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2012/04/26 12:22 am
कोलकाता से गंगानंद झा आज का युवा दुनिया को बदलने का आभास देनेवाले सैद्धान्तिक बदलावों से उत्साहित नहीं हुआ करता। वे प्रारम्भ से ही बूढ़े रहा करते हैं, अधिक भौतिक लक्ष्यों की उपलब्धि के लिए परिपक्व ढंग से अपने विकल्पों
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2012/02/13 4:24 pm
ऐसा बताया जाता रहा है कि बढ़ते हुए परिवर्द्धन के साथ-साथ अभाव की स्थिति में कमी आती जाएगी तथा अन्त में विश्व के हर कोने से गरीबी समाप्त हो जाएगी। परिवर्द्धन (Development) और गरीबी के बीच विलोमानुपाती सम्बन्ध समझा जाता
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2012/02/07 1:29 am
आज के भारत के परिप्रेक्ष्य में भाषा के संस्कृति के साथ अन्योन्याश्रयी रिश्ते पर कुछ और बात की जाए। आज के काल-खण्ड में हमारे लिए यह रिश्ता तीव्र तनाव से दो-चार हो रहा है। मानविकीविद् बतलाते हैं कि मनुष्य के
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2012/01/22 3:25 pm
सजीव कोशिका जीवन की इकाई होती है तथा इसका अन्तर्निहित पदार्थ जीवन का भौतिक आधार हुआ करता है। कोशिका एक जटिल तंत्र (system) होती है । जब हम जीवित कोशिका में झाँकना तय करते हैं तो ‘सूक्ष्म में विराट के
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2011/11/16 8:48 pm
हिन्दी की प्रासंगिकता कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए जनजीवन में हिन्दी की स्थिति की बात करते हुए दुष्यन्त कुमार की गजल की ये पंक्तियाँ मर्मान्तक रूप में प्रासंगिक
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2011/10/10 6:57 pm
शारीरिक अक्षमता के कारण अनेको औरतें सहज रूप से गर्भधारण और सन्तानोत्पत्ति में असमर्थ रहती हैं। सन्तान के अभाव को लोग गोद लेकर पूरी करते रहे हैं। पर उनमें अकसर अपने जीन्स को धारण करनेवाली सन्तान न होने की कसक
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2011/09/26 5:19 pm
परिवार की हमारी पारम्परिक अवधारणा और संरचना को आधुनिकता के ज्वार के कारण काफी तनाव का सामना करना पड रहा है । मनुष्य एक ही साथ व्यक्ति तथा समूह के अवयव की सत्ता रखा करता है । हमारी परम्परा में परिवार
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2011/09/17 10:48 pm
आदमी ने आवास को मकान बनाया, फिर मकान को घर बनाया । घर बनने के साथ घर की खबरदारी करने वाली सत्ता गृहिणी के रुप में उभड़ी । पुरुष-सत्ता और नारी-सत्ता की सीमाएँ निर्द्धारित हुईं । पुरुष रोटी कमाता और
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2011/09/05 5:43 pm
आज शिक्षक दिवस है। मैं प्रोफेसर मुखर्जी को स्मरण कर रहा हूँ। उन दिनों शिक्षक दिवस नहीं हुआ करता था। लोग अपनी किसीके प्रति अपनी व्यक्तिगत कृतज्ञता और श्रद्धा की भावनाओं को अभिव्यक्त करने में सहज संकोच अनुभव करते थे।
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2011/09/04 8:00 pm
मूल्य-बोध धारण किए रहने वालों को इसकी कीमत चुकानी पड़ती रहती है, इसलिए उनका जीना और भी अधिक कठिन हो जाया करता है। हमारे पिता के जीवन में कठिनाइयों का अभाव कभी भी नहीं रहा ; मरना भी सहज और यन्त्रणा-रहित