है कितना आसां कह देना,कि बीत गई सो बात गई….
5है कितना आसां कह देना….. कि बीत गई सो बात गई…….. एक दाग उम्र को दे कर के मुझ को ये बीती रात गई…..। कैसे कह दूं माज़ी मेरा कल परदे में छिप जायेगा एक पहर वक्त की घड़ी चली
है कितना आसां कह देना….. कि बीत गई सो बात गई…….. एक दाग उम्र को दे कर के मुझ को ये बीती रात गई…..। कैसे कह दूं माज़ी मेरा कल परदे में छिप जायेगा एक पहर वक्त की घड़ी चली
हर रात सोचता हूँ, एक नई सुबह आये, सुबह तो हर रोज़ आती है, पर बैरंग चली आती है फिर सोचा,कि ये रात बदल जाए, पर,ख्वाव वदलकर, सुनसान चली आती है……. अब तो ये दिन-रात, भी अपने न रहे, जैसे,
मेरी मासूमियत का वो ऐसा, ज़बाब देते हैं, जैसे मेरी जिन्दगी से हर लम्हे का, हिसाब लेते हैं, जिनको समझते थे,सच का देवता वही,झूठ का, दबाव देते हैं, चेहरे पढ़ने में तो लग गई उम्र तमाम,अब चेहरे को, किताब कहते
पल-पल नज़र में मुझे भर रहा है कोई……… दिल पर असर गहरा, कर रहा है कोई……… बो क्यों लगाते हैं, काज़ल आँखों में, इतना जिसके लिए हर पल, ज़ल रहा है कोई…………, हदों की हदें, पार कर रहा है कोई,