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2012/05/12 1:48 am
विमलेन्दु 30 अप्रैल 1945 को हिटलर ने आत्महत्या कर ली थी. इतिहास के पन्नों पर जो लिखा हुआ है, उसके मुताबिक तो दूसरे विश्वयुद्ध में अपनी सेना की डावांडोल स्थिति ने उसे आत्महत्या के लिए प्रेरित किया. पर अनुभव कहते
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2012/05/11 9:02 pm
आकाश कुमार |नई दिल्ली (साई)। लगभग ढाई से तीन करोड़ रूपए रोजाना की आय वाले दिल्ली परिवहन निगम को घाटा उठाना पड़ रहा है। वह भी एक दो करोड़ नहीं एक अरब से ज्यादा का। जी हां, दिल्ली में अलग
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2012/05/11 7:41 pm
सोनिया गाँधी और विवादों का साया साथ-साथ चलते हैं | राजीव गाँधी हत्याकांड में संलिप्तता ,बोफोर्स दलाल क्वात्रोकी से रिश्तेदारी , विदेशी मूल के होने का मुद्दा , स्विस बैंक में अरबों की संपत्ति , विदेशी में रहस्यमई बीमारी का
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2012/05/10 11:14 pm
साधारण ग्रामीणों का यह काम कबीले तारीफ है। अपने खेतों को बंजर होने से बचाने के लिए उत्तराखंड के देहरादून जिले के कालसी विकास खंड के खैरवा गांव के लोगों ने पड़ोसी राज्य हिमाचल के सीमावर्ती गांव आंद्राखड्ड से एक
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2012/05/08 6:17 pm
गुमला, झारखंड डिप्टी कमिश्नरः राहुल शर्मा आइएएस, 1998 बैच राहुल शर्मा ने झारखंड में लाल आतंक के खतरनाक क्षेत्रों में से एक गुमला को अपनी चुनौती माना. उनके ग्राम पुनर्विकास के मॉडल को संयुक्त राष्ट्र ने परखा और कहा है
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2012/05/08 5:58 pm
आदरणीय मित्रों, आपको यह जानकर अति प्रसन्नता होगी कि भारत की प्रथम मीडिया डायरेक्टरी ”पत्रकारिता कोश” के 12वें अंक का लोकार्पण पिछले दिनों मुंबई के झुनझुनवाला कॉलेज में बड़ी ही धूमधाम से संपन्न हुआ। इस अवसर पर प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अनेक
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2012/05/07 1:02 pm
राजीव रंजन प्रसाद जब शीर्षक सुना था तो अटपटा लगा – “ क्यों जाउं बस्तर ? मरने!” किंतु बाध्य हुआ इस वाक्यांश को देर तक सोचते रहने के लिये। अनिल पुसदकर की 65 पन्नों की यह किताब एक आउटबस्ट है, अपनी
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2012/05/06 10:46 pm
‘इंडियन मीडिया फोरम’ के तत्वाधान में “बदलते परिवेश में भाषा” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया | संगोष्ठी की अध्यक्षता ‘भारतीय साहित्यकार संघ’ के अध्यक्ष डॉ वेद व्यथित जी ने की | हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ की
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2012/05/06 12:06 pm
ज्ञानेश्वर वात्स्यायन मेरा यह पोस्ट रांची के संजीवनी बिल्डकान की करतूतों की सफल पारी का राजफाश है । मैं जानता हूं कि मेरे इस पोस्ट से मीडिया के कुछ साथी हत्थे से उखड़ जायेंगे,लेकिन क्या करें,आदत से लाचार जो हूं
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2012/05/06 11:40 am
आज़ादी की बीते 63 सालों में देश के लाखों बुनकरों की समस्याएं और उनकी ग़रीबी दूर होने की बजाय बढ़ती ही चली जा रही है | सरकार की ओर से मिलता है तो बस आश्वासन | देश के जिन हिस्सों