आज एक हिंदी ब्लॉग पर छपे पोस्ट में डिस्कसन की चर्चा पढ़ी .जिसमें हिंदी मीडिया वाले ग्लोबल वार्मिंग को लेकर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम के लिए पैनल बना रहे हैं . अब ,इन ससुरों को कौन समझाए दिन भर ए ०सी० में रहने वाले लोग जिन्हें स्वच्छ हवा लग जाए तो सर्दी हो जाती है . वो ग्लोबल वार्मिंग पर डिस्कस करेंगे ? वैसे यार बुराई नहीं है डिस्कस तो कोई भी कर सकता है . डिस्कस हीं तो करना है .दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग का वरदान देने वाले देश अमेरिका आदि भी तो डिस्कस ही कर रहे है . डिस्कस एक ऐसा तरीका है जिससे मानव हर समस्या का समाधान खोजने का अभिनय करके मन को संतुष्ट करता है . दुनिया भी उसके इस स्वांग में मज़े लेती है . अरे ,भारत में तो लगभग सारे काम डिस्कसन पर हीं टिके हैं . नक्सलियों से डिस्कस होती रहती है . अभी चीन से १२वे चरण के डिस्कस की तैयारी चल रही है . जब भी कुछ बड़ा धमाका होता है घुसपैठ होती है तो पाकिस्तान से डिस्कस करने की तैयारी शुरू हो जाती है .पानी के बटवारे को लेकर कर्णाटक तमिलनाडु से डिस्कस करता है . मायावती सर्वोच्च न्यायलय में डिस्कस कर रही है आखिर उसने अपनी मूर्ति जनता के पैसों से क्यों लगवाई ? कोई पार्टी आम चुनाव हारती है तब भी डिस्कसन होता है . जसवंत पार्टी से निकले जाते हैं तब भी डिस्कसन होता है . सार्वजनिक सन्दर्भों से अलग व्यक्तिगत जिन्दगी में भी डिस्कसन का महत्व बढ़ता जा रहा है .भाई -भाई , पति-पत्नी , बाप-बेटे की आपस की लड़ाई में भी डिस्कस के रामबाण से अचूक कोई इलाज नहीं है . अरबों के भारत में कुछ एक हज़ार न्यायालय इस बात की तस्दीक करते हैं कि यहाँ डिस्कस यानी बातचीत का कितना क्रेज है . यही नहीं पौराणिक कथाओं में भी डिस्कसन अर्थात शास्त्रार्थ की परंपरा का जिक्र मिलता है . मंडन मिश्र और शंकराचार्य का डिस्कसन जग जाहिर है .मध्यकाल में भी कुछ राजाओं के दरबार में डिस्कसन की चर्चा देखने को मिलती है . दक्षिण भारत के प्रतापी राजा कृष्णदेव राय और सम्राट अकबर के दरबार में बुद्धिजीवों के बीच होने वाले डिस्कसन आज भी मशहूर हैं और कहावतों के रूप में लोकप्रचलित भी . राजा महाराजाओं के अलावा सबसे महत्वपूर्ण डिस्कसन गुरुकुल में हुआ करता था जहाँ गुरु-शिष्य ब्रह्माण्ड के विभिन्न विषयों पर डिस्कस किया करते थे .आम आदमी चौपाल पर अपनी घर-गृहस्थी की बातें डिस्कस किया करते थे . अब ना तो चौपाल रहे , ना हीं गुरुकुल और ना हीं राजदरबार धीरे -धीरे डिस्कसन की स्वस्थ परंपरा बदल रही है .आज निरुद्देश्य, पक्षपातपूर्ण और दिखावे के डिस्कसन का चलन बढ़ गया है .राजदरबारों से निकल कर पान की दुकानों पर , गुरुकुल से निकल कर कॉलेज केंटिन में ,और चौपालों से हटकर दफ्तरों /सत्संग स्थलों / पार्कों आदि सार्वजनिक जगहों पर डिस्कसन का निवास स्थान हो गया है .आज कल राउंड टेबल डिस्कसन बड़े जोरों पर है . पर कोई बात नहीं जल्द हीं डिस्कसन को यहाँ से भी बगैर किसी नोटिस के निकाल दिया जायेगा तब वह चल देगा एक नए आशियाने की तलाश में …..



हाँ, डिसकसन ही रह गया, और नतीजा वही सिफर ।
अब तो पता नहि क्यो वार्ता का नाम सुनते हि बुखार चढ़ने लगता है
व्यन्ग्य
अच्चा है
भैया आप तो जनोक्ति में इतने अच्छे अच्छे मसाले उठा रहे हो ,ये डिस्कस कम गंभीर नहीं