सुरेश चिपलूनकर ( suresh chiplunkar )
0राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रचार-प्रसार और पोषण हेतु प्रयासरत और अंतरजाल पर सर्वाधिक चर्चित लेखक सुरेश चिपलूनकर जी उज्जैन के रहने वालेहैं और जनोक्ति.कॉम से जुड़कर हमारा सहयोग और मार्गदर्शन दोनों कर रहे हैं
राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रचार-प्रसार और पोषण हेतु प्रयासरत और अंतरजाल पर सर्वाधिक चर्चित लेखक सुरेश चिपलूनकर जी उज्जैन के रहने वालेहैं और जनोक्ति.कॉम से जुड़कर हमारा सहयोग और मार्गदर्शन दोनों कर रहे हैं
नक्सलवाद पर आज व्यापक बहस की जरुरत है . इसी विचार से विमर्श के इस स्तम्भ में पत्रकारिता के छात्र प्रणव का यह आलेख प्रस्तुत है :- नक्सलवाद और नक्सली हिंसा लगातार चर्चा में है . समय के साथ नक्सलिओं
मैंने उदय प्रकाश का एक साक्षात्कार पढ़ा था। उनसे इस तरह के सवाल पूछे गए थे कि जैसे लेखक को कटघरे में खड़ा किया जा रहा हो और उसे अपनी सफाई देनी हो । किसी भी साक्षात्कार का वह
१० अक्तूबर को भारत नीति संस्थान के द्वारा दीनदयाल शोध संस्थान, नई दिल्ली में ” वर्तमान सन्दर्भ में हिंद स्वराज की प्रासंगिकता ” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया . इस संगोष्ठी में वरिष्ठ गांधीवादी चिन्तक और पूर्व सांसद राम जी सिंह , जेएनयु के प्राध्यापक अमित शर्मा , पांचजन्य के सम्पादक बलदेव भाई सिंह , आईबीएन -7 के पत्रकार आशुतोष , आचार्य गिरिराज किशोर , केदारनाथ साहनी , और भारत नीति संस्थान के संचालक राकेश सिन्हा समेत दर्जनों पत्रकार ,लेखक और छात्र शामिल हुए . इस अवसर पर प्रो ० अमित शर्मा ने कहा कि हिंद स्वराज की प्रासंगिकता पर विचार करने से पूर्व गाँधी को जानना आवश्यक है . गाँधी ने जीवन के दो लक्ष्य बताये हैं, एक आत्मसाक्षात्कार और दूसरा ब्रह्मसाक्षात्कार . गाँधी शास्त्र के नहीं लोक के जानकार थे
प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है जाहिर है आज नहीं तो कल इस सच से सामना तय है। ऐसे में कोई है जिसने बीड़ा उठाया है भगीरथ बनके भागीरथी को बचाने का। भारतीय सेना की एक टुकड़ी गंगोत्री
इस बीच माजिद माजिदी की दो फिल्में देखने को मिली। चिल्ड्रन आफ हैवन और कलर्स आफ पैराडाईस। माजिद माजिदी की फिल्में एक अलग संसार रचती हैं। गांवों का संसार, भावनाओं का संसार और अदभुत प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक सुन्दरता
पार्टी कल्चर से बहुत ज्यादा ताल्लुक ना होने के बावजूद इस पार्टी ने लुभा लिया। 1984 में आई गोविन्’द निहिलानी की फिल्म पार्टी गर्मियों की पहाड़ी ठंडक का अहसास करते हुए देखी। फिल्म वर्तमान साहित्य जगत के पूरे गड़बड़झाले को उस दौर में भले ही कह गई हो पर आज भी सीन बाई सीन सच्चाई वही है। तल्ख ही सही।
हमारा समय
एक कलर पेंटिंग है
जिसके एक हिस्से में
शेर की खाल पर बैठी कुछ औरते
नंगी होकर बेच रही हैं
नक्सलवादी अपने आप को वनवासियों का मसीहा बताते हैं। उनका दावा है कि वे वनवासियों की भलाई के लिए कार्य करते हैं। लेकिन यह उनका वास्तविक रुप नहीं है। वास्तविकता कुछ और ही है। अब यह किसी से छिपा नहीं है। नक्सलवादियों के बर्बर और अमानवीय चेहरे को सभी ने देखा है। नक्सलवाद पर नजर रखने वाले लोग जानते हैं कि वे इसके माध्यम से अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं। उनकी विचारधारा से असहमत लोगों की सबके सामने गला काट कर हत्या कर दी जाती हैं।
भारत क्या है , यह प्रश्न अक्सर हमारे मन में उभरता रहता है . हमारे एक शिक्षक कहा करते थे : ” भारत को जानना है तो किताबें पढो , महापुरुषों के भारत सम्बन्धी विचार को जानो तब निकल जाओ