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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; अभिषेक कुमार सिंह</title>
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	<description>Daily news analysis , Hindi samachar ,Hindi magazine,Hindi website,a6V3sbK3z0d4m7JTOT6OQOVo1jQ</description>
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		<title>बूंदों का विश्वासघात</title>
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		<pubDate>Sun, 07 Mar 2010 07:09:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अभिषेक कुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[mothers day]]></category>
		<category><![CDATA[society]]></category>
		<category><![CDATA[आस्तिक]]></category>
		<category><![CDATA[नास्तिक]]></category>
		<category><![CDATA[भगवान का अस्तित्व]]></category>
		<category><![CDATA[मां की याद]]></category>

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		<description><![CDATA[मैं आस्तिक नहीं हूं न ही नास्तिक हूं। भगवान का अस्तित्व मेरे लिए सिर्फ मेरे डर को एक नया रूप देने का माध्यम है। मगर मैं भगवान को नहीं मानता, मगर उसके अस्तित्व को पूर्णतयाः नकार भी नहीं सकता हूं। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="size-medium wp-image-1928 alignleft" title="mothers-love-by-kolongi1" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/03/mothers-love-by-kolongi1-300x252.jpg" alt="" width="300" height="252" />मैं आस्तिक नहीं हूं न ही नास्तिक हूं। भगवान का अस्तित्व मेरे लिए सिर्फ मेरे डर को एक नया रूप देने का माध्यम है। मगर मैं भगवान को नहीं मानता, मगर उसके अस्तित्व को पूर्णतयाः नकार भी नहीं सकता हूं। भगवान है, क्यों है ? इसका जवाब भी मैं आपको दूंगा। मेरे लिए भगवान का अस्तित्व सिर्फ इसलिए है कि क्योंकि मुझे भी डर लगता है। कालेज के गेट के अंदर सभी का मानना है कि मुझमें भी कुछ बात है, मैं कुछ करूंगा। मगर मेरा मानना है कि नहीं, मैं कुछ नहीं, शायद कुछ भी नहीं कर पाऊंगा क्योंकि मुझे डर लगता है। मगर दोस्तो अभी मैं आपको अपने डर से नहीं बल्कि इस डर से बचने के साधन के बारे में बताना चाहूंगा। ‘‘मां की गोद’’ यकीन कीजिए अगर आपके पास यह साधन है तो दुनिया में कोई भी डर आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। इस दुनिया के बहुत सारे रंगों को मैंने बड़े नजदीक से देखा है, इसलिए मेरी बात पर यकीन कीजिए। अक्खी मुंबई पर राज करने वाले ‘‘वास्तव’’ के रघु भाई को जब ज़िंदगी में पहली बार डर लगा तो वो अपनी मां के गोद में जाकर छिप गये थे। रघु भाई ही क्यों, मुन्ना भाई M.B.B.S. भी तो अपनी मां की जादू की झप्पी के मिलते ही उनका डर चला जाता है। जब दिल्ली की चौड़ी सड़के, लम्बी-लम्बी और बड़ी-बड़ी गाडियां, ऊंचे-ऊचे बंगले और उन बंगलों के गेट के अंदर से झांकने वाले कुत्ते जब मुझे डरा देते है तो मुझे भी अपनी मां की याद आ जाती है। क्योंकि मेरी मां मेरे साथ नहीं रहती है, इसलिए मैं दुर्गा मां के पास चला जाता हूं। हालांकि वो मुझसे कुछ बोलती नहीं है न ही वो मुझे मेरी मां की तरह अपनी गोद में सुलाती है पर न जाने क्यों मुझे वो मेरी मां की तरह लगती है, इसलिए मैं उनके घर (मंदिर) पर चला जाता हूं। मैं उन्हें कोई भगवान मानकर उनके पास नहीं जाता हूं मैं तो उन्हें बस अपनी दूसरी मां मानता हूं इसलिये उनके पास चला जाता हूं। मेरे अपनों के सपनों का बोझ उठाये हुए मेरे ये पतले कंधे जब 4-6 महीनों में थक जाते हैं जो मुझे मेरी मां की याद आ जाती है और मैं उसके पास जाने की तैयारियां करने लगता हूं। जैसे:- कपड़े खरीदना, बाल कटवाना आदि। मैंने कभी इस बात को कभी स्वीकार नहीं किया है कि मुझे भी डर लगता है। इसलिए इन पन्नों पर अपनी स्वीकार करके मैं अपने मन को हल्का करने की कोशिश कर रहा हूँ। मन्नू भंडारी लिखित एक पुस्तक ‘‘आपका बंटी’’ पढ़ा था। उस वक्त मेरे आंखों से पानी की तीन-चार बूंदे गिरी थी। उन बूदों ने मुझसे विश्वासघात किया था और वो मेरे आज्ञा के बिना ही मेरे आँखों से बाहर आ गयी थी। इसकी सज़ा मैंने मुक्करर कर दी है। मैं उस पुस्तक को दुबारा पढुंगा और अपने आसुओं द्वारा किये गये विश्वासघात का बदला लूंगा मैं इस बार अपने अस्तित्व का नियंत्रण अपने दिमाग को दे दूंगा जिससे मेरी भावनायें मुझ पर हावी न हो सके। और मैं रोना चाहते हुए भी न रो सकूँ। अगर मैं स्वयं को नहीं रोक पाया तो मैं खुद को यह सजा उतनी बार दुंगा जब तक कि मैं अपनी सजा को सही मायनों में पूरा न सकूं। बंटी से मेरा एक अनाम रिश्ता बन गया है, मगर मैं उसके लिए सहानूभूति नहीं प्रकट कर सकता हूं, क्योंकि मुझे भी उसी सज़ा के लिए चुना गया जिस सजा के लिए बंटी को चुना गया था। बंटी से उसके मां की गोद को छिन लिया गया था और मुझसे भी मेरी मां की गोद को छिन लिया गया है। हालांकि दोनों के कारण अलग-अलग है मगर परिणाम एक है। मैं बंटी को यह तो कह सकता हूं कि मैं तुम्हारे दुःख को महसूस कर सकता हूं मगर उसके लिए सहानूभूति नहीं प्रकट कर सकता हूँ।</p>
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		<title>उसके दो उजले मासूम से पैर &#8230;</title>
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		<pubDate>Sat, 23 Jan 2010 12:54:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अभिषेक कुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[स्मृति-लेख]]></category>
		<category><![CDATA[धर्मवीर भारती]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[प्रेम कहानियां]]></category>

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		<description><![CDATA[पुस्तके पढ़ने का शौक कभी इतना भारी पढ़ेगा, सोचा भी नहीं था। प्रेम कथाओं को पढ़ने में बढ़ा ही आनन्द मिलता था। एक पुरसकुन की प्राप्ति होती है। ‘कसप’ पढ़ी थी तो बड़ा ही अच्छा लगा था, उस वक्त मैं ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>पुस्तके पढ़ने का शौक कभी इतना भारी पढ़ेगा, सोचा भी नहीं था। प्रेम कथाओं को पढ़ने में बढ़ा ही आनन्द मिलता था। एक पुरसकुन की प्राप्ति होती है। ‘कसप’ पढ़ी थी तो बड़ा ही अच्छा लगा था, उस वक्त मैं भी एक शादी से लौटा था और कुछ वैसे ही हादसे मेरे साथ हुए थे इसलिए मैं खुश था, मगर अंत न जाने क्यों, मुझे अच्छा नहीं लगा। शायद इसलिए की मैं भी सामान्य पाठकों की तरह ही प्रेमी-प्रेमिकाओं के मिलन को ही कहानियों  का अंत मानता हूँ  । यहाँ मैं आपकों एक बात स्पष्ट कर दूं  कि वास्तविक जीवन में मुझे प्रेम का व्यवहारिक ज्ञान था। मैंने कभी किसी के प्रति अपने प्रेम को इस हद तक गुज़रने ही नहीं दिया कि मैं उसके बिना जीने की कल्पना ही न कर सकूं । मैंने अपनी ज़िंदगी को एक रेलवे प्लेटफार्म की तरह माना था जिस पर हर रेलगाड़ी निश्चित समय पर आती थी और फिर निश्चित समय पर चली जाती थी। पता नहीं जाने वो कौन सी रेलगाड़ी होगी जिसका अंतिम स्टॉप  मैं होऊंगा। बहरहाल, मैं आपसे एक ऐसी ही पुस्तक की चर्चा करना चाहता हूँ जिसने मुझे एक बार ये भी अहसास दिलाया था कि मैं भी कमज़ोर हूँ आम आदमी की तरह। लोग चाहे जो माने, मैं चाहे खुद के बारे में जो भी सोचूं । मैं भी एक कमज़ोर इंसान हूँ जो भावनाओं और भावुकताओं में बंधा है। और उसमें बंधे रहना बहुत पसंद करता है। मेरे व्यक्तितव पर न जाने किस शक्ति का अधिकार है कि आंसुओं  ने तो साथ ही छोड़ दिया है। मगर फिर भी अगर आज कुछ आंसू  गिर जाते तो शायद मेरा अपराध बोध कम हो जाता, मैं भी देवत्व की प्राप्ति कर पाता। मैंने धर्मवीर भारती का उपन्यास ‘‘गुनाहों का देवता’’ पढ़ा । पहली बार अहसास हुआ की प्रेम भी होता है और वह पवित्र भी होता है। इस पुस्तक को पढ़कर मैं क्या समझा ये तो मैं आपको शायद नहीं बता सकता मगर इतना ज़रूर बता सकता हूँ  कि इस पुस्तक की समाप्ति ने मेरे अस्तित्व को इस कदर झिंझोड़ा है कि फिर कभी प्रेम कथा को पढ़ने से पहले दस बार ज़रूर सोचूंगा । अगर मेरे वश में रहा तो मैं उस पवित्र प्रेम की सौगंध खाकर कहता हूँ , मैं अब कभी किसी प्रेम कहानी को नहीं पढूंगा। इस पुस्तक से मेरा आर्कषण तो उस वक्त से बन गया था जब मित्रों द्वारा इसकी चर्चा सुनी थी, मगर पढ़ने का सौभाग्य अब जाकर प्राप्त हुआ था। <img src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/01/beautiful-feet-300x224.jpg" alt="" title="beautiful feet" width="300" height="224" class="alignleft size-medium wp-image-1433" /><br />
सुधा जैसी जादूगरनी का सारा जादू ‘‘उसके दो उजले मासूम से पैरों’’ में था। जो इतने मासूम थे कि चन्दन के अंदर का वासना से ग्रसित जानवर भी उन्हें देखकर पवित्र हो गया और फिर उसने अपने गुनाहों की श्रमा याचना भी की। चन्दन जिस तरह से उन पैरो से प्यार करता था शायद उसी प्यार ने मेरे जैसे जानवर से इन शब्दों को लिखवाया कि मैंने भी कभी उस प्यार की पूर्णता का अहसास किया है मगर अब नहीं करना चाहता हूँ । क्योंकि न तो मैं वो देवता हूँ  और न ही बनना चाहता हूँ । हाँ , कभी  उस स्वर्गलोक के देवता ने कभी मुझसे मेरी आखिरी इच्छा पूछी तो उन्हीं उजले पैरों पर अपना सिर रखकर उस चिरनिंद्रा में सोना चाहूंगा । </p>
]]></content:encoded>
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		<title>आवारा के संस्कार</title>
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		<pubDate>Sat, 09 Jan 2010 08:46:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अभिषेक कुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[युवा]]></category>
		<category><![CDATA[परिवेश का असर]]></category>
		<category><![CDATA[महानगरों की जिन्दगी]]></category>
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		<description><![CDATA[एक कस्बे से दिल्ली आया तो अपने माँ-बाप के सपनों के संग जो कुछ चीजे और मैं अपने साथ लाया था वो थे तहजीब और संस्कार । तहजीब को तो न जाने कॉलेज में किस भाव, किस-किस को कितना बेचा। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/01/Sochon_Pe_Jami-225x300.jpg" alt="" title="Sochon_Pe_Jami" width="225" height="300" class="aligncenter size-medium wp-image-1286" />एक कस्बे से दिल्ली आया तो अपने माँ-बाप के सपनों के संग जो कुछ चीजे और मैं अपने साथ लाया था वो थे तहजीब और संस्कार । तहजीब को तो न जाने कॉलेज में किस भाव, किस-किस को कितना बेचा। अब तो यह भी याद नहीं हैं अगर याद हैं तो बस इतना की कभी मैं भी संस्कारी होता था। पर अब तो मैं आवारा हूँ, एक आदर्श आवारा। इस दिल्ली ने मुझे दिया भी बहुत कुछ हैं मेरे सपने, मेरी ख़्वाहिशे और ऐसी ढेरों चीजें जो मेरी फ़ाकामस्ती में मैंने जुटाई हैं, सिर्फ अपने लिए। वो मेरी हैं, सिर्फ और सिर्फ मेरी। मगर एक वाक़या जिसने मुझे ये एहसास दिलवाया की मैंने अपने संस्कारों को भी ताक में रख दिया है। अगर आप मेरी माने तो यह काम मैंने जानबुझकर नहीं किया हैं, न ही इस काम में मेरी गलती कोई गलती हैं। अपने इस काम की नैतिक जिम्मेदारी मैंने दिल्ली की बसों को दिया है। जिन्होंने मुझे अपने संस्कारों को ताक में रखने पर मजबूर कर दिया। घर से कॉलेज तक के इन दो सालों के सफर में मेरी किस्मत ने कभीकभी इस भीड़ से ख़चाखच भरी बसों में भी सीट दिलवा दी थी। मगर मेरी किस्मत और संस्कारों का कभी भी टकराव नहीं हो पाया था। मगर जब तीसरे साल में उस वाक़ये ने मुझे ऐसी याद दी है, जिसने मेरे आलसी व्यक्तित्व को भी लिखने पर मज़बूर कर दिया। सर्दियों के मौसम आने के बाद भी ए.सी बसों में चलना मुझे अच्छा लगता था। ख़ासकर तब जब डीटीसी ने अपना किराया तिगुना कर दिया था। मुझे अपने पूरे जीवन में सबसे डरावनी चीज़ों में से एक चीज &#8216;भीड़’ लगती थी। न तो मैंने कभी भीड़ के साथ सड़क पार की थी, न ही मैं उस भीड़ के साथ मैं अपने कॉलेज के दो घण्टों के सफर में व्यवधान चाहता था। मगर इस भीड़ ने भी कसम खा रही थी &#8220;चाहे जो हो जाये इस मुए को तो चैन से नहीं रहने देना है।’’ कॉलेज के कैंटिन से लेकर बस की सीट तक हर जगह इस &#8216;भीड़’ ने मेरे इस पतले से शरीर को खुब थकाया था। बहरहाल ऐसे ही एक दिन जब मैं बस में चढ़ा और बिना मशक्कत के सीट पर आराम से आसान लगाया और फिर बस के आगे वाले हिस्से में एक खूबसूरत चेहेरे की तलाश करने लगा जिसे देखकर मैं ये दो  घंटे उस चेहरे की समीक्षा करते हुए निकाल दूँ। मैं एक बार फिर आपको ये बताना चाहुँगा कि मैं &#8220;आवारा’’ हूँ एक &#8221; आदर्श आवारा’’। खाली दिमाग रहना मेरे जैसे व्यक्ति के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं होता है। इसलिए मैं लोगों के चेहरे की समीक्षा करता रहता था। या फिर आप कह कहते हैं कि मैं भविष्य के एक फिल्म निर्देशक की हैसियत से अपने फिल्म के किरदारों को तलाशता रहता हूँ। क्योंकि इंसान की हकीकत तो हमें यहीं पर देखने को मिलती हैं। फिलहाल मैं ऐसे ही एक चेहरे की तलाश कर ही रहा था कि मैंने एक बूढ़े व्यक्ति को देखा जो खड़े थे, और भीड़ में अपनी जगह बनाने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे। मैं अपनी सीट से उठकर उन्हें बिठाना चाहता था। मैंने अपने मन को सीट से उठने के लिए पूरी तरह से तैयार कर लिया था। मेरे संस्कारों ने मेरे अस्तित्व पर अधिकार जमाने का प्रयास किया। लेकिन तभी अचानक मेंरे मस्तिष्क ने इसका विरोध किया और मैं बैठा रहा क्योंकि अभी बस ने मात्र 5 मीनट का सफर तय किया था। और मेरे गंतव्य तक पहुँचने में कम से कम 1.5 घण्टे लगने वाले थे। मैं बैचेन हो उठा था। मेरे संस्कारों ने मुझे धिक्कारना शुरू कर दिया था। मगर मैं हमेशा अपने दिमाग के आदेश का पालन करता हूँ। अब मैं खुद को उनकी निगाहों से बचाना चाहता था। क्योंकि अगर उनकी नज़र मेरी नज़र से टकरा जाती तो मैं अपनी सीट से खड़ा हो जाता जो मैं किसी भी कीमत पर करने को तैयार नहीं था। बहरहाल थोड़ी ही देर में मैंने देखा कि उन्हें &#8216;वरिष्ठ नागरिक’ वाली सीट मिल गई थी। मेरे मन का अपराध बोध कम तो हो गया मगर मेरे संस्कार रह -रह कर मुझे धिक्कार रहे थे .आख़िरकार परेशान होकर मैंने अपनी कलम से मेरे अपराध को स्वीकार किया . . . और उस वृद्ध व्यक्ति से क्षमा का अनुरोधी हुँ। हालांकि मेरे जैसे आवारा का ऐसा करना अपनी ही समझ से परे हो गया है &#8230;. </p>
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		<title>पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त</title>
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		<pubDate>Tue, 17 Nov 2009 03:44:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अभिषेक कुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[संसद मार्ग]]></category>

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		<description><![CDATA[विभिन्नताओं में एकता हमारे भारत की सबसे बड़ी विशेषता है। क्या यह विशेषता हमारे इस भारत की है? जिस भारत में बिहारी-मराठी, तो कभी हिन्दी-मराठी , तो कभी मध्य प्रदेश और बिहार के बीच में शीत युद्ध होता है। यह ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">
	विभिन्नताओं में एकता हमारे भारत की सबसे बड़ी विशेषता है। क्या यह विशेषता हमारे इस भारत की है? जिस भारत में बिहारी-मराठी, तो कभी हिन्दी-मराठी , तो कभी मध्य प्रदेश और बिहार के बीच में शीत युद्ध होता है। यह विरोध सिर्फ शीत युद्ध तक ही सीमित नहीं होता है। यह युद्ध हमें भविष्य में होने वाले नुकसान के कुछ नमूने हमारे समक्ष प्रस्तुत कर देता है। और हमें यह कहता है कि ये तो सिर्फ ट्रेलर है, पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!। <br />
	<a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/Hindi.png"><img alt="Hindi" class="aligncenter size-medium wp-image-1113" height="169" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/Hindi-300x169.png" title="Hindi" width="300" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">महाराष्ट्र के हालात तो सर्वाधिक खतरनाक&nbsp; है। कभी दंगों में बिहारियों को मारा जाता है तो कभी उन्हें भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। नस्लवाद, भाषावाद को लेकर रोज़ ठगा जा रहा है हमारे देश का एक तबका। बात सिर्फ एक तबके की नहीं यह बात हमारे भारत की अखण्डता पर एक प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहा है। जिसकी तरफ हमारे देश के नेताओं का कोई ख़ास ध्यान नहीं है? एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारा मीडिया भी क्षेत्रवाद के प्रभाव से अछूता नहीं हमारे मीडिया में भी पहाड़ी और बिहारी इन दोनों समुदाय के लोगों में लॉबिंग और शीत युद्ध का काम निरंतर चलता है। यह एक यक्ष प्रश्न है कि जिस देश का मीडिया भी क्षेत्रवाद की समस्या से जुझ रहा है क्या वो मीडिया सही ख़बर जनता को प्रस्तुत कर पायेगा? क्षेत्रवाद&nbsp; और भाषावाद हमारे देश के लिए एड्स की समस्या के समान है। एड्स जैसे बीमार व्यक्ति के शरीर को खोखला बना देता है। ठीक उसी प्रकार ये&nbsp; समस्याएं&nbsp; भी हमारे देश को खोखला बनाने की कोशिश करती परिलक्षित हो रही है। राजठाकरे समर्थित विधायकों का सदन में सपा विधायक अबू हाशिम आजमी के ऊपर हाथ उठाने का मामला व्यक्तिगत न होकर संपूर्ण भारत की हिन्दी मानसिकता पर प्रहार करने के समान था। राज ठाकरे तो हिन्दी और हिन्दी प्रदेशवासियों के विरोध को लेकर मीडिया की सुर्खियों में बने रहते हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान भी बिहार वासियों का विरोध करते हुए देखे गये । मगर हमारे देश में राजनेताओं को एक ख़ास शिक्षा दी जाती है जिसमें उन्हें यह सिखाया जाता है कि&nbsp; अपनी बात से किस प्रकार मुकर जाये, और शिवराज चौहान एक अच्छे राजनेता है !&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/lwh1tbpzyssd324l_D0_MI_MARATHI_386691952.jpg"><img alt="lwh1tbpzyssd324l_D0_MI_MARATHI_386691952" class="aligncenter size-medium wp-image-1114" height="224" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/lwh1tbpzyssd324l_D0_MI_MARATHI_386691952-300x224.jpg" title="lwh1tbpzyssd324l_D0_MI_MARATHI_386691952" width="300" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">सरदार पटेल को भारत के एकीकरण में बहुत समय लगा था मगर फिर भी वो भारत को सही मायने में नहीं कर पाये। अभी हमारे दक्षिण में तमिल समुदाय हिन्दी को दरकिनार करता नज़र आता है। आज कल हिन्दी समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने हिन्दी के वर्चस्व को बढाया&nbsp; है। 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मानकर हम खुद को संतुष्ट कर लेते हैं कि हमने हिन्दी भाषा के लिए बहुत बड़ा काम कर दिया। मगर ज़मीनी हक़ीकत कुछ और है, आज भी देश में अपने स्थानीय&nbsp; भाषाओं से ज्यादा लगाव है। क्षेत्रिय भाषा से लगाव ने लोगों में एक क्षेत्रियता की भावना को बढाया है, जो देश के लिए ख़तरनाक है। क्योंकि ये क्षेत्रियता हमें हमारे राष्ट्रवाद की भावना पर हावी रहता है। और हम अपने देश के प्रति होने वाली अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाने की कोशिश करने लगते हैं। इस कोशिश में हम या तो क्षेत्रवाद को ब़ाते हैं या फिर भाषावाद को। और खुद को सुरक्षित करने के प्रयास में लग जाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>तलाश पहचान की</title>
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		<pubDate>Sat, 14 Nov 2009 14:26:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अभिषेक कुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[युवा]]></category>
		<category><![CDATA[पहचान की तलाश]]></category>
		<category><![CDATA[समाज और युवा]]></category>
		<category><![CDATA[हिंसक विचार]]></category>

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		<description><![CDATA[हर साल की तरह इस साल भी तालिमी मेला आया और हमारे कुछ यादों को हमारे दिलों में छोड़ गया। ये यादे हमें कब तक याद रहेंगी ये तो कहा नहीं जा सकता है। मगर इन यादों के ख़जाने में ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">
	<a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/SuperStock_1444R-261041.jpg"><img alt="SuperStock_1444R-261041" class="aligncenter size-medium wp-image-1096" height="300" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/SuperStock_1444R-261041-199x300.jpg" title="SuperStock_1444R-261041" width="199" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">हर साल की तरह इस साल भी तालिमी मेला आया और हमारे कुछ यादों को हमारे दिलों में छोड़ गया। ये यादे हमें कब तक याद रहेंगी ये तो कहा नहीं जा सकता है। मगर इन यादों के ख़जाने में एक ऐसी घटना है जो शायद ही कभी भुलाई जा सके। वो घटना कुछ इस प्रकार है कि विश्वविद्यालय के प्रांगण में विश्वविद्यालय का एक पूर्व छात्र अहसान (काल्पनिक नाम) आता है और कहता है&nbsp; &quot;जामिया वाले मुझे भुलना चाहते हैं मगर मैं इन्हें खुद को भुलाने नहीं दुँगा&rsquo;&rsquo; और वो तीनचार हवाई फायर करता है। यह घटना अपने आप में एक अद्भुत घटना है। मगर इस घटना का कारण हमारे समाज के युवाओं के एक बहुत बड़ी सच्चाई को हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है। और हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि आख़िर इसका जिम्मेदार कौन है? आमिर खान की बहुचर्चित फिल्म &rsquo;&rsquo;रंग दे बसंती&rsquo;&rsquo;में उन्होंने एक डायलॉग दिया कि यूनिवसर्टी के इस गेट के अंदर डीजे की एक औकात है। सब कहते हैं डीजे में कुछ बात है, डीजे कुछ करेगा। मगर इस गेट के बाहर न जाने कितने डीजे पीस गए है दुनिया की भीड़ में।&rsquo;&rsquo; । फिल्म में जितना प्रासंगिक ये बात थी ठीक उतनी ये आज पूरे विश्व के लिए है। कॉलेज गेट के अंदर अपने गु्रप के अंदर हर लड़के की एक पहचान होती है। मगर वहीं लड़का जब कॉलेज गेट को पार करके इस दुनिया की भीड़ में आता है और मगर वो इस भीड़ में अपनी एक पहचान कायम नहीं कर पाता है तो उसके अंदर ही अंदर एक विदु्रप जन्म लेने लगता है। ऐसी स्थिति में वह या तो&nbsp; खुद को नुकसान पहुँचा लेता हैं या फिर उस जगह वापस पहुँच जाता है। जहाँ उसकी पहचान थी। अगर विज्ञान के आधार पर देखे तो वैज्ञानिकों का मानना है कि कुद लड़के अपनी छवि को लेकर कुछ ज्यादा संवेदनशील होता&nbsp; हैं, या उन्हें अपनी एक अलग पहचान चाहिए होती है। और अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो वे हिसंक हो जाते हैं। इसे हम असामान्य व्यवहार कहा जा सकता है। यह कहानी सिर्फ उस अहसान की ही नहीं है बल्कि हमारे जैसे उन हजारों &#8211; लाखों लोगों की है जो अपनी पहचान बनाने के लिए इस दुनिया से जद्दोजहद कर रहे हैं। यह घटना हमारे लिए सिर्फ घटना ही नहीं बन पाई क्योंकि मैं भी अहसान से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता हूँ। बहरहाल अब इन बातों को छोड़कर हमें इस बात की दुआ करनी चाहिए की अहसान इस भीड़ में खोने की बजाय अपनी एक पहचान बना पाएं। </p>
]]></content:encoded>
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		<title>मन्ना डे को 2007 का दादा साहब फाल्के पुरूस्कार</title>
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		<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 13:42:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अभिषेक कुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[सिनेमा-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[bollywood]]></category>
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		<category><![CDATA[मन्ना डे]]></category>
		<category><![CDATA[साहब फाल्के पुरूस्कार]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[भारतीय सिनेमा में अपने आवाज़ से जीवनपर्यंत ही किवदंती बन चुके मन्ना डे को 2007 का दादा साहब फाल्के पुरूस्कार देने की घोषणा की गई है। सूचना व प्रसारण मंत्रालय के नज़दीकी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस हफ्ते ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">
<img width="130" height="130" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/manna.jpg" alt="" /> भारतीय सिनेमा में अपने आवाज़ से जीवनपर्यंत ही किवदंती बन चुके मन्ना डे को 2007 का दादा साहब फाल्के पुरूस्कार देने की घोषणा की गई है। सूचना व प्रसारण मंत्रालय के नज़दीकी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस हफ्ते पांच सदस्यों वाली एक समिति ने मन्ना दा का नाम इस पुरूस्कार के लिए सुनिश्चित किया। <br />
मन्ना डे भारतीय सिनेमा के बेहतरीन प्लेयबैक गायकों में से एक है। मुकेश, रफी, हेमंत कुमार, तलत महमूद, किशोर कुमार जैसे पाश्र्व गायकों के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाना बड़ा ही मुश्किल काम था। मगर मन्ना डे एक ऐसे अनूठे गायक थे जो किसी एक कलाकार की आवाज़ बनने के बजाए उन्होंने सबके लिए अपने अनूठे अंदाज में गाना गाया था। अपने इसी अनूठे अंदाज के कारण ही मन्ना डे संगीत के इन महान हस्तियों के दौर में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने में कामयाब रहें, और अपने आप को जीवित ही किवदंती बना डाला। बॉलीवुड़ संगीत में उनकी बादशाहत 1950 से 1970 तक रही थी। मन्ना डे ने कई सदाबहार गाने गाये हैं। इन गानों की फेहरिस्त तो काफी लम्बी हैं, क्योंकि मन्ना डे ने अभी तक 3500 गाने गाए हैं। मगर कुछ गाने ऐसे जो उनके नाम के साथ ही जु़बान पर चले आते हैं। इनमें ॔॔ऐ मेरी जोहरा जबी तुम्हें मालूम नहीं, तू अभी तक है हंसी और मैं जवान&rsquo;&rsquo; और ॔मेरे साजन है उस पार&rsquo;&rsquo; का नाम प्रमुख है। <br />
जिस समय उन्हें दादा साहब फाल्के अवार्ड से सम्मानित करने की घोषणा की गई उस समय में वे न्यू यॉर्क में एक कल्चरल शो में शिरकत करने गये थे। 90 वर्ष के आयु में भी मन्ना दा के अंदर एक अलग ही जोश है जो शायद संगीत साधना का ही नतीजा है। क्योंकि शास्त्रीय संगीत जीवन में आन्नद की अनूभूति करवाता है और मनुष्य को एक लम्बी आयु प्रदान करता है। जीवन के इस पायदान पर भी मन्ना डे प्रतिदिन क्लासीकल संगीत का रियाज करते हैं। <br />
मन्ना डे को यह सम्मान मिलने से सिनेमा जगत में एक अलग ही चहलपहल देखने को मिली। फिल्म बिरादरी में खुशी और नाराज़गी का मिलाजुला माहौल देखने को मिला। लोगों में इस बात को लेकर नाराज़गी थी कि उन्हें यह सम्मान बहुत देर से दिया जा रहा है। मशहूर संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांतप्यारेलाल के प्यारेलाल का कहना था कि ॔॔मुझे यह ख़बर सुनकर बहुत अच्छा लगा, लेकिन मेरे ख़्याल से उन्हें यह सम्मान बहुत देर से मिला है।&rsquo;&rsquo; पाश्र्व गायिका कविता कृष्णमूर्ति का कहना है कि ॔॔यह सम्मान उन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए क्योंकि वे उन संगीताकारों में से एक है जिन्होंने आम जनता को क्लासिकल म्यूजिक का आनंद लेना सिखाया है। पाश्र्व गायक अभीजीत और म्यूजिक डायरेक्टर अन्नू मलिक ने भी कुछ ऐसा ही कहा। अभीजीत ने मन्ना डे को संगीत का द्रोणाचार्य बताया तो अन्नू मलिक ने उन्हें एक महान कलाकार और एक अच्छा इंसान बताया है। उन्होंने साथ में यह भी कहा कि मन्ना दा ने मुझे और मेरे जैसे उभरते कई युवा संगीतकारों के हौसले अफ्जाई किये है।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>आस्तीन का सांप बन गया मोबाइल</title>
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		<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 11:24:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अभिषेक कुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
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		<description><![CDATA[&#34;टन टन आ आ, आ जा गुलक को फोड़े&#8217;&#8217; यार! है तेरे मोबाईल में ये गाना, प्लीज ब्लूटूथ से सैंड कर ना।&#8217;&#8217; यह&#160;किस्सा हंसराज कॉलेज के छात्र नीतिन और अमन का है। ऐसे कई वाकये हमारी ज़िदगी में आमतौर पर ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="line-height: 150%; text-align: justify;" class="MsoBodyText"><span style="font-family: Mangal;"><o:p></o:p></span><span style="font-family: Mangal;"><img width="130" height="130" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/Technology_Anurag-Main.jpg" alt="" /></span><span style="font-family: Mangal;"><o:p> </o:p></span><span style="font-family: Mangal;"><o:p>&quot;टन टन </o:p></span><span style="font-family: Mangal;"><o:p>आ आ, आ जा गुलक को फोड़े&rsquo;&rsquo; यार! है तेरे मोबाईल में ये गाना, प्लीज ब्लूटूथ से सैंड कर ना।&rsquo;&rsquo; यह&nbsp;किस्सा हंसराज कॉलेज के छात्र नीतिन और अमन का है। ऐसे क</o:p></span><span style="font-family: Mangal;"><o:p>ई वाकये हमारी ज़िदगी में आमतौर पर घटित होते हैं, मगर हम इन पर ध्यान नहीं दे</o:p></span><span style="font-family: Mangal;"><o:p>ते हैं क्योंकि यह हमारी ज़िदगी का एक हिस्सा बन गये हैं। अगर हम भारत के इस संचार क्रांति युग से थोड़ा पीछे हरित क्रांति के युग में जाकर सोचे कि क्या इस तरह कल्पनाएँ उस समय लोगों द्वारा की जा सकती थी। जी हाँ, आज का यह संचार&nbsp; आधारित युग तत्कालीन समाज की कल्पना का ही प्रतिफल है।&nbsp;</o:p></span></p>
<p style="line-height: 150%; text-align: justify;" class="MsoBodyText"><span style="font-family: Mangal;"><o:p>संचार क्रांति ने हमें चूहे की आकृति का ऐसा दोस्त दिया है जिसके बगैर अब जीवन के बारे में सोचना&nbsp; भी मुमकिन नहीं है। जी हाँ, अब तो आप समझ ही</o:p></span><span style="font-family: Mangal;"><o:p> गये होंगे कि यह चूहे की आकृति का हमारा दोस्त कोई और नहीं बल्कि हमारा मोबाइल फोन है। जिसने आज हमारे बीच की दूरियाँ को केवल कम ही नहीं किया, बल्कि हमें हर वक़्त एकदूसरे से जोड़े रखता है। यकीन मानिए इस मोबाइल फोन का संग ठीक &quot;दोस्ती&quot; फिल्म के अंधे -लंगड़े और &quot;शोले&quot; के जय-वीरू की दोस्ती को भी मात दे सकता है। मोबाइल जहाँ हमारे लिए एक प्यारा दोस्त है वहीं दूसरी तरफ यह उतना ही ख़तरनाक दुश्मन भी है। कॉलेज गर्ल नेहा की कुछ आपित्तजनक तस्वीरे इंटरनेट और दोस्तों के मोबाईल फोन पर मिली तो वो हैरान हो गई। मगर जल्द ही उसे याद आ गया कि यह तस्वीरे उसके पुराने प्रेमी ने अपने मोबाईल फोन से खिंची थी। इस तरह की घटनाओं से समाचार पत्र और न्यूज चनैल सरोबार नज़र आते हैं। आज आंतकवादियों, बड़े</o:p></span><span style="font-family: Mangal;"><o:p>बड़े माफियाओं से लेकर गली के गुड़े तक भी अलगअलग नम्बरों का प्रयोग कर लोगों को धमकाते हैं और अपने कारनामों को अंजाम तक पहुँचाते हैं। आज हर प्रकार की गतिविधी में मोबाईल का फोन का एक अहम् भूमिका अनिवार्य रूप में होती है। सर्वविदित निठारी कांड और आरूषि तलवार हत्याकांड में भी मोबाईल फोन के सहारे ही गुनहगारों को गिरफ्तार किया गया था। कुछ</o:p></span><span style="font-family: Mangal;"><o:p> चालाक छात्र इसका प्रयोग परीक्षा में नकल करने के लिए करते हैं तो कुछ लड़कियों को अलग-अलग नम्बरों से फोन करके परेशान करते हैं। यह सारे कारनामे भी मोबाईल फोन के मदद ही किये जाते हैं।&nbsp;&nbsp;</o:p></span></p>
<p style="line-height: 150%; text-align: justify;" class="MsoBodyText"><span style="font-family: Mangal;"><o:p>मोबाईल फोन के कुछ ऐसे अनचाहे शारीरिक नुकसान हैं जिन्हें आप चाहकर भी रोक नहीं सकते हैं। कुछ दिनों पहले एक कैंसर रिसर्च इंस्टीटयूट के विशेषज्ञों की टीम ने घोषणा की थी कि मोबाइल का ज़रूरत से ज्यादा इस्तेमाल&nbsp; का कारण बन सकता है। इस संबंध में यूनिवर्सटी ऑफ पिट्सबर्ग कैंसर इंस्टीटयूट के डायरेक्टर डॉ. रोनाल्ड हर्बरमैंन ने अपने ही कर्मचारियों को एक संदेश भेजकर इस बात की जानकारी दी और उन्हें बेवजह मोबाइल इस्तेमाल करने से मना किया है। इस संबंध में  शोधकर्ताओं द्वारा 10 सूत्री सलाह पेश की गई है। इसमें कहा गया है कि बच्चों को बहुत ज़्यादा ज़रूरी होने पर ही मोबाइल का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि मोबाइल से निकलने वाला इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन उनके ब्रेन टिश्यू को जल्दी प्रभावित करता है। इसके अलावा जहाँ तक संभव हो मोबाइल को अपने शरीर के करीब नहीं रखना चाहिए, खासतौर से सोते वक्त। मोबाइल को चार्जिंग में लगाकर कभी भी बात नहीं करनी चाहिए। मोबाइल को सिर की मदद से कंधे पर दबा कर लगातार बात करने से गर्दन में कई परेशानियाँ पैदा हो सकती है। <br />
लिहाजा यह कहा जा सकता है कि मोबाइल को लेकर इंसान की हालात ठीक उस तरह की हो गई है कि मोबाइल आस्तीन में छुपे उस सांप की तरह है जो दिखाई नहीं देता है। आजकल मोबाइल से किये जाने वाले प्यार ने इंसान को उस दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ आगे कुआँ और पीछे खाई है। <br />
</o:p></span></p>
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		<title>बुकनान फिर से मीडिया की सुर्खियों में</title>
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		<pubDate>Sat, 11 Jul 2009 10:51:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अभिषेक कुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल-कूद]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>
		<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[हमारे यहाँ एक कहावत है जिसके अनुसार जो काम से बड़ा नही हो पता वो केवल मुह से बडा बनने की कोशिश करता है. लगता है जौन बुकनान भी आज कल कुछ ऐसा ही कर रहे है या फिर उन ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_PHwnTWAZTQ8/Slgox5U2vxI/AAAAAAAAACI/Kg1eEXy4o0E/s320/kk.jpg" alt="" style="margin: 0px auto 10px; display: block; width: 222px; height: 320px; text-align: center;" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5357076594424200978" /></p>
<div>हमारे यहाँ एक कहावत है जिसके अनुसार <strong>जो काम से बड़ा नही हो पता वो केवल मुह से बडा बनने की कोशिश करता है.</strong>  लगता है जौन बुकनान भी आज कल कुछ ऐसा ही कर रहे है या फिर उन पर उनकी उम्र का प्रभाव कुछ जायदा ही असर दिखा रहा है. बुकनान सचिन और युवराज जैसे खिलाडियों पर अपनी कलम को लगातार घिस रहे है और उन्हें निम्नस्तर का खिलाडी घोषित करने के लिए प्रयासरत है. मगर वो इस बात को दरकिनार करने की कोशिश कर रहे है की सचिन जो की आज विश्व क्रिकेट का पर्याय बन चुके है तो युवराज अभी आई सी सी की रैंकिंग में नम्बर २ पर काबिज़ है. लगता है बुकनान अपनी घरेलू टीम के भविष्य को लेकर कुछ जयादा ही चिंतित है इस कारण २०-२० क्रिकेट में (जो की बुकनान के अनुसार भविष्य में क्रिकेट का सबसे अच्हा फॉर्म होगा) भारत के बढ़ते वर्चस्व से कुछ जय्दा ही चिंतित नज़र आने लगे है. या फिर उन्हें राखी सावंत की तरह मीडिया में बने रहने का भुत सवार हो गया है. तभी तो वो ऐसे शख्सओ पर अपनी टिप्निया करते है जो मीडिया में चर्चित है. ताकि वो भी जल्दी ही फेम हासिल कर ले. वैसे मई बुकनान साहब को एक सलाह देना चाहूँगा की <strong><span style="font-size: 130%;">फकत साहब इन हसीनो (मीडिया) से दूर की सलामत ही अच्छी न इनकी दोस्ती अच्छी न इनकी दुश्मनी अच्छी..</p>
<p></span></strong></div>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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