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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; उमेश पंत</title>
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	<description>Daily news analysis , Hindi samachar ,Hindi magazine,Hindi website,a6V3sbK3z0d4m7JTOT6OQOVo1jQ</description>
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		<title>जामिया में सैकड़ों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ , MCRC  के छात्र अनशन पर</title>
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		<pubDate>Sun, 08 May 2011 07:49:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उमेश पंत</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंधेर नगरी]]></category>

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		<description><![CDATA[जामिया में छात्रसंघ जैसी कोई संस्था भी नहीं है, जो छात्रों के हित की बात प्रभावशाली तरीके से कर सके। ऐसे में वहां का एडमिनिस्‍ट्रेशन छात्रों पर जबरन अपने फैसले बड़ी आसानी और क्रूरता से थोप देता है। एमसीआरसी का ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><a rel="attachment wp-att-15684" href="http://www.janokti.com/government-failure-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%88%e0%a4%95%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%9b%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/attachment/jamia/"><img class="alignleft size-full wp-image-15684" title="jamia" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/jamia.jpg" alt="" width="175" height="131" /></a>जामिया में छात्रसंघ जैसी कोई संस्था भी नहीं है, जो छात्रों के हित की बात प्रभावशाली तरीके से कर सके। ऐसे में वहां का एडमिनिस्‍ट्रेशन छात्रों पर जबरन अपने फैसले बड़ी आसानी और क्रूरता से थोप देता है। एमसीआरसी का ये मौजूदा घटनाक्रम इसकी एक बानगी भर है।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">छात्रों ने दिन-रात मेहनत करके अपनी डिप्लोमा फिल्मों की पटकथा लिखी | उसे पिच किया गया लेकिन जब फिल्म बनाने के दिन नजदीक आये तो उन्हें कहा गया कि उनकी  अटेंडेंस कम है | इस्सिलिये उन्हें फिल्म नहीं बनाने दिया जायेगा और ना ही वो परीक्षा में बैठ सकते हैं | एक नामी संस्थान के लिए इससे खराब बात और कोई नहीं हो सकती कि वहां छात्रों पर नियम और कानूनों के खोखले और बेवजा बोझ को डालकर उनसे ये उम्मीद की जा रही है कि वो आपको कुछ अच्छी फिल्में बनाकर देंगे। क्रिएटिव मीडियम में काम करने वाले ये अच्छी तरह जानते होंगे कि मानसिक दबाव से बड़ी दासता उनके लिए कुछ और नहीं हो सकती। पर एमसीआरसी की फैकल्टी को ये बात न जाने कब समझ आएगी।</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-15685" href="http://www.janokti.com/government-failure-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80/%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%88%e0%a4%95%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%9b%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/attachment/mcrc-jamia-millia-islamia/"><img class="alignright size-medium wp-image-15685" title="MCRC JAMIA MILLIA ISLAMIA" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/MCRC-JAMIA-MILLIA-ISLAMIA-300x200.jpg" alt="" width="300" height="200" /></a>MCRC जामिया। एक निहायत ही जाना-माना संस्थान, जिसे फिल्म और जनसंचार की पढ़ाई के लिए आउटलुक का एक सर्वे तीसरे स्थान पर रखता है। अभी हाल ही में संस्थान के डायरेक्‍टर बने ओबेद सिद्दीकी ने एक वेबसाइट में दिये अपने इंटरव्यू में कहा कि मास कॉम की 50 सीटों में से हर सीट के लिए कम से कम 35 परीक्षार्थियों के बीच प्रतिस्पर्धा होती है, ऐसे में इसकी लोकप्रियता को अच्छी तरह समझा जा सकता है। लेकिन मीडिया से जुड़े हर संस्थान की तरह मखमल के परदे से फैसिनेटिंग दिखने वाले एमआरसी के भीतर भी एक मरघट का संसार है। ज्यादा साहित्यिक न होते हुए इस बात को कहा जाए तो पिछले कुछ सालों से एमसीआरसी के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। यहां पढ़ने से पहले छात्र तरह तरह के सपने लेकर इस संस्थान में दाखिल होते हैं और दाखिला मिल जाने पर खुद को बड़ा ही खुशकिस्मत समझते हैं। लेकिन दो साल तक जिन हालातों से वो रूबरू होते हैं, वो इतने खुशनुमा कतई नहीं हैं। कम से कम बीते कुछ सालों के अनुभव देखकर ये बात नकारी नहीं जा सकती।</p>
<p style="text-align: justify;">गौरतलब है कि एमसीआरसी में इस बीच एडमिनिस्‍ट्रेशन का रवैया वहां के स्‍टूडेंट्स के लिए परेशानी का सबब बनता रहा है। मौजूदा घटनाक्रम में एमए मास कॉम के 14 स्टूडेंट्स को ये कहकर उनके फाइनल प्रोजेक्ट बनाने और फाइनल एग्‍जाम देने से मना किया जा रहा है कि उनकी उपस्थिति इसके लिए पर्याप्त नहीं है। इनमें से ज्यातर स्टूडेंट्स ऐसे हैं, जिनकी एटेंडेंस 70 प्रतिशत या उसके करीब है। लेकिन एमसीआरसी प्रशासन कहता है कि 75 प्रतिशत से कम उपस्थिति वाले छात्रों को न परीक्षा देने दी जाएगी, न ही उनको उनके फाइनल प्रोजेक्ट बनाने दिये जाएंगे। अब ऐसे 14 छात्र छात्राओं का भविष्य खतरे में है, जो केवल पांच से दस फीसदी दिन और क्लास नहीं आये या नहीं आ पाये। बावजूद इसके कि वो अपने अपने मेडिकल सर्टिफिकेट देने को तैयार हैं। लेकिन ये कहकर उन सर्टिफिकेट्स को भी नकार दिया जा रहा है कि वो जाली हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">[pullquote]<strong>छात्र हितों के हनन का यह मामला जामिया में केवल MCRC  तक ही सीमित नहीं  है | इस साल वार्षिक परीक्षा में जामिया के हर फेकल्टी में यही हाल है | लगभग 300 छात्रों का हॉलटिकट रोक कर छात्रों का एक साल बर्बाद कर दिया गया | जामिया में छात्र संघ और केम्पस में किसी प्रकार के एक्टिविज्म पर प्रतिबन्ध होने से छात्र संगठनों का साथ भी इन छात्रों को नहीं मिल पाता | यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है | छात्रों में जामिया प्रशासन का खौफ और गैर-लोकतान्त्रिक माहौल से विश्वविद्यालय प्रशासन की तानशाही  बढती ही जा रही है |  :-  <span style="color: #0000ff;">&#8216; जयराम विप्लव &#8216; ( पूर्ववर्ती छात्र जामिया )</span></strong>[/pullquote]</p>
<p style="text-align: justify;">MCRC के इस फैसले के विरोध में स्टूडेंट्स ने जंतर मंतर पर धरना दिया, जिसकी खबर शायद कहीं नहीं छपी और उन्होंने कोर्ट में इस बाबत एक केस भी फाइल की है, जिसकी सुनवाई भी कोर्ट में हो चुकी है। लेकिन कोर्ट की ओर से ऐसा कोई फैसला अब तक नहीं आया है, जिससे छात्रों को कोई राहत मिल सके। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में दो बार सुनवाई हुई, जिसमें कहा गया कि यदि जामिया के वीसी चाहें तो एमसीआरसी के इस फैसले पर विचार किया जा सकता है लेकिन अब वीसी भी ये कह चुके हैं कि ये स्टूडेंट्स परीक्षा नहीं दे सकते। कुल मिलाकर देखें तो ये एक नियम सेट करने की कोशिश है ताकि स्टूडेंट्स अगली बार से 75 प्रतिशत के इस जादुई आंकड़े की अवहेलना करने का साहस न कर सकें। एमसीआरसी के इस क्रूर और अनैतिक फैसले के बाद सारे छात्र सकते में हैं। अब उन्होंने इस फैसले का पुरजोर तरीके से विरोध करने का मन बना लिया है। कल से वो इस फैसले के खिलाफ आमरण अनशन करने जा रहे हैं। इस बाबत एक प्रेस रिलीज भी जारी की गयी है, जिसे आप सभी साथियों को भेजा जा रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">एमसीआरसी छात्रों की जिस अटेंडेंस को शॉर्ट बता रहा है, दरअसर उस अटेंडेंस का आधार ही मौखिक है। फिल्मों को लेकर जो भी अभ्यास सत्र होते हैं, उनमें अटेंडेंस किसी रोल कॉल के आधार पर नहीं ली जाती बल्कि फैकल्टी में से कोई एक टीचर आकर छात्रों के चेहरे देखकर अटेंडेंस ले जाता है। अब एक संस्थान जो अपने छात्रों के लिए अंश मात्र भी सरोकार नहीं रखता, उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि इस मौखिक अटेंडेंस में धांधली या लापरवाही नहीं हुई होगी। दूसरा सवाल ये कि एमसीआरसी के ज्यादातर टीचर्स अपने अपने कारणों से छुट्टी पर हैं, अब वहां पढ़ाने के लिए वैसे ही बहुत कम अनुभवी टीचर्स बचे हैं, जिनमें से भी ज्यादातर खुद क्लास लेना पसंद नहीं करते। ऐसे में छात्र क्या पढ़ने के लिए रोज-रोज संस्थान जाएं, उन्हें ये बात समझ नहीं आती। टीचर्स से पूछा जाना चाहिए क्या उनकी खुद की क्वालीफिकेशन इतनी है कि वो एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पढ़ा सकें।</p>
<p style="text-align: justify;">गौरतलब है कि एमसीआरसी के ज्यादातर टीचर्स की क्वालिफिकेशन को लेकर सवालिया निशान हैं। किसी तरह वो यहां टिके हुए हैं। इस बाबत भी कोर्ट में एक मामला चल रहा है। कुछ टीचर्स कोर्ट से स्टे आर्डर लेकर अपने पदों पर बने हुए हैं। ये भी सवाल उठाया जाना चाहिए कि एमसीआरसी में फिल्म पढ़ रहे छात्रों की वर्कशॉप्‍स के लिए कितना पैसा आता है और वो जाता कहां है। और क्या जितनी वर्कशौप होती हैं, वो पर्याप्त हैं। इन सारे सवालों की बाबत वहां के छात्रों ने आरटीआई भी फाइल की है, जिसका जवाब आना अभी बाकी है।</p>
<p style="text-align: justify;">क्रिएटिविटी से जुड़े एक संस्थान में नियम और कानूनों की ऐसी खोखली शर्तें कितनी जायज हैं, ये एक बहुत बड़ा सवाल है, जो एमसीआरसी के छात्र हमेशा से पूछते आये हैं। पर उनकी ये आवाज कभी उस संस्थान की चाहरदीवारी से बाहर नहीं गयी।</p>
<p style="text-align: justify;">एमसीआरसी जब ये दावा करता है कि वो केवल बेहतरीन छात्रों को अपनी कड़ी परीक्षा के बाद संस्थान में प्रवेश देता है, तो फिर ऐसी क्या वजह है कि उन पर संस्थान को इतना भरोसा नहीं है कि उनके मेडिकल सर्टिफिकेट फर्जी कहे जा रहे हैं। कि उनकी फिल्मों के कंसेप्ट बिना फैकल्टी द्वारा बताये गये बदलावों के स्वीकार नहीं किये जाते।</p>
<p style="text-align: justify;">ये बातें पहली बार देखने पर किसी संस्थान की अंदरूनी बातें लग सकती हैं, लेकिन अव्वल तो ये कि एमसीआरसी कोई निजी संस्थान नहीं है, जिस पर वहां के एडमिनिस्ट्रेशन की मोनोपौली चले और दूसरा ये कि ये संस्थान शिक्षा पर खर्च होने वाले बजट का एक बड़ा हिस्सा अपनी झोली में डालता है, इसलिए इस बात पर सार्वजनिक रूप में चर्चा होनी ही चाहिए कि वहां भीतरखाने आखिर चल क्या रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">सवाल ये है कि संस्थान में पढ़ाने वाले टीचर्स का विजन इस कोर्स को लेकर क्या है। क्या वो एक निश्चित समयावधि में छात्रों से निर्धारित प्रोजैक्ट बनवाकर कोर्स पूरा कर लेने को लेकर ज्यादा चिंतित हैं या फिर वो उनमें सिनेमा जैसे आर्टफॉर्म की समझ विकसित करने की मंशा रखते हैं। ताकि वो अपने भीतर मौजूद क्रिएटिव आइडियाज को अपनी मर्जी से पर्दे पर उकेरना सीख सकें। मौजूदा हालात देखते हुए तो पहली बात ही सही लगती है, जो कि सचमुच बड़ी चिंताजनक है। अनवर जमाल किदवई ने जिस विजन को लेकर एमसीआरसी को शुरू किया था, वो विजन अब एमसीआरसी के मौजूदा पाठयक्रम में कहीं दिखाई नहीं देता।</p>
<p style="text-align: justify;">टीचर्स और स्टूडेंट्स के बीच के रिश्ते को इसी बात से समझा जा सकता है कि फाइनल इयर की परीक्षाएं देने के बाद जब एक प्रोडक्शन हाउस प्लेसमेंट के लिए आता है, तो संस्थान छात्रों को इंटरव्यू के लिए एक कमरा देने से मना कर देता है। इससे पता चलता है कि फैकल्टी के स्टूडेंट्स के साथ किस तरह के कन्सर्न हैं। एमसीआरसी एक ओर अपने कोर्स को बड़ा ही प्रतिष्ठाजनक कहता है और दूसरी ओर वहां प्लेसमेंट की कोई भी व्यवस्था छात्रों को मयस्सर नहीं है। यहां तक कि जो प्रोडक्शन हाउस या न्यूज चैनल प्लेसमेंट के लिए आना भी चाहते हैं, उन्हें संस्थान बिना छात्रों से पूछे ये कह देता है कि उनके पास समय नहीं है। ऐसे में कोर्स खत्म हो जाने के बाद मुश्किल से कुछ छात्रों को जॉब मिल पाती है और बाकी छात्रों को अपने बूते ही इंडस्‍ट्री में जूते घिसने पड़ते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">मौजूदा घटनाक्रम में इन छात्रों को कोर्ट कचहरी के चक्कर में अपनी जेब से पैसा खर्च करना पड़ रहा है। हमारी महंगी न्याय प्रणाली में न्याय मिलते मिलते कितना समय और पैसा खर्च होता है, ये किसी से छुपा नहीं है। इन छात्रों में से हर कोई आर्थिक रूप से इतना सशक्त नहीं है कि वो इस खर्च को अफोर्ड कर सके और आत्मनिर्भर तो छात्र को होने के नाते कोई नहीं है। ऐसे में न्याय की इस लंबी लड़ाई का कमजोर पड़ जाना भी संभव है। अगर ये छात्र अगले साल फिर परीक्षा देने का इंतजार करें, तो उनका एक साल तो बरबाद होगा ही, साथ ही हजारों रुपये की मोटी फीस जो एमसीआरसी छात्रों से उगाहता है, उसका इंतजाम भी इन्हें करना होगा। ऐसे में संभव है कि कुछ छात्रों को अगले साल योग्यता हाने के बावजूद कोर्स छोड़ ही देना पड़े।</p>
<p style="text-align: justify;">इन सारी अनियमितताओं का उजागर होना एमसीआरसी के गिरते हुए स्तर को वापस लाने के लिए बहुत जरूरी है। अब जब छात्र इन बातों को लेकर लामबंद हो रहे हैं, तो उन्हें आप सब के सहयोग की जरूरत है।</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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		<title>नौनलीनियर स्टाईल फिल्म है &#8216;ये साली जिंदगी&#8217; &#124;</title>
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		<pubDate>Wed, 16 Feb 2011 12:39:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उमेश पंत</dc:creator>
				<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[इन्टयूशन था कि साली अच्छी होगी। कई इन्टयूशन सच निकलते हैं। इस बार यही हुआ। ये साली जिन्दगी कुलमिलाकर एक अच्छी भली फिल्म थी। इसे देखते हुए ऐसा नहीं लगा कि कुछ रेगुलर देख रहे हैं। गन थी। धांय धांय ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-13598" href="http://www.janokti.com/art-literature-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/interview-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/%e0%a4%a8%e0%a5%8c%e0%a4%a8%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%b2-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b9/attachment/yeh-saali-zindagi-funrocker-com-1/"><img class="alignright size-full wp-image-13598" title="Yeh-Saali-Zindagi-Funrocker.Com-1" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/Yeh-Saali-Zindagi-Funrocker.Com-1.jpg" alt="" width="222" height="320" /></a>इन्टयूशन था कि साली अच्छी होगी। कई इन्टयूशन सच निकलते हैं। इस बार यही हुआ। ये साली जिन्दगी कुलमिलाकर एक अच्छी भली फिल्म थी। इसे देखते हुए ऐसा नहीं लगा कि कुछ रेगुलर देख रहे हैं। गन थी। धांय धांय थी। गेंग्स्टर्स थे। पर अभी रामू मार्का किसी डाईरेक्टर की जगह सुधीर मिश्रा थे। इसीलिये फिल्म थोड़ी अलग बन पड़ी। थोड़ी स्टाईलाईज्ड सी। अच्छी एडिटिंग निहायत रफ और रा कहे जा सकने वाले कैची डायलौग्स, इरफ़ान  की आम आदमी वाली खास आवाज में नेरेशन और कई परतों में बुना हुआ लेयर्ड सा नेरेटिव स्टाईल। ये सारी बातें फिल्म को आमतौर पर बनाई जाने वाली देसी बम्बैया मार्का गैंगस्टर फिल्मों से अलग पायदान पर खड़ा करने में कामयाब हो सकी हैं। फिल्म के बारे में कई क्रिटिक्स ने कहा है कि एक अनकौम्प्लिकेटेड सी कहानी को कौम्प्लिकेटेड बनाकर दिखाया गया है जो एक हद तक सच है। फिल्म में कई इन्टरनल लौजिक्स काम करते हैं जिनको समझने के चक्कर में आंखिरी तक फिल्म बांधे रखती है। और जिन्दगी में ज्यादातर चीजें हमें अपनी कौम्प्लिकेटेड फौर्म में ही अच्छी लगती हैं। इससे उनका अपना रहस्य और उनके प्रति उत्सुकता बनी रहती है। एक प्रवाह में बहते चले जाना जब असल जिन्दगी में अच्छा नहीं लगता तो एक फिल्म से भी ऐसी उम्मीद नहीं की जानी चाहिये। इस लिहाज से कान को उल्टा पकड़ने वाली आलोचकों की बात मेरे हिसाब से खारिज की जा सकती है। फिल्म में दो पैरलल लवस्टोरी एक साथ चलती हैं। दोनो ही प्रेमकहानियों में पैसा और पावर अन्त में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। इन दो अलग अलग प्रेम कहानियों में एक बात कौमन है कि दोनों ही आदमी अपने अपने प्रोफशन के बीच प्यार को ले आते हैं। और जहां प्यार प्रोफेशन के बीच आ जाता है चीजें अपने आप कौम्प्लेक्स हो जाती हैं। जैसा कि असल जिन्दगी में होता भी है। इरफान और चित्रांगदा की प्रेमकहानी जो पूरी तरह एकतरफा है। इरफान चिंत्रांगदा की मदद के लिये सबकुछ छोड़छाड़ के लौट आता है, ये जानते हुए कि उसके पूरे सेक्रिफाईस का हांसिल महज एक प्यार भरा थैंक्स होगा। पर दिल है कि मानता नहीं की तर्ज पर इरफान चिंत्रांगदा को एक ऐसे ट्रैप से बाहर निकालता है जिसमें वो उस दूसरे आदमी की वजह से फंसी है जिससे वो प्यार करती है। वो दूसरा आदमी एक बड़े मंत्री का होने वाला दामाद है जिसकी बेटी से इस दूसरे आदमी की शादी होने वाली है। जाहिराना तौर पर इस दूसरे आदमी के पास ज्यादा पैसा और पावर है। इस आदमी से चित्रांगदा की पहली मुलाकात तब होती है जब जिंत्रागदा उससे पहला झूठ बोलती है कि वो एक मीटिंग में है और उस वक्त इरफान उसे इस दूसरे आदमी की बाहों में पाता है। यहीं तय हो जाता है कि प्यार दरअसल नासमझ होता और खासकर तब जब वो एकतरफा हो तो वो बावड़ी पूछ ही हो जाता है। इरफान अन्त तक चिंत्रांगदा की मदद करता है और अन्त में उसके लिये अपना खून तक बहाता है। पूरी फिल्म में इस एकतरफा प्यार की मासूमियत को महसूस किया जा सकता है। लाल रंग में नहाई एक हरी भरी मासूमियत जिसके जख्म को आंखिर में मलहम मिल ही जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">दूसरी प्रेमकहानी अरुणोदय की है। इस कहानी में पेंच की वजह बेहद व्यावसायिक है। एक आदमी जो गैंग्स्टर है, जो कब जेल में बंद हो जाये इसकी कोई गारंटी नहीं है, जिसकी बीवी आदिति इस वजह से असुरक्षित महसूस करती है और जिद करती है कि वो खून का खेल छोड़ दे। पर इस खून के खेल में पैसा है और पैसा जीने के लिये जरुरी। आंखिर में निम्नमध्यवर्गीय आम औरत की तरह उसकी प्रेमिका को भी पैसा जरुरी महसूस हो ही जाता है। उसे लगता है कि स्विस बैंक और बांकी जगह रखा पैसा उसका पति ले ही ले तो साला क्या हर्ज है। इन दोनों के बीच लव और लस्ट के बीच की सी कोई चीज है जो उन्हें जोड़े रखती है।</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरी ओर सौरभ शुक्ला है जिसके लिये इरफान काम करता है लेकिन जिसे कभी समझ नहीं आता कि इरफान एक लड़की के चक्कर में कैसे अपना पूरा बिजनेस दांव पे लगा सकता है अपना ही लगाता तो ठीक था आंखिर में क्यों उसकी भी मट्टी पलीत कर देता है। पर इस क्यों का जवाब शायद कभी होता ही नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">पूरी फिल्म का यूएसपी उसका नौनलीनियर स्टाईल है। पहले हाफ में कुछ कुछ देर में नये नये कैरेक्टर फिल्म में एंट्री करते हैं। लेकिन हर नये कैरेक्टर को कैप्शन देकर इन्ट्रोडयूस करवाने की जरुरत पड़ती है। हर नयी लोकेशन के बारे में बताने के लिये भी कैप्शन प्रयोग किये गये हैं। और जहां चीजें थोड़ा कमजोर पड़ने लगती हैं वहां नेरेशन से काम चला लिया गया है। दूसरे हाफ में आते आते एक पौईंट पर लगने लगता है कि यहां एक खास तरह की स्पून फीडिंग होने लगी है। फैक्ट्स ओवरफ्लो से होने लगते हैं। ऐसे में लगने लगता है कि फिल्म जो दिखाकर समझाने में सफल नहीं हो पा रही वो कहकर समझाने की कोशिश कर रही है। ये कोशिश कभी कभी नागवार गुजरने लगती है। लेकिन फिल्म के डायलौग इतने कैची हैं कि जैसे ही ओवरफ्लो औफ फैक्ट्स वाली स्थिति आती है, डायलौग आपको गुदगुदाने लगते हैं। इस तरह नयी नयी घटनाओं और तथ्यों के भारीपन को डायलौग्स का सेंस औफ ह्यूमर रिप्लेस सा कर देता है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">फिल्म में खूब सारी गालियां हैं लेकिन केवल गालियांे से एलेर्जी के चक्कर में फिल्म को छोड़ा नहीं जा सकता। फिल्म में जिन लोगों के इर्द गिर्द है वो असल जिन्दगी में भी होते तो ऐसे ही होते। ऐसे में इन गालियों और देसी स्लैंग की वजह से फिल्म को चीप नहीं कहा जा सकता हां उसके कैरेक्टर्स को आप चीप कहेंगे तो ये शायद फिल्म के लिये अच्छी बात ही होगी।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इरफान हमेशा की तरह अपनी एक्टिंग से फिल्म में अलग जगह पर खड़े नज़र आते हैं। लेकिन अरुणोदय उनकी प्रतिभा के आगे बिल्कुल ओवरशैडो नहीं होते। दोनों की ही एक्टिंग सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। सौरभ शुक्ला भी याद रखे जा सकते हैंे। चित्रांगदा बेहद सुन्दर लगी हैं। खासकर अपने ग्रे शेडस में। हल्की सी रोशनी में लिये गये उनके रिएक्शन शौट्स में वो सेड्यूस करने की हद तक खूबसूरत नजर आती हैं। लेकिन उनकी संवाद अदायगी उतनी प्रभावित नहीं करती। कई बार बिल्कुल आर्टिफिशियल सी लगने लगती है। पंकज कपूर फिल्म में पूरी तरह वेस्ट किये गये हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">फिल्म की अच्छी बात ये है कि इरफान जब अपनी कहानी कह रहे होते र्हैं तो वो विलाप सी नहीं लगती। ऐसा नहीं लगता कि कोई इमोश्नल ड्रामा चल रहा है। वहां एक सटायर है। जो अपनी आईरनी में भी हंसाता है। शायद इसी वजह से फिल्म एक दिलजले और प्यार में हारे बेबस आदमी की कहानी होने से बच जाती है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जैसा की आजकल भतेरी फिल्मों के साथ होता है कि हम सोचते कुछ और वो होती कुछ और है लेकिन ये साली जिन्दगी ऐसी नहीं है। अगर सोच के जाएंगे कि कुछ अलग और हटके देखना है तो भले कहानी में कुछ खास नया ना मिले लेकिन कहानी दिखाने के तरीके में कुछ नया जरुर मिल जायेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">
]]></content:encoded>
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		<title>&#8216; द होली वाईव्स &#8216; ,धर्म के नाम पर</title>
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		<pubDate>Thu, 30 Sep 2010 08:02:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उमेश पंत</dc:creator>
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		<description><![CDATA[हाल ही में रितेश शर्मा की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म दिल्ली में प्रदर्शित की गई जिसमें देवदासी प्रथा जैसी ऐसी कुरीति पर सवाल उठाये गये जिसपर मेनस्ट्रीम मीडिया में आजकल मुश्किल से कोई बहस हो रही है। द होली वाईव्स नाम ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7940" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/%e0%a4%a6-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae/attachment/the-holy-wives/"><img class="alignright size-full wp-image-7940" title="the holy wives" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/the-holy-wives.jpg" alt="" width="226" height="320" /></a>हाल ही में रितेश शर्मा की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म दिल्ली में प्रदर्शित की गई जिसमें देवदासी प्रथा जैसी ऐसी कुरीति पर सवाल उठाये गये जिसपर मेनस्ट्रीम मीडिया में आजकल मुश्किल से कोई बहस हो रही है। द होली वाईव्स नाम से बनी यह फिल्म बताती है किस तरह इस दौर में महिला अधिकारों को लेकर हल्ला मचाया गया, घरेलूं हिंसा विरोध्ाी कानून बने और महिला अधिकारों पर कई बहसें हुई लेकिन इसके बावजूद कर्नाटक, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई इलाके ऐसे हैं जहां इन कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रहीं हैं वो भी धर्म के नाम पर और पूरी तरह सार्वजनिक तौर पर।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">अपनी फिल्म के निर्माण के दौरान रितेश उन इलाकों में गये जहां महिलाओं को धर्म और आस्था के नाम पर वैश्यावृत्ति के दलदल में धकेला जाता है और कई बार बलात्कार तक का शिकार होना पड़ता है। लेकिन जीविका उपार्जन और सामाजिक पारिवारिक दबाव के चलते ये महिलाएं इस धार्मिक कुरीति का हिस्सा बनने को मजबूर हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;">अपने प्रारम्भिक दौर में देवदासी प्रथा के अन्तर्गत उंची जाति की महिलाएं जो पढ़ी लिखी और विदुषी हुआ करती थी मंदिर में खुद को समर्पित करके देवता की सेवा करती थी। और देवता को खुश करने के लिये मन्दिरों में नाचती थी। समय ने करवट ली और इस प्रथा में शामिल महिलाओं के साथ मंदिर के पुजारियों ने यह कहकर शारीरिक सम्बंध बनाने शुरु किये कि इससे उनके और भगवान के बीच सम्पर्क स्थापित होता है। धीरे धीेरे यह उनका अधिकार बन गया। जिसको सामाजिक स्वीकार्यता भी मिल गई। उसके बाद राजाओं ने अपने महलों में देवदासियंा रखने का प्रचलन शुरु किया। और आश्चर्यजनक रुप से कई राजाओं के यहां 20 हजार से ज्यादा देवदासियां भी पाई जाने लगी। लेकिन मुगल काल में जबकि राजाओं ने महसूस किया कि इतनी देवदासियों का पालन पोषण करना उनके बस में नहीं है तो देवदासियां सार्वजनिक सम्पत्ति बन गई। अब ये आम आदमी के लिये भी उपलब्ध होने लगी। ऐसे में उच्च जाति के लोगों ने अपनी लड़कियों को देवता के लिये समर्पित करना बंद कर दिया लेकिन निम्न जातियों में यह प्रथा कायम रही। उंची जाति के लोगों के लिये अब ये महिलाएं एक तरह की धार्मिक वैध् ाता वाली वैश्याएं थी जिनका कभी पैसे देकर तो कभी अधिकार पूर्वक वो शोषण करते रहे।</p>
<p style="text-align: justify;">परंतु आज भी कहीं वैसवी, कहीं जोगिनी, कहीं माथमा, तो कहीं वेदिनी नाम से देवदासी प्रथा देश के कई हिस्सों में कायम है। कर्नाटक के 10 और आन्ध््रा प्रदेश के 14 जिलों में ये प्रथा अब भी बदस्तूर जारी है। ये बात और है कि कर्नाटक में 1982 और आन्ध् ा्र प्रदेश में 1988 से इस प्रथा के खिलाफ कानूनी प्रावधान हैं जिनके तहत इसे गैरकानूनी माना गया है। फिर भी तथ्यों पर यकीन नहीं होता लेकिन हर साल कर्नाटक और आन्ध््राप्रदेश में 5 हजार से लेकर 15 हजार लड़कियों को भगवान को समर्पित करने के नाम पर धार्मिक वैश्यावृत्ति के इस दलदल में धकेल दिया जाता है। शर्मनाक तथ्य ये है कि ये महिलाएं ऐसी उम्र में भगवान को समर्पित कर दी जाती हैं जब इन्हें इस समर्पण का असल मतलब भी नहीं मालूम होता। 12- 13 वर्ष की उम्र में ही इन्हें देती या देवता को समर्पित कर दिया जाता है और तब से ही ये चाहे अनचाहे मंदिर की सम्पत्ति बन जाती हैं। जहां धार्मिक कार्यक्रमों में नाचने से लेकर पुजारियों और रसूख वाले उच्च जाति के लोगों के शोषण का शिकार होने तक के सारे काम इन्हें मजबूरन करने पड़ते हैं और ऐसा न करने पर इन्हें न केवल सामाजिक बल्कि पारिवारिक तिरस्कार तक झेलना पड़ता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;"><a rel="attachment wp-att-7941" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/%e0%a4%a6-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae/attachment/devdasi/"><img class="alignleft size-full wp-image-7941" title="devdasi" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/devdasi.jpg" alt="" width="320" height="256" /></a>वेदिया अनुसूचित जनजाति के अन्तर्गत आते हैं। ब्रिटिश काल में इन्हें लुटेरी जनजाति माना जाता था लेकिन अब इन्होंने अपराध करना छोड़ दिया है और इस जाति की महिलाएं वैश्यावृत्ति में लिप्त रहने लगी हैं। मध्यप्रदेश के सागर जिले का पथारिया और विदिसा जिले का सूका ऐसे गांव है जहां आज केवल वेदिया जनजाति के लोग रहते हैं। सूका गांव में रहने वाले 80 मवासियों में से 60 ऐसे हैं जिनकी महिलाएं वैश्यावृत्ति में लिप्त हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13.3333px;">देवदासी प्रथा को लेकर कई गैरसरकारी संगठन अपना विरोध दर्ज करा चुके हैं। इन संगठनों का मानना है कि यह प्रथा आज भी अगर बदस्तूर जारी है तो इसकी मुख्य वजह इस कार्य में लगी महिलाओं की सामाजिक स्वीकार्यता है। ये वो दलित महिलाएं हैं जो रात में तो छूने योग्य हैं किन्तु दिन में इन्हें अछूत की नजरों से देखा जाता हैै। जो महिलाएं पुश्तैनी रुप में इस कुरीति का हिस्सा बन गई हैं वो अगर इसे छोड़ दे ंतब भी समाज उन्हें हेय दृश्टि से ही देखेगा। इनके लिये इससे बड़ी समस्या इनके बच्चों का भविष्य है। ये ऐसे बच्चे हैं जिनकी मां तो ये देवदासियां हैं लेकिन जिनके पिता का कोई पता नहीं हैं। ऐसे बच्चों के साथ आस पड़ौस से लेकर स्कूलों तक में भारी भेदभाव किया जाता है ऐसे में इनके ज्यादातर बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। सरकार ने इस कुप्रथा के खिलाफ देवदासी प्रोहिबिसन एक्ट जैसे कानून तो बना दिये हैं लेकिन इन लोगों के रिहैबिलिटंशन के कोई इन्तजाम न होने से ये कानून बेमानी ही साबित हो रहे हैं|</span></p>
<p style="text-align: justify;">रितेश की इस फिल्म को मानवाधिकारों के हनन का ताजा और विभत्स उदाहरण मानते हुए राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर तो प्रदर्शित किया जा रहा है लेकिन वो कहते हैं कि इससे ज्यादा जरुरी है कि इस विषय पर हमारे देश की कानून व्यवस्था कोई ठोस कदम उठाये जिससे न केवल इस कुप्रथा का उन्मूलन हो बल्कि ऐसी महिलाओं और उनके बच्चों को भी पुनर्वासित किया जा सके जो इस कुप्रथा की गिरफत में हैं</p>
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		<title>सपनों का सिनेमा</title>
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		<pubDate>Sat, 08 May 2010 15:20:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उमेश पंत</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अक्सर इंसान सपने देखता है , कल्पनाओं में उनको जीता है और जब तन्द्रा टूटती हैं तो सोचने लगता है कि जो हमने देखा उसका अर्थ आंखिर था क्या ? अधिकांश सपनों को वो यूँ ही भुला देता हैं , ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-2885" title="lost-in-dreams" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/05/lost-in-dreams-202x300.jpg" alt="" width="202" height="300" />अक्सर इंसान सपने देखता है , कल्पनाओं में उनको जीता है और जब तन्द्रा टूटती हैं तो सोचने लगता है कि जो हमने देखा उसका अर्थ आंखिर था क्या ? अधिकांश सपनों को वो यूँ ही भुला देता हैं , जैसे उन्हें उसने कभी देखा ही न हो। क्या आपने कभी सोचा है कि किसी दूसरे के सपने अपनी आंखों से देखना कैसा लगता है ? और वो भी तब जब सपने किसी सुन्दर फिल्म में फिल्मा लिये गये हो और वो भी अकिरा कुरुसावा जैसे निर्देशक के द्वारा। कुरुसावा की फिल्म ड्रीम्स एक ऐसा ही अनुभव है। कहाजाता है कि ये पूरी फिल्म अकीरा कुरुसावा के उन सपनों के बारे में है जो उन्होंने अलग अलग समय में देखे। फिल्म में 8 छोटी छोटी कहानियां हैं, मुश्किल से पांच पांच मिनट की। इन कहानियों में कुरुसावा मनुष्य और प्रकृति के बीच के तारतम्य के असन्तुलित से हो जाने के लिये अपनी चिन्ता जाहिर करते मालूम होते हैं। सभी कहानियों के पात्र किसी न किसी रुप में या प्रकृति से जुड़े हैं या प्राकृतिक जीवनदर्शन से। इन कहानियों में कहीं प्रकृति अपने पूरे साफ सुथरे नैसर्गिक रुप में दिखाई देती है तो कहीं उसके साथ हुए खिलवाड़ से पनपी विभीषिका पूरे भयावह रुप में सामने आ जाती है। और उसके समानान्तर चलता है आनन्द और विभीषिका दोनों से जूझता इन्सान। ये कुरुसावा के सपनों का फिल्मांकन तो है ही साथ ही हमारे इर्द गिर्द की दुनिया की चिन्ताएं भी हैं। भले इनका रुप प्रतीकात्मक है पर ये चिन्ताएं आज के सन्दर्भ में भी उतनी ही प्रासांगिक हैं। और इस लिहाज से ये फिल्म महत्वपूर्ण हो जाती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong> बरसात में सूरज की चमक- </strong>सनशाईन थ्रो रेन फिल्म की पहली कहानी है। फिल्म को देखकर लगा कि कई बार लोकोक्तियां या कहावतें जिन्हें हम नितान्त क्षेत्रीय समझ रहे होते हैं वो विश्वव्यापी भी हो सकती हैं। हम अपने घर में अक्सर सुना करते थे कि जब धूप और बारिस दोनों साथ साथ हो रही होती हैं तो उस वक्त लोमणियों की शादी होती है। इस कहावत के जापानी वर्जन को फिल्म के इस हिस्से में देखा जा सकता है। एक बच्चा जिसकी मां उसे इस मौसम में बारिश में जाने से मना कर रही है पर बच्चा जाता है और जब वो घर लौटता है तो उसकी मां उसे बताती है कि एक लोमड़ी वहां आयी थी जो उसे एक चाकू देके गई है। माने यह कि वे चाहती है कि तुम इससे खुद को मार लो। मां बच्चे से कहती है कि वो लोमड़ी से माफी मांग ले हो सकता है कि वो माफ कर दे। बच्चा लोमड़ी तलाश में घर से जंगल की तरफ चला आता है। और वहां एक इन्द्रधनुष है फूलो के बगीचे के इर्द गिर्द पहाड़ों के बीच कहीं उगता हुआ। और बच्चा आगे बढ़ा जा रहा है अनन्त की ओर। फिल्म के इस हिस्से में सफेद कुहासे के बीच से उभरते लोमणियों के प्रतीकात्मक चेहरे जब पार्श्व में बजते किसी जापानी लोकसंगीत के साथ आगे बढ़ रहे होते हैं तो एक अजीब किस्म की रहस्यात्मक अनुभूती होती है। और उस मासूम बच्चे के लिये एक खास किस्म की सहानुभूति का भाव मन में पैदा होने लगता है न जाने क्यों।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><em>आडू के बाग़ -</em></strong> द पीच और्चर्ड फिल्म की दूसरी कहानी है। ये कहानी गुड़ियाओं के एक त्योहार के बारे में है। माना जाता है कि इस त्योहार को तब मनाया जाता है जब आड़ू के बगीचों में सुन्दर गुलाबी फूल उगते हैं। और त्योहार में प्रदर्शित की गई हर गुड़िया एक आड़ू के पेड़ का प्रतीक मानी जाती है। लेकिन एक छोटा सा लड़का इस बार त्योहार में खुश नहीं है। क्योंकि उसके परिवार ने इस बार आड़ू के बगीचे से सारे पेड़ काट दिये। बच्चा एक लड़की के पीछे पीछे कटे पेड़ों वाले उस बगीचे में जाता है और देखता है कि गुड़ियाएं आड़ू के पेड़ों की आत्माओं में बदल गई हैं। और बच्चे को बताती है कि कैसे उन्हें काट दिया गया। लेकिन जब उन्हें महसूस होता है कि बच्चे को उनका खिलना कितना अच्छा लगता था वो फैसला करते हैं कि एक बार उसे फिर से आड़ू के उस खिले बगीचे का दर्शन करा दिया जांये। बगीचा एक बार फिर खिल जाता है पर थोड़ी देर बाद ही वहां सारे कटे हुए पेड़ वापस आ जाते हैं। वो लड़की जिसके पीछे बच्चा यहां आया था एक बार फिर दिखाई देती है। और थोड़ी देर में वो भी गायब हो जाती है और उसकी जगह एक गुलाबी फूलों वाला आड़ू का पेड़ वहां उग जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><em>मौत के परिंदे -</em></strong> क्रोज़ा इस सिलसिलेवार हिस्से की पांचवी कहानी है। इस भाग में मशहूर चित्रकार विनसेंट वानगाग की पेटिंग के जरिये उनके जीवन के एक खास हिस्से को बड़े ही दार्शनिक तरीके से कुरुसावा जीवन्त कर देते हैं। फिल्म के इस हिस्से में विन्सेन्ट वानगाग की भूमिका में विश्वविख्यात फिल्म निर्देशक मार्टिन स्कोर्सीजी खुद मौजूद हैं। फिल्म शुरु होती है वानगाग की एक पेटिंग से जिसके अन्दर एक लड़का किसी को ढूढ़ते हुए प्रवेश कर जाता है। वो लड़का वानगाग की कई पेंटिंग्स से गुजरता है और अन्त में उसे एक बूढ़ा आदमी पेंटिंग बनाता हुआ दिखाई दे जाता है। इस आदमी के दोनों कानों में पटिटयां बंधी हुई हैं और वो अपने चित्रों की दुनिया में खोया पेंटिंग बनाये जा रहा है। लड़का उस आदमी से पूछता है कि आपके कानों में पटिटयां क्यों बंधी हुई हैं तो वा आदमी उसे बताता है कि मैने अपने दोनों कान ही काट लिये क्योंकि ये कान मुझे मेरा काम करने में रुकावट पैदा करते थे। माना जाता है कि वानगौग ने अपने जीवन के अन्तिम समय में इसी तरह अपने कान काट लिये थे और अपने आंखिरी समय में वो जीवन से इतने परेशान हो गये थे कि उन्होंने आत्महत्या ही कर ली। क्रोज के आंखिरी दृश्य में कुछ कौवे आसमान को चीरते हुए उड़ते चले आते हैं। सम्भवतह कुरुसावा ने इस दृश्य में वौनगौग की आत्महत्या को ही प्रतीकात्मक रुप में दिखाया है। वानगाग की पेंटिग्य को फिल्म का यह हिस्सा जिस तरह से जीवन्त कर देता है वो सचमुच एक कमाल का अनुभव लेने जैसा है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>माउन्ट फूजी का लाल सच</strong>- माउन्ट फूजी इन रेड फिल्म की छटी कहानी है जिसमें दिखाया गया है कि कैसे माउन्ट फूजी में स्थित न्यूक्लियर प्लांट में फैले रेडियेशन के चलते इतना जहरीला प्रदूषण हुआ कि आसमान लाल हो गया। और वहां के सभी लोगों ने समुद्र में शरण लेकर मौत को गले लगाना बेहतर समझा। अन्त में तीन लोग एक आदमी औरत और बच्चा ही षश रह गये हैं जो लगभग जान ही चुके हैं कि जल्द ही उनकी मौत भी तय है। और उनके भीतर पसरा मौत का डर इस कहानी में साफ देखा जा सकता है। फिल्म की अगली दो कहानियां जापान में हुए परमाणु हमलों की वजह से हुए ज़हरीले विकीरण पर कुरुसावा की चिन्ता को दिखाती हैं। ये कहानिया उस विभीषिका की सांकेतिक अभिव्यक्ति हैं जो जापान ने सम्भवतह उन परमाणु हमलों की वजह से झेली।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><em>रोते हुए दैत्य -</em></strong> द वीपिंग डैमन फिल्म की सांतवीं कहानी है जिसमें दिखाया गया है कि एक पहाड़ पर कई ऐसे दैत्यनुमा लोग बुरी तरह चीख रहे हैं। अजीब सी आवाजें निकालेने वाले इन एक सींग वाले दैत्यों में से एक दैत्य लड़के को बतात है कि ये लोग न्यूक्लियर रेडियेशन के शिकार हैं। इसी विकीरण की वजह से इन लोगों की एक सींग उग आई और ये लोग भटकती हुई आत्माएं बन गये। और इनका सबसे बड़ा दुख ये है कि अब ये मर भी नहीं सकते और इसी तरह भटकते रहना इनकी मजबूरी है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><em>पवनचक्कियों का गाँव - <span style="font-style: normal; font-weight: normal;">एक सुन्दर सा गांव जहां हौले हौले एक नदी बह रही है। पेड़ों से मन्द मन्द हवा बहती आ रही है। और नदी और हवा के बहते जाने के बीच कई पनचक्कियां चल रही हैं। कुछ बच्चे हैं जो एक पत्थर पे फूल चढ़ा रहे हैं और वो नौजवान लड़का जो उन्हें देख रहा है फूल चढ़ाते हुए। लड़का इतने अच्छे वातावरण में बड़ी राहत महसूस करते हुए आगे बढ़ता है वहां उसे एक बूढ़ा सा आदमी दिखाई देता है जो पनचक्की बना रहा है। फिल्म के इस हिस्से में उस बूढ़े आदमी और इस लड़के के बीच जो बात होती है वो बेहद रोचक है। उस बात को सुनने के बाद आपको महसूस होगा कि आदमी अगर चाहे तो पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों की मदद से ही जी सकता है बिना प्रकृति को नुकसान पहुंचाये। ये भी कि इस तरह जीते हुए आदमी अपनी मौत को एक जश्न के रुप में मना सकता है। संवाद की शुरुआत में लड़का पूछता है कि इस गांव का नाम क्या है तो बूढ़ा जवाब देता है हम इसे गांव ही कहते हैं। इसका कोई नाम नहीं है। लड़का बिजली के बारे में पूछता है तो बूढ़ा आदमी जवाब देता है कि हमें बिजली की जरुरत महसूस ही नहीं होती। लड़का फिर पूछता है कि यहां रातें तो बड़ी गहरी होती होंगी। तब आप क्या करते हैं? बूढ़ा आदमी जवाब देता है कि रातें गहरी काली ही होनी चाहिये। तभी तो हम आकाश में बिखरे तारोें को साफ साफ देख पायेंगे। अन्धाधुन्ध हो रहे आविष्कारों पर सवाल उठाते संवादों के सिलसिले के अन्तिम पड़ाव में पहुचते हुए फिल्म जिन्दगी को एक को इत्मिनान से जिये गये पर्व और मौत को किसी जश्न की तरह दिखाती है। और बताने की कोशिश करती है कि अगर प्रकृति की नैसर्गिकता बर्करार रखते हुए और उसपे अपनी शर्तें न थोपते हुए सरलता से जिया जाये तो मौत को भी उत्सव की तरह अपनाया जा सकता है। क्योंकि तब न मौत आने में जल्दी करेगी, न हम मौत को बुलाने की जल्दबाजी में रहेंगे। ये सब उसी तरह होगा जैसे प्रकृति। बिल्कुल अपनी प्राकृतिक निरन्तरता में, अपने समय से। फिल्म के इस हिस्से के आंखिरी पलों में 103 साल का बूढ़ा आदमी जो 99 साल की औरत की अन्तिम यात्रा के जश्न में शामिल होने जा रहा है नौजवान से कहता है कि मेरे खयाल से मेरी उम्र मौत को अपनाने की बिल्कुल सही उम्र है। और अन्त में सम्भवतह जापानी लोकगीत की सुन्दर सी धुन के साथ पारम्परिक वाद्ययंत्रों और एक समान पोशाक पहने छोटे छोटे बच्चों से लेकर सौ साल से बूढ़े लोगों के जुलूस की जुगलबन्दी फिल्म के इस हिस्से को अहसास कर पाने की हद तक दर्शनीय बना देती है।</span></em></strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">अकिरा कुरुसावा के सपनों की ये फिल्मी दुनिया न केवल फिल्म देखने की सुखानुभूति देती है बल्कि एक सरल सन्देश भी दे जाती है कि प्रकृति और इन्सान का रिस्ता मानवीय रिस्तों से अलहदा नही है। जब तक हमें उसकी गरज है तब तक ही उसे हमारी फिक्र। जिस दिन इन्सान ने प्रकृति के बारे में सोचना छोड़ दिया उस दिन प्रकृति भी हमें ऐसे तरसाना शुरु कर देगी। और इसका असर हमारे सपनों में भय बनकर समा जायेगा। कुरुसावा के ये सपने इसी असर की असरदार नुमाईश हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>कभी बाघ भी हुआ करते थे !</title>
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		<pubDate>Fri, 19 Feb 2010 03:59:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उमेश पंत</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रकृति]]></category>

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		<description><![CDATA[बाघ अब नहीं जीते। सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो 2015 तक ये चर्चा हम आप कर रहे होंगे। ऐसा वन्य जीव विशेषज्ञों का मानना है। आज कौन मानेगा कि सौ साल पहले अपने देश में लाख की तादात ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/02/30dec_tiger.jpg" alt="" title="कभी बाघ भी हुआ करते थे !" width="240" height="180" class="alignright size-full wp-image-1674" />बाघ अब नहीं जीते। सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो 2015 तक ये चर्चा हम आप कर रहे होंगे। ऐसा वन्य जीव विशेषज्ञों का मानना है। आज कौन मानेगा कि सौ साल पहले अपने देश में लाख की तादात में बाघ जीते थे और अपने होने का दम भरते दहाड रहे होते थे। 6 साल पहले बाघों की ये तादात घटकर 3600 हो गई और 2008 में ये संख्या चैंकाने की हद पर पहुंचते हुए 1411 जा पहुंची। 2005 के सरकारी आंकणों के मुताबिक राजस्थान के सरिस्का टाईगर रिजर्व में मौजूद सभी 26 बाघ विलुप्त हो गये। 6 साल पहले टाईगर स्टेट के नाम से जाने जाने वाले मध्य प्रदेश के पन्ना टाईगर रिजर्व में मौजूद 44 बाघ आज की तारीख में इतिहास हो गये हैं। बाघों को बचाने के लिये बनी नेश्नल टाईगर कन्वेंशन अथोरिटी की एक रिपोर्ट बताती है कि 2007 में 41 और 2008 में 53 बाघ देश भर में मौत की नीद सो गये और 2009 के पहली छमाही में ही 45 बाघ मर गये और साल के जाते जाते ये संख्या 86 पहुंच गई। पयावरणविद दावा कर रहे हैं कि आज देशभर में मुश्किल से 1000 बाघ रह गये हैं। इन 1000 बाघों को बचाया ना गया तो 2015 ज्यादा दूर नहीं लगता। आज &#8220;सेव टाईगर्स&#8221; के नारे देशभर में पोस्टरों, बैनरों, अखबारों, रेडियो और टीवी विज्ञापनों में तैर रहे हैं। लोग बाघों के जीवन के लिये चिन्तित नजर आ रहे हैं। 1972 में कार्बेट नेश्नल पार्क से प्रोजेक्ट टाईगर नाम से शुरू की गयी सरकारी योजना आज जबरदस्त रूप से प्रासांगिक हो गई है। एयरसेल ने ताजा ताजा एक केम्पेन सेव अवर टाईगर नाम से शरू किया है। एनडीटीवी भी पहले ही इसके लिये एक केम्पेन चला चुका है। दरअसल बाघों की ये दातात कैसे आश्चर्यजनक तरीके से कमती चली गई। कैसे इन कुछ सौ सालों में देशभर के हजारों बाघ गायब होने की जद पर आ पहुंचे। कैसे हम इतने बेपरवाह शिकारी हो गये कि हमने अपने राश्ट्रीय पशु को मरने के लिये छोड दिया। इन सवालों की परतें अपनी जडों तक बडी गहरी हैं। बाघों की तस्करी के अन्तर्राश्ट्रीय बाजार में भारत से तिब्बत के जरिये चीन तक उनकी खालों के व्यापार की खबरें पिछले कई सालों से छनती हुई मीडिया में पहुंचती रही हैं।<img src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/02/tiger-skin-224x300.jpg" alt="" title="tiger skin" width="224" height="300" class="alignright size-medium wp-image-1675" /> और अब जबकि बाघों की विलुप्ति की खबरों के सच होने के दिन नजदीक आते लग रहे हैं हमें उनकी चिन्ता सता रही है। देशभर में 38 से ज्यादा टागर रिजर्व उनके संरक्षण के नाम पर बने तो सही पर मौजूदा हाल साफ कर देता है कि वो कितने सफल रहे। या कहना बेहतर होगा कि कितने नाकामयाब रहे। खैर हालात जब इतने बिगडे हैं तो कम से कम हमें जागने की सूझी है। हम जो कर सकते हैं वो यही है कि उनके बचाव के लिये काम कर रहे जागरूकता अभ्यिानों से किसी न किसी तरह जुडें। अपनी ओर से जागरूकता लाने का प्रयास करें। हो सके तो कोई पहल करें। अगले कुछ सौ सालों तक बाघ जीते हुए दहाड सके तो पर्यावरण संरक्षण के लिए ये हमारी बडी मदद होगी। </p>
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		<title>ब्लूलाइन के बाद अब डीटीसी का कहर</title>
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		<pubDate>Fri, 06 Nov 2009 12:16:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उमेश पंत</dc:creator>
				<category><![CDATA[दिल्ली -एनसीआर]]></category>

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		<description><![CDATA[दिल्ली की बसों में एक और बड़ा दर्दनाक वाकया हुआ। बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस हादसे में 3 रुपये की टिकट नहीं रही । दिल्ली में बसों के किराये बढ़ गये। पांच का टिकट दस ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">दिल्ली की बसों में एक और बड़ा दर्दनाक वाकया हुआ। बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस हादसे में 3 रुपये की टिकट नहीं रही । दिल्ली में बसों के किराये बढ़ गये। पांच का टिकट दस का हो गया और दस का पन्द्रह में बदल गया। सात की बिसात भी अब नहीं रही। इस घटना का सीधा असर यहां ब्लाग पढ़ रहे आप हम लोगों में से बहुत कम पर होगा। हमें शायद ये घटना बहुत दर्दनाक&nbsp; ना लगे। पर बस में चढ़ने वाला एक बड़ा तबका दिल्ली में मजदूरी कर रहे लोगों का है। वो लोग जिनके गन्दे से कपड़ों से जब बदबू आ रही होती है तो कुछ नाकें अपना मुंह सिकोड़ लेती हैं। जिनको बस का कन्डक्टर हिकारत भरी नजरों से <a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/dtc-249x189.jpg"><img alt="dtc-249x189" class="aligncenter size-full wp-image-1083" height="189" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/dtc-249x189.jpg" title="dtc-249x189" width="249" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">देख आगे बढ़ जाने का डांटता हुआ सा आदेश दे देता है। और जो पांच की जगह तीन रुपये की टिकट में अपना काम चला रहे होते हैं क्योंकि ऐसा करके वो अपने किसी छोटे से बच्चे की किताबों या कपड़ों की संख्या में थोड़ा इजाफा कर लेने के सपने देख रहे होते हैं। पर शीला आंटी की सरकार ने बसों का किराया बढ़ाकर तीन रुपये के टिकट की मौत की घोश्णा कर दी। और इस तरह के कई मजदूरों की रोजी रोटी का एक बड़ा हिस्सा छीन लिया। कई किताबों कई कपड़ों के सपने जमीदोज हो गये। और ये इसलिये हुआ कि शीला आंटी की सरकार चाहती है कि कौमनवेल्थ खेलों में हमारी बसें चकाचक दिखें। उन्होंने घोषणा की है कि हर बस पर बीस हजार रुपल्ली का खर्चा किया जायेगा। उसे सजाने सवारने के खातिर। बस में सफर करने वाला वो मजदूर सकते में है। उसे कुछ कहते नहीं बन रहा। उसकी कमाई उसका मेहनताना जस का तस है। टिकट बढ़ गया। उसे रोज जाना आना है अपनी फैक्टी, अपने आफिस, अपनी जेल में। वह कैसे आ जा पायेगा शीला आंटी की सरकार की फिक्र से ये बात परे है। केवल किराये ही बढ़ाये होते तो बात और थी होलाकि तब भी जायज नहीं थी, पर जुल्म की इन्तहां और भी है। टिकट की दूरी की मियाद भी कम कर दी गई है। माने ये कि अब तीन किलोमीटर पर पांच रुपये की टिकट देनी होगी। जबकि पहले चार किलोमीटर पर तीन की टिकट थी। पिचहत्तर रुपये के स्टूडेन्ट पास को सीधे चार सौ रुपये पर पहुंचा दिया है। खैर डीटीसी तो इस फैसले से अपनी खूब कमाई कर ही लेगी। बावजूद इसके कि आम मजदूर वर्ग जिसकी कमाई महीने के कुछ हजारों में है उसके महीने का आने जाने का खर्च हजारों में पहुच जायेगा और इन कुछ हजारों में से कुछ और कट जायेंगे, कुछ कपड़े लत्ते, कुछ किताबें, खाने की कुछ चीजें भी। क्योंकि इसका कोई विकल्प नहीं है सिवाय पैदल चलने के। जो दिल्ली जैसे दूरियों वाले शहर में नामुमकिन है। <br />
	इस लेख को पढ़कर कोई सोच सकता है कि कैसी पांच दस रुपयों की टुच्ची अदनी सी बात पर बहस खड़ी की जा रही है पर ये दिल्ली के उस तबके की दिल्ली सरकार को आह है जिसके लिये ये टुच्ची सी बात बड़ी अहमियत रखती है। वो वर्ग सचमुच परेशान है। आप बस में सफर कीजिये तो आप आह भरे उन शब्दों को सुन पाएंगे। ब्लू लाईन कन्डक्टर्स जैसे अचानक से मालिकाना अन्दाज में आ गये हैं। ये वर्ग चैंकता हुआ कहता है क्या बात कर रहे हो हम तो हमेशा पांच रुपये देते थे दस कहां से हो गया। कन्डक्टर बड़े रौब में आकर कह देता है चल भई उतर ले और दिल्ली सरकार से पूछ के आ। उपर से और्डर हैं। कुछ उतर ही जाते हैं और कुछ मरे मन से दस का नोट कन्डक्टर की तरफ बढ़ा देते हैं। ये उपर से और्डर होने की कहानी होने का एन्टी क्लाईमेक्स हमारे देश में अक्सर दुखान्त ही होता है। पर तीन के टिकट की ये मौत आजकल निम्न वर्गीय चेहरे की सिकन में बसों से चढ़ते उतरते देखने को मिल रही है। उनकी फुसफुसाहट में छुपी मजबूरियों को सुनने वाला यहां कोई नहीं है। उन्हें कहने का हक किसी ने दिया नहीं है। कहने को ये शहर दिल्ली है सियासत का केन्द्र पर इस दिल्ली में सियासत किस चालाकी से निम्नवर्ग का गला गला घैंाटे जा रही है तीन के टिकट की मौत <a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/dtc+bus.jpg"><img alt="dtc+bus" class="aligncenter size-medium wp-image-1084" height="202" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/dtc+bus-300x202.jpg" title="dtc+bus" width="300" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">इसकी बानगी है। शीला आंटी या उनके नीतिकारों तक ये बात पहुचनी ही चाहिये कि पीएसयू का दस प्रतिशत सो कौल्ड आम आदमी को दे देने के फैसले से आम आदमी को खुश करने की गलतफहमी में न रहें। क्योंकि आम आदमी का स्तर इस देश में अभी और नीचे है जो फलाईओवरों के नीचे या यमुना किनारे बनी झुग्गियों में रह रहा है। जहां तक भले ही लालबत्ती की गाड़ियों से झांकने पर नजर ना जाती हो पर चुनावों में वोट वहां से भी आते हैं। वो अनाम सा रहने वाला आम आदमी जो दिल्ली की काया पलटने में गजब की भूमिका निभा रहा है उसके लिये तीन के टिकट की मौत बड़ी खबर है बावजूद इसके कि उस खबर की इतनी औकात नहीं है कि वो ब्रेकिंग न्यूज बन सके।</p>
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		<title>सुपरमैन आफ मालेगांव ( superman of malegaon )</title>
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		<pubDate>Sat, 24 Oct 2009 08:05:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उमेश पंत</dc:creator>
				<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[superman of malegaon]]></category>
		<category><![CDATA[सुपरमैन आफ मालेगांव]]></category>

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		<description><![CDATA[वे फैज नहीं हैं फैजा हैं इसलिए उनका अंदाजे बयां अलहदा है। फैज शब्दों से अपनी बात कहते थे फैजा ने वृत्तचित्र के जरिये कही। और जो कही कमाल कही। किसी कविता सी दिल में उतर गई चित्रों के कई वृत्त ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7946" href="http://www.janokti.com/hindi-news-media-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be-cinema-media-blog-fourth-pilar/cinema-film-tv-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a5%80/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8-%e0%a4%86%e0%a4%ab-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b5-superman-of-malegaon/attachment/super-man-of-malegaon/"><img class="alignleft size-full wp-image-7946" title="super man of malegaon" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/super-man-of-malegaon.jpg" alt="" width="320" height="240" /></a>वे फैज नहीं हैं फैजा हैं इसलिए उनका अंदाजे बयां अलहदा है। फैज शब्दों से अपनी बात कहते थे फैजा ने वृत्तचित्र के जरिये कही। <span style="font-size: 13.3333px;">और जो कही कमाल कही। किसी कविता सी दिल में उतर गई चित्रों के कई वृत्त सी बनाती जैसे नदी के शान्त प्रवाह में कंकड़ को हल्के धकेल दिया हो। फैजा अहमद खान आरै कुहू तनवीर की फिल्म सुपरमैन आफ मालेगांव एक डाक्यूमेंटी फोर्म की फिल्म है। पूरी फिल्म एक फिल्म बनने की प्रक्रिया से जुड़ती है और फिल्म के भीतर उस फिल्म के बन जाने और प्रदर्शित हो जाने के बाद तक चलती है। पहले तो ये फिल्म ही अच्छी बनी है और उसपर जिस फिल्म की ये चर्चा करती है वो भी गजब ढ़ा गई है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">मलेगांव चर्चा में तब आया जब एक मोटरसाईकिल में रखे बम से हुए धमाके में वहां सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। लेकिन हम आप में से कम ही लोग जानते हैं कि वहां एक फिल्म इन्डस्ट्री है। इस इन्डस्ट्री की खास बात है कि इसमें काम करने वाले लोग कोई बड़े फिल्मी सितारे नहीं हैं बल्कि मालेगांव के हैन्डलूम पावर कारखाने में काम करने वाले मजदूर हैं। और निर्देशक गांव के ही नासिर भाई हैं। जिन्होंने एक सपना देखा और फिर जुट गये उसे पूरा करने में। सपना कि अपनी कुछ फिल्में बनें। मालेगांव के लोगों के द्वारा, मुम्बईया फिल्मों के समानान्तर। 1999 में उन्होंने बालिवुड की मसहूर फिल्म शोले की रिमेक बनाई और फिर ये सिलसिला चलता रहा। लेकिन इसबार उन्होंने बालिवुड को पीछे छोड़ने की ठानी और सुपरमैन का रिमेक बनाने में जुट गये। लेकिन कहानी आसान नहीं रही। पैनासोनिक के साधारण से हैंडीकैम से सूट करने की चुनौती उसपर संसाधनों के नाम पर कुछ नहीं। न डौली न क्रेन। उस पर उड़ने वाले सुपरमैन को फिल्माना। क्रोमा तकनीक का पता करने किसी स्टूडियो गये तो पूरे दो लाख रुपये के खर्च की बात सुनकर हौसले कुछ कम हुए नासिर भाई के। इतने में तो हमारी चार फिल्में बन जायेंगी। कहा और कुछ और सोच लिया। जुगाड़ तो होते ही हैं दुनिया में। क्रेन के लिये बैलगाड़ी और ट्राली के लिए साईकिल और ट्रक की मदद ली गई। सुपरमैन का किरदार एक मसलमैन ने नहीं बल्कि एक पतले से सीधे साधे मजदूर ने निभाया। पूरी कौमेडी फिल्म बनाई नासिर भाई ने। फिल्म ने सबको खूब गुदगुदाया पर किसी की मजाल जो उनके इस प्रयास की कोई हंसी उड़ा सके।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जब आप फैजा साहब की इस डौक्यूमेंटी को देख रहे होते हैं तो आपकी आंखें आश्चर्य से फटी रह जाती हैं कि कोई इतने कम संसाधनों में ऐसे प्रयास की सोच भी सकता है। कितनी लगन होगी उस आदमी में जो असम्भव से दिखने वाले प्रयास को बिना पैसे बिना किसी संसाधन के अंजाम दे रहा है। मालेगांव का सुपरमैन दरअसल एक प्रेरणा है। कि फिल्में बनाने के लिए जिस चीज की सबसे ज्यादा जरुरत है वो है इच्छाशक्ति। फिल्म आपको मालेगांव के इन किरदारों से इतना जोड़ देती है कि फिल्म के एक दृश्य में सूटिंग करते हुए नासिर भाई का कैमरा पानी में गिर जाता है और सिरीफोर्ट औडीटोरियम में बैठे दर्शक सकते में आ जाते हैं। ओह सिट। ओेह नो। फक। इस तरह की फुसफुसाहट औडी में होने लगती है। क्योंकि लोग जान रहे हैं कि उस कैमरे में मालेगांव और नासिरभाई का सपना छुपा है। उस सपने से, देखने वाला इतना जुड़ जाता है कि वो तब तक परेशान रहता है जब तक उसे पता नहीं चल जाता कि कैमरा ठीक हो गया है। इस दुबले पतले सुपरमैन की अदाएं खूब गुदगुदाती भी हैं दर्शकों को। उसका उड़ना कैसे सम्भव हो जाता है ये चैंकाता है। कैसे एडिटिंग अपना कमाल दिखाती है और फिल्म पहुंचती है अपनी टार्गेट आडियंस के पास। मालेगांव के लोगों के पास। फैजा का ये पूरा वृत्तचित्र बहुत ही लाजवाब बन पड़ा है। डौक्यूमेंटी की स्टीरियोटिपकल फोर्म को तोड़ता सा। साथ ही एक बड़ा सवाल भी फिल्म खड़ा करती है कि क्या स्टार सिस्टम के समानान्तर हो रहे इन छोटे छोटे क्षेत्रीय स्तर के प्रयासों का कोई योगदान फिल्मों के विकास में है भी कि नहीं और यदि है तो क्या उनकी मदद के लिए आकाश से फरिस्ते आयेंगे और तब तक हम ऐसी फिल्मों से रुबरु कराती कुछ बड़े बैनर की फिल्मों को आसियान जैसे फेस्टिवल में दिखाकर ही खुश होते रहेंगे। क्या हम तब तक यही कहते रहेंगे कि वाह मालेगांव में क्या सही काम हो रहा है फिल्मों पर, तब तक जब तक ये अनूठा सिनेमाई प्रयास दम तोड़ चुका होगा। किसी मदद का इन्तजार करते करते।</p>
<p style="text-align: justify;">
]]></content:encoded>
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		<title>त्रयम्बकेश्वर जाने के बाद&#8230;.</title>
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		<pubDate>Tue, 20 Oct 2009 16:29:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उमेश पंत</dc:creator>
				<category><![CDATA[दक्षिणावर्त]]></category>
		<category><![CDATA[विचार -विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[indian heritage]]></category>
		<category><![CDATA[tourism in india]]></category>

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		<description><![CDATA[इस बार त्रयम्बकेश्वर जाना हुआ। लगा कि भक्ति और आस्था ये ऐसे शब्द हैं जिनका कट्टरवाद से कोई लेना देना नहीं है। महाराष्ट्र में नासिक के पास एक छोटा सा कस्बा है त्रयम्बकेश्वर जिसका अस्तित्व अगर है तो उसके पीछे ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">
	<a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/100_1651.JPG"><img alt="100_1651" class="aligncenter size-medium wp-image-945" height="225" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/100_1651-300x225.jpg" title="100_1651" width="300" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">
	इस बार त्रयम्बकेश्वर जाना हुआ। लगा कि भक्ति और आस्था ये ऐसे शब्द हैं जिनका कट्टरवाद से कोई लेना देना नहीं है। महाराष्ट्र में नासिक के पास एक छोटा सा कस्बा है त्रयम्बकेश्वर जिसका अस्तित्व अगर है तो उसके पीछे बस यही भक्ति और आस्था है। लगता है कि ये कस्बा इसी आस्था से है और इसके लिए जीता है। आस्था न होती तो ये कस्बा न होता। एक पिछड़ा सा नजर आने वाला इलाका, पिछड़े से नजर आने वाले लोग लेकिन बावजूद इसके देश भर से लोगों की आवाजाही । स्थानीय लोगों की आजीविका भक्ति के इर्द &#8211; गिर्द लिपटी समायी सी आम हिन्दू मानसिकता से चलती है। </p>
<p style="text-align: justify;">
	<a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/100_17081.JPG"><img alt="100_1708" class="aligncenter size-medium wp-image-947" height="225" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/100_17081-300x225.jpg" title="100_1708" width="300" /></a>पन्डित भक्ति के नाम पर कमाते हैं, दुकानदार भक्ति से पैसा कमाते हैं और एक भीख मांगने वाला&nbsp; आदमी आप से यह कहकर कमाने की कोशिश करता है कि भोलेनाथ भला करेंगे। एक औरत एक घास का छोटा गट्ठर&nbsp; सा लेकर आपके पास आती है, पास में उसकी ही गाय बंधी है और वो आपको एक रुपये में इस गट्ठर को यह कहकर बेच देना चाहती है कि गौदान एक पुण्य काम है। एक बच्ची फूल की माला लेकर आपके इर्द गिर्द मडराती है, कहती है ले लो ना भगवान भला करेगा। यहां आने वाले लोग अपनी आम दिनचर्या के बिगड़े हुए नियम छोड़कर सुबह पांच बजे उठ जाएंगे और सुबह पवित्र माने जाने वाले कुंड में पूरी भक्ति से स्नान करेंगे इस आस्था के साथ कि उनके पाप धुल जाएंगे। सुबह होते होते त्रयम्बकेश्वर के मुख्य मन्दिर में लोगों का तांता लग जाएगा कि भगवान की मूर्ति के दर्शन भर हो जायें। आगन्तुक दिन भर कहीं अपने पूर्वजों का श्राद्ध करेंगे कि उनकी अतृप्ति आत्माएं शान्त हो जांये, कहीं कोई अपने कालसर्प दोष का निवारण कर रहा होगा। आदमी औरतें सफेद कपड़ों में जगह जगह बैठे हवन कर रहे होंगे। शाम होगी लोग अपने लिए खरीदे हुए रात के ठिकानों में चले जाएंगे और अगले या उसके अगले रोज इस कस्बे में अपनी यादें और आस्था छोड़ चले जाएंगे अपने घरों को। ये इस कस्बे का जीवन है। कहानियों परम्पराओं और धार्मिक मान्यताओं के पहनावे को खुद में ओढ़े लिपटे एक कस्बे का जीवन। इस पूरी आस्थावान विरासत का कहीं कोई नुकसान होता नहीं दिखाई देता। यहां आकर कभी आपको ऐसा नहीं लगेगा कि धर्म कभी हिंसा से सरोकार रख सकता है। यहां धर्म आपको एक अजीब तरह की उर्जा देता है, एक अलग तरह का भावनात्मक लगाव जो न मालूम किससे है? भगवान जैसी किसी चीज से, जिसे मानते ना मानते अपने परिवार के साथ यहां आ पहुंचे हैं। उन मान्यताओं से जिनमें आपको कहीं को लॉजिक जैसी चीज नहीं दिखाई देती, ना आप तलाशते हैं या अपने परिवार से जो आपके साथ है बस इसीलिए आप भक्ति का दिखावा करना चाहते हैं ताकि आपके बुजुर्गों, या मम्मी पापा को अच्छा लगे। इन सारी भावनाओं में कहीं दुराग्रह नहीं छुपा है। किसी के प्रति कोई हिंसात्मक अलगाव जैसा कुछ भावनाओं के आवेश में नहीं है। धर्म अगर है तो किसी के जीने के लिए, एक कस्बे को जिन्दा रखने के लिए, वहां के गरीब लोगों को आजीविका देने के लिए, उन्हें भूखों मरने से बचाने के लिए और जो धर्म में विश्वास रखते हैं उनके पुण्य के लाभ की आकांक्षा को पूरा कर देने भर के लिए। ऐसे धर्म से किसी को परहेज होने ना होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता।&nbsp; ये कुछ भावनाएं धर्म के बारे में उमड़ रही हैं। धर्म के प्रति किसी सहमति असहमति से परे, धार्मिक होने के किसी लेबल के चस्पा होने ना होने के भय के परे आप तक इन भावनाओं को पहुंचा रहा हूं। </p>
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		<title>पाताल भुवनेश्वर- रहस्यों को खुद में समेटे एक शिल्प</title>
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		<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 11:58:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उमेश पंत</dc:creator>
				<category><![CDATA[पर्यटन]]></category>
		<category><![CDATA[indian heritage]]></category>
		<category><![CDATA[tourism in india]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तराखण्ड]]></category>
		<category><![CDATA[पाताल]]></category>

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		<description><![CDATA[&#160; &#160; उत्तराखण्ड की पहाड़ी वादियों के बीच बसे सीमान्त कस्बे गंगोलीहाट की पाताल भुवनेश्वर गुफा किसी आश्चर्य से कम नही है। यहां पत्थरों से बना एक. एक शिल्प तमाम रहस्यों को खुद में समेटे हुए है। मुख्य द्वार से ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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</a></h3>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/12312.jpg"><img width="180" height="138" class="aligncenter size-full wp-image-906" title="जनोक्ति/उतराखन्ड" alt="जनोक्ति/उतराखन्ड" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/12312.jpg" /></a></p>
<div style="text-align: justify;">उत्तराखण्ड की पहाड़ी वादियों के बीच बसे सीमान्त कस्बे गंगोलीहाट की पाताल भुवनेश्वर गुफा किसी आश्चर्य से कम नही है। यहां पत्थरों से बना एक. एक शिल्प तमाम रहस्यों को खुद में समेटे हुए है। मुख्य द्वार से संकरी फिसलन भरी 80 सीढियां उतरने के बाद एक ऐसी दुनिया नुमाया होती है जहां युगों युगों का इतिहास एक साथ प्रकट हो जाता है। गुफा में बने पम्थरों के ढांचे देष के आध्यात्मिक वैभव की पराकाष्ठा के विषय में सोचने को मजबूर कर देते हैं।<br />
पौराणिक महत्व&nbsp; पुरातात्विक साक्षों की मानें तो इस गुफा को त्रेता युग में राजा ऋतुपर्ण ने सबसे पहले देखा। द्वापर युग में पाण्डवों ने यहां चौपड़ खेला और कलयुग में जगदगुरु शकराचार्य का 822 ई के आसपास इस गुफा से साक्षात्कार हुआ तो उन्होंने यहां तांबे का एक शिवलिंग स्थापित किया। इसके बाद चन्द राजाओं ने इस गुफा के विशय मे जाना।और आज देष विदेष से षैलानी यहां आते हैं। और गुफा के स्थपत्य को देख दांतो तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाते हैं।<br />
मान्यताएं चाहे कुछ भी हो पर एकबारगी गुफा में बनी आकृतियों को देख लेने के बाद उनसे जुड़ी मान्यताओं पर भरोसा किये बिना नहीं रहा जाता। गुफा की शुरुआत में शेषनाग के फनों की तरह उभरी संरचना पत्थरों पर नज़र आती है। मान्यता है कि धरती इसी पर टिकी है। आगे बढने  पर एक छोटा सा हवन कुंड दिखाई देता है। कहा जाता है कि राजा परीक्षित को मिले श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए उनके पुत्र जन्मेजय ने इसी कुण्ड में सभी नागों को जला डाला परंतु तक्षक नाम का एक नाग बच निकला जिसने बदला लेते हुए परीक्षित को मौत के घाट उतार दिया। हवन कुण्ड के ऊपर इसी तक्षक नाग की आकृति बनी है। आगे चलते हुए महसूस होता है कि हम किसी की हडिडयों पर चल रहे हों। सामने की दीवार पर काल भैरव की जीभ की आकृति दिखाई देती है। कुछ आगे मुड़ी गरदन वाला गरुड़ एक कुण्ड के ऊपर बैठा दिखई देता है। माना जाता है कि शिवजी ने ने इस कुण्ड को अपने नागों के पानी पीने के लिये बनाया था। इसकी देखरेख गरुड़ के हाथ में थी। लेकिन जब गरुड़ ने ही इस कुण्ड से पानी पीने की कोशिश की तो&nbsp; शिवजी  ने गुस्से में उसकी गरदल मोड़ दी। कुछ आगे ऊंची दीवार पर जटानुमा सफेद संरचना है। यहीं पर एक जलकुण्ड है मान्यता है कि पाण्डवों के प्रवास के दौरान विश्वकर्मा ने उनके लिये यह कुण्ड बनवाया था। कुछ आगे दो खुले दरवाजों के अन्दर संकरा रास्ता जाता है। कहा जाता है कि ये द्वार धर्म द्वार और मोक्ष द्वार है । आगे ही है आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा&nbsp; स्थापित तांबे का शिवलिंग। माना यह भी जाता है गुफा के आंखिरी छोर पर पाण्डवों ने शिवजी के साथ चौपड़ खेला था। लौटते हुए एक स्थान पर चारों युगों के प्रतीक चार पत्थर हैं। इनमें से एक धीरे धीरे ऊपर उठ रहा है। माना जाता है कि यह कलयुग है और जब यह दीवार से टकरा जायेगा तो प्रलय हो जायेगा। गुफा की शुरुआत पर वापस लौटने पर एक मनोकामना कुण्ड है। मान्यता है कि इसके बीच बने छेद से धातु की कोई चीज पार करने पर मलोकामना पूरी होती है। आष्चर्य ही है कि जमीन के इतने अन्दर होने के बावजूद यहां घुटन नहीं होती शान्ति मिलती है। देवदार के घने जंगलों के बीच बसी रहस्य और रोमान्च से सराबोर पाताल भुवनेश्वर की गुफा की सैलानियों के बीच आज एक अलग पहचान है। कुछ श्रृद्धा से, कुछ रोमान्च के अनुभव के लिये, और कुछ शीतलता और शान्ति की तलाश में यहां आते हैं। गुफा के पास हरे भरे वातावरण में सुन्दर होटल भी पर्यटकों के लिये बने हैं। खास बात यह है कि गंगोलीहाट में अकेली यही नहीं बल्कि दस से अधिक गुफाएं हैं जहो इतिहास की कई परतें, मान्यताओं के कई मूक दस्तावेज खुदबखुद खुल जाते हैं। आंखिर यूं ही गंगोलीहाट को गुफाओं की नगरी नहीं कहा जाता।</div>
<div style="text-align: justify;">
<strong>अन्य आकर्षण :- </strong>हिमालय की श्रृंखलाओं को यहां नजदीक से देखा जा सकता है। प्रसिद्ध कालिका मन्दिर और हजारों फीट की ऊंचाई पर बसा मुक्तेश्वर । सर्दियों में बर्फ का लुत्फ भी यहां उठाया जा सकता है।<br />
<strong><br />
कहां रुकें :- </strong>पार्वती रिसोर्ट और होटल सैलाषा में रहने खाने पीने की उच्च स्तरीय व्यवस्था है।</div>
<div style="text-align: justify;">
<strong>कैसे पहुंचें:-</strong> दिल्ली से गंगोलीहाट तक सीधी बस सेवा। गंगोलीहाट से टैक्सी लेकर एक घन्टे में यहां पहुंचा जा सकता है।</div>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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		<title>यमुना किनारे विचरने के बहाने</title>
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		<pubDate>Mon, 12 Oct 2009 16:14:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उमेश पंत</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रकृति]]></category>
		<category><![CDATA[Nature]]></category>
		<category><![CDATA[pollution of delhi]]></category>
		<category><![CDATA[rivers]]></category>
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		<category><![CDATA[यमुना]]></category>

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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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<h3 class="post-title entry-title" style="text-align: justify;"><a href="http://naisoch.blogspot.com/2009/02/blog-post.html"><br />
</a></h3>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/DSC_0153.JPG"><img width="320" height="213" class="aligncenter size-full wp-image-867" title="DSC_0153" alt="DSC_0153" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/DSC_0153.JPG" /></a><br />
&nbsp;नदियां हमेशा उस जगह को एक संस्कृति देती हैं जहां वो बह रही होती हैं। नदियों के साथ एक पूरा जीवन और उस जीवन के बरक्स लोगों की दैनिक जीवनचर्या भी नदियों से जुड़ जाती है। चाहे वो बनारस या हरिद्वार के घाट हों या किसी छोटे से गांव के किनारे बह रही अनजान से नाम वाली नदी के किनारे, नदी होने से उनका होना कुछ अलग ही अहमियत से सराबोर हो जाता है। उन घाटों, उन किनारों में होने वाली चहल पहल की वजह वो नदी होती है और इस वजह के इर्द-गिर्द कई और वजहें जान बूझकर वहां के रवासियों और राहगीरों द्वारा बुन ली जाती हैं। ये वजहें उस नदी की अहमियत के सबूतों में शुमार हो जाती हैं। लेकिन कोई नदी तभी अच्छी लगती है जब वह अविरल बही चली जाये, उसकी सतहों के इर्द गिर्द स्वच्छ और निर्मल होने की महक महका करे, और वहां एक अजीब सी शान्ति, एक अजीब सा सुख आने जाने वालों को मिला करे। अब तक हमेशा यही लगता आया था कि न यमुना ऐसी नदियों में है, न दिल्ली यमुना के होने से मिले उपरोक्त सुखों से परिपूर्ण है। यानी यह कि यमुना का यहां दिल्ली में है तो पर दिल्ली से और दिल्ली वालों से अलहदा है। पूरी तरह उपेक्षित सी एक कोने में पड़ी हुई। जैसे बनारस की विधवांएं। न यमुना ने दिल्ली को कोई संस्कुति ही दी है, न दिल्ली वालों ने यमुना के इर्द गिर्द खुद कोई संस्कुति बुनने की जरुरत ही समझी। परिणाम जो होना था वही हुआ। यमुना एक नाले में दब्दील होती रही। सूखती रही और दिल्लीवालों ने भी उसे किसी कूड़ेदान से बेहतर न समझा। <a href="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/SYcTdH3dAZI/AAAAAAAAAJ8/8UQgtAVEcGc/s1600-h/DSC_0202.JPG"><img border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5298224877673447826" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/SYcTdH3dAZI/AAAAAAAAAJ8/8UQgtAVEcGc/s320/DSC_0202.JPG" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 213px;" /></a><br />
आईटीओ के पास यमुना का जो किनारा है वहां एक सूखे दिन में जाना हुआ तो पैर पर पहनी खुली काली चप्पलें मटमैली हुए बिना नहीं रह सकी और पैर मिटटी में पसीने के मिल जाने से काले हो गये। पर भीगे नहीं। नदी के किनारे जाने के बावजूद बिना भीगे- भिगाये पैरों का लौट आना बड़ी विडम्बना जरुर थी। पर वजह जाहिर थी कि इतने गंदे पानी में न पैर भिगाने का जी हुआ न ही माहौल में घुली बदबू ने ज्यादा देर वहां ठहरने ही दिया। वहां चहल पहल के नाम पर कुछ बच्चे मिले जो पास ही से गुजरती रोड में बहती हुई कारों में मौजूद आस्थावान लोगों की आस्था को उनके द्वारा दी गई मूर्तियों, घड़ों और चंद सिक्कों जैसी चीजों के रुप में इस नदी में उड़ेल आते हैं। बहाने से ये बच्चे इन चंद सिक्कों के हकदार बन जाते हैं। ये बच्चे स्कूल नही जाते और नदी के कूड़े को बीन अपने भविश्य के आईने से दूर चले जाते हैं। वैसे भी इस नदी में वो कुव्वत कहां है कि यह किसी को आईना दिखा भी सके। या कहें कि लोगों ने इस कुव्वत होने की कोई गंजाईश ही नही छोड़ी। वैसे और जगह होती तो नदी में अपना प्रतिबिम्ब देखना भी कम रोचक नहीं होता। पर यहां आकर इस रोचक अनुभव से गुजर पाना कतई असम्भव सा लगा। <a href="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/SYcT-oepV-I/AAAAAAAAAKE/jPDxjwVLWLQ/s1600-h/DSC_0018.JPG"><img border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5298225453363451874" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/SYcT-oepV-I/AAAAAAAAAKE/jPDxjwVLWLQ/s320/DSC_0018.JPG" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 213px;" /></a><br />
अक्षरधाम के पास भी यमुना के कुछ अवशेश बांकी हैं। यहां यमुना का यह छोटा सा अहाता सुबह सुबह कालेज जाते हुए रोज दिखाई दे जाता है। इन दिनों रोलज इसे देखने की गरज से बस के दरवाजे पर खड़ा रहता हूं। सुबह जब धूप होती है तो सूरज की कई किरणें इसमें सितारों जैसा कुछ बिखेर रही होती हैं और कुछ पक्षी बार बार इस अहाते में उडत्ते-तैरते दिखाई देते हैं। इन पक्षियों के उड़ते वक्त नदी की सतह को ठीक छोड़ते समय, इनके शरीर से पानी को बिखरते हुए देखना मुझे एक अलग आनन्द देता है। दूसरी ओर अक्षरधाम की दिशा में जो छोर है वहां एक नर्सरी है। और इस नर्सरी के बीच में युमुना को बचाये जाने के लिए यमुना सत्याग्रह का बैनर लगा एक तम्बू न जाने कब से लगा हुआ है। सुना है मैग्सेसे अवार्डी राजेन्द्र जी यहीं से अपने आन्दोलन को प्रतीकात्मक रुप से चलाते हैं। लेकिन यह समझ से परे है इस जगह पर इस सत्याग्रह को कैसे कोई नोटिस ले पाता है। हांलाकि पास ही बन रहे खेलगांव की ईमारतों की मंजिलों को कम करने के पीछे इन लोगों के आन्दोलन की भूमिका जरुर रही है। <a href="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/SYcOcjEOT4I/AAAAAAAAAJ0/V52LLlfadco/s1600-h/DSC_0144.JPG"><img border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5298219370236759938" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/SYcOcjEOT4I/AAAAAAAAAJ0/V52LLlfadco/s320/DSC_0144.JPG" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 213px;" /></a><br />
खैर यमुना खूबसूरत कतई नही रह गई है। मेरी इस धारणा को तोड़ने में पिछला हफता बड़ा अहम रहा है। पिछले शुक्रवार को कालिन्दी कुंज के पास बने पक्षी विहार में जाना हुआ। दरअसल अन्दर जाना भी एक संयोग था। मैं बाहर से ही नदी में मौजूद एक नाव की तस्वीर लेने पे तुला था कि तभी वहां एक गार्ड आया और मुझे टोका कि मैं क्या कर रहा हूं। हांलाकि यह अजीब सा दुराग्रह ही था कि एक कैमरा पकड़ा हुआ आदमी जो नदी में मौजूद नाव को फोकस कर ही चुका हो उससे पूछा जाय कि वह कर क्या रहा है। खैर उस गार्ड ने बताया कि मैं पहले 30 रुपये का टिकट खरीदूं और फिर अन्दर जाकर जीभर फोटोग्राफी करु। मैने टिकट खरीदा और अन्दर जाकर वह हुआ जो दिन बनने के लिए काफी था। वास्तव में यमुना अब भी निहायत खूबसूरत है। उतनी ही तिनी किसी निर्जन गांव के इर्द गिर्द बह रही नदी हो सकती है। लगभग चार किलोमीटर का इस अहाते को अगर आप बिना थके केवल यमुना को निहारते, वहां मौजूद पक्षियों से ईश्या करते हुए पैदल पार कर लें तो यह एक नितान्त दार्शनिक अनुभव से कम नही है। कम से कम मेरे लिये तो यह सच रहा। <a href="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/SYcNv3Xz0wI/AAAAAAAAAJk/ymZrxgYqt2Q/s1600-h/DSC_0205.JPG"><img border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5298218602593506050" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_eCisLVpxoY4/SYcNv3Xz0wI/AAAAAAAAAJk/ymZrxgYqt2Q/s320/DSC_0205.JPG" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 213px;" /></a></p>
<p>इतनी सुन्दर यमुना और उसकी दार्शनिकता को जिन्दा रखना जितना जरुरी है उतना ही विडम्बनापूर्ण है उसे गन्दे नाले में तब्दील होते देखते रहना।</p>
<p>&nbsp;</p>
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