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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; भुवन भास्कर</title>
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		<title>हर दिन लग रहा है कांग्रेस का आपातकाल</title>
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		<pubDate>Tue, 22 Jun 2010 11:06:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>भुवन भास्कर</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="aligncenter size-medium wp-image-3852" title="bhopal gas tragedy" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/bhopal-gas-tragedy2-300x253.jpg" alt="" width="300" height="253" />आडवाणी का कहना है कि एंडरसन को भारत से भगाना आपातकाल जैसी घटना थी। उन्होंने इस सूची में एक तीसरी घटना को भी शामिल किया है- इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में हुआ सिक्खों का सामूहिक नरसंहार। सूची पूरी हो गई। लेकिन क्या सचमुच पूरी हो गई? आपातकाल में बुराई क्या थी? मेरी जैसी जिस पीढ़ी ने उन ढाई सालों को महसूस नहीं किया है, झेला नहीं है, उसके लिए यह समझना बहुत मुश्किल है। इसलिए कि हम कहीं आपातकाल का इतिहास नहीं पढ़ते। आज़ादी के दौरान हुए अत्याचारों को तो हम फिर भी जानते हैं, लेकिन आपातकाल के दौरान क्या हुआ, हमें नहीं पता। अगर ग़ैर कांग्रेसी नेताओं के भाषणों और कुलदीप नैयर जैसे कुछ पत्रकारों को छोड़ दें, तो कभी कोई आपातकाल की विभीषिका के बारे में नहीं बताता। लगता है जैसे, देश को आपातकाल से कोई परेशानी नहीं थी, कोई नुकसान नहीं था। क्या यही सच है? उलटे हमारी पीढ़ी के लोगों को तो बहुत बार यही बताया जाता है कि उस समय ट्रेनें बिलकुल समय पर चलती थीं और भ्रष्टाचार लगभग ख़त्म हो चुका था। तो क्या सचमुच आपातकाल देश का एक ऐसा स्वर्णकाल था, जिसमें नेताओं और पत्रकारों को छोड़ कर किसी को कोई तकलीफ नहीं थी।</p>
<p style="text-align: justify;">मुझे लगता है इसका जवाब &#8216;हां&#8217; में होना चाहिए। भारत में आम जनता बिलकुल ही आम है। उसका सिद्धांत वाक्य है- कोउ नृप होए हमें का हानि। डॉक्टर को अपनी क्लिनिक चलने से मतलब है, इंजीनियर को अच्छी सैलेरी वाली नौकरी से मतलब है, दुकानदार को अपनी दुकान चलने से मतलब है और अब तो पत्रकार को भी खूब चमक-दमक वाले और ऊंचे वेतन के करियर से ही मतलब रह गया है। यही कारण है कि समाज का आम इंसान आपातकाल को किसी डरावने सपने की तरह याद नहीं करता। लेकिन मेरी व्यक्तिगत समझदारी यह है कि आपातकाल ने आम लोगों को जितना नुकसान पहुंचाया, उतना किसी को नहीं। आपातकाल ने इस पूरे देश की नसों में एचआईवी के ऐसे कीटाणु छोड़े, जो सालों निष्क्रिय रहने के बाद अपना असर दिखा रहे हैं। आपातकाल भले ही ढाई साल में खत्म हो गया हो, लेकिन आपातकाल के संस्कार देश अब तक झेल रहा है। यह संस्कार दरअसल कांग्रेस के खून में है और क्योंकि कांग्रेस इस देश की सबसे स्वाभाविक शासक है और इसलिए आपातकालीन एचआईवी भी पूरे देश के खून में समा चुका है।</p>
<p style="text-align: justify;">आपातकाल क्यों बुरा था? दरअसल देश में राजनेताओं का अहंकार और उनकी महत्वाकांक्षा आजादी के तुरंत बाद से ही अपना रंग दिखाने लगी थी। इसके बावजूद जवाहरलाल नेहरू का राजनीतिक कद इतना बड़ा था कि तमाम संस्थाएं उनके सामने बौनी नज़र आती थीं। इस कारण सत्ता के कर्णधारों और शासन की संस्थाओं के बीच कभी टकराव नहीं हुआ। नेहरू के बाद शास्त्री जी आए, जो नेता के लिबास में संत के समान थे। और इसलिए उनके छोटे से शासनकाल में भी देश की संस्थाओं की निष्ठा और पवित्रता बहुत हद तक अक्षुण्ण रही। लेकिन इंदिरा गांधी के समय से चीजें बदलने लगीं। इंदिरा गांधी को सिंडिकेट ने गूंगी गुड़िया क़रार दिया था और कोई यह मानने को तैयार नहीं था कि उनकी सत्ता को चुनौती नहीं दी जा सकती। क्योंकि देश की संस्थाएं देश के संविधान के प्रति जवाबदेह होती हैं, इसलिए अगर सत्ता और संस्था में से कोई भी एक भ्रष्ट हो जाए, तो दोनों में टकराव निश्चित है।</p>
<p style="text-align: justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का निर्वाचन अवैध ठहराया और आपातकाल लागू हो गया। इंदिरा के नेतृत्व वाली कांग्रेस को यह समझ में आ गया देश पर लंबे समय तक निर्बाध शासन करने के लिए यहां की संस्थाओं को भ्रष्ट करना आवश्यक है। आपातकाल से यह काम शुरू हो गया। कांग्रेस ने देश की संवैधानिक जड़ों में मट्ठा डालना शुरू किया। संविधान की शपथ लेने वाले आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की सेवानिवृत्ति के बाद राजदूत, राज्यपाल और ऐसे पदों पर नियुक्ति शुरू हो गई ताकि सारे वरिष्ठतम अधिकारी यह समझ लें कि सरकार का साथ देने में क्या फायदे हैं। उच्च और उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को मानवाधिकार आयोग जैसे शक्तिशाली और सुविधायुक्त पदों पर बैठाया जाने लगा, जिससे उनके सामने हमेशा सरकार से पंगा न लेने का लोभ बना रहे। तमाम समितियों, आयोगों और ऐसे दूसरे वैधानिक पदों पर नियुक्तियों के लिए कोई तय मानदंड न बनाकर भ्रष्टाचार के रास्ते साफ रखे गए। इन सारी प्रक्रियाओं का सारांश इंदिरा के समय देश का प्रथम नागरिक, संविधान का केयरटेकर और तीनों सेनाओं का प्रमुख यानी राष्ट्रपति बनने वाले एक व्यक्ति का वह बयान है, जिसमें उसने कहा था कि वह इंदिरा गांधी के घर झाड़ू तक लगाने के लिए तैयार है। इंदिरा जी गईं, आपातकाल गया, लेकिन कांग्रेस ने संस्थाओं को भ्रष्ट करने का संस्कार आत्मसात कर लिया। चुनाव आयोग में नवीन चावल की नियुक्ति और प्रोन्नति इसका सबसे प्रकट उदाहरण है।</p>
<p style="text-align: justify;">और इसी कड़ी में सबसे ताजा उदाहरण है यूलिप पर सेबी और इरडा में हुई लड़ाई पर सरकार का फैसला। सेबी और इरडा के बीच यूलिप (शेयर बाजार में निवेश के साथ बीमा सुविधा देने वाला उत्पाद) पर अधिकार को लेकर झगड़ा चल रहा था। सेबी के प्रमुख सी बी भावे और इरडा के जे हरिनारायण को सरकार की ओर से निर्देश मिले कि वे हाईकोर्ट में एक संयुक्त याचिका दाखिल करें। लेकिन भावे ने अपनी पहल पर मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने का फैसला किया। फिर क्या था, सरकार को गुस्सा आ गया। सरकार की ओर से हरिनारायण को संपर्क किया गया और कहा गया कि एक मसौदा तैयार करें ताकि यूलिप पर इरडा का नियंत्रण हो सके। यानी एक अभिभावक ने दो बच्चों की लड़ाई में फैसला लिखने का अधिकार इसलिए एक के हाथ में दे दिया, क्योंकि दूसरे ने उसकी बात मानने से इंकार कर दिया। क्या सरकारें ऐसे काम करती हैं? यूलिप में आम लोगों के लाखों करोड़ रुपए लगे हैं, इस भरोसे पर कि सरकार उनके हितों की निगहबान है। लेकिन सरकार केवल अपने अहंकार को तुष्ट करने के लिए किसी एक रेगुलेटर को इसकी कमान थमाने का फैसला कर रही है। अब सोचिए प्रणव मुखर्जी के एहसानों से दबे जे हरिनारायण इरडा प्रमुख के हैसियत से निवेशकों के हितों की सुरक्षा करेंगे या सरकार और कांग्रेस पार्टी के हितों की।</p>
<p style="text-align: justify;">यही कांग्रेस की कार्यसंस्कृति है, जो उसे इंदिरा गांधी और आपातकाल से विरासत में मिली है। संस्थाओं को भ्रष्ट करने की कार्यसंस्कृति। संवैधानिक पदों को भ्रष्ट करने की कार्यसंस्कृति। यह केवल एंडरसन को भगाने में नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस सरकारों के हर दिन के कामकाज का अभिन्न हिस्सा है।</p>
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		<title>ये बिहार का स्वाभिमान है या अभिमान</title>
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		<pubDate>Sun, 20 Jun 2010 12:50:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>भुवन भास्कर</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-3809" title="Narendra_Modi_and_Nitish_Kumar" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/Narendra_Modi_and_Nitish_Kumar-300x285.jpg" alt="" width="300" height="285" />बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आखिरकार गुजरात को 5 करोड़ रुपए लौटा ही दिए। बहुत ही अजीब सी घटना है। जैसे, स्कूल के एक बच्चे ने किसी दिन चार दोस्तों के बीच मजाक में इस बात का जिक्र कर दिया हो कि उसने अपने फलां दोस्त को अपनी टिफिन में से एक परांठा खिलाया था और परांठा खाने वाले बच्चे को बात इतनी बुरी लगी हो कि अगले दिन वह मां से जबरन परांठा बनवा कर लाया हो और पूरे स्कूल के सामने अपने दोस्त के सामने परांठा फेंक कर हेठी से कहा हो, &#8216;ले! उस दिन खाई थी, आज वापस कर दी।&#8217;</p>
<p style="text-align: justify;">नीतीश कुमार ने कुछ ऐसी ही बचकानी हरकत की है कोसी आपदा फंड से पैसे लौटा कर। मैंने जब से खबर सुनी, सोच ही रहा था कि इसका विश्लेषण कैसे करना चाहिए? पहले मुझे लगा, यह उभरते हुए बिहार का आत्मसम्मान है। कुछ ऐसा ही आत्मसम्मान लाल बहादुर शास्त्री ने भी तो अमेरिका को दिखाया था, जब उन्होंने वहां जानवरों को खिलाए जाने वाले पीएल-80 किस्म की गेहूं का आयात बंद कर हरित क्रांति का नारा दिया था। लेकिन क्या वास्तव में गुजरात सरकार का विज्ञापन बिहार का अपमान करने की मंशा से दिया गया था? नीतीश के पैसा लौटाने की घोषणा के अगले दिन पटना के गांधी मैदान में भाषण देते हुए नरेंद्र मोदी ने जो कहा, कम से कम उससे तो ऐसा लगता नहीं। मोदी ने बिहार को लातूर भूकंप के समय मदद देने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने यहां तक कहा कि वह गुजरात में रहने वाले लाखों बिहारियों के प्रतिनिधि के तौर पर उनका कुशल क्षेम देने उनके घर आए हैं और उन्होंने गुजरात के विकास में बिहारियों के योगदान के लिए भी बिहार को धन्यवाद दिया। फिर यह मानने का कोई कारण नहीं है कि नीतीश की प्रतिक्रिया उभरते बिहार के आत्मसम्मान पर लगे चोट का जवाब है। तो यह क्या है?</p>
<p style="text-align: justify;">सरकारी विज्ञापन देने की प्रक्रिया हम सब को पता है। वह मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या रेल मंत्री तय नहीं करते। अभी हाल में क्या हमने भारत सरकार के एक विज्ञापन में पाकिस्तानी सेनाधिकारी की तस्वीर नहीं देखी थी? क्या हाल ही में रेल मंत्रालय के एक विज्ञापन में दिल्ली को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं दिखाया गया था? मीडिया में कुछ हो-हंगामे के अलावा विपक्ष तक ने उन विज्ञापनों को तूल नहीं देकर समझदारी का ही परिचय दिया। लेकिन नीतीश में यह समझदारी नहीं है। क्या सच में नीतीश में समझदारी नहीं है? पिछले चार साल का जद (यू)- भाजपा गठबंधन का शासनकाल दरअसल नीतीश का वन मैन शो ही है। नतीश की कार्यप्रणाली कुछ-कुछ कांग्रेस के गांधी परिवार सी है। शासन की सारी शक्ति नीतीश से निकलती है और वहीं समाप्त होती है। इन चार सालों ने नीतीश को नेता से प्रशासक बना दिया है। अंग्रेजी में बात ज्यादा साफ होगी- नीतीश अब लीड नहीं करते, एडमिनिस्टर करते हैं। उनका अहंकार संगठन और शासन दोनों से बड़ा हो गया है और इसलिए उन्हें ऐसी कोई बात बर्दाश्त नहीं, जो उनके अहंकार को चुनौती देती हो।</p>
<p style="text-align: justify;">बिहार में पिछले चार साल के शासनकाल में मुस्लिम तुष्टीकरण का जो नंगा खेल खेला जा रहा है, वह अद्भुत है। क्योंकि भाजपा सरकार का हिस्सा है, इसलिए मुस्लिमपरस्ती के ऐसे दसियों मसले हैं, जो न मीडिया में आ रहे हैं और न ही लोगों की जानकारी में। लेकिन नीतीश कुमार का लक्ष्य बहुत साफ है। उन्हें न तो बिहार के आत्मसम्मान की चिंता है, न बिहारियों की अपेक्षाओं की। उन्हें मुसलमानों का वोट चाहिए। किसी भी कीमत पर। क्योंकि तभी वह भाजपा को दुलत्ती मार कर अपने बूते सरकार में आ सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">यह स्थिति बहुत करीब भी है। क्योंकि मुसलमान, महादलित (नीतीश की नई परिभाषा में) और कुर्मी एवं कोइरी उनके साथ हैं। यादव, ओबीसी की कई जातियां और मुसलमानों का एक वर्ग लालू के साथ है। अगड़ी जातियां कुछ तो जद (यू) के बागी नेताओं के साथ टूटेंगी और बाकी कांग्रेस के हलका सा भी मजबूत होते ही, उसकी झोली में जा गिरेंगी। भारतीय जनता पार्टी अपनी भ्रमित राजनीति और सुशील मोदी जैसे स्वार्थी तथा पदलोलुप नेताओं के कारण मटियामेट होने ही जा रही है। ऐसे में नीतीश के सामने वह विज्ञापन एक धारदार हथियार के तौर पर हाथ आया, जिसे भुनाने के लिए उन्होंने तुरंत वार कर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">कुल मिलाकर इस घटना से तीन बातें बहुत साफ तौर पर सामने आई हैं। एक, नीतीश की प्रतिक्रिया केवल एक शातिर और अहंकारी राजनेता की राजनीतिक चाल है। दूसरी, नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया ने एक बार फिर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व का मजबूत उम्मीदवार बना कर पेश किया है। और तीसरी बात यह, कि भारतीय राजनीति में मुसलमानों को खुश करने के लिए कोई दल या नेता किसी भी स्तर तक जा सकता है।</p>
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		<title>अमेरिका की दोहरी मानसिकता और हमारी गुलामी सोच</title>
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		<pubDate>Fri, 18 Jun 2010 09:23:21 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[मैक्सिको की खाड़ी में ब्रिटिश पेट्रोलियम की तरफ से हुई तबाही और उस पर सख़्त अमेरिकी रुख़ के बाद कंपनी द्वारा चुस्ती से कार्रवाई करते हुए 20 अरब डॉलर का मुआवज़ा दिए जाने की घटना से भारतीयों के मन में ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">मैक्सिको की खाड़ी में ब्रिटिश पेट्रोलियम की तरफ से हुई तबाही और उस पर सख़्त अमेरिकी रुख़ के <img class="alignright size-medium wp-image-3784" title="IN01_MANMOHAN-OBAMA_15260e" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/IN01_MANMOHAN-OBAMA_15260e-217x300.jpg" alt="" width="217" height="300" />बाद कंपनी द्वारा चुस्ती से कार्रवाई करते हुए 20 अरब डॉलर का मुआवज़ा दिए जाने की घटना से भारतीयों के मन में क्षोभ है, गुस्सा है। अमेरिकी भेदभाव का गुस्सा। यूनियन कार्बाइड और डाओ केमिकल की उदासीनता का गुस्सा। यह गुस्सा इस बात का प्रमाण है कि अभी और भी बहुत से यूनियन कार्बाइड होने बाकी हैं। यह गुस्सा इस बात का प्रमाण है कि भारत अब भी ग़ुलाम मानसिकता के साथ जी रहा है। आंखों में महाशक्ति बनने के सपने के बावजूद हृदय की गहराइयों में हम ग़ुलाम हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कोई हमारे देश में आकर हमारी ही धरती पर क़त्ल-ए-आम करके चला जाता है और उसे न केवल क़त्ल करने के बाद निकलने में, बल्कि क़त्ल करने में भी वे लोग सहयोग देते हैं, जिनके लिए हम जय-जयकार के नारे लगाते हैं। फिर भी, हमारा गुस्सा ओबामा और बीपी पर निकलता है। चुरहट लॉटरी में करोड़ों की रकम डकारने वाले (जिसमें यूनियन कार्बाइड ने भी कुछ करोड़ रुपए का &#8216;अनुदान&#8217; दिया था) अर्जुन सिंह तिल-तिल मरने वाले उस समाज में आज भी सुरक्षित घूम रहे हैं। उनके घर में अब भी आग नहीं लगाई गई है।</p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-3785" title="bhopal gas tragedy" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/bhopal-gas-tragedy1-300x253.jpg" alt="" width="300" height="253" />एंडरसन को देश से निकालने में सूत्रधार की भूमिका निभाने वाले राजीव गांधी की बेवा आज भी चुपचाप मूर्ख, जाहिल और तलवे चाटने वाले कांग्रेसियों की भगवान बनी हुई है, 6 साल के अपने केंद्रीय शासनकाल और 10 वर्षों से ज्यादा से अपने राज्य शासन के दौरान चुपचाप भोपाल को मरते देखने वाली और वोट मांग कर सत्ता का जश्न मनाने वाली भारतीय जनता पार्टी के निर्लज्ज नेता अब भी अपने एयरकंडीशन मीडिया रूम में बैठकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं। उनके घर और कार्यालय अब भी मटियामेट नहीं हुए। तो ओबामा और बीपी की न्यायप्रियता पर सवाल उठाना क्या केवल हमारी नपुंसक ग़ुलाम मानसिकता का परिचायक नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">तुलसीदास 500 साल पहले ही कह गए थे- समरथ को नहीं दोष गोसाईं। जनसंहार के हथियारों की काल्पनिक कहानी बनाकर इराक को नेस्तोनाबूद कर देने की कहानी दरअसल अमेरिका के सामर्थ्य की ही कहानी है। दूसरी तरफ महाशक्ति बनने की गाल बजाने वाला भारतीय नेतृत्व है, जो पाकिस्तान की ज़मीन में तमाम आतंकवादियों की जड़े होने के पुख्ता प्रमाण के बावजूद वर्षों से अमेरिका से अनुरोध ही करता जा रहा है कि वह पाकिस्तान को रोके। भीख में केवल रोटी के टुकड़े मिलते हैं, आत्मसम्मान और जीने का अधिकार नहीं। यह बात पता नहीं भारत की जनता कब समझेगी। अपनी बहन और बेटी की इज़्जत बचाने के लिए अगर हम गांव के ज़मींदार का दरवाजा खटखटाएंगे, तो बदले में वह उसी बहन और बेटी का एक रात का नजराना तो मांगेगा ही। अपने बुजुर्ग पिता के सम्मान के लिए अगर हम अपने पड़ोसी के आगे गिड़गिड़ाएंगे, तो अपनी महफिल में पानी पिलाने के लिए हमारे पिताजी की सेवाएं तो वह मांगेगा ही।</p>
<p style="text-align: justify;">माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले मेरे एक मित्र हैं, जिन्होंने एक दिन कहा कि भोपाल गैस पीड़ितों ने सैकड़ों की संख्या में वर्षों तक जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन किया और बदले में उन्हें क्या मिला? धोखा, अन्याय और मौत। यही लोग अगर हाथ में हथियार लेकर सड़कों पर उतर जाएंगे, तो उन्हें माओवादी कहकर उनके खिलाफ सेना उतार दी जाएगी। नैतिकता, अध्यात्म और राष्ट्रवाद के तर्क की कसौटी पर इसके खिलाफ बहुत कुछ कहा जा सकता है, लेकिन भावुकता के मोर्चे पर क्या वास्तव में यह लाजवाब नहीं है? जिसके घर दिन-रात मौत का तांडव हो रहा हो, जिसके देखते-देखते जिसकी पीढ़ियां अपंगता और लाचारी के अंधकूप में समा गई हों, वह नैतिकता, अध्यात्म और राष्ट्रवाद के तर्क समझेगा या नक्सलवाद के करारे जवाब का तर्क। यहां मजेदार बात यह है कि अर्जुन सिंह का बचाव करने वाले मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह नक्सवादियों के ज़बर्दस्त पैरोकार भी रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">भोपाल पर चल रहे हंगामें में रोज नए खुलासे हो रहे हैं। लेकिन इन खुलासों से जितने जवाब मिल रहे हैं, उनसे कहीं ज्यादा सवाल खड़े हो रहे हैं। इन तमाम सवालों के बीच एक जवाब तो मुझे साफ समझ आ रहा है कि पिछले हजार सालों में हम भारतीयों की ग़ुलाम मानसिकता और परमुखापेक्षी स्वभाव में कुछ भी बदलाव नहीं आया है। जब तक हम अपने घर की सुरक्षा के लिए अमेरिका, चीन और पाकिस्तान से भीख मांगते रहेंगे, तब तक कई यूनियन कार्बाइड कई भोपाल बनाते रहेंगे और हमारी कई पीढ़ियां मानसिक और शारीरिक तौर पर विकलांग पैदा होती रहेंगी।</p>
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		<title>उदासीनताओं और उपेक्षाओं का बजट</title>
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		<pubDate>Sun, 28 Feb 2010 06:20:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>भुवन भास्कर</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंधेर नगरी]]></category>
		<category><![CDATA[budget]]></category>
		<category><![CDATA[बजट]]></category>
		<category><![CDATA[सामाजिक एवं जनकल्याण]]></category>
		<category><![CDATA[सूचकांक सेंसेक्स]]></category>

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		<description><![CDATA[वित्त वर्ष 2010-11 के लिए पेश बजट प्रस्तावों को 48 घंटे बीत चुके हैं। हर बार की तरह इस बार भी कुछ प्रस्तावों के राजनीतिक महत्व को देखते हुए सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हो गए हैं और कुछ प्रस्ताव केवल ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/02/home0707091.jpg" alt="" title="home070709" width="300" height="252" class="alignright size-full wp-image-1837" />वित्त वर्ष 2010-11 के लिए पेश बजट प्रस्तावों को 48 घंटे बीत चुके हैं। हर बार की तरह इस बार भी कुछ प्रस्तावों के राजनीतिक महत्व को देखते हुए सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हो गए हैं और कुछ प्रस्ताव केवल अर्थवेत्ताओं में ही चर्चा का विषय बन सके हैं। जैसे कोई भी व्यक्ति, विषय या समाज संपूर्ण (परफेक्ट) नहीं होता, उसी तरह यह बजट भी नहीं है। इसीलिए इसे कोई भी एक नाम देकर सर पर चढ़ा लेना या खारिज कर देना बचकानापन होगा।<br />
मेरे विचार से प्रणव मुखर्जी का इस बार का बजट उम्मीदों, उदासीनताओं और उपेक्षाओं का सम्मिलित दस्तावेज है। वेतनभोगी जनता के लिए इसने जहां उम्मीद और उत्साह का पिटारा खोला है, वहीं हर दिन अपनी आजीविका के लिए जूझने वाले करोड़ों गरीबों और मजदूरों के लिए यह बजट उदासीनता का दर्द है। और इसमें उपेक्षा मिली है फिर देश के उस हिस्से को, जिसके लिए जबानी खर्च सबसे ज्यादा किया जाता है, यानी किसानों को। देश की आर्थिक वृद्धि दर दहाई अंक में ले जाने की इस सरकार की प्रतिबद्धता संदेह से परे है। लेकिन, ऐसी स्थिति में कृषि को लेकर सरकार में दृष्टि का अभाव (lack of vision) बहुत अखरता है। जबकि स्वयं सरकार भी यह मानती है कि कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 4 फीसदी तक पहुंचाए बिना देश के जीडीपी को 10 फीसदी की रफ्तार दे पाना संभव नहीं है, तो फिर कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए महज 400 करोड़ रुपए का आवंटन उदासीनता का दर्दनाक उदाहरण है। वित्त मंत्री फसलों को पानी मिलने के लिए इंद्र देवता से प्रार्थना करने के लिए तो तैयार हैं, लेकिन सिंचाई सुविधाएं बढ़ाने के लिए उनकी झोली में केवल 300 करोड़ रुपए हैं। मेरा साफ मानना है कि कृषि ऋण माफी जैसी योजनाएं सरकारी पैसे का घनघोर दुरुपयोग है और इससे एक ओर तो वास्तविक ज़रूरतमंदों की कीमत पर ग़लत और ग़ैर ज़रूरतमंदों को फायदा पहुंचाया जाता है, वहीं आगे से कर्ज लेकर उसे पचा जाने की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा मिलता है। इसके बदले अगर 80,000 करोड़ रुपए की रकम देश की सिंचाई व्यवस्था ठीक करने और कृषि उपज बढ़ाने पर खर्च की जाए तो यह केवल एक साल के लिए किसानों के लिए राहत के दरवाजे नहीं खोलेगा, बल्कि उनकी उत्पादकता और आमदनी बढ़ाकर उन्हें और ज्यादा कर्ज समय पर वापस करने के लिए सक्षम बनाएगा। इस दिशा में कोल्ड स्टोरेज शुरू करने के लिए जरूरी उपकरणों के आयात पर सीमा शुल्क 5 फीसदी कम करने और सेवा कर से पूरी छूट एक स्वागतयोग्य घोषणा है।</p>
<p>वेतनभोगियों के लिए ज़रूर यह बजट एक बोनांजा है, जिन्हें स्लैब में हुए बदलाव से भारी राहत मिलेगी। लेकिन यहां भी, अच्छा होता अगर वित्त मंत्री स्लैब की जगह छूट की दरें बढ़ा देते। ऐसा होने से हर आय वर्ग के लोगों को बराबर फायदा होता, जबकि मौजूदा स्थिति में ज्यादा पैसा कमाने वालों को छूट भी ज्यादा मिलेगी और कम वेतन वालों के हाथ कुछ खास नहीं आएगा। इस तरह का विरोधाभास विडंबना ही है। इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड में निवेश को 80 सी के तहत 1 लाख रुपए के ऊपर जोड़ा जाना एक अच्छा कदम है।</p>
<p>उद्योग जगत इस बजट से काफी खुश है, जिसकी एक झलक बजट पेश होने के दौरान शेयर बाजार में आई भारी बढ़त से मिली। हालांकि इसमें भी &#8216;कुछ बहुत अच्छा होने&#8217; से ज्यादा &#8216;कुछ बहुत बुरा ने होने&#8217; की भूमिका ज्यादा थी, जिसका संकेत बीएसई के 30 शेयरों वाले सूचकांक सेंसेक्स के अपने दिन के शीर्ष स्तर से 240 अंक नीचे बंद होने से मिलता है। उत्पादन और सीमा शुल्क में मिली छूट के चरणबद्ध तरीके से वापस होने को लेकर बाजार लगभग तैयार था। वैकल्पिक न्यूनतम कर (मैट) को 15 से बढ़ाकर 18 फीसदी किया जाना जरूर एक नकारात्मक सरप्राइज था, लेकिन कॉरपोरेट टैक्स पर सरचार्ज को 10 से घटाकर 7.5 फीसदी करने के फैसले से बहुत हद तक इसकी भरपाई हो गई। इनके अलावा नए होटलों पर निवेश को डिडक्शन से जुड़े फायदे देने और शोध एवं अनुसंधान पर वेटेड डिडक्शन में बढ़ोतरी से क्रमशः होटल और फ़ार्मा सेक्टर को फायदा होने की उम्मीद है। अति लघु, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के लिए बजट आवंटन में 30 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी कर उसे 2,400 करोड़ रुपए कर दिया गया है, जिससे निश्चत तौर पर उभरते हुए उद्योगों के विकास में मदद मिलेगी।</p>
<p>सामाजिक एवं जनकल्याण के लिए वित्त मंत्री ने काफी गंभीरता दिखाई है। कुल 3,73,000 करोड़ रुपए के बजट में से 37 फीसदी सामाजिक क्षेत्र के लिए आवंटित किए गए हैं, जबकि 25 फीसदी ग्रामीण क्षेत्र में आधारभूत ढांचे के विकास के लिए दिया गया है। पेयजल की हालत में सुधार के लिए 1,300 करोड़ रुपए बढ़ाए गए हैं, जबकि सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए आवंटन को 2,600 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 4,500 करोड़ रुपए कर दिया गया है। इससे सरकार की मंशा तो ज़ाहिर हो जाती है, लेकिन यह पता नहीं चलता कि क्या वास्तव में एक साल बाद देश की जनता को पीने का बेहतर पानी ज्यादा सुलभ हो जाएगा, यह पता नहीं चलता कि क्या 28 फरवरी 2011 को जब भारत के वित्त मंत्री अगला बजट पेश करने के लिए खड़े होंगे, तब क्या हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा पाने वाले बच्चों की संख्या अपेक्षित तौर पर बढ़ चुकी होगी, क्या शुरुआती 2-3 वर्षों में स्कूल छोड़ कर मजदूरी में लगने वाले बच्चों की संख्या में अपेक्षित सुधार आएगा, क्या बच्चों को जन्म देते समय मरने वाली मांओं की संख्या इस रकम के अनुपात में ही घटेगी और क्या जीवन की रोशनी देखने से पहले ही मौत की आगोश में समाने वाले नौनिहालों की संख्या में अपेक्षित कमी आएगी। यह सब कुछ इसलिए पता नहीं चलता क्योंकि बजट घोषणाओं को अमली जामा पहना सकने का सरकारी रिकॉर्ड बहुत ख़राब है। स्वयं वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में स्वीकार किया, &#8216;वास्तव में, आने वाले वर्षों में, यदि कोई कारक हमें एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में हमारी क्षमता को साकार करने में बाधक हो सकता है तो वह हमारी सार्वजनिक वितरण प्रणालियों की अड़चन है।&#8217;</p>
<p>यह बजट जिस एक मोर्चे पर सबसे ज्यादा नाकाम हुआ है, वह है महंगाई का। अपनी जेब बचाने के लिए त्राहि-त्राहि करती जनता के प्रति वित्त मंत्री की उपेक्षा भयानक है। उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी से जहां सीमेंट और स्टील जैसी कमोडिटी की कीमतें बढ़नी तय है, वहीं पेट्रोल-डीजल पर शुल्क बढ़ाने का प्रस्ताव कर मुखर्जी ने एक तरह से आम जनता के ज़ख़्मों पर नमक मल दिया है। हो सकता है कि राजनीतिक दबाव में यह प्रस्ताव वापस लेना पड़े, लेकिन इसने यह तो बता ही दिया है कि इस सरकार की प्राथमिकता सूची में आम आदमी का दुख और उसकी पीड़ा कहीं नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में 74 रुपए प्रति बैरल (160 लीटर) के हिसाब से कच्चे तेल की कीमत इस समय करीब 21.46 रुपए प्रति लीटर पड़ता है। अब रिफाइनिंग और परिवहन चार्ज लगाने के बाद भी किसी तरह यह 44 रुपए प्रति लीटर नहीं हो सकता। पेट्रोल पर हम जो हर रुपया देते हैं, उसमें से 51.36 रुपए सरकार की जेब में जाता है। इस पर भी अगर सरकार रोना रोती है, तो यह केवल उसकी लूट वृत्ति ही दर्शाता है।</p>
<p>राजकोषीय घाटे को लेकर सरकार बहुत चिंतित रही है। इस संदर्भ में जिस तरह अगले दो वर्षों में इसके कम होकर जीडीपी का केवल 4.1 फीसदी रह जाने की उम्मीद जताई गई है, उसमें मुझे खुश होने की कोई वजह नजर नहीं आती। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपिनयों में हिस्सा बेचकर 25,000 करोड़ रुपए और 3जी स्पेक्ट्रम की बिक्री से 35,000 करोड़ रुपए जुटाने की योजना बना रही है और इसी के भरोसे राजकोषीय घाटा कम करने की उम्मीद कर रही है। यह कुछ इसी तरह है जैसे आप अपने मित्रों और रिश्तेदारों से लिया कर्ज़ उतारने के लिए अपने घर के सामान और पत्नी के ज़ेवर बेचने का जुगाड़ कर रहे हों। बेहतर हो सरकार अपना भुगतान संतुलन (बीओपी) ठीक करने के लिए निर्यात बढ़ाए, उत्पादन बढ़ाए और लोगों की प्रति व्यक्ति आय बढ़ाए। विनिवेश और स्पेक्ट्रम की बिक्री जैसे उपायों से होने वाली आमदनी को सड़क, पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं के विकास में लगाया जाए ताकि रोजगार बढ़े और जीडीपी की वृद्धि दर भी।</p>
<p>कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि यह बजट शेयर बाज़ार और उद्योग जगत के लिए तो अच्छा है, लेकिन आम लोगों के लिए पूरी तरह उदासीन है। अब विचारणीय यह है कि किसी भी बाजार या उद्योग की आमदनी का आखिरी स्रोत तो आम जन ही है, ऐसे में आम जनता की जेब और मन पर कुठाराघात करने वाला कोई भी बजट या प्रस्ताव लंबी अवधि में उद्योग या बाजार का भी भला नहीं कर सकता।<br />
<strong>(लेखक आर्थिक पत्रकार हैं और एक प्रतिष्ठित समाचारपत्र से जुड़े हैं )</strong></p>
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