कविता|Shortlink: 2010/06/21 10:01 am

वाह रे! इंसानों का इन्साफ

पिंजड़े में बंद एक चिड़ियाँ

नन्हे कोमल पंखो से

उड़ना चाहे कुछ कर ना पाए

आसमान में गोते भरना चाहे

पर टकरा जाये सलाखों से

आंशू छलक आये उसके आखों से

फिर सोचे कसूर क्या था मेरा

ना खून किया ना चोरी कि

ना आन्दोलन किया इंसानों से

कभी पूछा भी नहीं

क्यों उजाड़ रहे हो उन पेड़ो को

हमारा छोटा सा रैन बसेरा

नदियाँ सुखदी, पोखर सोख लिया

पी कम बर्बाद कर तुम इंसानों ने

जल स्तर को निचे कर दिया

बंजर बना दिया इस धरती को

किस लिए चाँद सिक्को के लालच में

अब पेड़ क्या खाख उगेंगे

कांटे बोते हो, केक्टस उगाते हो

अपनी फरमाईस सब पूरा कर जाते हो

ना जानवरों का ख्याल रखते हो

ना हमारे लिए संसद में सवाल करते हो

कहा रहेंगे वो कहा जायेंगे

क्या इस धरती पर उनका हक़ नहीं

केवल इंसानों के लिए तो धरती नहीं बनाई थी

हमारे मौला हमारे इश्वर ने

पर तुम्हे तो मॉल, मीनारों की आदत पड़ गई है

ठंडी हवा भी मशीनों से लेते हो

लेकिन हमें ठण्ड हवाएं कहा से मिल पायेगी.

पेड़ जो कांट डाले हो तुम सब

जब ये सरे कसूर तुम इंसानों ने किये

और मुझ बेक़सूर को सलाखों में डाल दिए

वाह रे! इंसानों का इन्साफ

अफजल कसाब को सरकारी मेहमान बनाकर रखते हो

और मुझ जैसे कमजोर पक्षियों और जानवरों को

सख्त लोहे के पिंजड़े में कैद रखते हो.

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