सादत हसन मंटो की यादें
0साहित्य की दुनिया यकीनन इतिहास याद करने के लिए सर्वोत्तम तरीकों में से एक है। शेक्सपियर के रूमानी लालित्य से लेकर वात्सायन के कामसूत्र, कालिदास की अभिज्ञान शाकुंतलम हो या भृतहरी के नाट्य शास्त्र समाज के वो आईने है जो इतिहास
साहित्य की दुनिया यकीनन इतिहास याद करने के लिए सर्वोत्तम तरीकों में से एक है। शेक्सपियर के रूमानी लालित्य से लेकर वात्सायन के कामसूत्र, कालिदास की अभिज्ञान शाकुंतलम हो या भृतहरी के नाट्य शास्त्र समाज के वो आईने है जो इतिहास
राजनीति जब तक राज करने की नीति है तब तक तो ठीक है पर मनमानी करने की नीति हो जाए तो क्या करें ? एक तरफ केंद्र की सरकार है जो अपने हिसाब से कार्यक्रम चलवाना चाहती है तो राज्य
जानकारों का मानना है कि रिलायंस ने जिन दावों के साथ कृष्ण गोदावरी बेसिन के गैस ब्लाको को सरकार से पाया था वह वो उस अपेक्षा पर खरी नहीं उतरी है और ना ही अरबो के सौदों के साथ इस
बंगारू लक्ष्मण पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुखराम के बाद भारत के अकेले ऐसे नेता है जिन्हें भ्रष्टाचार की सजा मिली है, मेरे एक दलित मित्र इसे दलितों पर अन्याय का एक और उदाहरण बता रहे है. बात दलितवाद के चश्मे से
सपा की सायकिल ने अपनी रफ़्तार विपक्ष के गढ़ कहे जाने वाले जिलो में भी बढ़ा दी है वही पूर्व की गोंडा, फैजाबाद दोआब की इटावा एटा की परंपरागत के अपने गढ़ में भी विजयी माला अपने गले में डलवाई
आज ब्रज के नन्दगाँव व् बरसाना में लट्ठमार होली शुरू हुई तो शाम होते होते जेएनयू में भी गुलाल के होली शुरू हुई, दोनों ही बदलाव की उमंग के साथ फिजाओं में बिखरे थे. जहां ब्रज में जीवन के हर
दिल्ली से यूपी की तरफ बढ़ने वाले नैशनल हाईवे चौबीस पर, आपकी गाड़ी जब लखनऊ की तरफ बढ़ती है तब आपको धीरे धीरे यूपी की औद्योगिक क्रांति का एहसास होता है. यूपी के द्वार पर आते ही जहाँ नए
बहुजन समाज पार्टी के पिछले 28 वर्षो के सफ़र पर नज़र डाले तो ये जानने में ज्यादा समय नहीं लगेगा की बसपा के संस्थापक कांशीराम की तरह ही मायावाती पार्टी की उन्नती की प्रमुख वजह रही है. इस बसपा रूपी
भारत में कई ऋषि मुनि, पीर ,गुरु व् ज्ञानी हुए है हमने उन्हें नहीं देखा , ना ही तक्ष-शिला , भोज- शिला ,विक्रम -शिला, नालंदा, वल्लभी या कांची जैसे विश्वविद्यालय, पर फिर भी अपने लोगो के मुंह से भारत को
कहा जाता है कि दुश्मनी में भी एक अंदाज़ होना चाहिए परन्तु आजकल राजनीति में ऐसी बात कहाँ ? एक वो समय था जब विपक्ष में बैठे लोग पक्ष वालो को दुर्गा कह संबोधित करते थे. समय बदला, समाज बदला,