राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर मेरी और से एक कवितान्जली :
“ईश्वर के काव्यदूत “
ओ ईश्वर के काव्यदूत तुम फिर से मही पर आओ,
मानवता फिर सुप्त हो चली आकार उसे जगाओ।
जननी के माथे पर अब भी लटक रही तलवारें,
रोज रोज सुनते रहते हम शत्रु की ललकारें।
कहीं धमाका-आगजनी, फिर कहीं खून की होली,
आतंकित हैं लोग हमारे, सूनी माँओं की झोली।
सिंहदन्त से गिनती सीखे, अब वैसे शूर नहीं हम,
राष्ट्र बांधे एक सूत्र में लौह-पुरुष अब वैसे नहीं हम।
आ जाओ अब हममें उतना साहस नहीं बचा है,
भरत के पुत्रों के वक्षों में पावक नहीं बचा है।
आओ आकर राष्ट्र जगाओ, भरो प्राण में शक्ति,
राष्ट्रद्रोह की कील उखारें माँ भारती की भक्ति।
धधकानी होंगी तुमको फिर वैसी ही ज्वालायें,
जिस ज्वाला से दीप्त हुई थी स्वाधीनता की राहें। – प्रकाश ‘पंकज’
Author: प्रकाश पंकज
मैं, प्रकाश पंकज, एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी का नौकर पर अपना मालिक, वर्त्तमान में सॉफ्टवेर इंजिनियर के रूप में कार्यरत हूँ। २००८ के जनवरी से मैंने कविता लिखनी शुरू की। “इतनी ऊँचाई न देना ईश्वर कि धरती पराई लगने लगे” मेरी पहली कविता है । मैं अपनी भावनाओं और विचारों को अक्सर कविता में ढालने की कोशिश करता हूँ पर बहुत कम बार ही सफल हो पता हूँ। मोतियाँ बहुत हैं पर मालाओं में पिरोना सीख रहा हूँ। कृपया आशीर्वाद दें !
शस्त्र भारी थे, उठता न था, लेखनी को ही अब शस्त्र बना लिया।
शब्द धीमे थे, कोई सुनता न था, लेखन को ही अब स्वर बना लिया।
बस अब इतनी विनती करता हूँ – “हे इश्वर अब कलम न छूटे !” – प्रकाश ‘पंकज’
मैं ब्लॉगर पर अपने चिठ्ठे प्रकाशित करता हूँ । मेरा यह चिठ्ठा मेरे समस्त चिठ्ठो को एकत्र करता है: http://prakashpankaj.wordpress.com
SUCH A WONDERFUL AND A HEART TOUCHING POEM…:)