राबिया बसरी का सरमाया सच का सरमाया था जो सूरज कि रौशनी की तरह अपनी बातों से उजाले फैलाया करती थी. कुछ अनदेखे पर सुने हुए किस्सों की जुबानी उनका जलवा देख लें.
१
एक बुजुर्ग आदमी था जो हमेशा फरमाया करता था कि कोई जब तकलीफ में किसीका दरवाजा खटखटाता है तो आख़िर किसी न किसी वक़्त वह खुल ही जाता है। राबिया बसरी ने जब यह सुना तो जवाब में कहा ” जो कभी बंद ही नहीं हुआ, तो उसके खुलने, न खुलने का सवाल ही कहाँ पैदा होता है।”
२
एक बार राबिया बसरी ने किसी को यह रट लगाते हुए सुना ” हाय ग़म, हाय ग़म ” . उसके पास जाकर कहा “हाय ग़म” की बजाय “बे-ग़म” कहकर सजदा करो, क्योंकि तुम्हें ग़म का अगर ज़ाइका मिल जाता तो तुम बोल ही न पाते।”
३.
एक बार एक आदमी के सर पर पट्टी बांधी थी जिसे देखकर राबिया बसरी ने कारण पूछ लिया. जवाब में उस शख़्स ने कहा कि उसके सर में सख़्त दर्द है.
राबिया बसरी ने फिर पूछा ” तुम्हारी उम्र क्या है?”
“तीस साल”
“तुमने कभी तीस सालों में सेहत मंदी की पट्टी बाँधी?” सवाल पूछा
“नहीं.” फिर जवाब पाया.
“तो फिर फक़त एक बार के सर दर्द में शिकायत की पट्टी क्यों बाँध रक्खी है.”
अनुवादः देवी नागरानी

