संत की चिता राजनेताओ का नया चूल्हा!
2संतनिगमानंद ने अनशन करके जान दे दी ,ये राजनेताओ के लिए इतना शुभ संकेत बन गया अपने स्वार्थ की रोटी सेकने के लिए,शुरू में मीडिया ने खबर को जादा कवर नहीं किया,फिर तमाम आरोप प्रत्यारोप आने लगे,बिलकुल ऐसा महसूस हो
संतनिगमानंद ने अनशन करके जान दे दी ,ये राजनेताओ के लिए इतना शुभ संकेत बन गया अपने स्वार्थ की रोटी सेकने के लिए,शुरू में मीडिया ने खबर को जादा कवर नहीं किया,फिर तमाम आरोप प्रत्यारोप आने लगे,बिलकुल ऐसा महसूस हो
कभी किसी खुले मैदान में बैठिये,फुर्सत के पलों में,और देखिये अपने इर्द गिर्द तो अजीब प्रश्न आते है मन में ,इतना ऊँचा आकाश जिसकी कोई थाह नहीं उसपे कभी ध्यान नहीं जाता आपका,वो आकाश जिसमे सूर्य सिर्फ सागर में लटकती
बाबा रामदेव का अनशन टूट गया,कई मीडिया चैनलों पर मैंने पत्रकारों को तात्कालिक प्रभाव में आके कहते देखा की बाबा बैकफुट पर चले गए,वही मीडिया की पुरानी आदत(या कहे बीमारी)जिसमे वो मनोरंजन परोसने के लिए सत्य पहचानने में चूक कर
मुझे ये तो नहीं पता की कौन कितना भ्रष्ट है और कौन कितना इमानदार पर अब जब स्वामी रामदेव ने अपने ट्रस्ट की संपत्ति घोषित कर दी है तो क्या दिग्विजय सिंह की ये नैतिकता नहीं बनती की वो इस
मनुष्य के जीवन का परम ध्येय होता है स्वयं के विषय में जानना,जीवन में किये गए हर एक कर्म का उद्देश्य भी यही होता है,हर किसी को इस का अनुभव है की उसने जीवन में जो इच्छा की वो पूरी
एक बात का जवाब दीजिये,क्या आपको आज़ादी शब्द में ख़ुशी नहीं महसूस होती,अब एक और बात बताइए ईमानदारी से, क्या अप सच में खुश है,मै बहस नहीं करूँगा आप खुद बोलिए,यदि नहीं है तो क्यूँ अभी तक इस भ्रम में
धन का हमारा तंत्र इतना उलझ गया है की आप वर्षो चिंतन कीजिये फिर भी वो सिरा नहीं खोज पाएँगे जहा से इसे सुलझाना शुरू किया जाए,बिलकुल स्वप्न वाली वो स्तिथि हो जाती है जिसमे एक मटका उठाओ तो दूसरा
कांग्रेस और विशेषतः उनके सबसे भ्रष्ट नेता माननीय दिग्विजय सिंह जी संभवतः अल्प्सख्यको के विषय में चिन्तन करते करते स्वयं बौद्धिक रूप से अल्पसंख्यक हो गए है और हिन्दू धर्म की किसी भी प्रकार की वास्तविकता अब उनकी चेतना में
स्वार्थी मत बनिए सिर्फ कुछ समय के लिए इस पर गौर करिए http://en.wikipedia.org/wiki/Dark_energy जरा इस चित्र को देखिये मे बिलकुल दिग्भ्रमित नहीं कर रहा अब जरा बुद्ध भगवान् के दर्शन को याद कीजिये यदि मेरी बात पे यकीं न हो
मेरा तर्क पूर्ण रूप से समाजवाद के सिद्धांत पे आधारित है,मैंने कई लोगो को दांत दिखा के हस्ते और कुंठा में इस सत्याग्रह का विरोध करते सुना है,न जाने ये उनके अन्दर का कौन सा शैतान है जो उन्हें इस