हिंदी-एक नजर(२)


हिंदी करे अब किसपे भरोसा ,
जहाँ से भी थी आस वहां से मिली धोखा.

बेटे भी अब करते हैं बेवफाई,
गाली की भाषा में देते हैं सफाई.

पहली दफा उसने किया गाँधी पे विश्वास,
वो करने लगा ‘हिन्दुस्तानी’ का विकास.

उसके बाद तो फिर ये धर्म बन गया,
हिंदी की उपेक्षा सबका कर्म बन गया.

अजी जब से देश आज़ाद हुवा है,
हिंदी का तो बस बलात्कार हुआ है.

रोती है हिंदी अब सिसक-सिसक कर,
अपने कुछ सपूतों के कलमों से लिपटकर.

हिंदी की हिफाजत हमारा फर्ज बनता है,
आखिर माता का भी तो कुछ कर्ज बनता है.

हम यहीं नहीं रुकेंगे इस कविता को लिखकर,
संघर्ष करेंगे खून-पसीना एक कर…………

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1 Comment

  • ज़माने में पैदा हुवे हैं जालिम बड़े-बड़े……
    मेरे विचार से गाँधी-नेहरु उनमे सबसे बड़े…….

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