गज़ल
0आह से उपजेगी आग तो तख्त-ओ-ताज भी जला करेंगे अब सांस थामो कि हुक्मरानों के अन्दाज भी जला करेंगे अब. आवाम की फितरत को इस कदर शर्मिंदा भी न कर जालिम इन्ही दियों से तूफानों के मिजाज़ भी जला करेंगे
आह से उपजेगी आग तो तख्त-ओ-ताज भी जला करेंगे अब सांस थामो कि हुक्मरानों के अन्दाज भी जला करेंगे अब. आवाम की फितरत को इस कदर शर्मिंदा भी न कर जालिम इन्ही दियों से तूफानों के मिजाज़ भी जला करेंगे
इस कैद में ज़म्हुरियत अब और रह सकती नहीं साँस ले कि ज़िन्दगी अब और सह सकती नहीं. ले देख तेरे सब्र का तो अब यही अंजाम है मशहूर तेरी ख़ामोशी है, तूं मगर बदनाम है जुल्म हुआ है सही
(आई. आई. टी. खड़गपुर की अद्भुत जनता के नाम) ये फिजायें याद आएँगी…. ये बेबाकियत की ख़ामोशी, ये शुकून में उलझी हुई तमन्नाओं की बेचैनियाँ, ये रातों को जगाने वाले ज़ज्बे, अपनी धुन में खुद बिखर के आकार लेती जिंदगी.
गली के नुक्कड़ की जिनसे यारी रही वो अब भी ताजे हैं दिल के किसी कोने में सदियाँ गुज़रीं कि उनको देखा हो मगर वो भूलते नहीं, किसी के धक्के से बचपन में जो धूल होठों से लगी अब भी
मेरे बचपन में वहां क्रिकेट के मैदान थे सिवाए बरसात के, जब पानी भर जाता था बच्चे कागज़ की नावें तैराते थे उनमें। अच्छी बनी नावें कभी-कभी बड़ी दूर निकल जाती थीं उम्मीद होती थी की कोई लहर किसी रोज