Articles By: दीपाली पाण्डेय दीपाली पाण्डेय

जानकारी के अभाव में सिमटता सूचना का अधिकार

जानकारी के अभाव में सिमटता सूचना का अधिकार

3 2010/01/31 7:53 pm

लोकतंत्र के नाम पर हमारे पास एक महज एक अधिकार है, पांच साल में अपना वोट देने का। व्यवस्था से शिकायत हो तो हम ज्यादा से ज्यादा पांच साल में अपना वोट सरकार बदलने के लिए दे सकते है। साठ

26 जनवरी एक रस्म बनकर रह गयी है ….

26 जनवरी एक रस्म बनकर रह गयी है ….

0 2010/01/25 12:10 am

गणतंत्र दिवस की आप सब को हार्दिक बधाई ,दो दिनों के बाद २६ जनवरी २००९ को हम गणतंत्र दिवस के 60 वीं वर्षगाँठ मनाएँगे।सारा देश राष्ट्रभक्ति के रंग में सराबोर है ,चाहे वो इन्टरनेट से लेकर टीवी और अख़बारों तक

और कितनी रुचिका ?

और कितनी रुचिका ?

3 2010/01/06 10:19 pm

यदि कोई अपराध करे तो सजा और पीड़ित को इन्साफ ” ये बातें हिंदी उपन्यास और फिल्मों में रह गयी हैं . आज कहाँ और कितना इन्साफ मिलता है ? इन्साफ के नाम पर विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में खिलवाड़ जारी है . यह कहानी है १४ वर्षीय लड़की की, जिसकी आँखों में सपना था टेनिस की सनसनी बनने का . आज अगर वो जिन्दा होती तो शायद सानिया मिर्जा से भी बड़ा नाम होती . एक ऐसी टेनिस की दुनिया का उभरता नाम जो यौन उत्पीड़न का शिकार होती है और प्रतिकार करती है तो उसे ख़ुदकुशी का रास्ता अख्तियार करना पड़ता है .यहाँ तक कि उसके भाई को झूठे केस में फंसाया जाता है ,जानवरों की तरह बर्ताव किया जाता है

२१ वीं सदी में ऑनलाइन एक्टिविज्म का जोर

२१ वीं सदी में ऑनलाइन एक्टिविज्म का जोर

1 2010/01/03 11:59 pm

सोशल नेटवर्किंग का जोर शहरों से होता हुआ कस्बाई इलाकों तक जा पहुंचा है . कम -पढ़े लिखे लोगों में भी पी आर यानी पब्लिक रिलेशन का बड़ा क्रेज है .पब्लिक रिलेशन को बढ़ते संचार माध्यमों ने एक नई उंचाई और

आत्ममुग्धता की बढ़ती भावना खतरनाक है

आत्ममुग्धता की बढ़ती भावना खतरनाक है

0 2009/10/28 10:40 pm

  मानव स्वयं के होने के बोध यानि अहम् के साथ नहीं जन्म लेता हैं। अहं का भाव समय के की धारा के संग-संग दिलोदिमाग पर छा जाता है। यह बाहरी दुनिया से हमारे मन के संसार का मिलन होने

चीनी से बढ़ती कड़वाहट

चीनी से बढ़ती कड़वाहट

1 2009/10/21 2:27 pm

भारत और चीन के बीच बढ़ते हुए अनावश्यक तकरार को देखकर अब यह नहीं  कहा जा सकता कि भारत को चीन के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रखने की जरुरत रह गयी हैं .चीन हमारे लिए सदैव से सामरिक चिंता का विषय

आधी आबादी का कड़वा सच

3 2009/07/27 2:43 pm

एक जमाना हुआ करता था जब शिक्षा केवल लड़कों के लिए थी । विद्यालय जाना तो दूर घर की दहलीज के भीतर ही घुट-घुट कर जीना ही लड़कियों की नियति बन कर रह गई थी । घर पर रहकर गृहस्थी

क्या हम परिवार को बचा पाएंगे ?

0 2009/06/06 8:48 am

घर में शिशु संगोपन और शिशु संस्कार अत्यन्त उपेक्षित विषय बन गए हैं , जो आने वाली पीढी के लिए प्रतिकूल परिणामदायक होगी । आज की आधुनिक शिक्षा ने उपभोगवादी मानसिकता को इतना बढावा दिया है कि युवक-युवतियां अपने परम्परा