खंजर बनाता हूं,
जानते हुए कि-
क़त्ल के काम आता है
पर क्या करूँ?
पेशा जो है मेरा,
पेट का सवाल है !
अपने ही-
कत्ल हो रहे हैं!
और खुद भी तो-
कत्ल हो रहा हूं.
किसे दोष दूँ ?
खंजर मैं ही तो
बना रहा हूं.
कुछ और पेशा
नहीं कर सकता!
इस पेशे में मुझे
पैसे बेहिसाब
जो मिलते हैं!
कत्ल हो रहा हूं-फिर भी
खंजर बनाता चला जा रहा हूं….??
–
…Sharda Monga


कत्ल हो रहा हूं-फिर भी
खंजर बनाता चला जा रहा हूं….??
बहुत अच्छी पंक्तियां…