एक चतुर नार,
करे शत-प्रहार,
मुँह फाड़-फाड़,
डँसे बार-बार ।
जन चीत्कार करे बार-बार,
मचे हाहाकार,
आह! अत्याचार ।
ये दण्डप्रहार के बहाने हजार,
ये लोकाचार का बलात्कार,
यहाँ भ्रष्टाचार! वहाँ भ्रष्टाचार!
अँधी सरकार! चहुँ अँधकार!
जन अब हमार सुन ले पुकार,
पारदर्शिता की यह बयार
बहती हीं जाये, रुक्के न यार।
मंथन करें , कर लें विचार,
जनता की माँग जन-लोकपाल,
जन की तलवार जन-लोकपाल,
यह नव-संग्राम, भ्रष्ट संहार।
अन्ना, किरण और केजरीवाल,
समरांत तक मानें न हार।
जन की गुहार जन-लोकपाल,
अंतिम सवाल अब आर-पार,
जन-लोकपाल या मृत्युद्वार,
मद्द में चिंघार, जन-लोकपाल।
जन-लोकपाल! जन-लोकपाल!
– प्रकाश ‘पंकज’
(http:/prakashpankaj.wordpress.com)



समसामयिक अच्छी प्रस्तुति
प्रिय प्रकाश जी,
मेरा तो है यही विचार
इसका तो है एक ही परिहार
अब जनता पर है इसका भार
वो ही कर सकती है इन पर प्रहार
अब जनता को बनना पडेगा लुहार
सुनार की सौ के बजाय करे एक ही वार
अपने वोटो से इन सबको पहुंचाए स्वर्ग द्वार !
राम कृष्ण खुराना