Articles By: अजय कुमार झा अजय कुमार झा

सज़ा ए मौत : न सज़ा , न मौत

सज़ा ए मौत : न सज़ा , न मौत

4 2011/12/29 3:51 pm

अभी हाल ही में आए कुछ अहम फ़ैसलों में अपराधियों को मौत की सज़ा सुनाई गई । इससे पहले भी मौत की सज़ा मिले आरोपियों , जिनमें अजमल और अफ़ज़ल जैसे आतंकवादी भी हैं को फ़ांसी दिए जाने में हो

भ्रष्टाचार और आम आदमी

भ्रष्टाचार और आम आदमी

4 2011/05/17 8:38 am

      आज भ्रष्टाचार अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच चुका है इसलिए जैसा कि कहा गया है कि जब पाप का घडा जब भर जाता है तो उसका चटकना तय हो जाता है । आज हर तरफ़ एक ही मुद्दा

लिव इन रिलेशनशिप : एक बहस

लिव इन रिलेशनशिप : एक बहस

1 2011/03/07 7:36 am

राजधानी दिल्ली के खबरिया हलकों में इन दिनों फ़िर एक लडकी की लाश केंद्र में है । पुलिस , मीडिया और आम आदमी अपने ताने बाने बुन रहा है हालांकि मीडिया पुलिस के काम में से स्टोरी और आम आदमी

खबरों पर एक आम सी प्रतिक्रिया

खबरों पर एक आम सी प्रतिक्रिया

0 2011/02/03 10:49 pm

खबर :-वेलेंटाइन डे पर मॉल्स में चुने जाएंगे बेस्ट कपल नज़र :-बिल्कुल ..जगहे वही है जहां पर आपको बेस्टम बेस्ट कपल ..एकदम सफ़ल होता हुआ दिखाई देगा और टाईम तो जान के चुने हैं आप ओही खासमखास दिन । मॉल्स

नासूर है मगर नामुमकिन नहीं है भ्रष्टाचार

नासूर है मगर नामुमकिन नहीं है भ्रष्टाचार

0 2011/02/01 10:49 pm

महाराष्ट्र में एडिशनल कलेक्टर को जिंदा जलाने की प्रतिक्रिया ने , सरकार , व्यवस्था , राजनीति सबमें पनप और पैठ जमा चुके भ्रष्टाचार के प्रति पहले से ही आक्रोशित आम जनमानस में एक अजीब सी बेचैनी और उत्तेजना भर दी

दो महत्वपूर्ण अदालती फ़ैसले : महिला अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में

दो महत्वपूर्ण अदालती फ़ैसले : महिला अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में

2 2010/12/25 5:59 pm

पिछले दिनों अचानक दो फ़ैसलों ने अपनी ओर ध्यान खींचा । इसमे आश्चर्य और सुखद बात ये है कि एक फ़ैसला दिल्ली की अधीनस्थ अदालत का है तो दूसरा सर्वोच्च अदालत का किंतु दोनों ही मुकदमों में महिला अधिकारों पर

देश का खेल चरित्र

देश का खेल चरित्र

1 2010/12/23 6:37 pm

यूं तो इस देश में खिलाडियों की उपेक्षा का अपना एक अलग ही खेल के समानांतर ही एक इतिहास है , मगर जब देश के खिलाडी सबको चौंकाते हुए राष्ट्रमंडल खेलों में या किसी बडे अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में पदकों

बंद हो संसद सत्र की परंपरा : नो वर्क नो मनी

बंद हो संसद सत्र की परंपरा : नो वर्क नो मनी

1 2010/12/13 8:01 pm

पिछले बीस दिनों से समाचार पत्रों पर जनता एक ही सुर्खियां पढती आ रही है कि गतिरोध जारी ..संसद आज भी नहीं चली । और पूरक खबर के रूप में जो खबर होती है कि आम जनता का फ़लाना ढिमकाना

न्यायपालिका में परिवर्तन की दरकार

4 2010/12/11 8:11 am

पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से न्यायिक क्षेत्र में पनप रहे कदाचार व अन्य अनियमितताओं की खबरें आती रही हैं उसने एक बार फ़िर से इस चर्चा को गर्म कर दिया है कि क्या अब समय आ गया है