबी ने रणबीर कपूर को एक बार फिर सबसे चर्चित युवा सितारा बना दिया है, जिनका करियर राॅकेट सिंह: सेल्समेन आॅफ द ईयर की नाकामी के बाद डगमगा गया था. इसी तरह कैटरीना कैफ के हिस्से में एक और सफल फिल्म दर्ज हो गई है.</p>
<p style="text-align: justify;">वहीं, फिल्म की कामयाबी ने प्रकाश झा को भी इंडस्ट्री के शीर्ष निर्देशकों में जमात में पहुंचा दिया है. हालांकि झा की पिछली दो फिल्में अपहरण और गंगाजल भी टिकट खिड़की पर कामयाब रही थी. लेकिन राजनीति ने झा के करियर की सभी फिल्मों की कुल कमाई से भी ज्यादा कमाई की है. असल में, राजनीति झा के साथ ही इसके प्रत्येक सितारे के करियर की भी सबसे कामयाब फिल्म साबित हो रही है.</p>
<p style="text-align: justify;">खास बात यह है कि फिल्म देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को साहस के साथ सामने लाती है. महाभारत से प्रेरित फिल्म की कहानी में परिवार के भीतर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की लड़ाई को दिखाया गया है. यह लड़ाई ऐसे निम्न स्तर तक पहुंच जाती है कि दो भाइयों के बेटे एक-दूसरे की जान लेने पर आमादा हो जाते हैं. वर्तमान में, भारतीय राजनीति भी इसी तरह के संक्रामक दौर से गुजर रही है, जहां नैतिक मूल्यों की कोई जगह नहीं है. क्षेत्रीय क्षत्रपों के प्रभुत्व वाले इस दौर में समाजसेवा और देशसेवा जैसे शब्द निरर्थक साबित हो चुके हैं और ताकत, पैसा हासिल करना ही राजनेताओं का एकमात्र लक्ष्य रह गया है. कुर्सी के पीछे नैतिक मूल्यों को तार-तार करने वाले शिबू सोरेन, पारिवारिक मोह में फंसकर धृतराष्ट्र बनकर रह गए समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव, एम. करुणानिधि जैसे नेताओं को देखने के बाद प्रकाश झा की राजनीति एक सार्थक फिल्म प्रतीत होती है.</p>
<p style="text-align: justify;">फिल्म की धमाकेदार कामयाबी के साथ झा उन चुनिंदा निर्देशकों में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने राजनीति की गंदगी को कामयाबीपूर्वक सिनेमाई पर्दे पर उकेरा. दशकों पहले 1971 मेरे अपने नामक एक फिल्म आई थी. महान फिल्मकार-गीतकार गुलजार के करियर की यह पहली फिल्म थी, जिसने तत्कालीन राजनीतिक दौर की विसंगतियों को बखूबी उकेरा था. सत्तर के दशक के उस दौर में भी आम जनता के लिए राजनीति में कोई जगह नहीं थी और प्रकाश झा की फिल्म यही साबित करती है कि वक्त बीतने के साथ हालात बदतर ही हुए हैं. बिहार की राजनीति में अच्छा-खासा दखल रखने वाले झा इस फिल्म के लिए बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने राजनीति के कीचड़ में रहते हुए भी इस यादगार फिल्म के जरिए एक मनमोहक फूल खिला दिया है.</p>
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		<title>मोदी-नीतीश कथा के गहरे राज</title>
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		<pubDate>Mon, 21 Jun 2010 16:05:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
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		<description><![CDATA[गुजरात के प्रभावशाली मुख्यमंत्री और देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा के अघोषित ‘ब्रांड एम्बेसडर’ माने जाने वाले नरेंद्र मोदी की शख्सियत के दो पहलू हैं. पहला- गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर वे देश के सबसे तरक्की ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-3838" title="nitish-kumar-narendra-modi-bhajpa" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/nitish-kumar-narendra-modi-sushma-swaraj-2009-5-10-10-52-11-300x281.jpg" alt="" width="300" height="281" />गुजरात के प्रभावशाली मुख्यमंत्री और देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा के अघोषित ‘ब्रांड एम्बेसडर’ माने जाने वाले नरेंद्र मोदी की शख्सियत के दो पहलू हैं. पहला- गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर वे देश के सबसे तरक्की पसंद मुख्यमंत्री के तौर पर उभरे हैं. मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी दो पारियों में मोदी ने गुजरात के औद्योगिक ढांचे का जिस तरह कायाकल्प किया है, वह उन्हें रतन टाटा, मुकेश अंबानी जैसे देश के शीर्षस्थ उद्योगपतियों का चहेता बनाता है. लेकिन मोदी की शख्सियत का दूसरा पहलू भी उतना ही असरकारी है, जो उनके लिए फायदेमंद नही,, बल्कि मुसीबतें बढाने वाला साबित होता है. मोदी का यह दूसरा पहलू 2002 के भयावह गोधरा दंगों से जुड़ा हुआ है, जिसमें उनकी ऐक ऐसी तस्वीर दुनिया के सामने आती है, जो हिन्दुओं का समर्थक है. लेकिन उससे भी बढ़कर वह मुसलमान कौम का दुश्मन है.</p>
<p style="text-align: justify;">बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू नेता नीतिश कुमार और मोदी के बीच इन दिनों जो कुछ हो रहा है, वह मोदी के इसी दूसरे पहलू की वजह से है. मामला कूछ यूं है कि पिछले दिनों बिहार में भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान मोदी ने अपने छठी इंद्रिय का इस्तेमाल करते हुए इस अवसर को भुनाने की सोची. सो उन्हें याद आया कि उनकी अगुवाई में गुजरात सरकार ने 2008 के भयावह कोसी बाढ़ हादसे के दौरान बिहार को 5 करोड़ रूपए की सहायता दी थी. सो, मोदी ने इसी सहायता को भूना लिया और देश के सभी छोटे-बड़े अखबारों में इस सहायता को सार्वजनिक करते विज्ञापन छपवा दिए. लेकिन अफसोस कि नीतिश कुमार को मोदी की यह अदा जरा भी नहीं भाई. सो, पटना में अपनी पार्टी की दुष्वारियों को सुलझाने के लिए इकट्ठा हुई भाजपा अब मोदी और नीतिश कुमार की लड़ाई के बीच फंसकर रह गई है.</p>
<p style="text-align: justify;">सवाल यह उठता है कि आखिर नीतिश कुमार ने मोदी की सरेआम बेइज्जति क्यों की ? सवाल यह उठता है कि आखिर मोदी की खातिर नीतिश कुमार ने भाजपा से दुश्मनी मोल क्यों ली,, जबकि बिहार में कुछ ही महीनों के भीतर विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और भाजपा उनकी गठबंधन सहयोगी है ? तो इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमें मोदी के अतीत और नीतिश कुमार के राजनीतिक चाल-चलन को समझना होगा. दरअसल, नीतिश कुमार भ्रष्टाचार और भाई-भतिजावाद के लिए कुख्यात बिहार में विकास की राजनीति के एक बड़े पैरोकार बनकर उभरे हैं. अपनी इसी छवि की बदौलत वे लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान जैसे धुरंधरों को पछाड़कर बिहार की सत्ता तक पहुंचने में कामयाब हुए. दूसरा, बिहार में मुस्लिम मतदाता भी बहुत बड़ी संख्या में मौजूद है. अपने विकास कार्यों से नीतिश कुमार सिर्फ बिहार के हिंदु मतदाताओं का दिल जीतने में ही कामयाब नहीं रहे, बल्कि मुस्लिम मतदाताओं के बीच भी उन्होंने साफ-सुथरी छवि कायम कर ली है, बावजूद इसके कि वे बिहार में बाबरी विध्वंस के लिए जिम्मेदार भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">अब ऐसे में भला नीतिश कुमार को कैसे सुहाता, कि देशभर के अखबारों में जो विज्ञापन छप रहे हैं, उनमें वे मोदी के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं. गौरतलब है कि गोधरा दंगों के बाद से ही नरेंद्र मोदी देश में हिन्दुओं के सबसे बड़े पैरोकार और मुस्लिमों के सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर उभरे हैं. गुजरात को देश में सबसे तेजी से विकास करता प्रदेश बनाने के बाद भी मोदी के दामन से गोधरा दंगों का कलंक मिट नहीं पाया है. यही वजह है कि मोदी के साथ अपनी तस्वीरें देखकर नीतिश कुमार बूरी तरह से बौखला गए. नीतिश कुमार को अच्छे से पता है कि अगर वे बिहार के आगामी विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करना चाहते हैं, तो इसके लिए उन्हें राज्य के मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखना होगा. लेकिन नीतिश कुमार यह भी जानते हैं कि मोदी के साथ उनकी करीबियां मुस्लिम मतदाताओं को उनसे दूर कर सकती है. यही वजह है कि वे मोदी के विज्ञापनों से कदर नाराज हो गए हैं कि अब भाजपा के साथ उनके संबंधों में भी कड़वाहट आ गई है.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन नीतिश कुमार अभी भी अपने रूख पर कायम है. वजह, उन्हें अच्छे से मालूम है कि जब तक बिहार के मुस्लिम मतदाता उनके साथ है, उन्हें भाजपा या नरेंद्र मोदी की कोई खास जरूरत नहीं है. बस इसीलिए नीतिश कुमार ने मोदी का सार्वजनिक बहिष्कार कर दिया है.</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे यह बहिष्कार नया भी नहीं है. दरअसल, नीतिश कुमार एनडीए में शामिल होने के बावजूद हमेशा ही मोदी से दूरियां रखते रहे हैं. कुछ अरसा पहले जब बिहार के चुनावों में भाजपा ने यह पेशकष रखी थी कि नरेंद्र मोदी को स्टार प्रचारक के तौर पर राज्य में भेज दिया जाए, तो नीतिश कुमार ने इसे सिरे से खारिज कर दिया था. तब भी नीतिश कुमार ने मोदी का सार्वजनिक बहिष्कार करते हुए कहा था कि इससे अच्छा तो यह है कि भाजपा सुशिल कुमार मोदी को भेज दे. इसी तरह भाजपा के अधिवेशनों में भी नीतिश कुमार मोदी से दूर ही रहते आए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">सो, अब चुनावों के चंद महीनें पहले भला नीतिश कुमार मोदी के साथ अपनी तस्वीरें कैसे हजम कर पाते. सो, उन्होंने एक बार फिर मोदी का बहिष्कार कर दिया है.</p>
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		<title>ओबामा से बात करों, हत्यारे एंडरसन की&#8230;</title>
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		<pubDate>Sat, 12 Jun 2010 15:44:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अपना मतलब कैसे निकाला जाता है, यह अमेरिका से सीखना चाहिए. स्वयंभू महाशक्ति के तौर पर अमेरिका दूनिया के प्रत्येक हिस्से में होने वाली गतिविधि पर प्रतिक्रिया देने और बाकी देशों को नसीहत देना अपना हक समझता है. सो, ऐसे ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-3664" title="Barack-Obama-Manmohan-Singh_0" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/Barack-Obama-Manmohan-Singh_0-300x200.jpg" alt="" width="300" height="200" />अपना मतलब कैसे निकाला जाता है, यह अमेरिका से सीखना चाहिए. स्वयंभू महाशक्ति के तौर पर अमेरिका दूनिया के प्रत्येक हिस्से में होने वाली गतिविधि पर प्रतिक्रिया देने और बाकी देशों को नसीहत देना अपना हक समझता है. सो, ऐसे स्वयंभू देश के राष्ट्रपति बराक ओबामा अब भारत के दौरे पर आने वाले हैं. जाहिर है, इस दौरे का फायदा उठाने की हरसंभव कोशिश की जाएगी. अमेरिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, भारत को परमाणु समझौते के लिए राजी करना. लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़े इस प्रस्ताव पर भारत को अपने साथ करना अमेरिकी राष्ट्रपति के एजेंडे में सबसे ऊपर रहेगा. सो, अपना मतलब निकालने के लिए अमेरिकी प्रशासन ने अभी से इसके लिए माहौल बनाना शुरू कर दिया है, जबकि यह यात्रा नवंबर महीने में प्रस्तावित हैं. व्हाइट हाउस ने इस तरह का माहौल बनाना शुरू किया है, मानों कि इक्कीसवीं सदी में भारत के साथ मजबूत संबंध बनाने के लिए अमेरिका पूरी तरह से तैयार है. चलिए यह मान लेते हैं, तो फिर सवाल यह है कि करीबी संबंध् बनाने को तैयार अमेरिका भोपाल गैस कांड के आरोपी एंडरसन के प्रत्यार्पण की भारत की छोटी सी मांग भी नहीं मानता. इस मामलें में हाल ही में फैसला सुनाया गया, लेकिन गोरी मानसिकता वाला एंडरसन आरोपी के तौर पर देश में मौजूद तक नहीं था. यह भारत सरकार की सबसे बड़ी नाकामी है और भारतीयों के लिए सबसे बड़ी जिल्लत. और इसके लिए अमेरिका जिम्मेदार है. ऐसे में जरूरत इस बात की है कि ओबामा के दौरे के वक्त उनका विरोध किया जाए और सबसे पहले भोपाल गैस कांड के गुनहगार को मांगा जाएं.</p>
<p style="text-align: justify;">अफसोस कि ऐसा होता नहीं दिखता. भोपाल गैस कांड का फैसला आने के बाद जरूरत इस बात की थी कि देश के इस सबसे विभत्स हादसे को लेकर एकजूटता का जज्बा दिखाया जाता. जरूरत इस बात की थी कि 15000 लोगों की मौत के गुनहगारों को दो साल की सजा सूनाने और पच्चीस हजार रूपए के मुचलके पर फौरन जमानत पर छोड़ दिए जाने वाले इस कानून की खामियों को दूर करने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाता.</p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-full wp-image-3665" title="warren anderaon" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/warren-anderaon.jpg" alt="" width="300" height="200" />लेकिन अफसोस कि यह भारत का प्रजातंत्र है, जहां प्रजा के लिए कोई सुनवाई नहीं होती. सो, ऐसे ईमानदारी भरे प्रयासों को बजाए राजनीतिक पार्टियों ने अपने वौटबैंक की रोटियां सैंकने को ज्यादा तरजीह दी है. चूंकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार है और 1984 के इस विभत्स कांड के दौरान भी राजीव गांधी की अगुवाई में कांग्रेस की ही सरकार थी, सो गेंद भाजपा के हाथ में है. वह हो-हल्ला मचा रही है कि इस मामलें के लिए कांग्रेस जिम्मेदार है. चूंकि सत्ता में कांग्रेस है, सो वह इस मामले पर अपना बचाव करने में जुट गई है. इन सबके बीच में, मामलें की गंभीरता पूरी तरह से खारिज कर दी गई है. मामलें के लिए जिम्मेदार लोगों तक पहुंचने की संभावनाओ को भी खारिज कर दिया गया है.</p>
<p style="text-align: justify;">चूंकि इस देश में प्रजातंत्र है, सो सभी राजनीतिक पार्टियां इस संवेदनशील मुद्दें को जमकर भूनाना चाहती है, ताकि इस प्रजातंत्र की मलाई में उनकी हिस्सेदारी कायम रहे. इसलिए, वे अपने-अपने काम में जूट गए हैं. वैसे भी हमारे प्रधानमंत्री, जो देश की गंभीर समस्याओ को सूलझाने के बजाए अमेरिका के साथ संबंधों को ज्यादा तरजीह देते हैं. ऐसे में इस बात की उम्मीद करना बेईमानी ही होगा कि वे नवंबर में बराक ओबामा की यात्रा के दौरान उनसे एंडरसन के गुनाह के बारे में चर्चा करें. वे ओबामा को बताए कि एक अमेरिकी की गैरजिम्मेदाराना रवैये के चलते 15000 लोगों को अपनी जान गंवाना पड़ी.</p>
<p style="text-align: justify;">अफसोस कि ऐसा होता नहीं दिखता. क्योंकि भारत एक प्रजातांत्रिक देश है.</p>
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		<title>सितारे जमीं पर&#8230;</title>
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		<pubDate>Fri, 11 Jun 2010 06:22:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल-कूद]]></category>
		<category><![CDATA[Cricket]]></category>
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		<category><![CDATA[batsman]]></category>
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		<category><![CDATA[विश्वकप]]></category>

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		<description><![CDATA[विश्वकप को सालभर से भी कम समय बचा है और भारतीय टीम के दर्जनभर प्रतिभावान गेंदबाज टीम में जगह पाने के लिए जूझ रहे हैं. यह 2008 में भारतीय टीम के ऑस्ट्रेलिया दौरे की बात है, जब प्रथम श्रेणी क्रिकेट ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-3654" title="Munaf-Patel-Ishant-Sharma-India-Fast-Bowlers-201208" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/Munaf-Patel-Ishant-Sharma-India-Fast-Bowlers-201208-197x300.jpg" alt="" width="197" height="300" />विश्वकप को सालभर से भी कम समय बचा है और भारतीय टीम के दर्जनभर प्रतिभावान गेंदबाज टीम में जगह पाने के लिए जूझ रहे हैं. यह 2008 में भारतीय टीम के ऑस्ट्रेलिया दौरे की बात है, जब प्रथम श्रेणी क्रिकेट में दिल्ली से खेलने वाले छह फुट चार इंच लंबे ईशांत शर्मा ने कंगारूओं को उनकी ही सरजमीं पर चारों खाने चित्त कर दिया था. खासकर पर्थ टेस्ट में ईशांत का जादू सर चढ़कर बोला था, जब उन्होंने विकेट के दोनों तरफ स्वींग लेती अपनी गेंदों से रिकी पोटिंग जैसे महानतम बल्लेबाज को भी चकित कर दिया था. उस पूरे दौरे में ईशांत ने 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रप्तार से गेंदबाजी की थी, जिससे प्रभावित होकर ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट के सर्वकालिक महानतम कप्तानों में शुमार होने वाले स्टीव वाॅ ने भी इस तेज गेंदबाज को भारतीय टीम का ‘भविष्य’ करार दिया था.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन अब हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं. ऐसे वक्त में, जबकि 2011 में एशिया में होने वाले विश्वकप को सालभर भी नहीं बचा है, ईशांत शर्मा भारतीय टीम में खेलने के आसपास भी नहीं है. ईशांत ही नहीं, आरपी सिंग, एस श्रीसंथ, मुनफ पटेल और इरफान पठान जैसे गेंदबाजों का भी यही हाल है. ये सभी कभी न कभी भारतीय क्रिकेट के सबसे चमकते सितारे थे. अपनी रप्तार और स्वींग खाती गेंदों से इन सभी ने विश्व क्रिकेट के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों को भी पैवेलियन भेजा था. 2007 के दक्षिण अफ्रीका दौरे पर अपनी रफ़्तार से सबको चौकाने वाले श्रीसंथ इसके बाद से अब तक भारतीय टीम के लिए 17 टेस्ट और 49 एकदिनी मैच खेल चुके हैं. कभी कपिलदेव के समकक्ष करार दिए गए इरफान पठान भारत के लिए 29 टेस्ट और 107 एकदिवसीय मैच खेल चुके हैं. वहीं, अपनी स्वींग गेंदबाजी से भारतीय टीम को विदेशी मैदानों पर कई यादगार जीतें दिलाने वाले आरपी सिंह अभी तक 13 टेस्ट और 55 एकदिनी मैच खेल चुके हैं. इसी तरह भारत के लिए 12 टेस्ट और 43 एकदिवसीय मैच खेल चुके मुनफ पटेल को उनके करियर की शुरुआत में सटीक लाइन-लैंथ के चलते ग्लैन मैग्राथ की तरह का गेंदबाज माना गया था.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन हाल-फिलहाल ये सभी टीम से बाहर हैं. 2011 के बहुप्रतीक्षित विश्वकप से पहले दुनिया की अन्य टीमों की तरह ही भारतीय क्रिकेट के लिए भी यह तैयारियों का दौर है. लेकिन विश्वकप के लिए तैयार की जा रही टीम में इन सभी गेंदबाजों का नाम दूर-दूर तक भी नहीं है. इसके लिए सीधे तौर पर बीसीसीआई के मुख्य चयनकर्ता एस. श्रीकातं जिम्मेदार है. तमिलनाडू से ताल्लुक रखने वाले ये महाषय शायद भारतीय टीम में सिर्फ तमिलनाडू के खिलाड़ियों को ही देखना चाहते हैं. तभी, तो जिम्बाब्वे के लिए चुनी गई टीम में तमिलनाडू के बल्लेबाज मुरली विजय को तो आराम से जगह मिल गई, लेकिन इरफान पठान सहित भारत के ये सभी युवा गेंदबाज एक मौके के लिए भी तरस गए. हाल ही में भारतीय चयनकर्ताओं ने तीन अलग-अलग दौरों के लिए टीम का चयन किया- इंग्लैंड दौरे के लिए ए टीम का, जिम्बाब्वे दौरे के लिए सुरेश रैना की अगुवाई में युवा टीम का और श्रीलंका में खेले जाने वाले एशिया कप के लिए सबसे मजबूत टीम का. इन तीनों टीमों के लिए चयनकर्ताओं ने दर्जनभर तेज गेंदबाजों का चयन किया, लेकिन उनमें भी पठान, श्रीसंथ, मुनफ पटेल और ईशांत शर्मा का नाम नहीं था. चयनकर्ताओं के इस फैसले के चलते कई सवाल खड़े हो गए हैं. ऐसे में, जबकि दूसरे देश विश्वकप के लिए अपने सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों को तैयार कर रहे हैं, भारतीय चयनकर्ताओं ने इन अनुभवी गेंदबाजों को नजरअंदाज क्यों किया हुआ है ?</p>
<p style="text-align: justify;">हालांकि इसका जवाब इन खिलाड़ियों के हालिया प्रदर्शन में छुपा हुआ है. गौरतलब है कि करियर की शुरुआत में करिश्माई प्रदर्शन करने वाले इन सभी गेंदबाजों के हालिया प्रदर्शन में खासी गिरावट दर्ज की गई है. चोटों से जूझते करियर के बीच न सिर्फ इन गेंदबाजों की रप्तार में कमी आई है, बल्कि बल्लेबाजों के मन में खौफ पैदा करने वाली स्वींग भी कहीं खो गई है. इसी के चलते कभी भारतीय गेंदबाजी के अगुवा रहे ये गेंदबाज अपनी लय पूरी तरह खो चुके हैं, जिसका उदाहरण हाल ही में आईपीएल में भी देखने को मिला.</p>
<p style="text-align: justify;">फिर भी, विश्वकप से ठीक पहले 40 से ज्यादा एकदिवसीय मैच खेल चुके इन सभी गेंदबाजों को नजरअंदाज करना किसी भी मायने में सही नहीं है. पूर्व चयनकर्ता और विकेटकीपर किरण मोरे के मुताबिक- ‘कुछ महीने पहले तक ये सभी गेंदबाज भारतीय आक्रमण के अगुवा थे, लेकिन अब वे संभावित 60 खिलाड़ियों में भी नहीं है.’ खास बात यह है कि ये सभी गेंदबाज 27 साल से कम उम्र के हैं, साथ ही इनके पास भारतीय मैदानों पर अच्छे प्रदर्शन का अनुभव भी है.</p>
<p style="text-align: justify;">इसीलिए चयनकर्ताओं के फैसले को क्रिकेट गलियारों में एकमत से गलत ठहराया जा रहा है. भारत के पूर्व गेंदबाज मनोज प्रभाकर के मुताबिक- ‘ये ठीक है कि इनका हालिया प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. लेकिन विश्वकप के लिए नए गेंदबाज तैयार करने से बेहतर यह है कि इन्हें ही फार्म में आने का मौका दिया जाए.’</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे, हाल-फिलहाल तो चयनकर्ता इस तरह की दरियादिली दिखाने के मूड में नहीं है. इसीलिए कई वरिष्ठ खिलाड़ियों की गैरमौजूदगी के बावजूद इन युवा तेज गेंदबाजों को जिम्बाव्बे दौरे पर नहीं भेजा गया. मोरे कहते हैं- ‘भारतीय टीम के पास फिलहाल जहीर खान और आशीष नेहरा ही बचे हैं. इनमें से भी नेहरा अक्सर चोटिल होते रहते हैं. ऐसे में भारतीय टीम की विश्वकप को लेकर तैयारियां अधूरी ही प्रतीत होती हैं.’ बात सही भी है. और इसमें भी संदेह नहीं कि चयनकर्ताओं की गलत नीतियों के चलते विश्वकप से ठीक पहले खराब पफार्म से जूझ रहे इन युवा गेंदबाजों को भी अपनी लय हासिल करने का मौका नहीं मिल पा रहा है.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>ललित मोदीः परिकथा पर विराम</title>
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		<pubDate>Wed, 28 Apr 2010 15:02:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
				<category><![CDATA[संसद मार्ग]]></category>

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		<description><![CDATA[यह 2004 की बात है, जब राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने राज्य की क्रिकेट बिरादरी के लिए एक भव्य पार्टी दी थी. उस पार्टी में राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन की कई ‘हाई-प्रोफाइल’ शख्सियतों के साथ ही ललित कुमार मोदी ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-full wp-image-2696" title="ललित मोदी आई पी एल" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/04/ललित-मोदी-आई-पी-एल2.jpg" alt="" width="300" height="229" />यह 2004 की बात है, जब राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने राज्य की क्रिकेट बिरादरी के लिए एक भव्य पार्टी दी थी. उस पार्टी में राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन की कई ‘हाई-प्रोफाइल’ शख्सियतों के साथ ही ललित कुमार मोदी नामक एक सांवला, दुबला-पतला शख्स भी मौजूद था. उस पार्टी में मौजूद लोगों के मुताबिक मोदी नामक यह शख्स उस वक्त दूसरों की नजर में आने की भरसक कोशिश कर रहा था, लेकिन कई ‘हाई-प्रोफाइल’ मेहमानों की मौजूदगी के चलते उसे किसी ने भी ज्यादा तवज्जो नहीं दी.</p>
<p style="text-align: justify;">सो, आज वे सभी व्यक्ति, जिन्होंने उस वक्त मोदी को नजरअंदाज किया था, पछता रहे हैं. 2004 की गुमनामी के दौर को पीछे छोड़ते हुए ललित मोदी आज देश के सबसे चर्चित व्यक्ति बन बैठे हैं. कुछ दिनों पहले तक क्रिकेट की दुनिया पर उनका एकछत्र राज था. मुकेश अंबानी, विजय माल्या जैसे उद्योगपति उनके साथ बैठने में गर्व महसूस करते थे, तो शाहरुख खान, प्रीति जिंटा और शिल्पा शेट्टी जैसे बॉलीवुड  सितारे भी उनके सम्मोहन में खींचे चले आते थे. क्रिकेट कमेंटेटर हर्षा भोगले के मुताबिक- ‘कैरी पैकर के बाद मोदी क्रिकेट के इतिहास के सबसे ताकतवर व्यक्ति के तौर पर सामने आए हैं.’</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन आईपीएल के तीसरे संस्करण में सट्टेबाजी और भ्रष्टाचार का दीमक लगने के बाद मोदी का जादू अब उतार पर है. बीसीसीआई ने मोदी के पर कतरने की पूरी तैयारी कर ली है. मुश्किलों के इस झंझावत में शरद पवार जैसे उनके कट्टर समर्थक भी दूर जा खड़े हैं. ऐसे में, यह जानना दिलचस्प रहेगा कि आखिर 2004 की गुमनामी के दौर को पीछे छोड़ते हुए मोदी देश के सबसे चर्चित व्यक्ति कैसे बन बैठे?</p>
<p style="text-align: justify;">मोदी का यह सफर 2004 के आखिर में राजस्थान के नागपुर जिला एसोसिएशन का अध्यक्ष बनने की साधारण घटना से शुरू हुआ. तब तक मोदी क्रिकेट के गलियारों में एक गुमनाम शख्सियत थे, जिनका नाम राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के तत्कालीन अध्यक्ष किशोर रूंगटा ने भी नहीं सुना था. रूंगटा परिवार का उस वक्त राजस्थान क्रिकेट में एकछत्र राज था. तब रूंगटा ने राजस्थान एसोसिएशन के सचिव राजेंद्रसिंह नन्दू से मोदी के बारे में पूछा, तो राजेन्द्रसिंह का जवाब था- ‘आप चिंता मत करिए, मोदी अपने ही ग्रुप का आदमी है, आगे बहुत काम आएगा.’</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन, फरवरी 2005 में मोदी ने राजस्थान एसोसिएशन के चुनावों में किशोर रूंगटा को करारी शिकस्त देकर उनके चालीस साल के प्रभुत्व को जमींदोज कर दिया. इसके बाद तो मोदी ने जिस चीज को भी छुआ, सोने में तब्दील कर दिया. अपना दायरा बढ़ाते हुए उन्होंने बीसीसीआई के भीतर अपना प्रभुत्व कायम किया और बाद में उपाध्यक्ष की कुर्सी तक भी पहुंचे. लेकिन निर्विवाद रूप से, आईपीएल मोदी की जिंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी है. एक ऐसी लीग, जिसने सैकड़ों क्रिकेटरों की जिंदगी को बदल दिया.</p>
<p style="text-align: justify;">आंकड़ों के मुताबिक आईपीएल तीन साल में ही पंद्रह हजार करोड़ रुपए के साम्राज्य में तब्दील हो गया है. लेकिन इस साम्राज्य को रचने वाले मोदी की विदाई हो चुकी है. यकीनन, मोदी ने जिस तेजी से ऊपर की छलांग लगाई, उसी तेजी से उन्हें नीचे भी धकेल दिया गया</p>
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		<title>अच्छी कहानी , फ्लॉप फ़िल्में</title>
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		<pubDate>Thu, 22 Apr 2010 12:48:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
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		<category><![CDATA[bollywood]]></category>
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		<category><![CDATA[film]]></category>
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		<category><![CDATA[फिल्म तकनीक]]></category>
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		<description><![CDATA[पिछले सप्ताह बॉक्स ऑफिस पर रिलीज हुई दो फ़िल्में &#8221; पाठशाला&#8221; और &#8220;फूंक-२&#8221; हिंदी सिनेमा में एक नए चलन की ओर इशारा करती है. यह  इन दिनों रिलीज हो रही फिल्मों की कहानियों और पर्दे पर उनके फिल्मांकन में आये ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-full wp-image-2570" title="पाठशाला हिंदी फिल्म" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/04/पाठशाला-हिंदी-फिल्म.jpg" alt="" width="225" height="338" />पिछले सप्ताह बॉक्स ऑफिस पर रिलीज हुई दो फ़िल्में &#8221; पाठशाला&#8221; और &#8220;फूंक-२&#8221; हिंदी सिनेमा में एक नए चलन की ओर इशारा करती है. यह  इन दिनों रिलीज हो रही फिल्मों की कहानियों और पर्दे पर उनके फिल्मांकन में आये बदलाव का संकेत है . गौर कीजिए, &#8221; पाठशाला&#8221; और &#8220;फूंक-२&#8221; दोनों ही फिल्मों की कहानी बेहद उम्दा थी. बावजूद इसके दोनों ही फिल्में टिकट खिड़की पर औंधे मुंह गिरी. न सिर्फ दोनों फिल्में दर्शकों का दिल जीतने में नाकामयाब रही, बल्कि आलोचकों ने भी दोनों फिल्मों को सिरे से नकार दिया.</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर अच्छी कहानी के बावजूद दोनों फिल्मों का बुरा हश्र क्यों हुआ ? इसका जवाब यही है कि बेशक दोनों फिल्मों की कहानी अच्छी थी, लेकिन दोनों ही निर्देशक इन अच्छी कहानियों को सही ढंग से पर्दे पर उकेर नहीं पाएं. मतलब यह कि कहानी का ‘आइडिया’ अच्छा था, लेकिन जब इसे दृष्यों में बांटने की नौबत आई, तो निर्देशक और उनके कहानीकार साथी इसमें नाकाम रहे. इसका नतीजा यह रहा कि अच्छी-भली कहानी होने के बावजूद दोनों ही फिल्में न तो दर्शकों का दिल जीत पाई और न ही आलोचकों की कलम को.</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">और ऐसा भी नहीं है कि यह पहली बार हुआ है. हैरानी इसलिए होती है कि बॉलीवुड में पिछले कईं सालों से यही हो रहा है. बेशक हमारी इंडस्ट्री में बीतें कुछ सालों में नए प्रतिभावान  निर्देशक और कहानीकार आएं है, जो लीक से हटकर काम करने में भरोसा करते हैं. अनुराग कश्यप , दीबाकर बनर्जी, शशांत शाह जैसे चिर-परिचित नामों के साथ ही प्रत्येक साल दर्जनों ऐसे नए  निर्देशक और कहानीकार अपनी फिल्मों को लेकर भारतीय  दर्शकों  के सामने आते हैं, जो एक नई कहानी, नया विचार परोसते हैं. लेकिन दुर्भाग्य की बात यही है कि इसके बावजूद उनकी फिल्में औंधे मूंह गिर जाती है.</div>
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<div style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-2571" title="funk -2 हिंदी फिल्म" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/04/funk-2-हिंदी-फिल्म-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" />पिछले एक-दो साल के दौरान रिलीज हुई फिल्मों पर नजर डालें, तो लक बाय चांस, सिकंदर, कुर्बान, वेल डन अब्बा, तुम मिले, दिल्ली-6, कार्तिक कालिंग कार्तिक ऐसी ही कुछ फिल्में है, जिनकी कहानी का मूल ‘आइडिया’ बेहद उम्दा था, बावजूद इसके ये फिल्में दर्शकों और आलोचकों दोनों के लिए ही बोझिल अनुभव ही साबित हुई. पहले बात करते हैं,फिल्म सिकंदर  की. जम्मू-कश्मीर  के आतंकी माहौल के बीच एक लड़के की दास्तां दिल झकझोर देने वाली साबित हो सकती थी, लेकिन नए निर्देशक पियूष झा  ने कहानी में राजनीतिक कोण डालकर पूरी कहानी का कबाड़ा कर दिया. नतीजतन, वह एक संवेदनशील फिल्म बनने के बजाए राजनीतिक भाषणबाजी वाली फिल्म बनकर रह गई. इसी तरह सैफ अली खान और करीना कपूर अभिनीत कुर्बान मुस्लिम आतंकवाद की थीम वाली अच्छी कहानी थी, लेकिन निर्देशक  ने इसे इस कदर उबाउ बना दिया कि फिल्म में मनोरंजक दृष्यों के लिए ही दर्शक तरस गए. वहीं, इमरान हाशमी और सोहा अली खान अभिनीत फिल्म तुम मिलें मुंबई की बारिश  के बीच फंसे एक प्रेमी जोड़े की उम्दा कहानी थी, लेकिन फिल्म में निर्देशक मोहित सूरी ने इतने फ्लेशबैक डाल दिए कि फिल्म अपने मूल भाव से भटक गई.</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">बात बिल्कुल साफ है, कि अच्छी कहानियों के बावजूद हमारे फिल्मकार अच्छी फिल्में नहीं बना पा रहे हैं. नतीजा यही है कि बॉलीवुड अभी भी साल में 300 से ज्यादा फिल्में बनाता है और अभी भी इसमें से नब्बे फीसदी फिल्में बूरी तरह से नाकाम साबित होती है. जाहिर है, इस खराब रिकोर्ड को सुधारने के लिए बॉलीवुड को अभी भी अपनी कार्यप्रणाली में भरपुर सुधार करने की गुंजाइश  है.</div>
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