महादलित मंत्री का दलित नौकर से पशुतापूर्ण व्यवहार
1मित्रों, कहने को तो बिहार जातीय राजनीति को 7 साल पीछे छोड़कर विकास की राजनीति के मार्ग पर चल पड़ा है लेकिन वास्तव में यह कथन एक अर्द्धसत्य मात्र है. पूरा सच यह है कि कहीं-न-कहीं आज भी जातीय वोटबैंक
मित्रों, कहने को तो बिहार जातीय राजनीति को 7 साल पीछे छोड़कर विकास की राजनीति के मार्ग पर चल पड़ा है लेकिन वास्तव में यह कथन एक अर्द्धसत्य मात्र है. पूरा सच यह है कि कहीं-न-कहीं आज भी जातीय वोटबैंक
मित्रों, ममता बहुत ही महान शब्द है, महान भाव है और महान अनुभूति तो है ही. परन्तु इस आलेख में हम जिस ममता का नीर-क्षीर-विश्लेषण करने बैठे हैं वह ममता शब्द नहीं ईन्सान है, भारत की एक महान नेता है.
मित्रों, किसी भी सभ्य और लोकतान्त्रिक राष्ट्र की आधारशिला यह है कि वह अपने नागरिकों में लिंग, धर्म, जाति, आर्थिक स्थिति आदि के आधार पर बिना किसी भेदभाव के सबके साथ समान व्यवहार करे. वास्तव में राज्य द्वारा नागरिकों से
मित्रों, भारत में अबसे कुछ ही सप्ताह बाद राष्ट्रपति चुनाव की सरगर्मी शुरू होनेवाली है. कुछ दूर की सोंच रखनेवाले पत्रकारों ने इस बात पर बहस शुरू कर भी दी है कि भारत का अगला राष्ट्रपति कैसा होना चाहिए. किसको
मित्रों, इसे हम अपनी सुविधानुसार भारतीय प्रजातंत्र की विशेषता कहें या विडम्बना; आजादी के बाद से ही सामूहिक नेतृत्व के स्थान पर इसकी प्रीति व्यक्तिपूजा के प्रति कुछ नहीं बल्कि बहुत ज्यादा रही है. जैसा कि आप सब भी जानते
मानवता के गुनाहगार स्त्रीरोग विशेषज्ञ मित्रों, आपको भी पता है कि हमारे देश में धर्मयुग कई दशक पहले धर्मयुग का प्रकाशन बंद होने के पहले ही समाप्त हो चुका था फिर भी धर्मरूपी गाय का एक पैर अब भी सही-सलामत था.
मित्रों, कुछ लोगों की आदत होती है कि करते बहुत कम हैं लेकिन ढोल बहुत ज्यादा का पीटते हैं और कुछ इसी तरह की आदत से ग्रस्त हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार. उनके शासनकाल में कुछ क्षेत्रों में सुधार
मित्रों, श्याम बेनेगल हमारे देश का एक ऐसा नाम है जिसके कान में पड़ते ही हमारे दिमाग में एक ऐसे क्रान्तिकारी संस्कृतिकर्मी की छवि बनने लगती है जिसने भारतीय सिनेमा की दशा और दिशा को ही बदल कर रख दिया.
एक कहानी याद आ रही है | दुर्भाग्यवश एक बार किसी बन्दर के हाथ नारियल पड़ गया. बन्दर ने उससे पहले नारियल को न देखा और न सुना था इसलिए जबरदस्त फेरे में पड़ गया. इसका वो करे तो क्या
मित्रों, भारतीय संविधान में कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका तीनों के कार्यों का स्पष्ट बंटवारा किया गया है.इनमें से कानून और व्यवस्था को बनाए रखना कार्यपालिका की जिम्मेदारी है.लेकिन जब कार्यपालिका पूरी तरह से बेकार और निष्क्रिय को जाए तो? तब