मित्रों,काफी दिन पहले मैंने प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित होनेवाली मासिक पत्रिका बाल भारती में एक बाल कहानी पढ़ी थी। एक राज्य में वयोवृद्ध राजा की मृत्यु के बाद उसका युवा पुत्र राजा बना। वह बड़ा दानी और दयालु था। दोनों हाथों से दान करता। उसके राज्य में कोई भी दुःखी नहीं था सिवाय वृद्ध मंत्री के। धीरे-धीरे खजाने में राजस्व वसूली घटने लगी और खजाना खाली हो गया। दुःखी राजा ने मंत्री से →आगे पढ़ें .. आत्मघाती है केंद्र सरकार की खैराती अर्थनीति
मित्रों,काफी दिन पहले मैंने प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित होनेवाली मासिक पत्रिका बाल भारती में एक बाल कहानी पढ़ी थी। एक राज्य में वयोवृद्ध राजा की मृत्यु के बाद उसका युवा पुत्र राजा बना। वह बड़ा दानी और दयालु था। दोनों हाथों से दान करता। उसके राज्य में कोई भी दुःखी नहीं था सिवाय वृद्ध मंत्री के। धीरे-धीरे खजाने में राजस्व वसूली घटने लगी और खजाना खाली हो गया। दुःखी राजा ने मंत्री से →आगे पढ़ें ..





मित्रों,साहित्य के लिए वर्ष 1953 के नोबेल पुरस्कार विजेता और ब्रिटेन के कथित महानतम प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय भारत को आजादी देने की मांग को यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि भारत के लोग अभी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि वे देश और आजादी को संभाल सकें। तब से न जाने कितनी बार खासकर चुनावों के बाद मैं खुद अपने देश के महानतम् बुद्धिजीवियों को यह लिखते-कहते हुए देख चुका
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